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सलीम मीकू को बकरे से कुत्ते में बदलना चाहता था

आज पढ़िए वैभव श्रीवास्तव की कहानी 'ईदगाह'

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2 सितंबर 2017 (अपडेटेड: 21 नवंबर 2017, 05:28 AM IST)
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अपने बारे में पूछने पर वैभव कहते हैं कि वो ऐसे शहर में 'समय' बेचते हैं जहां किसी के पास समय नहीं है. पिता जी रेलवे में हैं और इसी बहाने वैभव ने सोनपुर से ले कर बड़ौदा तक तमाम नगरों की बोली चखी है, और बचपन से ले कर अभी तक मिले लोग और अनुभव उनकी कहानियों में झलकते हैं. पिता जी द्वारा सुनाई गई आमिर हमजा और तिलिस्म की दास्तां ने इतनी तगड़ी छाप छोड़ी है कि वैभव लिखने में और असल ज़िंदगी में जादुई यथार्थवाद ढूंढते रहते हैं. फिलहाल बॉम्बे और मुंबई दोनों से इश्क लड़ा रहे हैं, उनका पहला लघुकथा संकलन 'Borrowed From Tomorrow' हाल ही में प्रकाशित हुआ है. आज एक कहानी रोज़ में पढ़िए उनकी कहानी बकरीद. आप भी कहानियां लिखते हैं अपनी कहानी हमें भेजिए, lallantopmail@gmail.com पर.

जब सलीम के अब्बा घर के लिए एक पालतू बकरा ले कर आए तो वो बहुत खुश हुआ. उसके दोनों भाई उससे उम्र में काफी ज्यादा बड़े थे, दोनों अब्बा के साथ बढ़ईगिरी का काम करते थे इसलिए उसके पास साथ में खेलने के लिए कोई नहीं था. उसको इस बात की ख़ुशी थी की पूरी धारावी में सिर्फ उसी के पास हर दो-तीन महीने में एक नया क्रिकेट बैट और स्टंप्स और लकड़ी की बनी एक बॉल आ जाती थी. पर उसकी कम उम्र और छोटे कद की वजह से धारावी के बाकी बच्चे उसका बैट ले कर उसको भगा देते थे. अम्मी भी घर पर नहीं रहती थी, किसी दुकान पर कपड़े सिलने का काम करती थी. अब्बा कहते थे की अम्मी बहुत बढ़िया कपड़े बनाती है, अम्मी अपनी तारीफ खुद कभी नहीं करती थी, और अब्बा की सुन कर अपनी हथेली से मुंह ढंक कर इतने ज़ोर से मुस्कुराती थी की उनकी मुस्कान हथेली के पीछे से बाहर निकल कर आ जाती थी. जब भी सलीम ज़िद करता था की अम्मी उसके लिए कपड़े बनाए तो अम्मी हंस कर टाल देती थी, 'पगले मैं लड़कियों के लिए कपड़े बनाती हूं, फूल पत्ती की डिज़ाइन बना कर, तू लड़कियों के कपड़े पहनेगा?'
अब्बा और अम्मी और दोनों भाइयों की गैरमौजूदगी में सलीम बहुत अकेला हो जाता था. घर की दीवार पर स्कूल से चुराई चॉक से कुछ बनाता रहता था या फिर झुग्गियों के बीच टहलता था. उसने एक-दो बार अब्बा से कहा कि उसके लिए एक पालतू कुत्ता ले आया जाए, तो अब्बा कहते थे 'धारावी में इतने कुत्ते टहलते रहते हैं, किसी को भी एक बार दो पाव दे देना, बन जाएगा तेरा पालतू, इसमें कुत्ता खरीदने की ज़रूरत कहां है?' फिर धीरे से जोड़ते थे, 'हां अपनी अम्मी को मत बताना मैं तुझको ये सब आईडिया दे रहा हूं, मुझको बहुत मार पड़ेगी.' पर सलीम को ये आईडिया पसंद नहीं आता था, धारावी के कुत्ते अच्छे थे पर उसको ऐसा कुत्ता नहीं चाहिए था जो घर के अंदर आए तो बदबू आए या फिर जिसको अम्मा चप्पल मार कर भगाएं, उसको एक साफ़ सुथरा सा सुंदर पिल्ला चाहिए था जो धीरे धीरे बड़ा हो.
इसीलिए जब घर में पालतू बकरा आया तो सलीम को लगा चलो कुत्ता न सही, बकरा भी कुत्ते जैसा ही होता है. भौंक भौंक कर अम्मा और अब्बा को परेशान भी नहीं करेगा, और अगर गंदगी भी मचाएगा तो उतनी ज्यादा नहीं जितनी एक कुत्ता मचा सकता है. क्योंकि सलीम स्कूल से बारह बजे तक आ जाता था और घर के बाकी लोग शाम छह बजे आते थे, सलीम को बकरे की ज़िम्मेदारी दी गई थी, अब्बा ने कहा 'इसको चराने ले जाया कर, उधर सर्किल के पास जहां घास है वहां पर, लेकिन ज्यादा दूर मत जाना, ऐसा न हो की तू टहलते हुए सायन पहुंच जाए!' उसके भाई इस्माइल ने मज़ा लेते हुए कहा, 'और अगर सायन पहुंच गया तो लंच होम से कीमा पैक करा लाना. ' सलीम ने मन में सोचा की उसके अब्बा को डरने की कोई ज़रुरत नहीं है, उसको तो सायन का रास्ता भी नहीं पता. और सर्किल तो घर से बस दस मिनट दूर था, सलीम ने ठान ली की वो सायन नहीं पहुंचेगा और खोएगा भी नहीं, उसने तय किया की अपने बकरे को कुत्ते की तरह ट्रैन करेगा ताकि वो रास्ता सूंघ कर घर पहुंचा दे. अम्मी से ज़िद्द करने पर उसको एक कपड़े का पट्टा और एक सुतली का हिस्सा मिला, और उसने अपने बकरे को एक कुत्ते की तरह पट्टा पहना दिया.
सलीम ने बकरे को मीकू नाम दिया, हालांकि बकरे को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ा, पर सलीम को लगा की अभी नया है, धीरे-धीरे उसको नाम की आदत लग जाएगी. शुरू-शुरू में मीकू थोड़ा आलसी था, सलीम सुतली से खींचता था और बकरा ज़मीन पर घसीटते हुए आता था. थोड़े प्यार और थोड़ी मार से उसको वो रोज़ दोपहर सर्किल तक ले जाता, पर वहां पहुंचने के बार मीकू अपना सारा आलस भूल जाता था, घंटे भर तक लगातार घास चरने के बाद सलीम को मीकू को खींच कर वापस घर ले जाना पड़ता था. रास्ते भर सलीम कोशिश करता रहता था की मीकू कुत्तों जैसी कुछ हरकत दिखाए, पर मीकू को ना तो बॉल के पीछे भागने में दिलचस्पी थी और ना लकड़ी की टहनी पकड़ने उछलने में. और तो और, मीकू सलीम के 'शू' बोलने पर भी नहीं भागता था. वो रास्ते भर घास ढूंढता रहता था और जहां मिलती वहीं चरना चालू हो जाता. अपने बकरे में कुत्ते जैसे गुण की कमी से सलीम दुखी था.
दो-तीन दिन के अंदर मीकू अपना नाम तो नहीं पहचानने लगा, पर अब वो सलीम को स्कूल से आते देख खड़ा हो जाता था, शायद इसलिए की अब घास खाने का टाइम आए गया, या फिर शायद वो सही में सलीम का पालतू बकरा बन गया था. पांचवे दिन के बाद से मीकू सलीम को देख कर मिमियाने लगा, और धीरे-धीरे सलीम के सीटी बजाने या ताली बजाने पर उसके पास आने लगा. सलीम अब थोड़ा खुश था, उसको लगा की उसका बकरा धीरे धीरे कुत्ता बनने की कगार पर है. मीकू अब सलीम का पीछा करता था, भाग कर नहीं, पर जिस रास्ते से सलीम आगे आगे हो कर चलता, मीकू पीछे पीछे आ जाता. उसने कोशिश की कि कीमीकू बॉल से खेलना सीखे, पर एक बार बॉल खाने की कोशिश के अलावा मीकू ने उस तरफ कोई ध्यान नहीं दिया. एक बार मीकू ने अब्बा से शिकायत भी की की मीकू बड़ा अड़ियल है, अब्बा ने कहा, 'जैसा सलीम वैसा उसका बकरा!' अब्बा कभी भी मीकू को नाम से नहीं बुलाते थे, पर मीकू का कभी ध्यान नहीं गया, क्योंकि अब्बा उसको भी कई बार 'ऐ लड़के' या 'ऐ छुटके' कह कर बुलाते थे. एक हफ्ते बाद सलीम को लगने लगा की मीकू अब उसकी बात समझने लगा है, उसके चुटकी या ताली बजाने पर तुरंत खड़ा हो जाता था, और घास चरते चरते सलीम की स्कूल की आप-बीती कान खड़ा कर सुनता था. घर में भी थोड़ा बहुत उत्पात मचता था, जिसको देख कर सलीम खुश होता था की मीकू अड़ियल नहीं रहा.
पर एक हफ्ते बाद एक और चीज हुई जो उसको समझ में नहीं आई, सर्किल पर और भी लड़के अपने बकरे चराने आने लगे. उनमें से ज्यादातर के बकरे हट्टे-कट्टे थे पर मीकू सलीम की तरह छोटा था. जैसे सलीम खुद बाकी बच्चों से दूर रहता था वैसे उसने मीकू को भी बाकी बकरों से दूर रखा, वो नहीं चाहता था कि उन बकरों के बीच मीकू छोटा महसूस करे. उसने एक दो बार अब्बा से पूछा की बाकी लोग भी अपना पालतू बकरा क्यों ले कर आ रहे हैं, अब्बा ने गोलमोल जवाब दे टरका दिया. कुछ दिन बाद सलीम ने मीकू को ले कर सर्किल जाना छोड़ दिया, उसने एक नयी जगह ढूंढी जहां पर ज्यादा भीड़ नहीं थी और वो और मीकू अकेले खेल पाते थे. अब उसको पूरा भरोसा हो गया था की मीकू को ट्रैन किया जा सकता है, और मीकू भी उससे घुल-मिल गया था.
एक रात आधी नींद में उसने अम्मी और अब्बा को बात करते सुना 'आपको क्या ज़रुरत थी सलीम को उसके साथ खेलने देने की, देखिए कितना खुश रहता है साथ.' 'अरे मैंने उसको सिर्फ घास चराने के लिए कहा था , अब वो नहीं चराता तो कौन चराता? न तुम घर जल्दी आ सकती हो ना मैं. ' 'कोई और चारा नहीं है? मत काटिए उसको?' 'बीबी मैं इतने साल से सोच रहा था कि अपने पैसे से कुर्बानी दूंगा, इतनी रकम इकट्ठा करके लाया हूं, और तुम कहती हो की ना काटूं? और नहीं काटा तो? बकरी थोड़ी है जो दूध देगा!' 'एक बार फिर सोच लीजिए, बच्चा है. ' 'बच्चा है इसीलिए भूल जाएगा, अब ज्यादा सोचो मत और सो जाओ, परसों छुट्टी है तो कल सुबह जल्दी है. ' अम्मी और अब्बा तो सो गए पर सलीम को रात भर नींद नहीं आई, उस बच्चे को ये लगता रहा की मीकू को इसलिए काटा जाएगा क्योंकि उसने अब्बा से उसकी शिकायत की थी. अपराधबोध से बेचारा सलीम रात भर सिसकियां भरता रहा, सुबह उठ कर उसने अब्बा सामने मीकू की बहुत तारीफ की, मीकू अब अड़ियल नहीं है, अब काफी कुछ एक पालतू कुत्ते की तरह हो गया है, उसने ये भी कहा की जब तक मीकू है तब तक उसको किसी कुत्ते की ज़रुरत नहीं है. पर उसके वालिद जल्दी में थे इसलिए उसकी बातें अनसुनी कर के निकल गए. उसने अम्मी से भी मीकू की खूब तारीफ की, और ना जाने क्यों अम्मी कुछ नहीं बोलीं , पर एक छोटा सा आंसू पोछ कर अपने काम पर निकल गईं.
उस दिन सलीम स्कूल नहीं गया, दोपहर तक हिम्मत जुटा कर उसने एक प्लान बनाया. उस दिन वो घर से काफी दूर मीकू को चराने ले गया. धारावी के पास कुछ इमारतें थी जिनके सामने एक छोटा सा नाला बहता था, और नाले के बगल में एक पेड़ों का झुण्ड था. भारी मन से उसने मीकू को वहां छोड़ा और चला गया. घर जाते जाते उसका दुःख धीरे धीरे ख़ुशी में बदल गया, उसको लगा की उसकी वजह बच गई है, और उसने छोड़ा है वहां पर और कोई जानवर नहीं है, और मीकू तो आलसी है, वो उसी इलाके में घूमता रहेगा और सलीम रोज़ शाम को उसके साथ जा कर खेल सकता है. अब मीकू कहां है ये उसका राज़ रहेगा.
सलीम को घर पहुंचते देर हो गयी थी, जब तक उसने घर में कदम रक्खा तब तक उसके अब्बा वापस आ चुके थे. 'आ गए मेरे शहज़ादे सलीम? खूब घास खिलाई बकरे को?' उसके अब्बा ने इधर उधर देखते हुए कहा, 'वो तेरा बकरा है कहां?' सलीम ने बड़ी मुश्किल हुए कहा, 'अब्बा मीकू तो खो गया. ' 'क्या मज़ाक कर रहा है लड़के, खो गया? कहां खो गया?' 'पता नहीं पापा मैं थोड़ी देर के लिए एक पेड़ के नीचे लेटा तो तुरंत नींद आ गई,और मैं सो गया, जब उठा तो देखा मीकू गायब था.'
अब्बा हंसते हुए बोले, 'देख छुटके, अब्बा मज़ाक के मूड में नहीं हैं, जल्दी से बकरे को ले आ वरना मैं बहुत गुस्सा हो जाऊंगा. ' 'पर अब्बा मैं मज़ाक नहीं कर रहा, मैं रोज़ ध्यान देता हूं बस आज नींद...' 'अरे नासपीटे तो उसको बांध कर रख देते! तुझे मालूम है तूने क्या खोया है?'
सलीम ने सचमुच के आंसुओं के साथ रोते हुए कहा, 'डांट क्यों रहे हैं? आपका थोड़ी था मीकू, मेरा था. मैं पहले से काफी दुखी हूं, और आप मुझे और रुलाना चाहते हैं.' अब्बा ने गुस्सा काबू करते हुए कहा, 'देख लड़के, मैं डांट नहीं रहा, पर वो बकरा बहुत ज़रूरी है, अगर वो नहीं मिला कुफ्र हो जाएगा, तेरे अब्बा दोजख चले जायेंगे, तू चाहता है अब्बा दोजख जाएं? नहीं ना? तो वो बकरा ले आ, ज़रूरी है… अरे? वो तो रहा बकरा! पगले सलीम, अपने अब्बा को डराता है!'
सलीम ने डरते हुए पलट के देखा कि उसके मीकू ने एक और कुत्ते का गुण पा लिया है, और वो सूंघते-सूंघते वापस सलीम के घर पहुंच गया है.

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