वह ठकुराइन जो खुदकुशी करने की बजाय 'छिनाल' बन गईपहली बात, इस शीर्षक और कहानी से अपनी भावनाएं मत आहत कर लीजिएगा. और अगर कर भीलेंगे तो मेरा क्या उखाड़ लेंगे? दूसरी बात, मेरे एक अजीज ने यह कहानी मुझे सुनाईथी. उनके मुताबिक यह सच्ची कहानी है. मेरे मुताबिक तो हर कहानी ही सच्ची होती है.फिर भी परंपरा का निर्वाह करते हुए मुझे कहना है कि इस कहानी के पात्रों का जीवितऔर मृत किसी भी व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है. अगर ऐसा होता है तो इसे महज इत्तेफाकसमझ कर मुझे बख्श दिया जाए. यह कहानी एक ठकुराइन की है. आप कहेंगे कि ठकुराइन हीक्यों चमाइन क्यों नहीं? तो मैं कहूंगा कि आपको बहुत जल्दी है. पहले कहानी पढ़लीजिए. ठकुराइन और चमाइन में फर्क होता है. हालांकि फर्क पैदाइश नहीं होता. क्योंकिहम सभी मादरजाद नंगे होते हैं. आगे चलकर अलग-अलग किस्म के कपड़े पहन लेते हैं. खैर.ठाकुर दो किस्म के होते हैं. गरीब ठाकुर और अमीर ठाकुर. पर हमारा समाजशास्त्र दोनोंमें कोई फर्क नहीं कर पाता. अब भूमिका कुछ ज्यादा लंबी हो रही है आपको सीधे कहानीपर ले चलते हैं. गाजीपुर का हूं, मान लेते हैं कि कहानी भी गाजीपुर की है. हमारेसंपादकों ने सिखाया है कि किसी भी स्टोरी को कनेक्ट करना चाहिए. इसलिए मैंने भी इसेगाजीपुर से कनेक्ट कर दिया. एक गांव में गरीब ठाकुर के घर पहली के बाद दूसरी, तीसरीऔर चौथी भी बिटिया ही होती है. ठाकुर की ठकुराइन तो पहली ही बिटिया के बाद मर जातीहै. बांझ कोख तो गाली है पर बेटी की मां होना भी कम संकट वाली बात नहीं है. इसी हूकमें ठकुराइन मन से मर जाती है, पर शरीर से जिंदा रहकर ठाकुर को बेटा देने की कोशिशकरती रहती है. चौथी बेटी के पैदा होते ही ठकुराइन का शरीर भी मर जाता है. दरअसल येकहानी इस ठकुराइन की नहीं है. ये कहानी उसकी बड़ी वाली बेटी की है जिसे आगे चलकरठकुराइन बनना है. इसलिए सीनियर ठकुराइन के मरने या जिंदा रहने से कहानी की सेहत परकोई फर्क नहीं पड़ना था. अब जिसके होने या न होने से दुनिया को कोई फर्क नहीं पड़ताउसका मर जाना ही बेहतर होता होगा शायद. इसीलिए ठकुराइन मर गई. आप ठाकुर से किसी ऐसेजालिम आदमी की छवि तो नहीं बना रहे हैं, जिसकी मूंछें बड़ी-बड़ी और आंखें हमेशा लालरहती हों? अगर हां तो रुक जाइए. आप गलत छवि बना रहे हैं. आपका कंफ्यूजन दूर कर देताहूं. मैंने पहले ही बता दिया कि ठाकुर साहब गरीब थे साथ ही शीलता और सज्जनता केधनी. स्वभाव बहुत कोमल. कभी किसी से तेज आवाज में बात तक नहीं की. शक्ति के उपासकथे, स्त्री की पूजा करते थे, हालांकि ठकुराइन के चले जाने से बेटे की ख्वाहिश कहींदबी ही रह गई, पर इसके लिए ठकुराइन को दोष नहीं देते थे. हां कभी-कभी अपने प्रारब्धको जरूर कोस लेते. खैर, ठाकुर साहब रोज सुबह नहा-धोकर दुर्गा सप्तशती के श्लोकपढ़ते थे. चौथी बेटी काफी छोटी थी. घर में बेटियों के सिवा और कोई नहीं था इसलिएअक्सर उसे गोद में बिठा दुर्गा सप्तशती पढ़नी पड़ती. बड़ी बेटी जिसे इस कहानी मेंठकुराइन बनना था उस दौरान घर के काम कर रही होती और उसके कानों में अक्सर येपंक्तियां गूजतीं, 'या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता . नमस्तस्यै नमस्तस्यैनमस्तस्यै नमो नमः' पिता कभी-कभी अच्छे मूड में होते तो अपनी बेटियों को इन मंत्रोंका अर्थ भी समझाते. बड़ी बिटिया ने पिता से मंत्र का अर्थ सुना था, 'जो देवी सबप्राणियों में शक्ति रूप में स्थित हैं, उनको नमस्कार, नमस्कार, बारंबार नमस्कारहै.' ठाकुर गरीब थे इसलिए बड़ी बेटी पढ़ नहीं पाई. क्योंकि जब वह पैदा हुई तो ठाकुरऔर भी ज्यादा गरीब थे. बड़ी बिटिया के बाद कुछ बरकत आई तो घर संवरा बेटी का भविष्यनहीं, पर बेटी भागमती जरूर समझ ली गई. जैसा कि बेटियां सयानी हो जाती हैं. हमारेसमाज में बेटियों के साथ यह एक शास्वत समस्या है. वे सयानी हो जाती हैं. सयाने तोबेटे भी हो जाते हैं पर इस सयानेपन का मतलब उनकी बुद्धि और बल से लगाया जाता है.बेटियों के सयाने होने का मतलब उनकी छातियों और महीने में आने वाले खून से लगायाजाता है. पुराने लोग कह गए हैं कि सयानी बेटी पिता के सीने पर सांप की तरह लोटतीहै! आप कहेंगे व्हाट द फक! आप कह लीजिए मैं सुनने के लिए रुका हूं. अब आगे बढ़तेहैं. तो सयानी बेटी की चिंता से मुक्त होने के लिए गरीब ठाकुर शादी खोजने लगते हैं.शादियां सबकी हो ही जाती हैं. क्योंकि इसे विधि का विधान बताते हैं, ऊपर से तय होताहै. हर लड़की के लिए कोई लड़का बना ही होता है. वह तो आज की जेनरेशन है जो पता नहींक्यों लड़की के लिए लड़की और लड़के के लिए लड़के की लड़ाई लड़ रही है. तब हर लड़कीके लिए एक लड़का बना ही होता था. आप पहले ही जान चुके हैं कि ठकुराइन भागमती थी.संयोग देखिए कि गरीब ठाकुर की बेटी का रिश्ता एक अमीर ठाकुर के घर तय हो जाता है.अब इस कहानी में दो नए ठाकुर जुड़ेंगे. एक समधी ठाकुर, जो बिल्कुल आपकी कल्पना केठाकुर की तरह रोबिले हैं और दूसरे दामाद ठाकुर जो शहर में बैरिस्टरी की पढ़ाई करतेहैं और बैरिस्टर बनने से पहले ही खुद को बैरिस्टर समझते हैं. समधी ठाकुर को अपनेछोटे बेटे के लिए बहू चाहिए थी. ठाकुर ने रिश्ता देखा, सोचे गरीब घर की लड़की ठीकरहेगी. अदब में रहेगी. रिश्ता तय हो जाता है. छोटे ठाकुर को शहर के पते से एक तारभेज दिया जाता है. तार में बड़े ठाकुर का आदेश था, घर आओ, तुम्हारी शादी है. छोटेठाकुर को जिस वक्त यह तार मिला उस वक्त ठंड का मौसम था. छोटे ठाकुर अपनी प्रेयसीमिस मालिनी के साथ ब्रांडी पी रहे थे. गांव से आया उनका नौकर उनकी पसंदीदा सिगरेटपनामा लेने बाजार गया था और बैकग्राउंड में रफी साहेब गा रहे थे, 'देखो रूठा न करो,बात नजरों की सुनो.' हम-आप गूगल की पीढ़ी वाले हैं इसलिए आप सर्च करके बेजा मेहनतकरें उससे पहले बता दूं कि फिल्म तेरे घर के सामने (1963), गायक रफी और लता, संगीतएसडी बर्मन. जाहिर सी बात है कि गाने के बोल के मुताबिक मिस मालिनी और छोटे ठाकुरके चेहरे के हाव-भाव भी बदल रहे थे. तार मिलने से कुछ देर पहले ही छोटे ठाकुर नेमिस मालिनी से वादा किया था कि दुनिया की कोई ताकत उन्हें जुदा नहीं कर सकती और वेजांत-पांत जैसे दकियानूसी ख्यालों को नहीं मानते. तभी तार मिला. तार पढ़ते ही छोटेठाकुर का चेहरा उतर गया. मिस मालिनी ने चिंता में पूछा, डार्लिंग इज एवरीथिंग ओके?ठाकुर के कांपते हाथों से तार छूटा, मिस मालिनी ने उठाकर पढ़ लिया. ताज्जुब की बातकि मिस मालिनी के चेहरे के भाव कुछ ज्यादा नहीं बदले, उसने बस इतना पूछा, अब क्या?तार में दी गई तारीख पर घर पहुंचने के लिए छोटे ठाकुर को तत्काल निकल देना था.उन्होंने मिस मालिनी से वादा किया कि वह अपने पहले के वादे पर कायम हैं. उनकारिश्ता किसी संबोधन या कस्टम का मोहताज नहीं. सुधि पाठकों अगर आपको लग रहा है किछोटे ठाकुर ने झूठा वादा किया, तो आप गलत हैं. कहानी के अंत में आपको पता चलेगा किछोटे ठाकुर ने मिस मालिनी से किया अपना वादा पूरा किया. खैर छोटे ठाकुर को देर रातकी गाड़ी पकड़नी थी. करीब आधे घंटे और थे उनके पास. दोनों ने फिर एक गाना सुना,ठाकुर ने दर्द के समय का अपना फेवरिट गाना लगा दिया. शहर की रात और मैं, नाशाद औरनाकारा फिरूं, जगमगाती जागती सड़कों पे आवारा फिरूं' 'ऐ गम-ए-दिल क्या करूं, ऐवहशत-ए-दिल क्या करूं'. अब इस गाने को आप गूगल करके ही जानें, सबकुछ बना बनाया नहींमिलेगा आपको, पकाना भी पड़ेगा. दरअसल छोटे ठाकुर ने मिस मालिनी को बताया कि पिताजीबड़े संगदिल हैं. जवान हो चुके बेटे पर भी हाथ उठाने से नहीं चूकते और सबसे बड़ीबात कि उन्हें बैरिस्टर बनने से पहले बाप से मिलने वाले पैसों की सख्त जरूरत है. एकबार बैरिस्टर बन गए, तो इस भव सागर को भी पार कर जाएंगे, इस वादे के साथ छोटे ठाकुररुखसत हुए. छोटे ठाकुर गांव पहुंचे तो शादी का माहौल तैयार था. हालांकि छोटे ठाकुरशादी के लिए कत्तई तैयार नहीं थे, पर हल्की सी इच्छा थी कि शादी किससे हो रही है,कुछ पता चल जाए. आखिरकार खाते वक्त भौजाई ने वज्र गिरा ही दिया. गर्म रोटी देतेवक्त भौजाई फुसफुसाई, आ रही है अनपढ़ देवरानी, अब दिखाना तेवर. अगर आप इसे भौजाई कीचुहल समझ रहे हैं, तो गलत हैं. दरअसल भौजाई ने अपना बदला पूरा किया था. छोटे ठाकुरने अपने बड़े भाई की पत्नी को एक दफा सार्वजनिक तौर पर जलील किया था. उन्होंने उसेगंवार कहा था, जबकि भौजाई आठवीं पास थी. भौजाई ने उस दिन तंज कहकर अपने मन की फांसनिकाल दी. 'भौजाई रॉक, छोटे ठाकुर शॉक' कुछ ऐसा ही माहौल था. छोटे ठाकुर ने एकबारगी विरोध का मन बनाया, पर पिता की सोने की मूंठ वाली छड़ी याद आ गई. खैर कहानीकुछ ज्यादा लंबी हो रही है जबकि असली कहानी शेष है. इसलिए अब कहानी सीधे ठाकुर कीशादी के बाद से शुरू होगी. गरीब ठाकुर की बेटी अब ठकुराइन बन चुकी है. सुहागरातफिल्मों में ही नहीं असल में भी होती है बस उसमें तब ग्लैमर का तड़का नहीं हुआ करताथा. छोटे ठाकुर की सुहागरात थी. पर वे बागी हुए जा रहे थे और उस रात सोने के लिएअपने पिता ठाकुर के बनवाए मंदिर के सामने बनी एक छोटी बैठकी में चले गए. मंदिर गांवजाने वाले मुख्य रास्ते में ही था. पाठक गण इस मंदिर को याद रखें, कहानी में इसकीअहम भूमिका है. ठकुराइन रोज की तरह सो गई. सुबह बड़े ठाकुर घर में खंखारते हुएघुसे. कड़क कर पूछा, 'बबुआ अब तक सोकर नहीं उठे क्या?' भौजाई ने एक बार फिर अपने मनकी फांस निकाली, 'बबुआ तो रात में मंदिर की तरफ चले गए थे, लौटे ही नहीं.' बवंडर होगया ये तो! बड़े ठाकुर का गुस्सा फूटा, 'शहर जाकर नामर्द हो गए क्या जनाब', कोईसमझाएगा कि हम उन्हें समझाएं, छिनाल बन जाएगी पत्नी तो कौन संभालेगा.' ठकुराइन कमरेमें अकेले थी, दुर्गा सप्तसदी सुनने के अभ्यस्त कानों के लिए ये शब्द बिल्कुल नयातो नहीं था पर नया ही लगा. छोटे ठाकुर घर लौटे, तो बड़े ठाकुर रास्ता रोके खड़े थे.छोटे ठाकुर समझ गए, पिटने से पहले गलती मानी, कहा आगे से ऐसा नहीं होगा बाबूजी.अगली रात दोनों साथ में सोए, सुहागरात थी, छोटे ठाकुर को बुरा नहीं लगा. ठकुराइन केमन से इस कहानी को अभी कोई लेना-देना नहीं. शादी के बाद छोटे ठाकुर शहर लौटने कीप्लानिंग कर रहे थे, उन्होंने इस बाबत मिस मालिनी को तार भी कर रखा था. पर अचानकबड़े ठाकुर बीमार पड़े और चल बसे. बड़े भाई को खेती की तो समझ थी पर कारोबारीबुद्धि नहीं. छोटे ठाकुर ने हिसाब लगाया. भगवान का दिया उनके पास बहुत था, अब बड़ेठाकुर के बाद लंबी-चौड़ी जायदाद के अकेले खेवनहार थे. सो इस बार मिस मालती को तारनहीं, खत लिखा. लंबा-चौड़ा खत. खत का पूरा मजमून देने का वक्त नहीं है क्योंकि मैंभी कहानी के सबसे अहम बिंदु पर आना चाहता हूं. छोटे ठाकुर जो कि अब बड़े हो चुके थेलिखते हैं, 'प्रिये, हमारा प्रेम अमर है. मैं बैरिस्टर नहीं बन पाया, घर का बोझ आगया. पर तुम बैरिस्टर जरूर बनोगी. तुम्हें मनी ऑर्डर मिलते रहेंगे. मैं आता-जातारहूंगा. तुम एक बार बैरिस्टर बन जाओ फिर हम साथ रहेंगे.' कुछ ऐसा लिख ठाकुरमुस्कुराए, उन्होंने आखिरकार एक क्रांति को अंजाम दे दिया था. दो साल बीत गए.ठकुराइन उनकी पत्नी थीं यह केवल उस रात के वक्त पता चलता जिस रात ठाकुर उनके साथसोते. ठाकुर ने ठकुराइन का चेहरा तक नहीं देखा था. दिन में ठकुराइन घूंघट में होतीऔर रात में अंधेरे में. ठाकुर गांव में शान से अपने पिता की सोने की मूंठ वाली छड़ीलेकर निकलने लगे थे. आखिर वह खुशी का दिन आ गया. ओह शायद आप फिर गलत समझ बैठे,ठकुराइन गर्भवती नहीं हुईं थीं, मिस मालिनी बैरिस्टर बन गईं थीं. ठाकुर को तार सेसूचना मिली तो उन्होंने गांव में एक जलसे का आयोजन किया. मिस मालिनी का आना तय हुआ.घर में रौनक छा गई. ठाकुर ने छत पर अपना खास कमरा बनवाया. शानदार कालीन,झाड़-फानुस, लाखों खर्च किए. आखिरकार वह दिन भी आ गया. जश्न की महफिल सजी. ऊपर केकमरे में ठाकुर का परिवार, दोस्त और लागा चुनरी में दाग पर मिस मालिनी के ठुमके.ठकुराइन नीचे से ऊपर और ऊपर से नीचे के इंतजाम में लगी हुई थीं. मिस मालिनी थक करबैठी ही थीं कि ठकुराइन की गलती से जाम की ट्रे उनपर पलट गई. और बवाल, ठाकुर नेकहा, गंवार कहीं की, देखती नहीं क्या कर डाला. मिस मालिनी ने पूछा कौन है घूंघट मेंयह औरत. सब खामोश, मिस मालिनी समझ गई, मुस्कुरा कर बोलीं कि ओह आपकी पत्नी ठाकुरसाहब. ठाकुर साहब ने जलती निगाहों से ठकुराइन को देखा और उन्हें वहां से भाग जानेको कहा. यहां से असल कहानी शुरू हुई. शुक्रिया पाठकों की आप धैर्य पूर्वक यहां तकपढ़ते हुए पहुंचे. फिर ठकुराइन ने अपना घूंघट हटा दिया. समाज ने पहली बार ठकुराइनका चेहरा देखा. गोरा दगदग चेहरा. गाढ़ा सिंदूर, लाल बिंदी, ठकुराइन महफिल के बीचमें दुर्गा की तरह दिख रही थी. वैसा ही जैसा पोस्टरों में दुर्गा दिखती हैं. पूरीमहफिल स्तब्ध, ठकुराइन की आवाज गूंजी. किसे भाग जाने कहा आपने, मुझे? ठकुराइन नेपूछा. ठाकुर सकपका चुके थे एकबारगी जवाब नहीं सूझा. ठकुराइन ने फिर कहा, 'छिनालपंथीतुम करो और भाग मैं जाऊं?' ठाकुर अब अवाक थे. तुम! ठकुराइन उन्हें तुम बोल रही थी,वही ठकुराइन जिसने आजतक उन्हें पुकारा तक नहीं था. मिस मालिनी भी अवाक थीं, उन्हेंलग रहा था कि ठकुराइन ने भरी महफिल में उन्हें छिनाल बना दिया. ठाकुर बोले यह क्याबदतमीजी है. मिस मालिनी ने आंखों में आंसू भरकर ठाकुर की ओर देखा, ठाकुर का गुस्सासातवें आसमान पर. 'निकल जा कुलटा इस घर से, गंवार कहीं की, बेशर्म औरत, तेरी इतनीऔकात नहीं कि तूं अब यहां रुके' ठकुराइन यह सुनने से पहले जाने के लिए पलट चुकी थी.पर वह फिर पलटी, इस बार उसने ठाकुर को घूर कर देखा. ऐसी नजर कि ठाकुर की रूह कांपगई. ठकुराइन ने अपने प्यारे नौकर को आवाज लगाई. राम बालक! जी मालकिन! अब राम बालकके बारे में भी जान लीजिए. बचपन से ठाकुर के घर में रहा 14 साल का लड़का. ठकुराइनकी इज्जत करने वाला बस एक ही शख्स. वरना जिस औरत की इज्जत पति न करे उसकी इज्जतकरता ही कौन है. राम बालक उस आवाज के साथ हाजिर हुआ. ठकुराइन ने आदेश दिया, मेरेकमरे से सामान उठाओ. ठाकुर ने तंज कसा, कहां जाओगी, मायके? ठकुराइन बोली, राम बालकमंदिर वाले बैठके में ले चलो मेरा सामान. ठाकुर को सांप सूंघ गया, घर की इज्जत घरसे निकलकर बैठके में जा रही थी. महापाप, घोर बेइज्जती. ठाकुर ने रोकने की कोशिश की,अगले ही पल ठकुराइन के हाथों में दीवार पर लटकी कटार थी. खबरदार! काट कर रख दूंगी.ठकुराइन की आवाज गूंजी. महफिल स्तब्ध थी. ठकुराइन मंदिर वाले बैठके में जम गई थी.फिर इसके आगे की कहानी आपकी भाषा में वीयर्ड है. बताते हैं कि ठुकराइन ने उस बैठकेसे धंधा शुरू कर दिया. पैसा लेकर लोगों के साथ सोने लगी. ठकुराइन हर जात के लोगोंके साथ सोने लगी. क्या चमार, क्या धोबी और क्या दुसाध. गांव में चर्चे आम हो गए.ठाकुर का घर से निकलना दूभर हो गया. ठाकुर की इज्जत को कालिख पुत चुकी थी. ठुकराइनपर कोई फर्क नहीं था. लोग बताते हैं कि ठकुराइन ने मरघट पर शव साधना कर ली थी.बदनामी की हूक में ठाकुर बूढ़े होते जा रहे थे और ठकुराइन जवान. रोज सुबह मंदिरधोती और रात को धंधा करती. गांव में किसी को कुछ बोलने की हिम्मत नहीं थी क्योंकिएक तो उनका नौकर राम बालक जवान हो चुका था और लाठी भांजने में सिद्धहस्त. दूसराठकुराइन के बारे में यह कहानी प्रचलित हो गई थी कि इलाके के एक मशहूर डाकू काकिसी-किसी रात उस बैठके में आना-जाना रहता है. खौफ था, इसलिए ठकुराइन के खिलाफ उनकेमुंह पर किसी ने चूं तक नहीं कसी. एक दिन राम बालक दरवाजे से आवाज लगाकर बोला,ठकुराइन, हो ठकुराइन! अंदर से आवाज आई, क्या है रे? ठाकुर मर गए. अंदर से आवाज आईअच्छा. चलोगी नहीं देखने? नहीं. अरे एक बार देख लो? नहीं तूं देख आ. राम बालक दाहसंस्कार कराकर लौटा, तो बैठके का दरवाजा खुला था. बैठके में सारा सामान मौजूद था परठकुराइन नहीं. लाश मिली नहीं, इसलिए कह सकते हैं कि ठकुराइन ने खुदकुशी नहीं की, याशायद वह अबतक मरी ही नहीं. कभी-कभी अफवाह उड़ जाती है कि ठकुराइन अमावस की रातमंदिर में आती है. राम बालक से पूछो तो मुस्कुरा देता है. लोग कहते हैं कि पागल होगया है! आप इसे ठकुराइन का बदला कहने के लिए स्वतंत्र हैं. मंदिर आज भी वहीं, बैठकाभी वहीं हैं, आप चाहें तो ठाकुर के गांव जाकर इस कहानी की तस्दीक कर सकते हैं. परआप जाएंगे कैसे, मैंने तो बताया ही नहीं कि ठाकुर का गांव कौन सा था? आप सोच रहेहोंगे कि उस पार्टी के बाद मिस मालिनी का क्या हुआ? आपको बता दें कि मिस मालिनी शहरलौट गईं. वह बैरिस्टर बन चुकी थीं और जहां भी हैं खुश हैं. आप चाहें तो उनसे पूछसकते हैं? किस्सा खत्म!--------------------------------------------------------------------------------गर्म रातों को जुगनू देखने की आरज़ू में, हम बिजली गुल होने की दुआ करते थे