चंचल शर्मा नए लिखने वालों में से हैं. नोएडा में रहती हैं. अब तक दो किताबें आचुकी हैं. 'दहलीज़ पर दिल' और 'खुलती गिरहें'. तीन और किताबें हैं, जो आखिरी चरण मेंहैं. इतना लिख चुकने के बाद तो पुराने लिखने वालों में गिनती होने लगती है. एककहानी रोज़ में आज हम आपको उनकी कहानी पढ़ा रहे हैं. 'पलाश'--------------------------------------------------------------------------------अंधेरा होते-होते जब सूरज के ढलते ही लोग घरों में लौटते, पलाश घर से निकल जाता.रात का शहंशाह बनने की कवायद पिछले 7 महीने से चली आ रही थी. पर वो पिटा हुआ प्यादाहोने से रत्ती भर भी कुछ ज्यादा नहीं था. बिना एक अक्षर पढ़े-लिखे स्कूल में किताबोंके हवाईजहाज बनाने पलाश को इस शहर में साल भर गुज़ारा करना ही था, तब जाकर वो रकमजुड़ पाती, जिसे हथेली पर जमाकर वो गिलोल का हाथ मांगने गांव वापिस जाता. अगर अपनेमुंहफट्टपन पर लगाम रखकर उसने गिलोल के पिता से वो चुनौती न ली होती, तो आज अजनबीशहर में इस तरह भटकना न पड़ता. गांव में कुछ भी करके 2 वक़्त की रोटी खिलाने लायक कमाही लेता. गिलोल के प्यार से सब मुमकिन था, पर अब पछताने से क्या होता. सच यही था किवो शहर में दर दर भटक रहा था. आते-आते गिलोल से मिल भी नहीं पाया था. दूर छत पर एकबार उसकी हल्की सी झलक दिखी थी बस. वो आधा मुंह दुपट्टे में छिपाए रो रही थी शायद.उसके बाप से कह दिया था कि इंतज़ार करे, लेकिन उससे कहना भूल गया था. क्या फर्क पड़ताहै, जो बात पूरे मोहल्ले को पता थी, वो गिलोल को भी पता होगी. कैलेंडर पर नज़र डालीतो 210 दिन गुजर गए थे, जिसमें आखिरी बार 200 दिन पहले गिलोल की आवाज़ सुनी थी.“कितना रोती होगी, याद में”- सोचकर उसने पलकें पोंछ ली. 8 बजते ही वो सीढ़ियों पर सेउछलता हुआ बिल्डिंग से नीचे उतर आया. गली में बैठे कुत्ते ने अब उस पर भौंकना बंदकर दिया था. पहले पहल उसने पलाश की पतलून पकड़ कर पूरे मैदान में दौड़ाया था. एक तोउसका हुलिया उस पर उसका रात-बेरात आना-जाना, गली के सभी कुत्ते उसके खिलाफ हो गएथे. पर फिर पलाश की नेक दिली ने उनका दिल जीत लिया और अजनबी शहर में उसे चार यारमिल गए. वो हाथ हिलाता हुआ सड़क के किनारे-किनारे चलने लगा. बिल्डिंग से 2 किलोमीटरदूर आकर बस स्टॉप पर बैठ गया. ये पिछले 7 महीनों में 23वां ठिकाना था. पलाश नेसिगरेट का छल्ला बनाया और आसमान की तरफ मुंह कर दिया, धुंआ उड़ता उड़ता वापिस नाक मेंआ गिरा. जोर की खांसी उठी, तो थूक के छींटे उड़ गए, उसने मुंह पर हाथ नहीं रखा औरफव्वारे को हवा में छोड़ दिया. बगल से एक और खांसी सुनाई दी. धुएं ने एक और नाक केरुएं जलाए, उसने पलट कर देखा तो दो और आंखें तरेरकर देख रही थी. शख्स मन में कुछबड़बड़ाया और उठकर दूर जाकर बेंच पर जा बैठा. पलाश को बहुत मज़ा आया. आज दिल जलाने काकोटा पूरा हो गया था, एक हफ्ते से कोई भी उसे देखकर चिढ़ा नहीं, किसी के मुंह सेगाली और बद्दुआ नहीं सुनी, किसी ने लानत नहीं फेंके थे, तो पेट में एक गोला बन बैठाथा. आज गाली और हाय ने पेट में बने गोले को हल्का आकार दिया, पलाश ने चैन की सांसली. चाय का स्वाद अब बढ़िया ढंग से आया. पर हाथ में कुछ चुभा तो देखा कि चाय का कपकिनारे से चटक गया, और चाय बूंद-बूंद रिसने लगी. इतने हलके प्लास्टिक के कप कोकोसकर उसने मन में सोच लिया, कि आज के बाद वो कभी भी बाहर चाय नहीं पिएगा. जब भीहोगा, किसी अच्छे से ढाबे में बैठकर ही चाय लेगा, भले दुगुने पैसे खर्च हो. महंगीजगह पर बैठकर खाने-पीने से आदमी का रुतबा बढ़ता है. गिलोल के बाप को रुतबा देखकर हीयकीन आएगा कि वो उसका दामाद बनने लायक है. पूरे 45 मिनट हो गए, लेकिन दौड़ती-भागतीसड़क पर एक भी गाड़ी आकर नहीं रुकी. हॉर्न के शोर कानों के परखच्चे उड़ाने लगे. पलाशने कानों के दोनों तरफ मफलर को कसकर लपेट लिया, तो कान की नरम सी हड्डी में चीस सीहुई. उसने गर्दन के पास ऊंगली फिराकर मफलर की पकड़ को ढीला कर दिया. पूरी बेंच खालीहो गई थी. सड़क पर ट्रैफिक बढ़ा. गाड़ी धीरे-धीरे खिसकने लगी. दूर तक सड़क खुलने का कोईसंकेत नज़र नहीं आता था. ये काफिला कम से कम एक घंटे के लिए जाम हो गया था और पलाशको घंटे भर तक अपना हुनर आजमाने का मौका मिल गया. उसने बस स्टॉप से नीचे उतरकरमोबाइल का टॉर्च जला लिया और गाड़ियों के बगल से गुज़रकर एक-एक करके देखना शुरू किया.एक गाड़ी पर मोबाइल की लाइट डालते ही बड़ी घनी मूछों वाले आदमी ने शीशे उतार दिए,आदमी मन में कुछ बुदबुदाया तो पलाश ने शक्ल देखते ही दो भारी भरकम गलियां देकरटॉर्च बंदकर दिया. गाड़ी में बैठे आदमी ने खिड़की में से झपट्टा मारते हुए पलाश कामफलर पकड़ा वैसे पीछे वाली गाड़ी ने हॉर्न बजा दिया. पलाश ठीक-ठाक आगे बढ़ गया, तबपीछे मुड़कर उसने बस होंठ गोल-गोल घुमाकर एक भन्नाटेदार गाली घनी मूछों वाले आदमी कोदी, जिससे गाड़ी का मालिक तिलमिला कर रह गया. पलाश अगली गाड़ी के शीशे पर रौशनी करकेशीशा खुलने का इंतज़ार करने लगा, तो आदमी ने शीशा नहीं खोला. पीछे की सीट पर 2 बच्चेबैठे थे, और आगे रात में काला चश्मा लगाये एक सजी धजी औरत जो हर एंगल से आदमी कीपत्नी लग रही थी. पलाश ने शीशे पर ठोंक मारी तो भी किसी ने कोई जवाब नहीं दिया, नही गाड़ी के भीतर कोई हिला. पलाश ने ड्राईवर साइड आकर कांच पर चेहरा टिकाकर देखा तोउसने फ़ौरन पहचान लिया, कि यही आदमी महीने भर पहले उसे गाजीपुर रेड लाइट पर मिला था,और तब उसने खुद ही शीशा उतार कर पलाश को रोका था. उसे गुस्सा आया तो उसने मुंह सेच्विंगम निकाली और फ्रंट मिरर पर चिपकाकर रेस लगा दी. भागते-भागते पीछे मुड़कर देखा,गालियों की आवाज़ सुनी, लेकिन आदमी नीचे नहीं उतरा. “अगर उतरता तो इसकी उतार देता”-पलाश ने मन में सोचा. आज उसे ज्यादा ही गुस्सा आ रहा था. धूल में पैर पटकता वो आगेबढ़ने लगा और फुटपाथ के किनारे-किनारे चलते हुए अगली रेड लाइट पर पहुंच गया. रात के11:30 हो गए थे. आज भी वो इसी तरह भटकता रहा तो गिलोल को कोई ले उड़ेगा. “अपने प्यारके लिए उसे लड़ना होगा. सब कुछ दांव पर लगाना होगा. ’- उसने सोचा और रोड के किनारेगाड़ियों की कतार के बगल-बगल चलने लगा. हाथ में मोबाइल की लाइट जलाए वो शीशों पररौशनी डालता और आदमी का चेहरा देखता. आदमी ही सही थे, औरतों से वो दूर था. गिलोल केसिवा किसी की तरफ नज़र उठाकर देखेगा भी नही, मन में सोच कर वो घर से निकलता था. एकगाड़ी का शीशा धीरे-धीरे नीचे उतर रहा था. पलाश दौड़कर ड्राइवर सीट के नज़दीक आ गया.उसने फ़ौरन कमीज़ का ऊपर वाला बटन खोलकर गर्दन पर हाथ घुमाया और एक हाथ कमर पर रखलिया. मोबाइल की टॉर्च बंद करके जेब में रख ली. गाड़ी का शीशा आधा ही खुला, आदमी नेहाथ बाहर करके पलाश का चेहरा छुआ और जोर से नाख़ून गढ़ा कर होठ के पास खून का थक्काजम्मा दिया. पैसे के बदले प्यार इसी हिसाब का मिलता था. खून से सना हुआ. आदमी काहाथ मजबूत था, पलाश ने चूं तक नहीं की. गाड़ी वाले आदमी ने दोबारा हाथ बाहर निकालातो 100 का कड़क नोट पलाश की तरफ बढ़ा दिया. उसने नोट लपक लिया. लाइट हरी हो गयी. गाड़ीधीमी-धीमी रफ़्तार से आगे जाती जा रही थी और पलाश फिर दौडकर गाड़ी के कंडक्टर साइड आगया. गाड़ी अभी भी रुकी हुई थी. अंदर बैठे लोगों ने आधा शीशा उतार लिया था. 100 कानोट देने वाले आदमी के बगल में औरत बैठी थी, जिसने पलाश को देखकर सड़क पर थूक दियाथा. पलाश ने जेब से मोबाइल निकालकर टॉर्च जलाई. गाड़ी के शीशे पर रौशनी डाली, तो आधाचेहरा दिखा. हंसता हुआ. जाना पहचाना. “गिलोल उस दिन छत पर रोई नहीं थी” – पलाश रातभर यही सोचता रहा”.--------------------------------------------------------------------------------कल आपने पढ़ा था. इंजीनियरिंग युद्ध इतिहास में पहली बार था कि बात कर युद्ध काप्रोटोकॉल तैयार होना था आपको भी अपनी कहानी भेजनी है? हमारे यहां लगवानी है.लल्लनटॉप राइटर बनना है. भेज देओ. lallantopmail@gmail.com पर.