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एक कविता रोज़: आज की रात

सब एक साथ उठें तो इन्हीं दीवारों पर कोई खिड़की खुल जाएगी. कह रहे हैं कैफी आज़मी.

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कुलदीप
17 अप्रैल 2016 (अपडेटेड: 17 अप्रैल 2016, 06:46 AM IST)
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अख़्तर हुसैन रिज़वी. उर्फ कैफी आज़मी. उर्दू के नामचीन शायर हैं. उन्होंने हिंदी फिल्मों के लिए भी कई गीत लिखे. आज उनकी यह रचना पढ़ें, जो जानलेवा लू में फुटपाथ पर सोते मजदूरों की कहानी है. लेकिन सिर्फ इतनी ही नहीं है. यहां 'गर्म हवा' मुश्किल हालात का रूपक है और खिड़की उम्मीद का रास्ता है.


आज की रात

कैफी आज़मी

आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है, आज की रात न फ़ुटपाथ पे नींद आएगी, सब उठो, मैं भी उठूं, तुम भी उठो, तुम भी उठो, कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जाएगी

ये जमीं तब भी निगल लेने को आमादा थी, पांव जब टूटती शाखों से उतारे हमने, इन मकानों को ख़बर है न, मकीनों* को ख़बर उन दिनों की जो गुफ़ाओं में गुज़ारे हमने

हाथ ढलते गए सांचों में तो थकते कैसे, नक़्श के बाद नए नक़्श निखारे हमने, की ये दीवार बुलन्द, और बुलन्द, और बुलन्द, बाम-ओ-दर* और ज़रा और निखारे हमने

आंधियां तोड़ लिया करतीं थीं शम्ओं की लौएं, जड़ दिए इस लिए बिजली के सितारे हमने, बन गया कस्र* तो पहरे पे कोई बैठ गया, सो रहे ख़ाक पे हम शोरिश*-ए-तामीर* लिए

अपनी नस-नस में लिए मेहनत-ए-पैहम* की थकन, बंद आंखों में इसी कस्र की तस्वीर लिए, दिन पिघलता है इसी तरह सरों पर अब तक, रात आंखों में खटकती है सियाह* तीर लिए

आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है, आज की रात न फुटपाथ पे नींद आएगी, सब उठो, मैं भी उठूं, तुम भी उठो, तुम भी उठो, कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जाएगी


मकीनों: मकानों के वासी बाम-ओ-दर: छत और दरवाज़े कस्र: महल शोरिश: शोरगुल तामीर: सृजनात्मकता मेहनत-ए-पैहम: छुपी हुई मेहनत सियाह: अंधेरा


https://www.youtube.com/watch?v=OsifISqyFQ4

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