मनोहर श्याम जोशी - ‘हम लोग’, ‘बुनियाद’ के लेखक. महेश भट्ट के लिए ‘पापा कहते हैं’लिखी थी. जो साहित्य वाले लोग हैं उनके लिए तो खैर जोश्ज्यू (जोशी जी) बहुत ऊंचीयानी ‘पहुंचेली’ चीज़ हैं. ‘क्याप’ के लिए साहित्य अकादमी पुरूस्कार मिला. 40 दिनमें लिखी गई ‘कसप’ को ‘मैला आंचल’ की तरह ही भारत के सर्वोत्तम ‘आंचलिक उपन्यासों’में से एक कहा जाता है. अज्ञेय का आशीर्वाद जिसको मिल जाए फिर उसकी बात ही क्या है.जोशी जी के उपन्यास अपने चुटीले अंदाज़ और व्यंग्यात्मक शैली के लिए पाठकों के बीचकाफी लोकप्रिय हैं. व्यंग्य लेखन में उनका कोई जवाब आस पास नहीं दिखता. ‘नेताजीकहिन’ के कोट्स तो आप यहां पर पढ़ ही चुके हैं उनके. प्रभात रंजन का उनपर एक मनोहरआलेख (जोशी जी की मनोहर कहानियां) भी पठनीय है. बहरहाल एक बहुत बढ़िया कहानी आज आपकोपढ़ा रहे हैं. कहानी एक 'काल्पनिक देश' की है जो 'काल्पनिक सफाई पसंद' है. लेख मेंदिए गये 'काल्पनिक' रेफरेंस बताते हैं कि ये राजीव गांधी युग का व्यंग है, लेकिन आजके युग में भी कित्ता फिट बैठता है. अंत में 'उस देश' का नाम लेने से जोशी जीहिचकिचाते हैं. लेकिन हम सब तो पहले ही पैरा में जान चुकते हैं कि 'हम उस देश केवासी हैं'--------------------------------------------------------------------------------उस देश का यारों क्या कहना? उस देश का यारों क्या कहना? और क्यों कहना? कहने से बात बेकार बढ़ती है. इसीलिएउस देश का बड़ा वजीर तो कुछ कहता ही नहीं था. कहना पड़ जाता था तो पिष्टोक्तियोंमें ही बोलता था. पिष्टोक्तियों से कोई नहीं पिटता. पिष्टोक्तियां हजम भी आसानी सेहोती हैं. सच, कहने में कोई अर्थ नहीं है, कहना पर व्यर्थ नहीं, कहने पर मिलती हैएक तल्लीनता और एक पारिश्रमिक का चेक (कई बार फोन करने और चिट्ठी भेजने पर). तो मैंउस देश के बारे में कुछ कहने बैठा हूं जो दुनिया का सबसे अधिक सफाई-पसंद देश है. यहसही है कि वहां कीचड़ से भी होली खेली जाती है, लेकिन यह भी सही है कि वहां केवातावरण में ही सफेदी लाने वाले कुछे ऐसे विशिष्ट रसायन पाए जाते हैं कि सारी होलीके बाद बेचारे ढूंढनेवाले कीचड़ के दाग ढूंढते ही रह जाते हैं. वहां के आमोद-प्रियनिवासी एक-दूसरे पर कीचड़ जमकर फेंकते हैं लेकिन कीचड़ किसी पर लगता या जमता नहींहै. हर कोई, हर क्षण बेदाग सफाई का, हंसता हुआ नूरानी विज्ञापन बना रह पाता है.गैर-सफाई-पसंद देशों में मानो सारा महत्व ही कीचड़ का है. जिस पर जरा-सी कीचड़उछलती है, उसे घबराकर पद से, और कभी-कभी तो जीवन से ही त्यागपत्र दे बैठने की सूझतीहै. मगर उस सफाई-पसंद देश में कीचड़ कमल का कुछ बिगाड़ नहीं पाता है. बल्कि पंकजितना ही ज्यादा उछले-गिरे, पंकज उतना ही देदीप्य- होता जाता है. उस देश के समझदारलोग इसीलिए कीचड़ महज शौकिया उछालते हैं, एक शगल के नाते उछालते हैं. इस मामले मेंवे कभी सीरियस नहीं होते. सीरियसली तो वह कमल की प्रार्थना ही करते हैं. उससफाई-पसंद देश के निवासी अपना दिमाग बार-बार साफ करते रहते हैं. इससे उन्होंनेसिर्फ काम की ही बातें याद रहती हैं. शहर के अंदेशे उनके दिमाग पर बोझ नहीं बनतेहैं. इतिहास की स्मृति सहज उत्साह की राह में बाधा नहीं डाल पाती है. उस देश केनिवासी अपना दिल भी साफ करते रहने के बारे में बहुत सजग हैं. इसीलिए वे अपनी सारीभावनाएं अपने पर और अपनों पर केंद्रित रख पाते हैं. रो लेने की विधि,चीखने-चिल्लाने की विधि से बेहतर समझते हैं. वे जानते हैं कि चीखने-चिल्लातने से तोरक्तचाप ही बढ़ना है. रो लेने से और कुछ नहीं तो मन की शांति तो मिलेगी. और वहमिलेगी तो फिर शांत मन से अपनी और अपनों की समस्याओं का विचार कर सकेंगे. चित्तशांत होने से रक्तचाप भी नीचे आएगा. नित्य नियम से रोकर दिल की सफाई करते रहनेवालेउस देश के निवासी हार्ट अटैक और स्ट्रोक जैसी उन बीमारियों से बचे रह पाते हैं जोचीखने-चिल्लानेवाले देशों में बहुत व्यापक रूप से फैल गई हैं. जहां तक पेट साफ रखनेका सवाल है, इस मामले में तो उस देश के निवासी जगदगुरु सिद्ध हुए हैं. उनके यहां कीएक कब्जहर भूसी का तो आज उन्नत देश के निवासी तक सुबह-सुबह जय-घोष करते पाए जातेहैं. उस सफाई-पसंद देश में छोटे-से-छोटा अनुष्ठान भी बाहरी और भीतरी शुचिता केबारे में पूरी तरह आश्वास्त हो जाने पर ही करने की स्वस्थ परंपरा रही है. उस देशमें उस बाहरी और भीतरी शुचिता के बारे में केवल एक मंत्र पढ़कर और तीन बार आचमनकरके आश्वस्त हो सकने की सुविधाप्रद परंपरा भी रही है. उस सफाई-पसंद देश के नागरिकहिसाब साफ रखने में यकीन करते हैं और जब हिसाब साफ कर दिया जाता है तब वे स्वयंहमेशा लेनदार साबित होते हैं, प्रतिपक्ष देनदार. उस देश के निवासी साफ बात कहने औरकरने का आग्रह करते हैं और बहुत सफाई से बात कहना और करना बखूबी जानते हैं. वे अपनेशत्रुओं तक को मारते नहीं, बस साफ कर देते हैं. उनके सफाई-पसंद होने का इससे बड़ाक्या प्रमाण होगा कि वे झूठ तक साफ-साफ बोलते हैं. इन सफाई-पसंद नागरिकों को बराबरप्रेरणा देते रहने के लिए संसार की सबसे पवित्र नदी उसी देश में बहती है जो मैल कोही नहीं, पाप को भी काट देती है. सबसे पवित्र पर्वत-माला उसी देश के केशों मेंलिपटी है. और उस देश की मिट्टी तो इतनी पवित्र है कि उससे तिलक करने की सलाह दीजाती है. आज भी वहां की जनता अपने नेताओं के चरणों से लिपटी हुई इस पवित्र धूल कोमाथे से लगाकर धन्य होती है. उस देश की माटी स्वनयं तो पवित्र है ही, अपने स्पर्शमात्र से शुचिता प्रदान करने की अद्भुत क्षमता रखती है. तो क्या आश्चर्य जो उस देशकी बहुसंख्यक आबादी सदा धूलि-धूसरित रहती आई है और अपने बच्चों को धूल में लोटलगाता देखकर पुलकित होती रही है. यही नहीं, हाथ धोने के लिए वह इस माटी को महंगे औरमहकते विदेशी साबुनों से बेहतर समझती आई है. इधर जब से उस देश में टेलीविजन नेउपभोक्ता संस्कृति के नाम पर विदेशी साबुनों का विज्ञापन शुरू किया है, कुछ कमजोरकलेजेवाले लोग घबरा उठे हैं और अपने देश की पवित्रता पर आंच आने का खतरा देख रहेहैं. सौभाग्य से उस देश में नेतृत्व हमेशा ऐसे ही लोगों के हाथ में रहता आया है, जोउस देश को ठीक-ठाक जानते हैं. न ज्यादा, न कम. बस इतना कि कम जाननेवालों से कह सकेंकि आप नहीं जानते हैं, इसलिए आपके हितों के संरक्षण और संवर्द्धन का काम हम अपनेहाथों में लिए ले रहे हैं. और जो ज्यादा जानते हों, उन्हें बता सकें कि जिस देश मेंयह पवित्र नदी विशेष बहती है, उसमें ज्याोदा जाननेवाले अपने देश को ठीक से नपहचानने के लिए अभिशप्त रहे हैं. तो विदेशी साबुनों का आक्रमण होने पर इन नेताओं नेकहा कि जिस देश में पवित्र नदी विशेष बहती है, उस देश के निवासी आज भी देश की माटीसे जुड़े हुए हैं. उसी को जोत-बोकर अपना पेट पाल रहे हैं. उसी से बने हुए घरों मेंवे रहते हैं. रात को उसी पर सुख की नींद सोते हैं. और सुबह उसी पर निवृत्त होकर,उसी से शौच करते हैं, किसी सिने-तारिका के सौंदर्य साबुन से नहीं. तमाम पश्चिमीप्रभाव के बावजूद, टी.वी. से फैलती सांस्कृतिक टी.बी. के बावजूद, हमारे देश की असलीआबादी को न ग्लैमररूम माने जा सकनेवाले बाथरूम में कोई आस्था हुई है, और न टायलेटपेपर से सफाई करने में कोई श्रद्धा. सच तो यह है कि वह आज भी इन पश्चिमी चोंचलों सेअपरिचित है. यह ठीक है कि गांव के लोग शहरों की तरफ भागने लगे हैं. दूसरों की क्योंकहें स्वयं हम भी गांवों से शहर में आ बसे हैं. लेकिन इसका यह अर्थ हरगिज नहींलगाया जाना चाहिए कि देश पश्चिम के प्रभाव में आ रहा है या कि उसका शहरीकरण हो रहाहै. इससे तो केवल यह संकेत मिलता है कि देश में लोकतंत्र स्वस्थ है, सबल है. शहरोंपर, सत्ता पर, उच्च वर्गीय शहरियों की बपौती नहीं रह गई है. झोंपड़ेवाले भी सरकारीबंगला-कोठी के दावेदार बन गए हैं. नेताओं ने यह भी कहा कि गांववालों के शहर में आनेके बावजूद गांवों की आबादी घट बिलकुल नहीं रही है. जनसंख्या के आंकड़े बताते हैं किहमारे देश की अधिकतर आबादी अब भी गांवों में ही रहती है. परमात्मा हमारे देश कीपवित्र छवि को बनाए रखने के लिए इतना चिंतित है कि उसने देश-माता को एक अद्भुतवरदान दे डाला है. चाहे विकास के कितने भी पंचवर्षीय आयोजन पूरे हो जाएं, चाहे तेरेकितने भी बेटों के लिए कितना भी आरक्षण कर दिया जाए, चाहे तेरे कितने भी बेटे शहरोंको चले जाएं, तू जहां है वहीं रहेगी, पवित्र धूल से धूसरित गांव में. और जब देश कीमाता ग्रामवासिनी रहेगी, तब देश भी ग्रामवासी ही रहेगा. जरा ये भी देखिएगा कि गांवसे शहरों में आई हुई यह आबादी अपने नित्यी कर्म में अपनी जमीन से, अपनी माटी सेअपना यह पवित्र संबंध बराबर जोड़े हुए है. गांव से आई जनता को तो शहर में रेल पटरीके आसपास या फिर सरकारी बंगले में बंधी हुई अपनी-अपनी भैंस की पीठ पर हाथ फेरते हुएइन नेताओं ने शंकालुओं को यह भी समझाया कि जो लोग हमारी तरह गांव से शहर आ गए हैं,वे भी अपने नित्य कर्म में अपनी जमीन और माटी से अपना वह पवित्र संबंध बराबर जोड़ेहुए हैं. गांव से आई जनता को तो शहर में रेल पटरी के आसपास या फिर पार्कों में अपनीजमीन से संपर्क साधे देखते ही होंगे आप, कभी हमारे सरकारी बंगलों और निजी शहरीफार्म हाउसों में सुबह-सुबह कोई आएंगे तो पाएंगे कि विदेशी कमोड हमारे लिएकब्जरकारी है और हमारे ग्लैमररूम जैसे बाथरूम में लिक्विड सोप से अधिक सम्माेन देशकी माटी को प्राप्त है. जब कुछ संवाददाताओं ने देश की बहुसंख्याक आबादी के माटी सेजुड़े इस संबंध को ही देश के गंदे होने का प्रमाण बताया और एक हाथ की तर्जनी औरअंगूठे से दोनों नथुने बंद करके दूसरे हाथ की तर्जनी सफाई-पसंद देश की तथाकथितगंदगी की ओर उठाते हुए हैरान होकर पूछा कि यहां लोग सांस भी कैसे ले पाते हैं? तबनेता बोले, काश कि कभी आप अपने नथुने खोलते और स्वयं अनुभव करके देखते कि और तमामचीजों के साथ-साथ हमारे देश का पवन भी पावन है और उनके जैसे पतितों का भी उद्धार करसकता है. ऐसा प्रतीत होता है कि अपनी नाक के साथ-साथ आप फिरंगी और फिरंगीवत आलोचकोंने अपनी आंखें भी बंद कर रखी हैं अन्यथा आप निश्चय ही ये देख पाते कि हमारे देश कीबहुसंख्यरक आबादी, इसी हवा से निर्मित हमारे चुनावी वादों पर जीती आई है. नेताओं नेइस ओर भी ध्यान दिलाया कि सफाई-पसंद देश को आकंठ गंदगी में डूबा हुआ बताने केदुस्साहस को कभी व्यंग्य-विडंबना में तो कभी मानवीय चिंता में छिपा जाने की कोशिशकरते हैं. सफाई-पसंद देश में गंदगी देखने-दिखानेवाले इन लोगों को उन्होंनने 'नाबदानके नायब इंस्पेकक्टैर' और 'गंदे चहबच्चे के बच्चे' ठहराकर अपनी ग्रामवासिनी माता कीतथाकथित गंदगी की सफाई में ऐसे-ऐसे तर्क दिए कि आलोचकों के मुंह खुले रह गए औरबोलती बंद हो गई. उदाहरण के लिए उस देश के नेताओं ने कहा कि अलग-अलग देशकाल मेंगंदगी की परिभाषा अलग-अलग तरह की होती आई है क्योंकि सौंदर्य-बोध देशकाल सापेक्षहै. अस्तुर जैसे आपको हमारी अपनी नाक अपनी जमीन पर सिनक देना गंदा लगता है, उसी तरहहमें आपका नाक रूमाल में सिनककर रूमाल को अपनी जेब में रख लेना गंदा लगता है. अगरआप तटस्थत होके देखें तो इस मामले में ही नहीं और तमाम बातों में भी आपकी गंदगी,हमारी गंदगी से कुछ ज्यादा ही गंदी ठहरेगी. नाबदान के नायब इंस्पेक्टरों से उस देशकी नेता बिरादरी यह कहती थी कि गंदगी दरअसल आपके दिमाग में है. इसीलिए आप हमारीतथाकथित गंदगी में ही अटके रह जाते हैं. हमारी सफाई आपको नजर ही नहीं आती है. अरेआपको हमारा गलियों में कूड़ा फेंकना तो नजर आता है लेकिन इससे पहले जब हम घर कीसफाई करके वह कूड़ा जमा कर रहे होते हैं तब आप आंखें मींच लेते हैं. अजी सच तो येहै कि जब आप हमारी गंदगी का मजाक उड़ा रहे होते हैं तब आप वस्तुतः हमारी गरीबी कामजाक उड़ा रहे होते हैं और यह भूल जाते हैं कि इस गरीबी के लिए आप ही पूरी तरहजिम्मेदार हैं. हम इस देश के नेता जरूर हैं मगर इस देश का बेड़ा गर्क कर सकनेवालेतो आप विदेशी ही थे, हैं और रहेंगे. अगर सच्चे मन से हिसाब लगाएंगे तो पाएंगे किहमारी विराट आबादी को देखते हुए हमारी गंदगी कुछ भी नहीं है. आप लोगों की प्रतिव्यक्ति आय ही नहीं, प्रति व्यक्ति गंदगी भी हमसे सौ-गुनी है. उस देश को ठीक-ठाकजाननेवाले लोग उस देश की गंदगी की ही नहीं, हर कमजोरी की तसल्लीबख्श सफाई देते रहे.इसीलिए सारी दुनिया अंततः यह मानने को मजबूर हुई कि तमाम गरीबी और गंदगी के बावजूदवही दुनिया का सबसे ज्यादा सफाई-पसंद देश है. वहां हर कोई सफाई मांगता है और हर कोईसफाई दे सकता है. ‘इस बारे में मैं कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता’ जैसी कायरउक्तियां उस देश के कायर-से-कायर नेता तक के लबों पर कभी नहीं आतीं. उस सफाई-पसंददेश में सफाई मांगने के नाम पर गंदगी फैलाना, खोदखाद कूड़ा सबके सामने बिखरा देनाअच्छा नहीं समझा जाता है, इसलिए एक अलिखित-सा समझौता है कि सफाई मांगी जरूर जाए,मगर जो सफाई दी जाए, उसे जहां तक हो सके, स्वीकार कर लिया जाए. सफाई हमेशा बहुत साफऔर सरल दी जाती है ताकि कोई ऐसा न कह सके कि गोलमाल बात करके कुछ छिपाने की कोशिशकी जा रही है. सबसे साफ और सरल सफाई वह मानी जाती है जिसमें आरोप को बिलकुलबेबुनियाद बताया गया हो. उदाहरण के लिए एक बार वहां छोटे वजीर पर यह आरोप लगा किउसने अपने भाई की मदद से विदेशों में घूस खाई है. उसने पहले सफाई दी कि मैंने कोईघूस नहीं खाई है. मेरे पास जो भी पैसा आया है, जायज तरीकों से ही आया है. इस परआरोप लगानेवाले ने सिद्ध करना चाहा कि भाई ने पैसा नाजायज तरीके से कमाया और नाजायजतरीके की कमाई में छोटे वजीर ने हिस्सा लिया है. छोटे वजीर ने बयान दिया कि इस बारेमें मैंने अपने भाई से सफाई मांगी है और उसका कहना है कि आरोप बेबुनियाद है. मैंमानवीय भाईचारे में विश्वास करता हूं. आप न करते हों तो आगे बात मेरे भाई से कीजिए.किसी की सफाई को देर-सवेरे न मान लेना उस सफाई-पसंद देश में शिष्टाचार के विरुद्धसमझा जाता है. फिर भी विदेशी प्रभाव में आए कुछ लोग किसी भी सफाई से संतुष्ट न होकरआरोप लगाते चले जाते हैं. ऐसी दशा में उस देश में पुलिस का एक पूरा विभाग ही सत्यासत्य की जांच के लिए खोल दिया गया है. सफाई-पसंद देश के निवासी अनिवार्य रूप सेउसकी जांच के नतीजों के बारे में भी सफाई मांगते हैं. इसीलिए उस देश में जांच कमीशनऔर प्रवर समिति बैठाकर गंभीर कांडों की गहराई तक जाने का प्रावधान है. किनारे परबैठकर पानी में पांव डाले हुए वह कमीशन, गहराई के विषय में पूर्वानुमान करते हुएकाफी समय लेता है. इस बीच वह मामला सफाई-पसंद देश की स्मृति से साफ हो चुका होताहै. कमीशन उस नतीजे पर पहुंचता है कि गहराई तो ऐसी है कि सारी व्यसवस्था को ले डूबेलेकिन अब उसमें जाने से कोई फायदा नहीं है. आवश्यकता इस बात की है कि आइंदा सावधानीबरती जाए ताकि गंदे-गंदे आरोप लगने से इस सफाई-पसंद देश में गंदगी न फैले. गंदेआरोप लगानेवाले स्वयं इस विषय में बहुत सजग रहते थे कि कहीं हमारी वजह से हमारे देशका वातावरण गंदा न हो. इसीलिए वे सत्तारूढ़ व्यक्ति के पीछे हमेशा हाथ धोकर हीपड़ते थे. मगर जैसे ही सत्तावान मेहरबान होकर उन्हें कुछ दे देता है, वे उसके समक्षहाथ जोड़कर खड़े हो जाते हैं. गंदे आरोपों के बीच भी देश को स्वच्छ रखने के विषयमें उस देश की नेता बिरादरी कितनी सजग है इसका एक अत्यंपत सुंदर उदाहरण 'नीले होंठकांड' में मिलता है: हुआ यह कि एक बार उस देश के किसी बड़े वजीर की घर से दूरअकस्मात मृत्यु हो गई. उसके पुत्र ने अपने पिता के शव के नीले होंठों की ओर जनता काध्यान दिलाते हुए यह आशंका व्यक्त की कि मेरे पिता की हत्या की गई है. उसके चमचोंने नए बड़े वजीर पर परोक्ष ढंग से आरोप लगाया कि उसने सत्ता हथियाने के लिए पिछलेबड़े वजीर की हत्या करा दी. लेकिन अंततः सफाई-पसंदी के हित में पिछले बड़े वजीर केपुत्र ने नए बड़े वजीर की यह सफाई मान ली कि पिछले बड़े वजीर दिल का दौरा पड़ने सेपहले जामुन खा रहे थे और इसीलिए उनके होंठ नीले हो गए थे. पिछले बड़े वजीर के पुत्रने न केवल यह सफाई मान ली बल्कि अपने चमचों के लगाए आरोपों से फैली गंदगी को दूरकरने की खातिर नए बड़े वजीर का यह अनुरोध भी स्वीकार कर लिया कि वह अपने पिता काअधूरा काम पूरा करने के लिए फिलहाल छोटा वजीर बन जाए. तो उस सफाई-पसंद देश में आरोपजितना ही गंभीर होता है, सफाई उतनी ही सरल होती है. आरोप को संगीन बनाने के लिए नितनए सबूत जुटानेवाले, उस देश में यह देखकर बहुत हैरान होते हैं कि संगीनी के साथ-साथबढ़ती सफाई की सरलता आखिरकार बहुत सादगी से उनका ही सफाया कर देती है. सफाई-पसंदनागरिक सफाई देनेवाले की मासूमियत के कायल होते हैं और वही-वही आरोप दोहराए चलेजानेवाले को सनसनी के नाम पर बोरियत फैलानेवाला ठहराते हैं. उदाहरण के लिए एक बारवहां किसी विदेशी तोप की खरीद में कमीशन के पैसे खुद खा जाने का गंभीर आरोप बड़ेवजीर पर लगाया गया. वह अपने को निर्दोष बताते रहे. उन्होंने कहा कि सर्वविदित है किहम डायटिंग कर रहे हैं. इसलिए यह कल्पनातीत है कि हमने पैसे जैसी गरिष्ठ चीज खाईहोगी. किसी और ने खा ली हो तो उसकी भी हमें कोई जानकारी नहीं है. जानकारी मिलेगी तोबताएंगे और आप निश्चित रहें, पैसा खाने के दोषी देश के कानून के अनुसार अवश्य दंडपाएंगे. आरोप लगानेवाले कहते रहे कि आप पूछेंगे, तभी तो जानकारी पाएंगे. जवाब मेंउन्हें यही सफाई सुनने को मिलती रही कि हम तमाम नियम-कायदों का पालन करते हुएपूछताछ कर रहे हैं. वही आरोप और वही सफाई का क्रम इतना लंबा चला कि उस सफाई-पसंददेश की पब्लिक झुंझला उठी और बोली कि जिन लोगों को उस तोप के सिवा कुछ नहीं सूझताहै, उन्हेंय उसी तोप से उड़ा दिया जाए. उस सफाई-पसंद देश में सफाइयां भी दो तरह कीहोती हैं, एक सार्वजनिक और एक निजी. सार्वजनिक रूप से ऐसी कोई सफाई नहीं दी जाती हैजिससे देश के वातावरण की स्वच्छंता को आंच पहुंच सकती हो. निजी सफाई भी दो तरह कीहोती है. एक वह जो विश्वत मित्र के कान में कही जा सके और दूसरी वह जिसके बारे मेंकहा जा सके कि या तो मैं जानता हूं या मेरा परमात्मा जानता है, और हां आरोपलगानेवाला भी. और चूंकि आरोप लगानेवाला उस बात को कहकर पहले ही वातावरण काफी गंदाकर चुका होता है इसलिए जिस पर आरोप लगा हो उसका यह कर्तव्यत हो जाता है कि सफाईदेकर उस गंदगी को साफ करे, यह नहीं कि स्वयं उसमें लोट लगाने लगे. यही कारण है किसफाई के मामले में उस देश के सत्तावान लोग सार्वजनिक और निजी को हर हालत में अलग हीरखते थे. एक बार को आप उन्हें सरकारी गाड़ी का घर की सब्जी लाने के लिए इस्तेमाल नकरने के लिए मजबूर कर सकते थे. एक बार को आप उन्हें वजीर पद क्या, संसार भी छोड़देने के वर्षों-वर्षों बाद तक सरकारी कोठी अपने ही नाम रखे रहने के लिए राजी करसकते थे, लेकिन मजाल है जो आप उनसे किसी सार्वजनिक मंच से वह सफाई बुलवा देते, जोवे एक-दूसरे के कान में बोल दिया करते थे. कोई साहब आपत्ति कर रहे हैं कि उससफाई-पसंद देश का नाम क्यों नहीं ले रहा हूं, इस बारे में तुरंत सफाई दूं. लगता हैये भी उसी सफाई-पसंद देश के नागरिक हैं. तो साहब, मेरी सार्वजनिक सफाई ये है किसठिया जाने के कारण मैं उस देश का नाम भी भूल गया हूं. अब आपसे क्या छिपाऊं, मैं तोअपने तीन बेटों के एक ही अक्षर से शुरू होनेवाले नामों तक में बुरी तरह गड़बड़ानेलगा हूं. मेरे सामने इसके अलावा अब कोई रास्ता ही नहीं रह गया है कि उनमें से कोईभी सामने आए, मैं क्रम से तीनों के नाम लेता चला जाऊं. कहना न होगा कि इससे जहांपहले बेटे को बहुत सुविधा हुई है, वहीं तीसरे को इतनी असुविधा कि अब उसने अपने कोटया कमीज पर अपनी नाम-पट्टी लगानी शुरू कर दी है. दिक्कत यह है कि मेरी निगाह भीसठिया गई है और मैं उस नाम-पट्टी को तभी पढ़ सकता हूं जब वह मेरी निगाह से चौथाईमीटर की दूरी पर हो. जहां तक मेरे दूसरे बेटे का सवाल है उसने अपनी इस स्थिति कोस्वीकार कर लिया है कि मेरा नाम, मेरे पिता द्वारा दूसरी कोशिश में ही सही पुकाराजाएगा. अब आप अपने कान मेरे होंठों के करीब ले आए हैं तो निजी सफाई भी दे डालूं.उम्र बढ़ने के साथ-साथ मेरा साहस घटता चला गया है. अब कौन इस उम्र में नाम लेकरझमेले में पड़े.--------------------------------------------------------------------------------मनोहर श्याम जोशी को और मनोहर श्याम जोशी के बारे में और पढ़ें:विज़िबिलटी पुअर रखिएगा तो फॉरगेट हो जाइएगाजोशी जी की मनोहर कहानियांकिस्सा पौने चार यार: जो छपा नहीं है, कहीं नहींएक कहानी रोज़: बिस्तर कमाने में उसकी नींद खर्च हो 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