चर्चित कथाकार सृंजय का आज जन्मदिन है. उन्हें शुभकामनाएं देते हुए एक कहानी रोज़में आज पढ़िए उनकी कहानी - 'कॉमरेड का कोट'. ये कहानी पढ़ने के पहले, ये भी पढ़िए किसृंजय इसके बारे में क्या लिखते हैं. "भोजपुर (बिहार) जिले के बलुआ गांव के एकव्यक्ति थे कमलनाभ उपाध्याय. मिडिल स्कूल में शिक्षक थे. वह पार्टी करते थे. कर्मठ,ईमानदार, परदुखकातर, समर्पित और मिलनसार प्रकृति के थे. जन्मना ब्राह्मण थे, लेकिनब्राह्मणवाद से घृणा करते थे. दलित-दमित, शोषित-पीड़ित लोगों से सहजता से जुड़ जातेथे. मानवता के निकष पर खरे थे, लेकिन सवर्ण समाज में बेहद बदनाम भी थे. मेरे साथउनकी खूब छनती थी. वय वरिष्ठ होने के बावजूद कमलनाभ जी से मेरा दोस्ताना संबंध था.जब भी छुट्टियों में गांव जाता तो उनसे जरूर मिलता. दुनिया-जहान, राज-समाज की खूबबातें होतीं. संस्मरण सुनाने में माहिर थे. संभवतः जनवरी 86 की घटना होगी. एक शामबड़े घबराए हुए से मिले. ठंड के बावजूद पसीने से लथपथ थे. घबराहट की वजह जाननी चाही,तो बोले कि यार! एक बहुत बड़ी गलती हो गयी है. मैंने पूछा कि क्या? तो झोले से एकलाल ओवरकोट निकालकर दिखाने लगे, ‘इसे लेकर चला आया हूं.’ फिर तो पूरे विस्तार सेउन्होंने माघ के महीने में गंगा के दियारे में स्थित एक गांव में हुई.उस पार्टीमीटिंग का पूरा ब्यौरा देना शुरू कर दिया. उस मीटिंग में बाहर से भी कई कॉमरेड आयेहुए थे. पूरी घटना सुनने के बाद मैंने पूछा कि अब क्या होगा? बोले कि पार्टी सेनिकाल दिया जाऊंगा, मेरे ऊपर नक्सलवादी होने का ठप्पा मार दिया गया है. मैंने कहाकि तब आप ऐसी ही किसी समानधर्मा पार्टी से जुड़ जाइए. कमलनाभ उपाध्याय बहुत मायूसहोकर बोले. "वहां भी तो कोई समझदारी नहीं देख रहा हूं. आमूलचूल परिवर्तन के बदलेवहां भी वर्चस्ववाद की लड़ाई चल रही है, मेरे जैसा आदमी शायद हर जगह दुत्कारा हीजाएगा!” पहली बार कमलनाभ उपाध्याय को इतना व्यथित और बेचैन देखा मैंने. यथार्थ कायही सच खंड मेरे हाथ लगा था. मैंने उनकी व्यथा को अपने मनोकोष में सहेज लिया किसच्चे और प्रतिबद्ध लोगों की बेचैनी क्या चीज होती है. जनवरी 1986 से शुरू हुईलिखाई अक्टूबर 1988 में पूरी हुई. नवंबर 1988 में राजेंद्र यादव जी को प्रकाशनार्थभेजी. फरवरी 1989 में कहानी ‘हंस’ में प्रकाशित हुई. इसके बाद की कहानी सबको मालूमहै. लेखक और संपादक पर खूब हमले हुए. ‘हंस’ के साथ-साथ अन्य पत्र-पत्रिकाओं,अखबारों में भी लगातार बहसें जारी रहीं. इस कहानी ने मेरे लिए दोस्त कम दुश्मनज्यादा पैदा किये. आज भी मुझे साहित्यिक समाज में अच्छी नजर से नहीं देखा जाता."--------------------------------------------------------------------------------कॉमरेड का कोट सृंजयओसारे से बाहर सिर निकालते ही माघ का तुषार बबूल के कांटे की तरह बरसा. कमलाकांतउपाध्याय के जोड़-जोड़ में सिहरन भर गयी. उनके दांत जोरों से रपटने लगे. वह भीतर लौटआए और आलने पर के पुराने कपड़े उलटने-पुलटने लगे. पत्नी पास ही खड़ी थी. सूनी-सूखीआंख उठाकर उनकी तलाश को भांपते हुए. कमलाकांत ने पुराने कपड़ों का गट्ठर छान मारा,लेकिन चादर न मिली. ”का खोज रहे हैं?” उनकी उठापटक से पत्नी परेशान होकर बोली.”चदरिया नहीं मिल रही है?” उनके उत्तर में प्रश्न भी शामिल था. परेशान होकर वहबिखरे कपड़ों को फिर उसी जगह रखने लगे, ”पहले सोचा कि ऐसे ही निकल जाऊं, लेकिन बाहरपाला झनझना रहा है.” ”मिलेगी कहां से!” पत्नी बुदबुदायी, ”बबुआ को अपने त ओढ़ा आएहैं.” हारकर वह बेटे के पास चले गये. उसके लिलार पर हाथ रखा. वह प्रतिक्रियाहीन पड़ारहा. निश्चेष्ट. लगभग एक घंटा पहले वह बेटे के पास ही बैठे थे. जब सरसाम की-सी हालतमें उसका बड़बड़ाना तेज हो गया था. तेज बुखार में कंपकंपाहट के साथ जुड़ी ऐसे चढ़ी आरही थी, जैसे बाढ़ का पानी. एकमात्र कंबल को खींच-खांचकर उन्होंने उसकी थर्राहट कमकरने का प्रयत्न किया था, लेकिन रेशा-रेशा घिस चुके बूढ़े कंबल को जैसे खुद किसीओढ़ने की जरूरत थी. कमलाकांत ने वही किया था. अपनी चादर उतारकर कम्बल पर साट दी थी.इसके बाद भी उसका कांपना बंद न हुआ था. बाप का ममत्व. उनमें एक इच्छा जगी कि वहअंगीठी में बदल जाते तो सुलग-सुलगकर बेटे को गर्मी पहुंचा देते. लेकिन अंगीठी तोदिल में जलती है, जलती क्या, धुंधुआती है और शायद ही उससे खुद को भी राहत पहुंचतीहो. उन्होंने तखत पर बिछी कथरी को भी बेटे पर फैला दिया था. और बेटा अभी बेहोश-सापड़ा था. उन्होंने किसी जेबकतरे की तरह बड़ी सावधानी से उसकी देह से चादर खींचना शुरूकिया. पत्नी उनके काम को ऐसे देखती रही, जैसे कोई खलखींचवा मुर्दा पशु की देह कीआखिर खाल उतार रहा हो, पत्नी से आंखें टकरायीं तो अपनी ही नजर में ओछे बन गये जैसे.पल-भर के लिए उनका हाथ सुन्न-सा हो गया और खुश्क आंखें सफ़ाई-सी देती मालूम पड़ींक्या करूं? बाहर जाना नितांत आवश्यक न होता तो भला कौन बाप यूं बज्जरकरेजी बने?हालांकि पत्नी कुछ बोल नहीं रही थी. बुत बनी उनको निहारने के सिवाय. उसकी आंखों मेंवही सूनापन था, जो हर वक्त रहता है. न कोई उलाहना, न कोई उमंग.एक तटस्थ-सा समझौतेका भाव. सामना न कर सके वह. कमलाकांत से ठहरा न गया, चादर उठायी और उसमें अपने कोछुपाते हुए लम्बे-लम्बे डग भरने लगे. जिद्दी ठंड थी कि मच्छरों की तरह उनकी देह केनंगे हिस्सों पर डंक चुभो ही देती थी. लत्ते-सी हो चली इस चादर को बदलने का खयालउन्हें फिर हुआ, लेकिन क्या-क्या बदलें वह? हालत तो ऐसी है कि आगे ढंको तो पीछेउघाड़. वह हथेलियां घिसते हुए तेज-तेज चलने लगे, ताकि इसी से गर्माहट बनी रहे. पिछलेदिनों वायुमंडल में अचानक निम्न चाप हो जाने से बूंदाबांदी हो गयी थी. आज मेघ केपूरी तरह खुल जाने से धरती का रहा-सहा लिहाफ़ भी जाता रहा, सो ठंड उग्र हो चली थी.कुहरे की धुंध में वह शीत से थर-थर बढ़े जा रहे थे. गाभिन गाय की तरह माघ की अलसायीरात में समय का अनुमान लगाना बड़ा मुश्किल था. तिथि के मुताबिक अंधरिया कब की बीतजानी चाहिए थी, लेकिन धुंआसी चाँदनी घने कुहरे के सामने धरती को रोशन करने मेंकितनी बेबस थी. पल-भर के लिए वह बड़े हो गये और अपने गांव की ओर रुख किया. चारों तरफसोता पड़ गया था. कुत्ते भी नहीं भौंक रहे थे. उनका गांव गोलाकार बसा हुआ है. धुंधमें डूबा गांव किसी दैत्याकार पशु के गोबर के चोथ की तरह लग रहा था. गांव के अमूमनबीच में खड़ी बाबू जगतनारायण सिंह की दोमंजिली हवेली बड़ी ही वीभत्स लग रही थी. उसकाअगवासा ढह चुका था. जैसे किसी जंगली मकना हाथी का निचला जबड़ा तोड़ दिया गया हो औरदर्द के मारे वह मुँह फैलाता जाये, ऐंठते हुए. मकान बनवाने के लिए अपशकुन से बचनेके लिए लम्बे बांस से जो सूप, जूता और झाडू़ लटकाये गये थे, उस पर शायद एक उल्लूआकर बैठ गया था. बड़े ही भयावह तरीके से उसने तीन आवाजें निकालीं, ”आऊक …आऊक… ओ ऊ ऊऊ क्!” कमलाकांत ने कानों पर हाथ रख लिया. कर्कशता से बचने के लिए, लेकिन अपशकुनसे कहां बच पाया कोई? कितने अरमानों से बाबू जगतनारायण ने हवेली को नया रूप देनाचाहा था. इसके लिए उन्होंने कितने सही वक्त का चुनाव किया था. माघ का महीना मालिकोंके लिए बड़ा अच्छा होता हे. इस समय मजदूर सस्ते मिलते हैं. हर साल का नियम है इसदोफ़सली देहात को भादो और माघ महीने में दुर्दिन आ घेरता है. भादो तो खैर बरसात औरबाढ़-बूड़े के चलते, लेकिन माघ में फसल तो खेतों में लहलहा रही होती है और खेतिहरमजदूरों को बैठकी का सामना करना पड़ता है. खेतों में काम तो रहता नहीं औररोजी-रोजगार का दूसरा कुछ साधन मिलता नहीं. हाथ पर हाथ रखे भूखों मरने की नौबत आजाती है. कुछ तो पंजाब-हरियाणे की तरफ भाग चलते हैं और जो बाकी बचे वे मालिकों सेडेढ़ा-सवाई पर अनाज उधार लेते हैं. माघ में एक मन लिया तो चैत में कटनी-दवनी के वक्तमजदूरी में से डेढ़ मन कटवा देंगे. भूख से बेहाल हुए मजदूर उनसे अनाज उधार मांगनेगये थे. उन्होंने देना भी चाहा था. ताकि मजदूर दूसरे प्रांतों में न भाग जायें.लेकिन कुछ चीजें बंधक रखकर. मजदूरों के पास अपनी देह के अलावा बंधक रखने को थाक्या! उन लोगों ने काम ही देने को कहा. जगतनारायण सिंह कई वर्षों से मन बनाते आ रहेथे, हवेली के पुराने ढंग के अगवासे को तोड़कर नयी डिजाइन देने का. नये ढंग के‘बैठका’ में एयरकूलर भी लगाने का विचार था. पिछला हिस्सा यानी रिहायसी कमरे या‘जनानाकित्ता’ उसी पुराने ढंग का रहता. चोरी-डकैती से वे कमरे सुरक्षित थे, क्योंकिउनमें जंगले नहीं थे. मजदूरों ने दो-तीन दिन काम करके उन हिस्सों को ढाह दिया. अबवे उनसे सरकार की तयशुदा मजदूरी की मांग करने लगे. बाबू जगतनारायण को लगा कि यदि एकबार उन लोगों को चोखी मजदूरी का स्वाद लग गया तो खेती के काम में भी वही दर मांगनेलगेंगे. तत्काल उन्होंने काम बंद करवाया और दूसरे गांव से मजदूर बुलवा लाए!‘आनगंवई’ और ‘निजगंवई’ मजदूरों में हलकी-सी झड़प भी हो गयी. लेकिन समझाने-बुझाने सेसरकारी रेट पर मिलने वाली मजदूरी की बात पर ‘आनगंवई’ मजदूर भी इनके साथ हो गये.अधखड़ी हवेली बाबू जगत नारायण को हिलते दांत की तरह दुःख देने लगी. न टूटे, न कुछठंडा-गरम ही खाने दे. दोनों तरफ से आन चढ़ गयी और वह आन कैसी जो चुनौती की सान परपजकर दुधारी से भी तेज न हो उठे? उल्लू फिर बोला, ‘ओऊ ऊउ …आऊक्’ और डैना पटपटातेहुए उड़ चला. कमलाकांत को चेत हुआ उल्लू के बोलने पर, वरना न जाने कितनी देर तकहवेली के बारे में ही सोचते रह जाते. वह अपने गांव से काफ़ी दूर चले आये थे. अरनाभैंसे की तरह गांव के सीवान पर खड़ा खैरा पीपल इसकी गवाही दे रहा था. इस पीपल से नजाने कितनी किंवदंतियां, कितनी स्मृतियां, जुड़ी हुई हैं. कहते हैं गांव वाले किसैकड़ों साल से यह पीपल ऐसे ही खड़ा है. इसके आगे की कितनी पीढ़ियां गंगाजी में सिरागयीं, लेकिन यह पीपल अपने तने में एक और कोटर बढ़ाकर ऊपर सरक गया. यह पीपलबनते-बिगड़ते जमाने का गवाह है. अंगरेज हाकिमों के राज में इसने एक बार आदमी की तरहइजलास में गवाही दी थी… शीतल मिसिर बताते हैं, जिनकी उमर ही अदालत की सीढ़ियों परमुकद्दमे की पैरवी करने में कटी… अभी जो हेमू साह हैं न पंसारी की दुकान वाले, इनकेबाप धरीछन साह से एक अहीर ने पाँच मोहर का करज लिया था और वह पच्चीस साल तक नहींचुका पाया. धरीछन साह ने ललमुँहा हाकिम के पास नालिश कर दी. पेशी हुई तो अहीर कहनेलगा, ‘माई किरिये, बाप किरिये, चाहें तो गुरु किरिया खिया लें होजूर! हमारी फूटलीकौड़ी की औकाद नहीं तो मोहर का करज काहे वास्ते लेंगे?” हाकिम ने गवाह लाने का हुकुमदिया. धरीछन साह सकपकाये. उन्होंने अकेले में मोहर दिया था. क्या बोले? कपार पीटनेलगे, ‘सरकार उहाँ आदमी तो कोई नहीं था. हाँ, एगो पीपर के पेड़ के नीचे करज दिया था.”हाकिम बोला, ”उसी को लाव… डव्रीचन शाव!” वह सुबकने लगे, ”इतना बड़का पेड़ कइसे आवेगाहोजूर? जदी आवेगा तो कइसे सुनावेगा होजूर?” ”अम गोवाह मांगटा.” हाकिम ने टेबुल परकाठ की छुटकी हथौड़ी ठोकी, ”अम जो हुकुम डेटा, उसको बजा लाव… डव्रीचन शाव!” धरीछनसाह महाकंजूस थे. सिर धुनते चले कि पाँच मोहर गया सो गया, अब रुपया-दो रुपया पेड़ कोकिसी लकड़हारे से कटवाकर बैलगाड़ी पर लदवाकर इजलास में ले जाने में लगेगा. एक और बातपर वह दुःखी थे, ”अदालत की हतीमूटी दुआरी में हतना बड़ा पेड़ कइसे ढुकेगा?” एक घंटाबीता तो हाकिम ने पेशकार से पूछा, ”डव्रीचन शाव आया?” पेशकार बोला, ”नहीं.” दूसराघंटा बीता तो हाकिम ने पूछा, ”इटना बखट में नहीं आया?” अहीर वहीं बैठा मन ही मन सोचरहा था कि यह हाकिम भी कैसा उजबक निकला. जइसन ऊद ओइसन भान, इनकी पूंछ ना उनका कान.वह खुश होकर बोला, ”अभी कइसे आवेगा होजूर! ऊ पेड़ इहाँ से बारह कोस दूर है.” ”अंगरेजससुरे हक बात पता लगाने में ओस्ताद थे तभी तो बाघबकरी को एके घाट पर पानी पियवातेथे, तभी तो उनके राज में सुरूज कभी डूबते नहीं थे.” बताते हैं शीतल मिसिर. ”बस,हाकिम ने पकड़ लिया उसका गट्टा और लगा डाँटने. अहीर भूतखेलौनी लुगाई की तरह सब कुछबकने लगा. फिर तो हाकिम ने सिपाही से दौड़ा दौड़ा के धरीछन साह को वापस बुलवाया औरअहीर से पाँच मोहर के बदले दस मोहर हगवा लिया.” और पीपल की इसी विशेषता का गुणगानआज तक बच्चे करते आ रहे हैं, हर पीढ़ी के बच्चे :चाक डोले चकबम-बम डोले, खैरा पीपर कभी ना डोले. काना रे कंडील-डील, पीपर तर हमारबिल साँप बोले चें-चें, कबूतर माँगे दाना, दूर सारा काना तोरे अतना बहाना.कमलाकांत ने भी इस विरासती कसीदे को सैकड़ों बार गाया होगा. इसी पीपल का डर दिखाकरउनकी माँ उन्हें बकरी का दूध पिलाया करती थी. लेकिन अब बचपने की नासमझी कहकर इसेउड़ा देने के बावजूद वह पीपल के पेड़ की ओर बढ़ने लगे. न जाने किस अनैच्छिक खिंचाव से.तनिक दूर रह जाने पर वह चौंक-से पड़े… पीपल के तने से सटे हुए चार-पाँच घुटे हुए सिरनजर आ रहे थे. उनकी ठुड्ढियों से लार बह रहा था. कमलाकांत एकदम से सावधान की मुद्रामें आ गये. अचानक उन्हें पदचाप-सी सुनाई पड़ी. पीछे की तरपफ़. वह मुड़ गये. कुछ न था.फिर दाहिनी ओर किसी के एक बार चलने की आवाज मिली. वह फुर्ती से घुम गये. वहाँ भीकुछ न था. उनके रोंगटे खड़े हो गये… तो क्या भूतों की ‘जोनी’ सच निकली? अब तक इनबातों पर यकीन न था कमलाकांत को. लेकिन उनके चारों मृत साथी आज साक्षात भूत बनकरउनसे तरपण मांग रहे थे. गाँव वाले कहते भी हैं कि पीपल के नीचे भूतों का डेरा है औरवे अमावस-के-अमावस वहाँ कबड्डी खेलते हैं. विरत रात को. लेकिन आज तो अमावस नहीं है.कहीं हत्यारे ही तो भूत का भेष धारे नहीं आ गये? कुछ भी हो- उन्हें लगा कि अगलीसुबह बाट-बटोहियों को उनकी गला घोटी हुई, रकत चूसी हुई लाश ही मिलेगी. बाल-बच्चेबिलख बिलख-कर पूछते ही रह जायेंगे कि वह यहाँ क्यों आये थे. उन्हें कोई बताने वालान रहेगा कि कैसे काल ने उन्हें अशक्त कर दिया था. न चाहते हुए भी वह उधर खिंचते गयेथे. अनायास, और सचमुच वह अपने को लाचार महसूस करने लगे. होनी होय सो होय रे मनवा,अब तो भागत ना बने. उनकी सारी शक्ति आँखों में निचुड़ आयी. उनकी खिसियानी-सी हँसीनिकल गयी. ”दुत्त तेरी कि…” हमेशा शिष्ट-शालीन व्यवहार के हिमायती कमलाकांत सच्चाईजान लेने के बाद आत्मनियंत्राण खो बैठे और इस निभृत एकांत में भी मुँह से गाली निकलगयी. भरम के भूत का निराकरण हो गया. ऊपर की जमी शीत निचले पत्तों पर टप-टप चू रहीथी… तने से चार-पाँच द्घंट लटक रहे थे और उनके छिदे पेंदे में ठुंसी कपास की बातीसे पानी रिस रहा था. इसे भरम का भूत भी कैसे कहें? मात्रा पखवारे भर पहले जिस घड़ीचार मजदूरों को मारकर इसी पीपल की डाल पर उन्हें उलटा लटकाया गया था, उसके पहले तो-निपट देहाती से जैसे भावुक कवि बन गये कमलाकांत- उसके पहले तो इन चारों की जिंदाहकीकतें थीं. राग की, आग की, आशा की, जिजीविषा की धड़कनें थीं… वह आस-उम्मीदों भरागतिमान वर्तमान अब जड़ भूत बना दिया गया है. क्या सचमुच? पीपल की निचली डाल से एकबित्ते भर लम्बा चमगादड़ आ लटका. पैरों के बल उलटा लटककर कलाबाजियाँ खाते हुए वह‘चिंक्-चिंक्’ कर रहा था. तो क्या उन्हें भी इसी तरह उलटा लटकाया गया होगा? उनकीआँखें पीड़ा से, मृत्यु की भीति से कैसे निकल-निकल पड़ रही होंगी. पीपल ने एक-एकवाकय़ा देखा होगा. इसकी कोटर-कोटर आँखें निकल आयी होंगी और पत्ते-पत्ते कान… दोनोंतरपफ़ से आन किसी आग-सिंकी डुग्गी की तरह तनी हुई थीऋ रत्ती भर की एक धुँधची;गुँजाद्ध भी गिरे तो टन्न से बोले. ऐसे में जगत नारायण के लठैतों ने मजदूरों के एकमेठ को बुरी तरह पीट दिया. अनखन खोजा गया कि वह हटिया से ताड़ी पीकर लौट रहा था औरबड़कऊ लोगों को गाली दे रहा था. मजदूरों को न अनाज उधार मिला, न निरापद काम और नचोखी मजूरी, लेकिन इतना जरूर हुआ कि इस पिटाई के बाद उनका मटिआया कलेजा भूख की आँचमें तपकर ईंट बन गया. अब तो उनकी नाकेबंदी की जाने लगी. किसी भी भूमिहीन खेतिहरमजदूर के खेत-खलिहान में जाने पर पाबंदी लग गयी. यहाँ तक कि कोई बड़कऊ के बाग-बगइचासे खरिका-दातौन भी न तोड़ पाये. एक आम गैरमजरूआ जंगल था ‘कुकुरबनवा’, जहाँ गाँव भरके मवेशी चरा करते थे. वहाँ भी जाने से रोका जाने लगा. मजदूरों के पास अपनीजीवन-रक्षा का एक भी अवलम्ब न रहा. रात-बिरात वे खेतों में से चोरी-छुपे कुछ उखाड़लाने लगे. गाभिन गैया से कोई दूध निकाले तो माघ में खेतों से अन्न भी पा ले. फ़सल तोअभी गदरा ही रही थी. चने के साग और मटर का गादा मिल सकते थे. सँपेलवा को भी मारो तोमरते-मरते भी उसकी चेष्टा एक बार डंस लेने की होती है. मजदूर भी मरण-दंश देने परउतारू हो गये. गुपचुप तय हुआ कि जगतनारायण के गैरकानूनी मिल्कियत वाले खेतों परधावा बोला जाय. इसके सिवा अब कोई दूसरा चारा नहीं. पीपल के पेड़ से सटे ही आठ दूनीसोलह यानी दो बैलगाड़ियों के आने-जाने लायक सोलह हाथ चौड़ी एक डगर निकलती थी. डगर कीबायीं ओर इन लोगों का अपना गाँव ”बलुआ” था और दायीं ओर ”पीपरपांती” गाँव था. एक तरहसे दोनों गाँवों के बीच सीमा-रेखा भी थी यह डगर. लेकिन जगतनारायण की जमीन की भूखऐसी बढ़ी कि उन्होंने इन्हीं मजदूरों से उस डगर को तुड़वाकर खेत बनवा लिया. मजदूरोंकी राय से चलें तो इन खेतों पर सरकार का हक बनता है और मेहनत भी इन्हीं की लगी हुईहै. कुछ ऐसा ही तर्क ढूँढ़कर वे एक रात उस खेत से कुछ मटर उखाड़ लाये. एक दिन बीचडालकर यानी तीसरी रात को भी मजदूर मटर उखाड़ ही रहे थे, तब तक पीपल के नीचे टुटहीजोन्ही ;उल्काद्ध जैसा कुछ कौंधा और तड़ातड़ गोलियाँ चलने लगीं. जिधर सींग समाया, उधरही मजदूर खेतों को रौंदते हुए भाग चले. छिन गया यह भी निवाला. तब तक चार लोगों कोगोली लग चुकी थी. भागे मजदूरों का कहना है कि उस वक्त उनमें जान बाकी थी, लेकिनहमलावरों ने उन चारों आहतों को पकड़ लिया. उन्हें नंगा किया और उन्हीं की धोती सेपैर बाँधकर डाल से उलटा लटका दिया. और तब तक मारते रहे जब तक उनके प्राण-पखेरू न उड़गये. बाद में मूंड़ी काटकर लेते गये. यह सबक था आइंदे से विरोध करने वालों के नाम…सचमुच कोटर-कोटर आँखें निकल आयी थीं पीपल की और पत्ते-पत्ते कान. बड़े ही निर्लिप्तभाव से गवाही दिये जा रहा था खैरा पीपल. देर से खड़ी मानुस-मूरत को देख उलटे-लटकेचमगादड़ की आँखों में शिकार का भ्रम हुआ. वह तेजी से झपटा उनके चेहरे की ओर.कमलाकांत ने झंप मारकर बचा लिया खुद को. उन्होंने तटस्थ-सा खेतों की ओर देखा.कच्ची-अधपकी छीमियाँ गंजे होते सिर पर बच रहे बालों के गुच्छे की तरह टापा-टुंआ दीखरही थीं. उनके जबड़े भिंच गये और आँखों में जुगनू कौंधने लगे. धीरे-धीरे उनकी मुट्ठीबंधी और दाहिना हाथ भूख के मोरचे पर कुरबान चढ़े शहीदों को लाल सलाम देने के लिएखुद-ब-खुद कंधे से ऊपर उठता गया. उनके लिए तो जाड़ा अब न जाने कांचनजंगा के किसकंगूरे पर जा भगा था.जल्दी-जल्दी चलते हुए वह बलुआ हाई स्कूल के मैदान में पहुँचे. जहाँ मद्धमि जादवसाइकिल का एक पुराना टायर जलाकर आग तापते हुए उन्हीं का इंतजार कर रहे थे. ”मुझेलगा कि अगिया बैताल यहाँ भी आ गया और लपटें फुफकार रहा है.” वह उनके सामने खड़े होगये. ”और ई साला प्लास्टिक का जूता…” कमलाकांत ने जूते से पाँव निकाला और आग की ओरबढ़ा दिये. मद्धमि जादव कुछ और पत्ते झोंकते हुए बोले, ”माघ ऐसा मकरा रहा है किससुरा हाड़-हाड़ हिला जाता है.” पत्ते शीत से सील गये थे. धुंआ होने लगा तो मद्धमि नेटायर खिसका लिया. ”यही तो सवा महीना का मकरचिल्ला है.” कमलाकांत खुद को लपट की जदमें लेते हुए बोले. ”हाँ, मसल है कि धनु की पनरह मकर पचीस, चिल्ला जाड़ा दिन चालीस.”मद्धमि जादव सिसकारने लगे, ”आप बहुत बिलम गये. तभी से आपकी आवाई ताक रहा हूँ.””सूचना ही लेट से मिली. वह भी रामगोबिन मास्टर ने भूइलोटन के मार्फ़त खबर भिजवायी.आज सुबह भी उनसे मुलाकात हुई थी, लेकिन ‘हाँ-हूँ’ कुछ नहीं बोले.” कमलाकांत परेशानदिखने लगे. सेंक से अंगुलियां कुछ ढीली हो चली थीं. वह गाँठ चटखाने लगे. ”हमको भीभूइलोटन भाई ने एकदम गरदबेरे ;गोधूली में बताया, हमें पता था कि आप इधर से आयेंगेही, सो यहीं बैठ गया.” ”देरी का एक कारण और है. पीपल के पास से गुजरा तो थथमा लगगया.” कमलाकांत ने कहकर मद्धमि को थथमा दिया जैसे. ”मत कहिए कामरेड, उसकी याद सेछाती फटने लगती है.” मद्धमि जादव ने उस दुखद प्रसंग को छोड़े रखने का अनुरोध किया औरलगे रामगोबिन मास्टर पर भड़ास निकालने, ”मास्टर साहेब ऐसी दरार में हगते हैं कि सूअरको भी बास नहीं मिलती. पता नहीं कैसा चक्कर है?” नासमझी में वह जोर-जोर से मूंड़ीहिलाने लगे, ”अबकी मीटिंग का पूरा इंतजाम रामगोबिन मास्टर के जिम्मे है, जबकि आपनेही राज्य कमेटी तक दौड़-धूप की थी कि वे लोग आकर यहाँ का हाल देख लें.”देरी के एक और कारण को छुपा गये कमलाकांत. टायर ने चारों ओर से आग पकड़ ली थी… छल्लेकी शक्ल में जलती हुई आग जमीन से ऊपर उठने लगी. अब यह कमलाकांत के सिर के चारों ओरअधर में जलने लगी, चाँद के प्रभामंडल की तरह या परीक्षा के लिए तैयार अनलचक्र कीतरह. सिर को झटका दिया कमलाकांत ने, ”चला भी जाय. यहीं देर करने में कोई फ़ायदानहीं.” वह पता नहीं कहाँ से बोल रहे थे… जूड़ी में तपते बच्चे के पास से, पेड़ मेंलटके किसानों के पास से या पार्टी की उस मीटिंग के स्थान से, जहाँ अभी पहुँचे भी नथे. मन तो भनभनाते ततैया की तरह कभी यहाँ तो कभी वहाँ चक्कर काटे जा रहा था.अस्थिर… बेचैन. चल पड़े वे. चलते-चलते उनके बीच ठंड पर ही बात होती रही. मद्धमि जादवउदास सूरत बनाकर बोले, ”माघ में पानी पड़ गया. लगहर ;दुधारू गायें एकदम चौपट होजायेंगी.” "मैनी; नीचे झुके सींगद्ध गैया मनगर दूध दे रही है न?” अगर कोई देखता तोशायद कमलाकांत का चेहरा उसे फटे दूध की तरह नजर आता. मद्धमि जादव एकबारगी दोरसेमौसम के ऊपर बरस पड़े, ”देगी कहाँ से! कुकुरबनवा में हमारी गायें चरती थीं. जगतनारायण ने वहाँ भी पहरे खड़े कर दिये. कल बैजू की बछिया कांजी हौस में डाल दी गयीहै. ऊपर से माघ का पानी… माघ बरसे तीन जाय, गेहूँ-गाय-बिवाय.” "अरे भाई, मुझे दूधका उठौना चाहिए.” आग अब उनके सीने में गुमड़ आयी थी. मुँह में जैसे कसैला धुंआ भरगया हो, बिना उगले अब रहा न जायेगा उनसे. ”बेटा बीमारी से बहुत कमजोर हो गया है.फल-फूल तो खिला नहीं सकता. दूध भी मिल जाये तो बहुत अच्छा.” कहने के साथ हीकमलाकांत के अंदर बिवाई जैसा कुछ चिलका. हठात उनके कानों में ”चर्र-चर्र, पुट्पुट्” की आवाज आयी. जैसे फ़सल का गाभा नोचा जाय. कहीं इन लोगों के बहाने चोर-चाँईहाथ तो नहीं मार रहे हैं? दोनों चौकन्ने हो गये. द्घने कुहरे के चलते सापफ़ कुछदिखलाई नहीं पड़ता था. सधे क़दमों से वे आहट की ओर बढ़ने लगे. डर भी लग रहा था. हवाके क़तरे-क़तरे तक में क़ातिल घुम रहे हैं. बहुत कोशिश के बाद भी कुछ सापफ़ नजर नआया. फ़क़त एक आभास-सा मिला. कई काली-सपफ़ेद छायाएँ एक खेत में क़वायद कर रही थीं.दोनों जने एक-दूसरे से लगभग सट-से गये. ”चर्र-चर्र… पुट्-पुट्… पड़-पड़”… आवाजें तेजसे तेज तर होने लगीं. बीच-बीच में कुछ कड़कड़ा उठता था. कंकालों की ठठरी बज रही होजैसे. मद्धमि जादव कहीं से खोजखाज कर ईंट का एक अधपावा उठा लाये और बहुत हिम्मतकरके उसे छायाओं की ओर उछाल ही तो दिया. छायाएँ पल-भर के ठिठकीं. उनमें से दो-तीनने उछाल मारी… जैसे दोनों हाथ और दोनों पाँव के बल माँव बना कोई थिरक रहा हो. ममिकाँप गये. काटो तो खून नहीं. उनकी बेवकूपफ़ी भरी हिम्मत महँगी पड़ी. "धत्तेरे की!नीलगाय फसल चर रही हैं.” जादव की जान में जान आयी. यदि इस वक़्त खेत का कोई विजूखाभी इनसानी शक्ल में होता तो वे दोनों उससे भिड़ जाते या भाग ही चलते. ”अब हमारा खालीहाथ चलना ठीक नहीं, कॉमरेड!” ”न हो तो कोई गुप्ती-कटारी भी रखनी चाहिए. पता नहीं हमकब दबोच लिये जायें.” ”अपनी तरफ़ से तैयार तो रहना ही चाहिए.” कमलाकांत पगडंडी सेनीचे उतर आये. ”चलो हाँक दिया जाय.” वह चादर को कमर में लपेटते हुए बोले, ”नाहककिसी की फसल बरबाद होगी.” ”छोड़िए भी. इधर के खेत धड़ाका सिंह के हैं. वह भीजगतनारायण के गुट का है.” जादव नफ़रत से बिदककर बोले, ”पापियों की चीज ऐसे ही नष्टहोती है. पुन्नी संचै साधु खाय, पापी संचै दीमक खाय.” ”चीजों को नष्ट होते देनाहमारा मकसद नहीं है, साथी!” सर्द हवा और कमलकांत की आवाज में कोई फर्क करना मुश्किलथा. हथेलियाँ पीटते हुए वह नीलगायों की ओर बढ़ चले. नीलगायें झुंड बनाकर ही भागतीहैं. इसलिए उन्हें हाँकने में कुछ खास दिक्क़त न हुई. कापफ़ी दूर तक खदेड़ने के बाद वेलोग फिर डगर पर आ गये. आगे अरहर के खेत थे. रास्ता दोनों बाजू से तुप-सा गया था. एकलोमड़ी निश्ंचितता से किसी मरे जानवर का सड़ा मांस खा रही थी. इन लोगों ने नाक परगमछा रख लिया. आदमी को देखते ही लोमड़ी के होश गुम हो गये. ‘खेंक-खेंक’ करती हुई वहकमलाकांत के दोनों पैरों की संध से ही निकल भागी. वह चिहुँककर गिरते-गिरते बचे."काटा तो नहीं न?” घबड़ाकर पूछा. "लगता है, ससुरी मूतकर भाग गयी.” कमलाकांत का पैरभीग चला था. उनके तलवे में गुनगुनी सरसराहट-सी महसूस होने लगी. थोड़ी देर में तोपूरा जूता छप-छप बोथ गया. यदि खून की धार है तो दर्द क्यों नहीं हो रहा है? अचकचाकर वह नीचे-झुके तो पता चला कि पानी सरसराकर बहे आ रहा है. ”लगता है, कहीं से नलकूपका अरद्घा टूट गया है. नील-गायें इधर आयी होंगी… पानी पीने.” अरहर के खेत पार करलेने पर टूटा-अरद्घा दीख गया. अभी पतली-सी ही दरार पड़ी थी, लेकिन कगार गल रहा था.वह खड़े होकर गौर से देखने लगे. ”अब अरद्घा की मरम्मत भी करेंगे क्या?” जादव हैरानीमें बोले. कमलाकांत ने कुछ जवाब नहीं दिया. चुपचाप गीली मिट्टी थोपने लगे, अरद्घेकी तोड़ पर. बेचारे म(मि जादव भी कगार के ऊपरले सिरे से दो-एक ईंट उखाड़कर सहायताकरने लगे. कामचलाऊ ढंग से तोड़ भर दी गयी. सचमुच, इस आदमी को समझना मुश्किल है. कीचड़सने हाथ धोते हुए वो सोच रहे थे. कमलाकांत की इस निस्संगता से उनका दम फूल रहा था.वह गंतव्य की टोह लेने लगे. कल्पना में तनिक दूर अलाव में लपलपाता रामगोबिन मास्टरका दुआर और उस लपलपाहट में काँपती इंसानी आकृतियाँ नजर आयीं. अब तो कमलाकांत काचेहरा खिल उठना चाहिए- उन्होंने कमलाकांत की ओर देखा- हाँ, उनका अनुमान सही था. याम(मि को कम-से-कम ऐसा ही लगा. धुन में तो कुछ महसूस न हुआ. काम खत्म हो जाने परउन्हें लगा कि हाथ-पाँव गलकर गिरे जा रहे हैं. ”जानता, तो टायरवा में से कुछ बचालेता.” पिघलते रबर की तरह म(मि की आवाज निकली, लेकिन तुरंत जमकर वह होंठों पर चिपकभी गयी. जमे शब्दों को जैसे उन्होंने नाखून से खुरचा,"पुरनिया लोग ठीक कहते हैं माघ मास की बादरी, और कुँआरा घाम. ये दोनों जो कोई सहै,करै पराया काम””गरम है तो ले लीजिए न, कमरेड साहेब!” भूइलोटन बिछ पड़े. ”नईं-नईं. आपको कष्ट-अजेलना पड़ेगा.” रक्तध्वज की रूह काँप गयी, ”मेरे पास तो हैं ही गर्म कपड़े.” उन्होंनेकम्बल को सहला भर दिया और बोले, ”बेंडों के ऊपर क्लाइमेट-अ का असर पड़ता है. मैदानीइलाकों की बेंडों के रोवें कड़े हो जाते हैं, वईं कश्मीर बगैरा में स्पंज की तरहमुलायम रहते हैं. राजस्तान के सरहदी इलाके की बेंडों को रोवें उतने मुलायम तो नईं,लेकिन लम्बे अउर चटक रंग वाले होते हैं. राजस्तान में एक विशेष प्रकार का कम्बलबनता है. लूँकार कहते हैं उसे. वह भी एक-दम काली बेंड के ऊन से बनता है, लेकिनबार्डर-अ पर लाल रंग से काम किया रहता है. अब देकिए ना… पश्मीना, शाहतूश और जामावारन जाने कइसी-कइसी शालें बनती तीं हमारे यहाँ. शालबापों की एक से एक बुनाई और उन परबड़े यत्न-अ से किये गये काम का नमूना देखने को मिलता ता. लेकिन पूंजी के इस युग मेंउनके हात का कौशल चिन गया. अब वह स्तान मशीनों ने चीन लिया.””समझौते के बारे मेंकिसी ने ठीक ही कहा है, कॉमरेड, कि वह एक ऐसी व्यवस्था की कोशिश है, जिसमें जो चीजमुझे नहीं मिलने वाली वह किसी दूसरे को भी न मिले. हमने सिर्फ़ मांग रखी थी, बदलेमें हमें मौत मिली. मारपीट भी उसी ने करवायी और हत्या की शुरुआत भी उधर से ही हुई.”कमलाकांत बेचैन होकर बोले ”कॉमरेड रक्तध्वज, आप तो देश-विदेश द्घूम चुके हैं. आपकोपता होगा, बिहार में उत्पीड़न अपने निकृष्ट रूप में है. अतः इन सामंती उत्पीड़नों,प्रहारों को रोकने के लिए उसे उसी भाषा में रिफ्ऱलेक्ट करना एक तरह से पीड़ित लोगोंकी बाध्यता बनती जा रही है.” कॉमरेड रक्तध्वज के साथ-साथ कई महत्वपूर्ण लोग भी चौंकउठे, ”आपका तात्पर्य?” वक़्त काफी जियान हो चुका था. ठार होते हाथ-पाँव बिनाढुलकाये गर्माहट नहीं मिलने को थी… वे दुलकी चाल चलने लगे. अलाव की लप-लपाहटआमंत्राण दे रही थी और शायद इसी ने उनके हाथ-पाँव की नसें गर्म कर दीं. रामगोबिनमास्टर के दुआर पर पहुँचते ही इन्होंने अलाव के पास जगह ले ली. ”आप लोगों की ही राहदेखी जा रही थी.” कमलाकांत के पास चले आये रामगोबिन मास्टर. अब वह म(मि जादव कोआत्मीय-सी फटकार देने लगे, ”का कमरेडवा! खाली मेले ददरी में हाथ चलता है! सुना है,बारह रकम के मसाले डालकर लिट्टी बनाना जानते हो. लेकिन यहाँ तो आग तापने लगे. ऐसेकैसे फरिआयेगा? चलो चार्ज संभालो.” ईंट जोड़कर बने चूल्हे पर चाय का देग रखा हुआ था.एक ओर लिट्टियाँ गढ़ी जा रही थीं. उपले का आड़ा लपलप तैयार हो रहा था. ”जरा चाह पीलूँ कामरेड!” म(मि लहसकर बोले. जल्दी-जल्दी चाय सुड़ककर और डबल खिल्ली खैनी होंठोंतले दाबकर वह आटा हमवार करने लगे. दहकते अंगारे पर वह बेहिचक लिट्टियाँ रखते जा रहेथे, मानो उनका हाथ लोहे का चिमटा हो. जिला कमेटी के सचिव चक्रधर जी कमलाकांत को एकतरपफ़ ले गये और उनके कान में खुसरपुसर करने लगे, ”कॉमरेड आपकी दौड़-धूप ने रंग लाया.बात बहुत ऊपर तक चली गयी है. पोलित ब्यूरो के निर्देश पर बंगाल से दो कामरेड्स आयेहुए हैं. एक आइडियालॉग हैं और दूसरे पार्टी के मुखपत्र से संबंधित हैं. इन पर इसघटना के साथ-साथ बिहार की परिस्थितियों के अध्ययन का भार भी सौंपा गया है. वैसेपहले वाले कॉमरेड हैं तो दक्षिण भारत के, लेकिन अर्से से बंगाल में रहते हैं.इन्होंने कुछ दिनों तक मध्य प्रदेश में भी काम किया था, लेकिन अब पार्टी के निर्देशपर पूर्वांचल का कार्य देखने लगे हैं.” ”ये लोग हिन्दी समझ लेंगे?” कॉमरेड चक्रधरमन-ही-मन मुस्कराये, जैसे कोई आश्चर्यजनक भेद बताने जा रहे हों, ”रक्तध्वज के छद्मनाम से इन्होंने हिन्दी में ही कई, किताबें लिखी हैं. हाँ, दूसरे कॉमरेड बता रहे थेकि उन्हें हिन्दी नहीं आती.” कमलाकांत को अपरिमित प्रसन्नता हुई, ”…तो रक्तध्वज जीयही है. अरे, इनकी लिखी पुस्तिकाएँ मैंने पढ़ी हैं और मजदूरों के बीच इनका पाठ भीकिया है. अब तक इन किताबों को मैं हिन्दी अनुवाद समझता था.” वह आलृादित हो गये,”कितना अच्छा संयोग है. अब बहुत कुछ जानने-समझने को मिलेगा. इनकी एक पुस्तिका‘आखिरी वक़्त का बिगुल’ से मुझे बहुत सहायता मिली है. और इस संकट की स्थिति मेंहमारे लिए पार्टी की गाइडलाइन बहुत जरूरी है.” ”इसीलिए तो आये हैं वे लोग.” चक्रधरजी की आवाज धीरे-धीरे गंभीर होने लगी, ”आपको बहुत होशियारी से ‘फ़ेस’ करना है,कॉमरेड. जाने या अनजाने में कुछ ऐसी बातें हो गयी हैं यहाँ, जिस पर आपत्तियाँ उठसकती हैं.” ”आपत्ति?” कमलाकांत का देहाती मन चौंका, ”लेकिन ऐसा क्या हो गया है?””अरे वही…” चक्रधर जी टालमटोल करने लगे, ”कुछ नहीं… आप खुद संभाल लेंगे. असल मेंआपने अकेले निर्णय ले लिया न. स्वाभाविक है, कुछ कदम ग़लत भी पड़ जायें.” ”खैर, हमअपनी समस्या रखेंगे. निर्णय तो अब पार्टी को ही लेना है.” कमलाकांत ज्यादा तूल-तबीलमें न गये. पिफर भी एक हल्की-सी शिकायत की, ”कॉमरेड चक्रधर! दूसरे काॅमरेड कोहिन्दी नहीं आती तो भोजपुरी या मगही तो आती होगी?” ”अंगरेजी जानते हैं, भई!” चक्रधरने आवाज को जरा लम्बा खींचा. ”बगैर जनभाषा जाने वह अध्ययन क्या करेंगे?” कमलाकांतका देहाती फिर से सिर उठाने लगा. ”हम साथ रहेंगे. बीच-बीच में व्याख्या करतेचलेंगे.””और वही सब लिखा जायेगा मुखपत्र में? हिन्दी नहीं जानते हैं तो मत जानें,लेकिन जिस इलाके का अध्ययन करना है वहाँ की कोई बोली तो जाननी चाहिए. सिपर्फ़अंगरेजी के बल पर हिन्दुस्तान का ठीक-ठीक अध्ययन हो पायेगा, मुझे संदेह है.” अबकमलाकांत का देहाती आदतन वाचाल होने लगा. ”यह तो मजबूरी है. पोलित ब्यूरो में इतनेबड़े हिन्दी प्रदेशों का एक भी आदमी सदस्य नहीं है, तो क्या वहाँ का काम रुक गया है?हिन्दुस्तान के आकलन में कोई कमी रह गयी है?” चक्रधर जी बोले, ”हमारे लिए भाषा कभीआड़े नहीं आनी चाहिए.” उन्होंने इस प्रसंग को यहीं रोक दिया, ”मार्क्स जब एशियाईग्राम समाज पर लिख रहे थे तो क्या यहाँ की भाषाएँ जानते थे?” ”तभी तो उनका विश्लेषणकुछ-कुछ ग़लत रह गया… तमाम सद्भावना के बावजूद… खासकर भारत वाले मामले में, क्योंकिउन्हें अंगरेजी में उपलब्ध तथ्यों पर निर्भर रहना पड़ा था.” ”क्या कहा? फिर से कहिएतो. मार्क्स का विश्लेषण ग़लत रह गया?” लगा कि चक्रधर जी उनका मुँह नोच लेंगे, ”आपमार्क्स को पढ़िए…फिर से पढ़िए.” ”पढ़ता हूँ. मार्क्स हमारी तरह जड़ नहीं थे. वहद्वंद्व को स्वीकार करते थे… और मार्क्सवाद ने मुझे यही सिखाया है कि अपनी-अपनीपरिस्थितियों के अनुसार उसका क्रियान्वयन किया जाना चाहिए… लेकिन पोषित ब्यूरो काआकलन तो आजकल स्थितियों को नारों में ढालना सिखला रहा है.” ”आपने भंग-वंग खा लियाहै, क्या?” चक्रधर जी तैश में आ गये. कमलाकांत बोलना चाहते ही थे कि राज्य सचिव केसाथ रक्तध्वज जी आते दिखे. उनको देखकर चक्रधर जी लौटने लगे. कमलाकांत को यह साराकुछ अजीब लग रहा था. उन्हें अब एक नयी कचोट काटने लगी थी, ”कॉमरेड चक्रधर!…” ”क्योंअब क्या हुआ?” ”नहीं माने कि… मीटिंग प्रभावित इलाके में ही कहीं करवानी चाहिए थी.हत्या के बाद से वहाँ के लोग बड़े सहमे हुए हैं. साथ ही बैठकर चर्चा होती तो उनकाहौसला भी बढ़ता.” अपने मन की सबसे बड़ी भड़ास निकालकर उन्होंने खुद को कापफ़ी हल्कामहसूस किया. ”वहाँ खतरा जो था.” चक्रधर जी ने कुछ इस ढंग से कहा, मानो अनिष्ट आसपासही मंडरा रहा हो. ”सुरक्षा की दृष्टि से प्रभावित इलाके से दूर मीटिंग की जा रहीहै. वैसे वह इलाका आपके प्रभाव क्षेत्र में आता है. जब आप आ गये तो समझें कि सब आगये.” कमलाकांत के चेहरे से अविश्वासी-सा हो जाने का क्षोभ टपकने लगा. राज्य कमेटीके सचिव से तो उन्होंने उसी इलाके में मीटिंग करवाने का अनुरोध किया था. उन्हें ऐसाही आश्वासन मिला था. अपने यहाँ के पीड़ितों को उन्होंने यही बात बतायी थी. लेकिन आजकी मीटिंग न जाने किसके इशारों पर अफरा-तफरी में होने चली है कि अंत समय तक इसपरिवर्तन के बारे में वह कुछ जान न पाये. लोग बरामदे में पुआल पर बिछी दरी पर आकरबैठ गये थे. कॉमरेड रक्तध्वज सबसे एक सच्चे जन-नेता की तरह अहककर मिल रहे थे. उनकाव्यक्तित्व बड़ा ही प्रभावशाली था. गहरे ताम्बई रंग का कद्दावर शरीर, खुली सीपियोंकी तरह ज्ञानरंजित आँखें, लम्बी दाढ़ी जो भारत की दक्षिणी सीमा की तरह नीचे की ओरक्रमशः नुकीली होती गयी थी. ठुड्ढी पर से दाढ़ी के सफ़ेद हो रहे बालों का एक गुच्छायों बढ़ता चला गया था, जैसे काली चट्टानों के बीच फेनिल झरना बहता है. सिर के आधे सेअधिक उड़ चुके बाल उनके अनुभव और चिंतन की व्यापकता का परिचय दे रहे थे. उन्होंने एकबहुत ही नजरखींचू लाल कोट पहन रखा था और कंधे पर गर्म ऊनी चादर तहिया कर डाल रखीथी. कॉमरेड आलोक भट्टाचार्य, जो पार्टी के मेन ऑर्गन से संबंधित थे, गोरे, सुंदरमगर दुबले-पतले शरीर वाले थे. उन्होंने फ्रेचकट दाढ़ी रखी थी. उन्होंने सिर के बालइस तरह संवारा हुआ था, मानो वे नहाते वक्त भी कभी बिखरते न होंगे. उन्होंने बंगालहैंडलूम के कुर्ते-पाजामे पर शाल ओढ़ रखी थी. रामगोबिन मास्टर से अपनी उत्सुकता कोरोका न जा सका. वह कोट का झूलता सिरा छूते हुए बोल ही तो पड़े, ”कॉमरेड, यह कोट! बड़ीही उम्दा ‘कोआलिटी’ का मालूम पड़ता है.” रक्तध्वज जी ने अपने शरीर को ऊपर से नीचे कीओर देखा. ”इदर का नईं है.” किंचित मुस्कराये वह, फिर कुछ देर के लिए उनकी आँखें मुदगयीं और वह विदेहावस्था में चले गये, जैसे कोई साधक गुनिया अपने इष्ट से संपर्कसाधने के पहले खो-सा जाता है. आहिस्ता-आहिस्ता उनके चेहरे पर एक सुरूर-सा खिला औरबोल पड़े वह, ”पिचले साल रूस गया ता. वईं उपहार में मिला ता. कजाकिस्तान के गाँउ मेंअइसा कोट-अ हात से बनाते हैं. उजली बेंड के ऊन से और वनस्पतियों से उस पर लाल रंग-अचड़ाते हैं. ये देकिए…” उन्होंने कोट उतार दिया और कालर की तरफ से उलटकर दिखाने लगे,”लेबल-अ के रूप में दस्तकारी संद्घम की अउरतों ने पार्टी-ई के निशान को एमब्रॉयडर-अकिया है. अइसा कोट-अ जार के टाइम-अ में किसान अपना लिए बनाते ते. लेकिन बाद मेंसोवियत काल में बी हस्तकलाओं के संगरक्छन के लिए इसे अउर डेवलप किया गया.” रक्तध्वजजी कापफ़ी ठहर-ठहरकर व्याकरण की दृष्टि से शु( हिन्दी बोल रहे थे. सिवाय कुछध्वनियों को छोड़कर जैसे ‘भेड़’ को ‘बेंड’, ‘झंझट’ को ‘जंजट’ या ‘देखिए’ को ‘देकिए’,उनकी ‘त’ और ‘थ’ ध्वनियों से इतना सूक्ष्म अंतर था कि किसी डिक्टापफ़ोन द्वारा भीउसे पकड़ना असंभव होता. कोट के नीचे भी उन्होंने स्वेटर पहन रखा था. इसलिए प्रायः सबलोग कोट को उलट-पुलटकर प्रशंसा भाव से देखने लगे. रक्तध्वज जी उदास-से दिखने लगे औरउनकी भाषा में एक अजीब-सी लापरवाही झलकने लगी, ”ब्रिटिशों की अउप्निवेशिक लूट-अ नेहमें कईं का नईं रका. हमारे उद्योग-दंदे, लोक कलाएँ, दस्तकारी सबको नष्ट कर दिया.उन साम्राज्यवादियों ने. ये कोट क्या है? कउन-कउन-सी चीज नईं बनती तीं हमारे यहाँ.वस्त्रा उद्योग तो हमारा बहुत ही उन्नत ता… हमारे ही सूत अउर कपास से इंग्लैंड-अ कीमिलें चलती तीं.”…’ट-ड’ ध्वनियों पर तो उनकी जीभ का निपात ऐसे होता था, जैसेछापेखाने का प्लेट खट से कागज पर गिरता है. कमलाकांत के अंदर उनकी हिन्दी बोलने कीकोशिश पर श्रद्धा उमड़ आयी. आलोक भट्टाचार्य तो और दुखी होकर बोले, ”हमारा पूर्बोबांग्ला में बेश भालो-भालो आउर सॅब माफिक का जिनिश बॅनता था. आप लोगिन श्योर शुनाहोगा ढाका का मॅलमॅल का बारा में. एक ठो आंग्ठी का भीतॅर से समस्तो कापॅड़ शाँप कामापिफ़क बाइर हो जाता था. जारा ई ठो देखुन ना….” उन्होंने अपनी शाल उतार दी और चमड़ेकी एक सदरी, जिसे उन्होंने हैंडलूम के कुरते पर पहन रखा था, दिखाने लगे, ”पोलैंड सेएक टा डेलिगेशन आया था, उई लोगिन इशको हामको प्रेजेंट किया था, परां…तू, हाम जान्ताहै हमारा हिन्दुस्तान में इशशे भी दारुन जिनिश गुली बनने शेकता है. बाबा! हामाराइंडिया का माथा कॅम आछे ना की?” उनके गोरे ललाट पर चिंता की काली-काली लकीरें बलखाने लगीं. लेकिन इतनी पेच बतियाने के बाद भी भट्टाचार्य की सदरी किसी का ध्यानखींचने में असमर्थ रही. जूते और चमड़े का कारोबार करने वाले जियावन रैदास ने उसेदो-तीन बार छूकर परखा और वह चमड़े की किस्म के बारे में अपनी जानकारी देने लगे,”लगता है ई उदंत ;जवान बाछा के चाम से बना है.” भूइलोटन गड़ेरिया देख रहे थे कि अभीभी सबके आश्चर्य का केन्द्र लाल रूसी कोट ही बना हुआ है. अपने हाथ का ‘गुर’ दिखानेका शायद इससे अच्छा मौका न मिलता. अपना ताजा बुना कम्बल रक्तध्वज जी के आगे फैलातेहुए चहकने लगे, ”कमरेड साहेब, तनी हेकरा के छूइए तो, आजमाइए तो. उजर भेंड़ि के बारसे हमहूँ बीने हैं. किनारी पर एकबरनिया कारिया भेड़ि का बार लगाये हैं. अइसी भेड़िसाइते-संयोग से नु मिलती है. कई बरिस से तनी-तनी बार बटोरने पर अबकी साल जाके एगोकम्मर तेआर होखा.” रक्तध्वज जी ने एक कुशल जर्रानवाज की तरह कम्बल ओढ़ लिया… बाप रे!कम्बल है कि नागफनी की चादर! स्वेटर छेदकर गड़ने लगा उनको. झटके से उतारकर रख देनेका मन किया, लेकिन शिष्टता के खयाल से बहाना बना गये, ”गरम तो इतना है कि मैं एकमिनट-अ नईं रक पा रहा हूँ.” वह बड़े ही मृदुल स्वर में बोले, ”तनिक चुब रहा है. तोड़ाअउर सॉफ्रट-अ रहता तो…” बातचीत अभी सम पर पहुँच ही रही थी कि रामगोबिन मास्टर बड़ेअपनेपन से आग्रह करने लगे, ”अब जरा चाह-पानी हो जाय. काहे कि भोजन में अभी अबेर है.मीटिंग में न जाने कितना समय लग जाये, कोई ठीक नहीं.” उनके कहते ही कार्यकर्ताओं नेसबके आगे चाय का कुल्हड़ और चार-चार ब्रिटेनिया बिस्कुट रखना शुरू कर दिया. कमलाकांतको हँसिए के ब्याह में खुरपी का गीत रुच नहीं रहा था. वह सिर लटकाये बैठे रहे. चायपड़ी-पड़ी ठंडी हो गयी और बिस्कुट अनकुतरा ही पड़ा रहा. जियावन रैदास की नजर पड़ी तोटोका उन्होंने, ”कमरेड, आप खा नहीं रहे हैं?” रामगोबिन मास्टर ने उनके आगे की ठंडीचाय फेंककर गर्म चाय रख दी. वातावरण को खुशगवार करने के लिए उन्होंने चुहल की,”बिस्कुट मत खाइए, क्योंकि इसमें विष कूट-कूटकर भरा रहता है, लेकिन चहवा तो पीजिए,कामरेड!” उन्होंने म(मि जादव को पुकारा, ”कमरेडवा! चाह और दे दो.” कमलाकांत ने एकसड़ाके में चाय सुड़क ली. सबके चाय-बिस्कुट से फारिंग हो लेने के बाद रामगोबिन मास्टरने आज के इस आयोजन के उद्देश्य के बारे में बताया. जिला कमेटी के सचिव चक्रधर जी नेइलाके को समस्याओं और इनसे संबंधित पार्टी की गतिविधियों के बारे में संक्षिप्तजानकारी दी. पिफर राज्य कमेटी के सचिव सत्यार्थी जी ने राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीयपरिस्थिति और भारतीय वामपंथी आंदोलन की भूमिका का विश्लेषण किया. भारतीय वामपंथीआंदोलन में भटकाव और इस भटकाव में भी अपनी पार्टी की सही नीतियों के बारे मेंबताया. इसके बाद कॉमरेड आलोक भट्टाचार्य से बोलने का अनुरोध किया गया. उन्होंने बड़ेही तंद्रालस भाव से कहना शुरू किया, ”खॅमा कोरबेन, कॉमरेड्स! हींदी ते ना बोलारजोन्ने. ताऊ कामरेड्स! आमी बेशी किछु बोलते चाइ ना…सुधु इंग्रेजी ते दु-एक टी कॅथारेखे निजेर वक्तव्यो शेष कोरबो…” अचानक रक्तध्वज जी ने यहाँ वीटो पावर का इस्तेमालकिया, ”कॉमरेड-अ बट्टाचार्या, न हो तो आप बाद में बोलिएगा… यहाँ के लोकल लोगों कोकुच बोलने दिया जाय.” ”…तो आप ही बोलिए न.” कॉमरेड चक्रधर रक्तध्वज जी से ही बोलनेका आग्रह करने लगे. ”अबी नईं.” वह कमलाकांत को देख रहे थे. कमलाकांत उलझन में पड़ेहुए दीख रहे थे. जिस घटना को लेकर इस मीटिंग का आयोजन था, उसका कहीं जिक्र भी नहुआ. रामगोबिन मास्टर ने आयोजन का उद्देश्य महज संगठन में वृद्धि और उसे सुदृढ़ करनेतक ही सीमित कर दिया. चक्रधर जी ने इलाके की समस्या में उनके गाँव की द्घटना काभूलकर भी उल्लेख न किया. यह क्या हो रहा है? उन्हें बोलने का मौका दिये बिना आलोकभट्टाचार्य या रक्तध्वज जी से ही बोलने का आग्रह किया जाने लगा है. रक्तध्वज जी नेउनकी हड़बड़ाहट और आंगिक मुद्राओं को पहले ही ताड़ लिया था. तभी उन्होंने कॉमरेड आलोकको रोक लिया था. उन्होंने कमलाकांत से पूछ ही लिया, ”कॉमरेड-अ उपाद्याय. आप बेचैनदीक रहे हैं. कुछ बोलना है क्या?” कमलाकांत ने जल्दी-जल्दी बीड़ी का कश लिया औरटोंटा नीचे मसलने चले तो दरी नजर आयी. वह हड़बड़ाकर उठे और दो-तीन लोगों के पैरकुचलते हुए ओसारे से बाहर निकल आये और टोंटा दूर फेंक डाला. खड़े होते ही उन्हेंलगा, बात को प्रभावशाली ढंग से कहने के जितने तरीके उन्होंने सोचे थे, सब भूल गये,सारा कुछ सपाट हो गया, पुआल पर बिछी उस दरी की तरह. उस सपाटता में सिपर्फ़ चार खेतमजदूरों के झूलते शव नजर आये, बाकी सब सापफ़. बिना किसी भूमिका के वह बोल उठे, ”मेरेगाँव में चार खेतिहर मजदूरों की हत्या कर दी गयी. हमारे गाँव में एक भूमिपति हैंबाबू जगतनारायण सिंह. ढाई-तीन सौ बीद्घे की काश्तकारी है उनकी. न्यूनतम मजदूरी कोलेकर विवाद चल रहा था. इसी में उन्होंने हमारे दल के चार मजदूरों की हत्या करवाकरउनकी लाश पेड़ पर टंगवा दी.” राज्य कमेटी के सचिव कॉमरेड सत्यार्थी जी बोल पड़े,”कॉमरेड उपाध्याय, बातचीत के क्रम में उस द्घटना पर चर्चा अवश्य होगी. पहले जरूरीमुद्दों पर ‘डिस्कशन’ कर लिया जाय.” ”कॉमरेड सेक्रेटरी! आपकी नजर में मजदूरों कीहत्या जरूरी मुद्दा नहीं है? आखिर यह मीटिंग किसलिए बुलायी गयी है? आज पखवारे भर सेमैं पपीहा बना पिफर रहा हूँ… इसी मीटिंग के लिए. इधर मेरे और कुछ साथियों के अपहरणकी योजना बनायी जा रही है… पिफर भी आप लोगों को यह जरूरी मुद्दा नहीं लगता?”कमलाकांत जोर-जोर से बोलने लगे, ”कॉमरेड सत्यार्थी, मैं अपने गाँव में मीटिंगबुलवाने के लिए आपके पास पटना गया था. लेकिन यह सब क्या हो रहा है? मीटिंग यहाँ होरही है. मुझे सूचना ऐन शाम को पहुँचायी जा रही है. हमारी पार्टी के ही लोग मारे गयेहैं. और लोगों के मारे जाने की आशंका है. इसमें पार्टी हमें कितनी सहायता दे सकतीहै, इसे बताने को मैं जरूरी मुद्दा मानता हूँ.” वे लोग बगलें झांकने लगे. ”तो इतनाचिल्लाते काहे हैं?” रामगोबिन मास्टर ने मौन भंग किया, ”जैसे यहाँ भी कोई आपकीटेंटी दबा रहा है.” ”हमारे लोग आपकी गलती से मारे गये हैं, कॉमरेड कमलाकांत!”चक्रधर जी ने हस्तक्षेप किया, ”मैं नहीं चाहता था कि यह बात खुले. मगर आप यहाँ भीअनुशासनहीनता का परिचय दे रहे हैं… तब बोलना पड़ा.” ”मेरी ग़लती से?” कमलाकांत काचेहरा फक्क पड़ गया. कुछ देर तक उनसे बोलते न बना. ”जी हाँ, आपकी ग़लती से. न्यूनतममजदूरी को लेकर तनातनी चल रही थी तो आप लोगों को संगठित करते, जनआंदोलन छेड़ते. ऐसीपरिस्थिति में अपने मजदूरों को खेत लूटने के लिए क्यों उकसाया?” रामगोबिन मास्टरक्रोध में बोले, ”आपने मुझसे भी राय नहीं ली.” ”अच्छा! मुझे कटद्घरे में खड़ा करनेके लिए ही मीटिंग यहाँ बुलवायी गयी है.” कमलाकांत असुविधा महसूस करने लगे. ”जिस दिनलठैतों ने मजदूरों के मेठ और हमारे पार्टी कार्यकर्ता शिवचरण राम को पीटा था, उसीदिन मैंने आपसे सलाह-मशविरा करना चाहा था, लेकिन आपने सब्र करने के सिवा और कौन-सीराय दी थी?” ”तो क्या कहता? मैं उसमें का नहीं हूँ जो कह दूँ, ‘चढ़ जा बेटा सूली परभला करे भगवान’.” ”अगले दिन भी मैं आपके पास गया था तो पता चला कि आप अपनी सास केश्राद्ध में ससुराल चले गये, नेवता लेकर…” ”आप क्या चाहते हैं कि मैं समाज से कटजाऊँ? एक तो ऐसे ही कम्यूनिस्टों के बारे में धारणा है कि वे नास्तिक होते हैं,विधर्मी होते हैं…तब तो कोई हमें सुनेगा भी नहीं.” ”कॉमरेड-अ उपाद्याय!” इस बाररक्तध्वज जी बोले, ”मुझे इस गटना के बारे में पता है अउर यह बी पता है कि आपनेप्रीमैच्योर्ड-अ स्टेज में इतना बड़ा दुस्साहस कर डाला. कैर, इसे सुलजाने के लिए हीहम एकत्रा हुए हैं. आप दैर्य तो रकें.” ”कॉमरेड! दुस्साहस अगर किसी ने किया है तोग़रीब मजदूरों की भूख ने. खेत लूटने को किसी ने उकसाया है तो मजदूरों के खाली पेटने. पेट भरा हो तो धैर्य रखा जा सकता है. लेकिन भूखे पेट को धैर्य कहाँ! आप बिहारकी परिस्थितियों का अध्ययन करने आये हैं. यदि गंभीरता से अध्ययन करें तब शायद पताचले कि यह दुस्साहस कौन करवाता है. लेकिन आप अध्ययन कर नहीं पायेंगे. खेद है किपूरी बात सुने बिना आपने कह दिया कि इस द्घटना के बारे में मुझे पता है.” ”टीक है,आप बी बताइए अपना पक्छ.” रक्तध्वज जी ने उदात्त भाव से कहा. वह अभी बताने ही जा रहेथे कि कैसे न्यूनतम मजदूरी का विवाद उठा, कैसे जगतनारायण की तरफ से मारपीट करवायीगयी. इसके बाद किस मजबूरी में लोग खेत लूटने को बाध्य हुए. उनकी बात अभी चल ही रहीथी कि रामगोबिन मास्टर और उनके पक्ष के लोगों की ओर से हल्ला-गुल्ला शुरू हो गया,”बंद कीजिए यह बकवास! गाये हुए गीत को ही दुबारा गाये जा रहे हैं. यह मीटिंगइतिहास-पुराण सुनाने के लिए नहीं बुलायी गयी है. हम अगली कार्यनीति पर विचार करनेके लिए एकत्रा हुए हैं.” रक्तध्वज जी ने बीच बचाव करके सबको शांत किया. वह कमलाकांतकी ओर उन्मुख हुए, ”मजदूरी के सवाल पर टेन्सन-अ चल रहा ता तो समजौता बी करवाया जासकता ता, उपाद्याय जी.” ”समझौते के लिए मैंने खुद पहल की थी, कॉमरेड! लेकिनजगतनारायण ने इसे हमारी कमजोरी समझा. बातचीत के लिए मैं दो-एक बुजुर्ग लोगों के साथउनके दुआर पर भी गया था कि सरकार की तयशुदा मजदूरी से कुछ कम पर भी मामला पट जाय.लेकिन वह तो मुझे रीति-नीति समझाने लगे कि मैं ब्राह्मण जाति में जन्म लेकर भी नीचजातियों का पक्ष ले रहा हूँ, कि मैं कुल का कलंक हूँ वगैरह-वगैरह. मेरे विरोध करनेपर बातचीत की कौन कहे उलटे उसने मेरे ऊपर लाठी चला दी. संयोग कहिए कि बगल में एकखूंटा गड़ा हुआ था. क्रोध में अंधा होकर वह दौड़ा तो उसी में ठेस लग गयी और निशानाचूक गया, वरना मेरी खोपड़ी के दी टुकड़े हो गये रहते. साथ के बुजुर्गों के मना करनेपर वह चिल्लाकर ही रह गया, नहीं तो मैं इतनी आसानी से छूटने वाला न था. कहने लगा,‘भगवान ने मुझे ब्रह्महत्या से बचा लिया नहीं तो आज से कमलाकांत की लीडरी झाड़ दियेहोता. हत्या के भरोसे कानी गाय खेत चरती है और सराप के भरोसे ब्राह्मण मुँहे लगताहै. अब सीधे मन घसक जाओ यहाँ से.’ मैं क्या करता?… मुँह लटकाये चुपचाप लौट आया.”कमलाकांत सफ़ाई-सी देने लगे, ”यह जगतनारायण किसी की सुनता थोड़े है, जहाँ सोच लेगावहीं खूँटा ठोककर ही मानेगा.” ”खूँटा काके बोलता?” आलोक भट्टाचार्य की गर्दनप्रश्नवाचक चिन्ह की तरह तन गयी और उन्होंने मास्टर साहब से पूछ लिया. कुछ देरविचारने के बाद वह बोले, ”खूँटा इज ए स्मौल पीस ऑफ बम्बू, कॉमरेड!… हाफ़ भीतर ऐंडहाफ़ बाहर.” इसके आगे वह बोलने से ज्यादा इशारों से बाहर और भीतर की स्थिति समझानेलगे. ”व्हाट?” आलोक भट्टाचार्य की आँखें कोइन ;महुवे का बीज की तरह बाहर निकल आयीं,”व्हेदर इट इज पुश्ड इनटू ह् यूमन बॉडी?… सो बूचरली…!” विषम परिस्थिति में भीकमलाकांत हँस दिये, ”रामगोबिन भाई की अंगरेजी ही ऐसी होती है. खूँटे से पशु बाँधेजाते हैं. यहाँ खूँटा ठोंकने से मतलब अपनी जिद्द पर अड़े रहना है.” ”ताई तो बोलीकी…” आलोक जी को सुकून मिला एकाएक. ”आप हमारी बात समझ तो रहे हैं न, कॉमरेड? याइंटरप्रेटर की जरूरत पड़ेगी?” ”नॉट सो, कॉमरेड! गो अहेड.” आलोक जी अचकचा गये, ”हामहिन्दी एकटू-एकटू जड़ूर सॅमॅजने शेकता. केबॅल बोल्ने आउर लिखने-पड़ने में नहीं शेकता.यू कैरी ऑन…” कहकर उन्होंने चारमीनार सिगरेट सुलगा ली. उन्होंने बड़े प्यार से एकसिगरेट कमलाकांत की ओर भी बढ़ायी, ”शिग्रेट खाइए, कॉमरेड!” कमलाकांत बीड़ी पी रहे थे,”फिर भी उन्होंने बात रखने के लिए एक सिगरेट ले ली और उसे कान पर खोंस लिया. मास्टरसाहब बेतरह चिढ़ गये. एक तो अपनी अंगरेजी की खिल्ली पर, दूसरे कॉमरेड आलोक द्वारासिगरेट पिलाकर बढ़ायी जा रही अंतरंगता पर. एक तरह से मास्टर साहब उनसे प्रतिस्पर्धारखते थे. वैसे पार्टी के पोर्टफोलियो होल्डरों में अपनी वाक्चातुरी के बल परउन्हें कापफ़ी सम्मान प्राप्त था, लेकिन जनप्रियता के नाम पर कमलाकांत उपाध्याय उनसेबीस पड़ जाते थे. मास्टर साहब कमलाकांत उपाध्याय के साथ ही बलुआँ हाई स्कूल में हीहिन्दी के शिक्षक थे. उनका कम्यूनिज्म से पुराना लगाव था. लेकिन पिछले दो-तीन सालोंसे, जब से वह कलकत्ते से लौटकर आये हैं, तब से यह लगाव और गहरा हो गया है. कलकत्तागये थे हाइड्रोसील का ऑपरेशन करवाने. उनका छोटा भाई वहाँ मारवाड़ी रिलीपफ़ सोसायटीहास्पिटल में स्टोरकीपर है. गये थे दो महीनों के लिए, लेकिन रह गये नौ महीने…. इननौ महीनों के बाद वह मानते हैं कि उनका नया जनम हुआ है. वह तो लौटना ही नहीं चाहतेथे, लेकिन घर से चिट्ठी गयी कि स्कूल के हेडमास्टर और सेक्रेटरी उन्हें निकाल देनेकी धमकी दे रहे हैं… तब आये वह. वहीं कुछ-कुछ बंगला का अधकचरा अभ्यास हुआ औरवामपंथी समझ भी विकसित हुई. कलकत्ते के मारवाड़ी रिलीपफ़ सोसायटी हास्पिटल कीसुव्यवस्था के पीछे वह वहाँ वामपंथी सरकार का होना मानते हैं… एक बिहार है, जहाँश्मशान और अस्पताल में कोई पफ़र्क ही नहीं दिखता. वह अपने कलकत्ता प्रवास के अनुभवसुनाते-सुनाते इतने उदास हो जाते हैं कि बिहार की जनता की चेतना कितनी ‘लो’ है…अंतहीन अनुभवों और सुरसामुखी संस्मरणों को सुनाते-सुनाते इतने उदास हो उठते हैं किउन्हें होश ही नहीं रहता कि सुनने वाला बिहारी है या बंगाली और वह द्घंटों बंगलामें ही बोलते रह जाते हैं… अभी आलोक भट्टाचार्य को ऐसा करते देख उनकी पीड़ा का सहजही अनुमान लगाया जा सकता था. कुढ़ते हुए वह भोजन की व्यवस्था देखने चले गये. इस बाररक्तध्वज जी काफी धीरज के साथ बोले, ”बातें तो सबी टीक हैं, लेकिन हमें शांतिपूर्नतरीकों से ही आंदोलन को आगे बड़ाना होगा. चोटे किसानों को अपने सात रकना होगा.मजदूरी अउर बूमि संबंदी विवाद में कबी बी समजौते की राह को बन्द-अ नईं करना चाइए.किसी डिमांड-अ को एक्सट्रीम-अ प्वाइंट-अ पर पउंचा देना किसी के हक में अच्चा नईंहोता. इसके लिए जरूरत है विबिन्न तबकों के किसानों को अउर केतिहर मजदूरों को संगठितकरने की. यदि आइसा, एक बड़ा-सा संगठन बन जाता है तो ये सामंती उत्पीड़न अपने आप बन्दहो जायेंगे. नईं तो इक्का-दुक्का प्रयास से हम कुद ही मारे जायेंगे.” ”पार्टी कीतरफ़ से हमारे बीच हथियारों की सप्लाई की जानी चाहिए. बिना हथियार उठाये अब हमाराबचना मुश्किल है.” कमलाकांत ने बेहिचक कह डाला. ”दादा, ई ठो केया बॅकता है आप?ओब्भी जॅदी पुलिस आपका धूल झाड़ दे तो कॉमरेड कमलाकांतो का सारा कमिटमेंट, सारारिभल्यूशनिज्म झड़े जाबे.” पार्टी ऑर्गन वाले आलोक भट्टाचार्य बुरी तरह भड़क गये औरपफ़र्राटेदार अंगरेजी में बोलने लगे. जिसका अर्थ था कि आपका यह कदम सामूहिक आत्मघातकी ओर जाने वाला है. यह एक रूमानी क्रांतिकारिता है. जब तक बहुसंख्यक जनता इसके लिएप्रस्तुत नहीं होती तब तक सशस्त्रा संद्घर्ष अंधे कुएँ में गिरने जैसा है. आप जिनकेखिलाफ लड़ेंगे, वे आपसे अधिक शक्तिशाली हैं. पुलिस और प्रशासन उनके पक्ष में है.गंगा के इस मैदानी इलाके की, जहाँ आप रहते हैं, भौगोलिक संरचना इसकी इजाजत नहींदेती. चारों तरपफ़ सड़कों का जाल बिछा है… दस मिनट के अंदर सुदूरवर्ती अंचलों में भीफ़ौज की पूरी बटालियन डिप्लॉय की जा सकती है. क्या आप फूस की इन झोंपड़ियों में सेखूनी संघर्ष चलायेंगे? यह कुरुक्षेत्रा का धर्मयुद्ध नहीं जो आप दिनभर लड़ेंगे औररात को निश्चिंत होकर थकान मिटायेंगे या विरोधियों के साथ बैठकर नीति-शास्त्र परचर्चा करेंगे. आपको पता होगा, रूसी सहयोग से अंतरिक्ष में जाने वाले भारतीयअंतरिक्ष यात्री का कहना है कि धरती पर ही छह इंच ऊँची कोई चीज भी वहाँ से सापफ़देखी जा सकती है. सारी मशीनरी, सारा तंत्रा उनके पास है. आप किस बूते पर ऐसा सोचतेहैं? ”तैश में आने की जरूरत नहीं, कॉमरेड! हम कोई स्टारवार करने नहीं जा रहे हैं.हम कुछ करें या न करें, लेकिन पुलिस हमारी धूल झाड़ती ही रहती है. वैसे किसीहिरोशिमा-नागासाकी पर अणु बम गिराना जितना आसान होता है, उससे कई गुना कठिन होता हैदेश में फैली बग़ावत की एक छोटी-सी चिनगारी को दबाना. सरकार बड़े-बड़े फौजी हमले कोझेल लेती है, लेकिन जन आंदोलन के एक छोटे से बीज से घबरा जाती है.” ”तो केया आपसिविल वार कॅरने मांगता है?” कमलाकांत ने विवाद को भरसक बचाते हुए कहा, ”संभव हैतर्क में आप मुझे परास्त कर दें. लेकिन मेरा एक छोटा-सा सवाल है. यदि आप लोग उसकासमाधान कर दें तो हमारी सारी मुश्किल मिट जाये. मैं पूछता हूँ, जब भूमिपति सामंततनिक विरोध पर ही हमें मारने को दौड़ रहे हैं तो क्या हम चुपचाप मार खा लें?” ”आपइसकूल का छेले का मापिफ़क प्रश्नों कॅरता है…जस्ट लाइक अ मोरोन.” आलोक भट्टाचार्य नेउन्हें बुरी तरह झिड़क दिया. रामगोबिन मास्टर राज्य कमेटी के सचिव से शिकायत करनेलगे, ”मैं पहले ही कहता था, कामरेड सेक्रेटरी, कि यह आदमी हम सबको भंडसार मेंझोंकवा देगा. मैं मना कर रहा था कि इनको मीटिंग में बुलाने की जरूरत नहीं, लेकिनआपने एक मौका देना चाहा. अब आपको कैसा प्रमाण चाहिए पार्टी विरोधी गतिविधि का?देखिए इस आदमी को… कैसे बहस किये जा रहा है. जिसे पार्टी की नीतियों से कोई वास्तानहीं, पार्टी के अनुशासन को मानना नहीं, सोचिए वह जनता के साथ क्या सलूक करेगा.”उनके होंठ वक्र हो गये. ”क्रांतिकारी जी सिविल वार करना चाहते हैं…ग्रीह-जुद्धचाहते हैं, अराजकता फैलाना चाहते हैं… एक ऐसे समय में जब देश आंतरिक और बाहरी दोनोंसंकटों का सामना कर रहा हो.” लगा कि देश की बात आते ही वह फूट-फूटकर रो पड़ेंगे.”बातें तो सबी टीक हैं.” रक्तध्वज जी ने रोका उन्हें, ”कामरेड-अ उपाद्याय!गाँउ-जोआर के सबी गरीब आपके सात हैं? सारे मजदूरों को अपने राजनीतिक रूप सेप्रशिक्छित कर लिया है? जनमत आपके पक्छ में है? इसके बिना आपका हतियारबंद दस्तासिवाय दो-चार कून-कराबा के अउर कुच नईं कर पायेगा.” उन्होंने कमलाकांत की ओर तर्जनीउठायी, ”यदि आप स्वस्त तरीके से आंदोलन का विकास चाहते हैं तो पार्टी-ई आपकी सहायताकरेगी. हम आंक के बदले आंक पोड़ने में आपकी मदद नईं करेंगे.” कमलाकांत समझाने की गरजसे धीरे से बोले, ”कॉमरेड आपने मुझे गलत समझा. मैं आतंकवाद के द्वारा समाज मेंसनसनी पैदा करना नहीं चाहता. हथियारों से लैस मरजीवड़े दस्ते की बात मैं आत्मरक्षाके लिए कर रहा हूँ, शक्ति में संतुलन के लिए कर रहा हूँ.” ”वाह जी… वाह! हमीं कोहथियारबंद दस्ते की उपयोगिता सिखाने लगे…” रामगोबिन मास्टर ने ताना मारा, ”जजमान कीलकड़ी, जजमान का घी और पंडित जी का केवल ओम नमो स्वाहा. हथियार उठाकर मजदूर मरतेरहें और आपकी सरदारी चलती रहे.” ”मान लीजिए आपने जगतनारायण को मार दिया. कुच अउरजमींदारों को मार दिया. आपको न्यूनतम मजदूरी बी मिल गयी. तो क्या इसके बाद आपकाआंदोलन टप्प पड़ जायेगा?” ”बहुत-सी बातें रास्ते में स्वयमेव तय हो जाती हैं. समस्याकेवल न्यूनतम मजदूरी की ही नहीं है. हमारे समाज में सामंतशाही ने लोगों के दिल औरदिमाग पर कब्जा कर लिया है. इस सामंती हेकड़ी को तोड़े बिना किसी बदलाव का आशा धोखाहै. अस्सी बरस का पोपले मुँह वाला बाप भी नहीं चाहता कि उसका बेटा उससे सर उठाकरबात करे. निखट्टू मर्द भी नहीं चाहता कि उसकी बीवी बराबरी की व्यवहार करे. इस कठोरकाँच को उससे भी कठोर हीरे से ही काटा जा सकता है.” ”काँच के लिए एक छोटा पत्थरकाफी है, कमलाकांत जी!” रामगोबिन मास्टर बेरुखी से बोले, ”और आप उसके लिए कठिनाई सेमिलने वाला महँगा हीरा तलाश रहे हैं. अरे, ककड़ी के चोर के लिए लात-मुक्का ही काफीहै.” ”पत्थर से काँच चकनाचूर किया जा सकता है, लेकिन उससे मनमाना आकार नहीं पाया जासकता.” कमलाकांत बोले, ”किसी चीज को चूर-चूर करना कोई भी समझदार पसंद नहीं करेगा.”भूइलोटन को भी यह नीति कुछ अटपटी-सी लगी तो रक्तध्वज जी से बोले, ”कमरेड साहेब, आपका चाहते हैं? हम सिरिफ मार खाते रहें?” ”ना चुप रहब(…धोती से बाहर मत होख(…”रामगोबिन मास्टर उनको चुप कराने लगे, ”ये सब गूढ़ बातें हैं, सिद्धात की. तुम्हारीसमझ में नहीं आयेंगी.” ”ई कइसन सिधांत है, मास्टर साहेब, जे गरीब मनई के जान चल जायबाकिर ऊ पलटा जबाब ना दें?” ”इतने दिनों से समझाते आ रहा हूँ, लेकिन दिमाग की कोठरीखाली हो तब न! उसमें तो भेड़ की लेंड़ी भरी हुई है…ठीक ही कहा गया है, सार-तत्व समझेबिना कागा हंस ना होय.” रामगोबिन मास्टर तुनक गये. भूइलोटन का पूछना उन्हें छोटीबुद्धि बड़ी बात लगी. ”अरे जोंक जब नून देने से ही मर जाय तो उसके लिए संखिया लानेकी क्या दरकार है? जगतनारायण कोई बाघ थोड़े हैं जो मान में नहीं आयेंगे.” ”मुझसे तोशांतिपूर्ण हल नहीं निकल सका. मैं अपनी कमजोरी मान लेता हूँ… तो आप हैं. रक्तध्वजजी भी आ गये हैं, सत्यार्थी जी और चक्रधर जी भी हैं… सब लोग मिलकर कल जगतनारायण सेबात कीजिए. न हो तो पंचायत ही बैठायी जाय. शायद कोई रास्ता निकल आये.” कमलाकांत नेआत्मसमर्पण कर दिया. ”एँह…एँह, देखिए कॉमरेड सत्यार्थी! इस आदमी की चाल देखिए. हमसबको यह ‘गजरा-मूरई’ की तरह कटवाना चाहता है.” रामगोबिन मास्टर की जाँघ की पेशियाँफड़कने लगीं, ”जगतनारायण एक नंबर का हंड़िकस ;एक प्रकार का गूंगा भूत जो चुपके से पकड़लेता है, है…और अभी तो वह जैसे जोड़ खाते नाग-नागिन को कोई छेड़ दे, वैसे बौखलाया हुआहै.” मास्टर साहब को लगा कि उनका डर जाहिर हुआ जाता है तो बात पलटने लगे, ”मुझे कोईभय नहीं. मैं चाहूँ तो अभी दंड-पंचायत बैठा दू…लेकिन रक्तध्वज जी, आलोक जी को लेकरसोचना पड़ जा रहा है. इनके साथ यदि कुछ ऊपर नीच हो गया तो….” ”अइसा कतरनाक है वह?”खौपफ़ के मारे रक्तध्वज जी भी द्घबड़ा गये. ”और क्या!” रामगोबिन मास्टर कूटनीति कासहारा थामने लगे, ”हड़बड़ी का काम शैतान का होता है. मैंने पूरी प्लानिंग कर ली है किकैसे उसको नाथा जायेगा. कल हम जैतपुरवा गाँव के महेन्दर प्रसाद सिंह के पास चलेंगे.वे हमारी पार्टी के मेम्बर हैं… खानदानी रईस जमींदार हैं, पिफर भी हमारी दिल खोलकरमदद करते हैं. जैसे पागल हाथी को ऊँट कान चबाकर काबू में कर लेता है, वैसे हीजगतनारायण को महेन्दर बाबू सोझ करेंगे….” वह फुसफुसा पड़े, ”टैक्टिस चाहिए, कामरेडसत्यार्थी, टैक्टिस!” ”अरे, वही महेन्दर प्रसाद सिंह न, जो क्रांतिकारी गीत-वीत भीलिखते हैं?” सत्यार्थी जी ने पूछा. ”हाँ-हाँ, वही. रईस होते हुए भी वे प्रगतिशीलमिजाज के हैं.” ”उससे क्या हुआ. एंगेल्स भी तो पूंजीपति थे. यदि वे नहीं होते तोबेचारे मार्क्स को कितनी मुसीबत झेलनी पड़ती. तालस्ताय, इतने बड़े लेखक, जमींदार हीतो थे.” सत्यार्थी जी ने बताया, ”…और हमारे ये रक्तध्वजं जी…इनके चाचा का बंगलोर केपास स्टील का बर्तन बनाने वाला विशाल कारखाना है. ये भी वहीं पर मैनेजर थे, लेकिनमजदूरों का शोषण देखकर समूची सुख-सुविधा पर लात मारकर चले आये.” ”हमारा बाबा जखुनपूर्वो बांग्ला शे आया, हुआ सुन्दोर बाड़ी, केला गांछ का एक ठो बागान, रुई माछ का एकठो पुखुर, ताल गांछ का एक ठो बागान छुड़ के आ गिया.” आलोक भट्टाचार्य ने बताया,”हमारा बैकग्राउंड भी तो जमींदार फेमिली का था, परांतू उशशे केया…. शव मायेर भोगेचले गेलो.” ”क्रांति के लिए जरूरी है, पहले कुद को डीक्लास करना.” रक्तध्वज जी जैसेस्मृति के सागर में गोते लगाकर ऊपर उठते हुए बोले, ”कुद को डीक्लास करने के लिए मैंजब मजदूरों के सात रहने लगा तो मेरे अंकुल ने जानते हैं क्या ब्लेम-अ लगाया?… ब्लेमलगाया कि कारकाना हड़पने के लिए मैं मजदूरों को बड़का रहा हूँ.” कहते-कहते वह अपनाशरीर हिलाने लगे, जैसे बारिश में भीगा पक्षी परों को झाड़कर पानी उड़ाता है. इस तरहसे शायद वह अपने चाचा का निराधार आरोप उड़ा रहे थे. ”महेन्दर प्रसाद खुद अपनेमजदूरों को न्यूनतम मजदूरी दे पाये हैं जो हमारी मदद करने चले.” कमलाकांत भड़क गये,”आप लोग उसी महेन्दर प्रसाद सिंह से मदद की आशा करते हैं, जो हमारी पार्टी कामेम्बर होते हुए भी अपने आचरण में घोर सामंती है. अपनी बीवी को छोड़कर वह एम.ए. पासएक लड़की को रखे हुए है. कभी उसे वह क्रांतिकारी कवियित्रि बताता है, तो कभी अपनेक्रांतिकारी गीतों की गायिका.” ”ओह कबूतरी का गीत हमहूँ सुने हैं.” भूइलोटन गड़ेरियाबोले, ”गाती है तो लगता है कि सरपत के जंगल में बकरी मेंमिया रही है.” रामगोबिनमास्टर को उनका भड़कना अच्छा लगा. वह चाहते थे कि कमलाकांत गुस्से में अपना आपा खोबैठे. ”आचरण में एक आप ही तो वैष्णव हैं, बाद बाकी सभी गणिका हैं आपके लेखे.”मास्टर साहब निहायत ही ठंडी आवाज में बोले, ”महेन्दर प्रसाद हमारी सहायता नहींकरेंगे, तो न करें. हम मृतकों को मुआवजा दिलाने के लिए डी.एम. का घेराव करेंगे….एकता रहे तो पचासों उपाय हैं.” ”यह हुई एक बात.” चक्रधर जी ने समर्थन किया, ‘घेरावके लिए पाँच सौ आदमी का जिम्मा मैं लेता हूँ.” इधर लोगों के बीच कानाफूसी शुरू होगयी. …पार्टी ऐसी बातों को कभी पसंद नहीं करती… …पिफर भी कमलाकांत आज कैसीबहकी-बहकी बातें कर रहे हैं… …पहले तो यह ऐसे न थे… …किसी ने बरगला तो नहीं दिया?…नक्सलियों ने झाँसापट्टी पढ़ाई होगी… …ये साले नक्सली अब इधर भी टाँग पसारने केपिफराक में हैं… ‘मैं किसी नक्सली-फक्सली को नहीं जानता, साथियो!” कमलाकांतचिल्लाते ही रह गये, ”यहाँ की स्थितियों ने ऐसा कदम उठाने के लिए हमें बाध्य करदिया है. हक के लिए तन-मन से जूझ पड़ना ही नक्सली कहलाना है तो आप लोगों की खुशी… जोचाहें, कहें…” …ये नक्सली और क्या करेंगे? किसी को नहीं छोड़ते ये…ममहर में बहिनबिआहते हैं…कानाफूसी जारी थी. लिट्टी पककर तैयार हो चली थी. फुलौना मल्लाह उसमेंलगी राख झाड़ने के लिए कपड़ा खोज रहे थे. रामगोबिन मास्टर ने एक छोटी-सी गमछी दी तोफुलौना ने असमर्थता जतायी, ”ढेर सारी लिट्टियाँ हैं…गमछा से झाड़ने पर पूरी रात सिगरजायेगी.” फिर भी उन्होंने गमछी फैलाकर देखी तो राम-राम करने लगे, ”हटाइए मास्टरसाहेब… ले जाइए इसे… इसमें किसी ने नेटा पोंछ दिया है.” और उन्होंने गमछी छान परफेंक दी. आग तापते-तापते या गर्मागर्म बहस के बीच कमलाकांत ने न जाने कब अपनी चादरउतार दी थी… उन्हें पता ही न चला. रामगोबिन मास्टर उसे फालतू पड़ा समझकर उठा ले गयेऔर लगे उसी से लिट्टी झड़वाने. चक्रधर जी ने सबको रोकते हुए कहा, ”यह बहस सारी रातभी चले तो खत्म नहीं होने की. समय काफ़ी हो चुका है. अब भोजन कर लेना चाहिए.कमलाकांत जी अभी उत्तेजित हैं. जरा नार्मल हो लें तो फिर बातें होंगी. इस इलाके मेंइन्होंने पार्टी के लिए जो किया है, उसे देखें तो अब भी काफ़ी उम्मीद है इनसे.” भोजनकी अकुलाहट अधिकांश लोगों के अंदर थी. कहने भर की देर थी कि वे लोग खरखरा कर उठगये. केवल तीन-चार लोग बैठे रहे. रामगोबिन मास्टर ने भूइलोटन से पूछा, ”का हो, तूना खइब(का?” ”इच्छा नहीं है, मास्टर, साहेब!” ”तो चलो, परोसो…मेहमानों को खिलाओ.”मास्टर साहब ने उनकी कांख में हाथ लगाकर उठा दिया, ”चलो भाई!” मद्धमि जादव भी पीछेरह जाने वालों में थे. मास्टर साहब बड़े प्रेम से बोले, ”चलिए मद्धमि भाई. यह कैसीबात है? इतने प्रेम से आपने लिट्टी बनायी और अब बैठ गये.” ”मेरा भी मन नहीं है. मैंखाकर आया हूँ.” ”उससे क्या! अघाया भैंसा भी तीन कट्ठा चरता है. ठीक है, बाद में खालीजिएगा. अभी चलकर परोसिए तो…” वह कमलाकांत से मनुहार करने लगे, ”आप तो खाने बैठिएही.” ”ब्रह्मभोज में किसी अश्रोत्रिाय को खिलाया गया अन्न अकारथ जाता है, मास्टरसाहब!” कमलाकांत कुढ़कर आनाकानी करने लगे, ”यह सब अच्छा नहीं लगता मुझे.” ऐसा नहींकि रामगोबिन मास्टर ने व्यंग्य न समझा हो, लेकिन उनका मानना था कि भोजन के लिएकुत्ते को भी पुचकारकर बोलना चाहिए. यह तो पिफर भी अपने साथी हैं. ”अच्छा किसे लगताहै!” न चाहते हुए भी उन्होंने एक स्वर में स्वर मिलाया, ”लेकिन क्या किया जाय? कोयलअंडे फोड़ देती है और उन्हीं से अपना बच्चा भी पलवा लेती है, तो क्या कौआ पिफर सेअंडे देना बंद कर देता है? या चारा चुगना छोड़ देता है? आपके या मुझे नहीं खाने सेजो चले गये, वो तो आने से रहे. चलिए दो-चार कौर ही खा लीजिए.” कॉमरेड रक्तध्वज नेभी उनका कंधा थपथपाया, ”आप मेरे सात बइटिए.” और उन्हें लगभग खींचते हुए वे पंगत तकले चले. लोग आसन रोपकर बैठ गये थे. चीजे परोसी जा रही थीं… शुद्ध घी में चभोरीलिट्टियों की सोंधी महक…कोल्हू के पेरे सरसों के तेल में सना आलू और बैंगन कामसालेदार चोखा…भुने धनिया और जीरे की बुकनी डली टमाटर की खटमीठीचटनी…प्याज-गाजर-मूली-धनिया पत्ता का सलाद, जिस पर गोलमिर्च और काले नमक का चूर्णतथा ईख का सिरका छिड़का गया था… …भूख ऐसी बढ़ आयी कि लिट्टियों की कुटम्मस होने लगी.रक्तध्वज जी कमलाकांत को साथ लिये अलाव की ऐन बगल में बैठे. कुछ देर बाद उनको गरमीलगने लगी. उन्होंने कोट उतार दिया और मोड़कर उसे घुटनों पर रखने ही वाले थे किरामगोबिन मास्टर खातिरदारी में लपके, ”भूइलोटन भाई, कोटवा टाँग दो कहीं. मोड़ केरखने से घुर्ची पड़ जायेगी.” भूइलोटन गड़ेरिया ने आगे बढ़कर कोट उठा लिया. उसे सहलातेहुए वह बड़ाई करने लगे, ”अजब सरकस बनवैया हैं रूस के लोग!” मास्टर साहब ने मीठीचुटकी ली, ”तुम तो ऐसे सुहरा रहे हो, मानो सुगनी की माई ;भूइलोटन की पत्नी कीजुलुफी हो.” भूइलोटन लजा गये. कोट को वह बरामदे की खूंटी पर जतन से टाँग आये. अबरक्तध्वज जी से बतरस करने लगे, ”ई कोटवा ओही रूस के नु है, कमरेड साहेब, जंहवा सेगोबरचन जी आये थे?” रामगोबिन मास्टर रक्तध्वज जी को लिट्टी खाना सिखला रहे थे, ”ऐसेनहीं, कामरेड! लिट्टी को दबाकर फोड़िए… हाँ, ऐसे…दो टुकड़ों में…अब सत्तू वाला हिस्साऊपर कीजिए-अब लीजिए…” उन्होंने सत्तू के ऊपर पैरी ;लोहे या काठ की बड़ी करछी, जिसकीडंडी लंबवत रहती हैद्ध से गर्म-गर्म द्घी ढालना शुरू किया, ”अब खाइए….” ”कौनगोबरचन?” रक्तध्वज जी का सिर ऊपर उठा. झटके से. हालांकि लिट्टी फोड़ने में वह माहिरहो चले थे, लेकिन दूसरी लिट्टी को दबाया ही था कि वह क्रिकेट की गेंद की तरह लुढ़कनेलगी. चक्कर काटते एक कुत्ते को मौका मिला और लिट्टी को दाँतों से दबाकर ले भागा.”इन बिहारियों को जिन्दगी-भर हिन्दी बोलना नहीं आयेगा. श्रद्धेय लोगों का नाम भीऐसा बिगाड़ देंगे!” रामगोबिन मास्टर रोष में बोले, जैसे वह खुद बिहार के न होकरचिकमंगलूर के रहने वाले हों. लिट्टी छिटकने पर दुःख प्रकट करते हुए उन्होंने‘गोबरचन’ शब्द को क्लियर किया, ”गोर्बाच्योव के बारे में कह रहे हैं, भूइलोटन. इनकीबेवकूपिफयों से मैं आजिज आ गया हूँ. कितना सिखाया ‘मार्क्स’ कहने को लेकिन यह‘मार-कस’ से आगे नहीं बढ़ पाये.” ”नामों का अच्छा स्वदेशीकरन है!” रक्तध्वज जी हँसपड़े. उनके हँसते ही पार्टी अनुशासन की अच्छी मिसाल पेश करते हुए कुछ और लोग भी हँसपड़े. मजबूरी में रामगोबिन मास्टर को भी भभाकर हँसना पड़ा. रूस का नाम उठा तोरक्तध्वज जी के अंदर कुछ गुरूर-सा खिला उनकी पाँचों उँगलियाँ घी से चिकनी हो रहीथीं और रूस की स्मृतियाँ इस गुरूर से सुगंधित हो उठीं, ”रूस की ही बात लें, कामरेडउपाद्याय! क्रांति वहाँ अनिवार्य हो गयी ती. वह अइसा वक्त ता, यदि क्रांति नई होतीतो लोगों का बचना मुहाल ता. कोई बी चीज समय पर होती है, जब बदलाव की सारीपरिस्थितियाँ उसके गर्ब में आकार दारन कर लेती है. चीन में बी वइसा समय आ गया ता.वहाँ की हालत इतनी कराब ती कि अन्न के बदले अच्चे द्घरों की स्त्रिायाँ अपनी देहबेचने लगी तीं. रोटी के केवल एक टुकड़े के लिए. यह सब कहने का मतलब है कि बारत मेंअइसी कराब स्तिति आने बी नईं देगा. कमलाकांत जी, एक बात याद रकें, उतावली में कोईकाम नईं करना चाहिए. आपके बारे में मैंने सुना है. आपने दीरे-दीरे ही यहाँ के लोगोंको एकजुट किया है. अब सई वक्त का इंतजार कीजिए, वक्त आते ही चोट कीजिए… सफलता जरूरमिलेगी.” जरा सला …लिट्टी एक इधर… लोग चटखारे ले-लेकर खा रहे थे. कमलाकांत का दिलबुझ-सा गया था. क्षुब्ध मन से वह कौर तोड़ते जा रहे थे. खाने का दिखावा करते हुए.भोजन एकदम बेस्वाद लग रहा था, जैसे उन मजदूरों के श्राद्ध का अन्न खा रहे हों. आलोकभट्टाचार्य लिट्टी की खूब बड़ाई कर थे, ”बाह! केया जिनिश है लिट्टी! शच में प्रॅतेकप्राभिन्स का खाना में अलादा-अलादा मॅजा लागता है…डिसेंट एंड भिभिड टैस्ट!” मद्धमिजादव ने इसे अपने लिए समझा. थोड़ी देर के लिए अपनी पाककला पर आत्ममुग्ध-से हो गये.हालांकि आलोक जी को यह पता नहीं था कि लिट्टी किसने बनायी है. वह मनुहार करने लगे,”लेकिन खा कहाँ रहे हैं? कभी की परसी दूनो लिट्टिया में से खाली आधा खाँड़ा खायेहैं… और लीजिए ना.” ”दाँत में थोड़ा तोकलीफ है.” ”अरे, तब तो घी में फुलाकर खाइए.”रामगोबिन मास्टर घी की कटोरी और पैरी लिए लपके, ”बंगाल का रसगुल्ला जैसा न हो जायेतो फिर कहिएगा.” रक्तध्वज जी को मजाक सूझा, ”मचली के बिना इनका काम नईं चलता. एकबार गुजरात गये ते. वहाँ ‘मांच-बात’ के लिए बड़ा परेशान हुए.” ”ओफ्फोह! जानता तोफुलौना मल्लाह से मछली मंगवा लेता.” मास्टर साहब बोले. ”अउर आप भी तो ‘रसम्’ खुजताथा.” आलोक जी ने भी इसका जवाब ठिठोली में दिया, ”साउथ इंडियन डिश नेंही माँगता थाआप?” भूइलोटन गड़ेरिया ने आलोक जी के पत्तल में बिना माँगे चोखा डालते हुए बंगलाबोलने की कोशिश की, ”कामरेड दादा! इतना गंवे-गंवे खाबेन त( कबहूँ ना ओराबे… पलथीमारके बइठुन ना, आराम से. पैजामा का फीता तनी नीचे सरका दिन. पेट तबे से अउंसा गइलहोबे.” रामगोबिन मास्टर के चलते बंगला की कुछ क्रियाओं से उनका भी परिचय हो चला था.कलकत्ता प्रवास के ललित संस्मरण सुनाते-सुनाते वह भूइलोटन से बंगला में ही बतियातेजाते थे. वैसे भी भूइलोटन में जिज्ञासा का सहज संस्कार था. आलोक जी हँस दिये, पतानहीं अपने बैठने के ढंग पर या उनकी बंगला पर. रक्तध्वज जी ने कमलाकांत के कान केपास मुँह ले जाते हुए हौले से कहा, ”कामरेड-अ उपाद्याय! आप गबराते क्यों हैं? मैंयहाँ से जाते ही मुख्यमंत्राी से मिलूँगा. देकिए न, मैं अइसा उपाय आजमाना चाहता हूँकि सांप बी मर जाये अउर लाटी बी न टूटे.” कमलाकांत के पूरे शरीर में आग लग गयीजैसे. मुँ ह में कौर रखे हुए ही वह ऊँट की तरह गलगलाने लगे, ”क्यों मजाक कर रहेहैं, कॉमरेड? मुख्यमंत्राी किसके हैं? वह गरीबों की तरफ कब से हो गये?” राज्य कमेटीके सचिव सत्यार्थी जी ने जड़ दिया, ”तभी तो मैं जोर देता हूँ कॉमरेड, कि जनता कोराजनीतिक रूप से सचेत किया जाय. तभी तो वे अपने पक्ष के प्रतिनिधि चुन सकेंगे. तबकोई असंभव नहीं कि बंगाल की तरह, केराला की तरह एक दिन बिहार के मुख्यमंत्राी भीहमारे हो जायें.” ”मैं भी पहले इस मुगालते में था, कॉमरेड सेक्रेटरी! लेकिन अब लगरहा है कि दर्जन-भर से अधिक प्रांतों में बंगाल की तरह मुख्यमंत्राी हो जायें, तबभी वे कुछ कर नहीं पायेंगे.” कमलाकांत ने पानी के घूंट से कौर निगल लिया था,”उन्हें वर्तमान संसदीय व्यवस्था की कार्यप्रणाली के अनुसार चलना पड़ेगा. इसव्यवस्था में इतने बड़े-बड़े खांचे हैं, जिसमें उनके नुकीले दांतों भी गच में फंसजायेंगे. इस व्यवस्था के साथ उनका चेन और व्हील का संबंध बन जाता है…चेन सरकता रहताहै, व्हील घूमती रहती है. अपनी धुरी पर स्थिर. वैसे भी मसल है कि बूढ़ी घोड़ी को लाललगाम लगा देने से चाल नहीं बदल जाती.” मद्धमि भाई, जरा चोखा… मास्टर साहेब, तनिक घीढालिए तो… अरे-रे, हाथ बार लिया… कम से-कम एक और लीजिए… चप-चप…चपर-चप…मांगने-खाने-मनुहार करने के स्वर आपस में घुलमिल रहे थे. कमलाकांत को लग रहा था किवही लोमड़ी अपने दल-बल सहित इस भोज में भी आ बिराजी है. ”नो कॉमरेड! इट इजअंडरएस्टिमेशन ऑफ एचीभमेंट.” आलोक जी ने प्रतिवाद किया, क्योंकि बंगाल की मिसाल आतेही वह उस बहू की तरह खुश हो गये, जो बगैर दहेज के आयी हो, फिर भी सास ने उसके मायकेकी बड़ाई कर दी हो. वह अंगरेजी में टिप्पणी करने लगे, जिसका अर्थ था कि चुनाव भी एकतरह का वर्गसंघर्ष है, मजदूर वर्ग के प्रतिनिधि को सत्ता सौंपने का संघर्ष. हमइसमें सफल भी होते जा रहे हैं, क्योंकि इसमें हमें तेजी से बढ़ रहे मध्यवर्ग का भीसाथ मिलता जा रहा है, जबकि सशस्त्र संघर्ष में मध्यवर्ग तनिक भी दिलचस्पी नहींदिखाता. तभी से जुमलेबाजी सुनते-सुनते और बोलते-बोलते कमलाकांत का अक्खड़ मन ऊबनेलगा था. उन्होंने बिफरकर कहा, ”सच कहूँ तो आप लोगों का व्यवस्था-विरोध उस वेश्या केगुस्से की तरह है, कॉमरेड, जो तभी तक गुस्से में रहती है, जब तक उसे पूरे नजरानेनहीं मिल जाते. फिर तो वह अपने को ऐसा परोसती है…ऐसा परोसती है…कि अब क्या कहूँ?”उन्होंने दाँत से जीभ काट ली, ”वेश्या तो फिर भी हमारी एक मजबूर बहन ही है.” ”सचडिक्शन इज रादर ऑब्जेक्शनेब्ल…” कॉमरेड आलोक भट्टाचार्य ने कसकर डाँटा. वह अभीचीख-चीखकर कुछ कहने ही वाले थे कि रक्तध्वज जी ने उन्हें इशारों से मना कर दिया.कमलाकांत की यह शैली वाकई बुरी लगी उन्हें भी, लेकिन राजनीति में उन्हें अनगिनतअवसरों पर इससे भी ज्यादा कड़े शब्दों, प्रतिवादों, आक्षेपों, आपत्तियों, तर्कों आदिका सामना करना पड़ा है. अंत में उन्हें अपने ज्ञान और अनुभव का सहारा ही लेना पड़ताहै. कुतर्क करने वालों को भी वह अपने अकाट्य तर्कों से ही परास्त करते आये हैं. यदिअगले का उद्देश्य आपको विचलित करने का है और आप उसकी किसी दलील पर तिलमिला गये तोआपकी वैचारिक कमजोरी ही प्रकट होगी. रक्तध्वज जी ने भीतरी तिलमिलाहट को दबाकर एकदमजैसे कुछ हुआ ही न हो वैसे कहा, ”सशस्त्र संघर्ष बी एक तरीका होता है बदलाव का.लेकिन ऐसे संघर्ष से स्वस्त जन आंदोलन को बहुत दक्का पहुँचता है. मान लीजिए किसीजमींदार या पूंजीपति या टाइरेंट रूलर के किलाप जन आंदोलन चिड़ा हुआ है. इसी बीच उसकीहत्या कर दी जाती है तो वह जन आंदोलन वईं एकाएक रुक जाता है. जनता की लड़ाई एकव्यक्ति पर आकर टहर जाती है. यह किसी ‘न्यूक्लियर एक्स-प्लोजन’ की तरह अचानक होताहै. इसके बाद का समूचा माहौल ‘शॉक वेव’ की चपेट में आकर दूलिसात हो जाता है.” तनिकचटनी…इनको…हाँ, इधर भी… …पानी…जियावन जी…जरा-सा पानी… …नहीं, अब लिट्टी नहीं…पेटफूल चला है…अब सिर्फ़ पानी… खाना लगभग पूरा हो चला था. पिफर भी कुछ लोग ‘मनु भाव नजाने पेट भरने से काम’ की तर्ज पर मिचरा-मिचरा कर टूंग रहे थे. कोई दाँत खोद रहा थातो कोई हाथ में लगे घी से मूँछें चिकना रहा था. कुछ लोग स्वादिष्ट भोजन के साथ-साथपार्टी के वरिष्ठ लोगों की गरिष्ठ बातें भी सुन रहे थे. ”वह उदाहरण तो आपने सुनाहोगा…” रक्तध्वज जी पत्तल से एक तिनका नोचकर दाँत खोदते हुए बोले, ”एक चोटे बच्चेने सुबह-सुबह गुलाब का पौदा रोपा. उसे उम्मीद ती कि दोपहर तक उसमें पूल आ जायेंगे.पौदे में वह कूब काद-पानी डाल गया. हर तोड़ी देर बाद वह उसे जांक लेता ता कि पूलकिले या नईं. लेकिन पूल को नईं किलना ता तो नईं किला, दोपहर होते-होते चोटा बच्चाइतना जल्लाया कि उसने पौदे को ही उकाड़ पेंका. हमारे कुच बचकाने सातियों में क्रांतिके प्रति कुच अइसी ही जल्दबाजी दीक रही है. मुजे तो शक है, वे कांग्रेस के ही एजेंटहैं.” ”ए मधिम!” अपनी आदत से लाचार भूइलोटन गड़ेरिया से रहा न गया, ”अरे ई चीन मुलुकसे लहसून जी का कहानी है हो. तबकी पहिली मई के मास्टर साहेब सुनाये रहे.” रामगोबिनमास्टर को इस बार नामों का बिगड़ना बुरा नहीं लगा. बल्कि वह प्रमुदित होकर बोले,”यही कहानी मैंने पहली मई को सुनायी थी, कॉमरेड! इन लोगों को पोलिटिकली डेभलप करनेके लिए मैं अकसर कुछ न कुछ सुनाता रहता हूँ.” हठात वे ‘यूरेका’ की तर्ज पर बोल उठे,”समझ गया…पहली मई की याद आयी तो आपके नाम का मरम समझ गया. उसी दिन मजदूरों के खूनसे सनी कमीज का झंडा बना था… रक्तध्वज!” ”अघ… वई कून का द्वज.” रक्तध्वज जीमुस्कराते हुए सिर हिला रहे थे. रामगोबिन मास्टर ने उनके पास जाकर पूछा, ”जो आपनेसुनायी, वह लु-शून की ही कहानी है न?” ”शायद यह वईं की एक लोक-कता है.” उन्होंनेअनिश्चय की स्थिति में बताया. कौओं की जमात में उल्लू की दशा हो, वहाँ कमलाकांतउपाध्याय की वही दशा हो रही थी. ‘मुझे उल्लू ही तो बनाया जा रहा है.’-उन्होंनेसोचा. कुछ देर तक चुप रहने के बाद, माहौल को तोलने के बाद वह बोले, ”बहुत अच्छादृष्टांत है. प्रसंगवश मुझे भी एक बोध कथा याद आ रही है, कॉमरेड रक्तध्वज!”रक्तध्वज जी को खुशी हुई कि कमलाकांत उनकी बातों को समझने की कोशिश कर रहे हैं. यहआदमी भी क्या करे- उन्होंने सोचा- आश्चर्य की बात है बिहार के ये हिंसक व्यक्तिहिंसा से अलग कोई भाषा ही नहीं समझते और अब तो पूरे देश में हिंसा का ही दौर चल पड़ाहै. उन्होंने जिज्ञासु होकर हाथ हिलाया, ”अवश्य सुनाइए. इन कताओं में विशाल अनुबवके सार चिपे रहते हैं.” दरअसल, उन्हें अपने ही विशाल अनुभवों पर भरोसा हुआ कि उनकेतर्कों का प्रभाव कमलाकांत जैसे अड़ियल के ऊपर भी पड़ने लगा है. ”पंचतंत्रा की कहानीहै.” कमलाकांत के अंदर विषण्णता की तेज हंसी फूटने को हो आयी, लेकिन होंठों कोधीरे-धीरे खोलते हुए उन्होंने कहा, ”तीक्ष्णविषाण नाम का एक सांड था. हमेशा झुंड सेअलग चलने वाला और अक्खड़. एक दिन प्रलोभन नाम का एक सियार उसके लटकते हुए लाल अंडकोषको देखकर सोचने लगा, ‘सांड की जंघाओं के बीच यह कितना सुंदर और सुडौल फल लटका हुआहै. पक जाने से यह टह-टह लाल भी हो चला है…लगता है, अब गिरे-तब गिरे.’ वह उसके पीछेलग गया. उसने निरंतर कई वर्षों तक उसका पीछा किया, लेकिन वह फल नहीं गिरा. क्याहमारे कुछ साथी वर्तमान संसदवाद के प्रति कुछ ऐसी ही आशा लगाये नहीं बैठे हैं? संसदके दोनों सदन के बीच लटकता हुआ फल. पता नहीं अभी और कितने दिनों तक उसकी तरफ टकटकीलगाये रखनी पड़ेगी.” मायूसी में उनकी ठंडी साँस निकल गयी. अचानक वहाँ खड़मंडल हो गया.चक्रधर जी क्रुद्ध सांड की तरह ही हुँकारने लगे, ”यह सरासर अनुशासनहीनता है. किसीको अपमानित करने का आपको कोई अधिकार नहीं है. आप एकदम उजड्ड हैं, अक्खड़ हैं. आपकोबात करने की तमीज नहीं है. आपकी समझ बड़ी विध्वंसक है.” रामगोबिन मास्टर उनके खिलाफमौके की ताक में रहते ही थे. वह भी तारस्वर में गगन गुंजाने लगे, ”आपने इस इलाकेमें लुच्चे-ललंगों की जरा-सी फौज खड़ी कर ली तो अपने को तीसमार खां समझने लगे हैं?आपके बल पर इतनी बड़ी पार्टी नहीं चलती… समझे? रक्तध्वज जी को मैं जानता हूँ.इन्होंने दुनिया देखी है, कई जगह आंदोलन चलाया है. और आप? आप बंगला पर की मोदियाइनकी चाह दुकान को छोड़कर जानते भी हैं कि दुनिया कितनी बड़ी है? आप क्या हैं? आप ईनारका बेंग हैं… आप गूलर का कीड़ा हैं…आप ‘अलमुनिया’ का तसला हैं, जी…तसलााा…पेंदा मेंआँच लगते ही गरम हो जायेंगे, जमीन पर रखते ही ठंडा.” गुस्सा आ जाने पर मास्टर साहबअनगिन कवित्त और लोकोक्तियाँ सुनाने लगते थे. उन्होंने वही रूप पकड़ लिया, ”आप बड़ादिसकूट ;दृष्टकूटध झाड़ने चले हैं? शर्म नहीं आती, किससे बात कर रहे हैं! इसी कोकहते हैं…महुआ नित उठि दाख सो, करत बतकही जाय.” किसी को माहौल के इतना बिगड़ जाने काअंदाजा न था. अपनी-अपनी तरह से नाराजी जाहिर करते हुए लोग टिड्डी दल की तरह उठ गये.अब तक तो वह ठस-ठस जवाब देते आ रहे थे, लेकिन जब चारों ओर से व्यंग्य-बाणों कीबौछार होने लगी तो कमलाकांत की सारी बुकराती गुम हो गयी. अब सिर झुकाये काठ की मूरतकी तरह निष्कंप बैठे रहे. ”ऐसे तपाकी के साथ किसी निर्णय पर पहुँचना असंभव है.”सत्यार्थी जी एक कोने में फुसफसाकर सबसे हट जाने की सलाह देने लगे, ”अब इनसे बातकरना अपना दिमाग़ खराब करना है. कल पिफर कहीं बैठा जायेगा. हम खुद तय करेंगे कि क्याकरना चाहिए. कहाँ इनको राज्य कमेटी में लेने की बात चल रही थी, लेकिन इन पर इसइलाके का भार देकर हमने आदमी समझने में सचमुच भूल कर दी.” ”मैं तो पहले ही कहता था,कॉमरेड सेक्रेटरी, कि यह आदमी सबको भंडसार में झोंकवा देगा.” रामगोबिन मास्टर कोखुशी इस बात पर थी कि उनका कहा होकर रहा. ”इसने मीटिंग की गरिमा और गंभीरता धूल मेंमिला दी. पूंजीवदिया सब क्या कहेंगे कि ये कम्युनिस्ट अपनी मीटिंग में पियक्कड़ों कीतरह लड़ते हैं.” ”यह आदमी कम्युनिस्ट तो कहीं से नहीं लगता. कम्युनिस्ट मूवमेंट मेंइनको जरा-सा भी फ़ेथ नहीं है.” चक्रधर जी ने लोगों को आगाह किया, ”अभी मीटिंग शुरूहोने के पहले ये हजरत मार्क्स में ही खोट निकाल रहे थे. ही इज एन एजेंट ऑफ़नक्सलाइट्स.” लोग कमलाकांत को शक की निगाह से देखने लगे. वे यूँ खिसकने लगे जैसेउनकी छाया से बचना चाहते हों. लेकिन रक्तध्वज जी समाधिस्थ-सा बैठे रहे… कई बारपुकारे जाने के बावजूद. चोट उनके मर्म पर लगी थी, शायद. कमलाकांत एक अजीब-सीबेचारगी की मुद्रा में आलोक भट्टाचार्य की दी हुई चारमीनार सिगरेट पीने लगे… शायदइस पराजय को धुआँ-धुआँ करने के लिए धुएँ का कवच बनाते हुए वह शून्य में ताक रहे थे.उनकी चेतना उस धुएँ के समान एक खास ऊँचाई तय करते हुए छितरा जा रही थी. उन्हेंसिगरेट को दी गयी किसी विद्वान की परिभाषा याद आ गयी- सिगरेट उसे कहते हैं, जिसकेएक सिरे पर आग होती है और दूसरे सिरे पर कोई मूर्ख. तो क्या वह मूर्खता कर रहे हैं?उस आग को अपनी चेतना और आचरण में खींचकर, जिसे क्रांति की ज्वाला कहते हैं. आज जिसआग को पीने के लिए वह कटिबद्ध हैं, इसके लिए माचिस की कितनी तीलियाँ घिसनी पड़ी थीं,ऐसे ओदे मौसम में… अनगिनत, बेहिसाब. गाँव के इन नंगे-भूखों को गोलबंद करनाअसाध्य-सा काम था, मेढक को तराजू के खुले पलड़ों पर तोलने जैसा. राजनीतिक पाठ काककहरा सिखाना, डकैती-जुआ-शराब जैसे कुटेव छुड़वाना, गुप्त तरीकों से दस-दस,पाँच-पाँच आदमियों को किसी झोपड़ी में बैठाकर ढिबरी की रोशनी में पतली-पतलीपुस्तिकाओं का बाँचना, कथा-कहानियों के माध्यम से जीवन के अलिखित रहस्यों कोसमझाना, एक नयी आशा का संचार करना…इसमें कितना घासलेट जला होगा, कितना वक्त औरकितना खून, कमलाकांत के पास कोई हिसाब नहीं. इतने दिनों का किया-कराया क्या एकधक्के से ही खत्म हो जायेगा? इसी के लिए उन्होंने अपना जीवन होम कर दिया. राजनीतितो उन्होंने चक्रधर जी के साथ ही शुरू की थी. वही चक्रधर जिनके पास तन ढंकने केसाबुत कपड़े तक नहीं थे… नहाते वक़्त धोती भीग जाती थी तो कमलाकांत की ही धोती पहनकरबाहर निकलते थे…और आज वह कहाँ पहुँच गये! जिला कमेटी के सचिव बनाये गये, जब सेनगरपालिका की यूनियन करने लगे हैं, तब से न सिर्फ़ देह पर चर्बी चढ़ गयी, बल्कि शहरमें मकान भी बनवा लिया, मटका-तसर ही पहनने लगे हैं, कॉन्फ्रेस अटेंड करने लगे हैं.नहीं-नहीं! कमलाकांत का यह लक्ष्य कभी नहीं रहा. कुत्ते के कान से सटी चमजुई की तरहसत्ता से चिपक जाना चाहिए या जनता को जन-संद्घर्षों के माध्यम से एक वैकल्पिकव्यवस्था के लिए तैयार करना चाहिए?- उनके सामने बड़ा प्रश्न था कि वह क्या करें?पार्टी के इस टरकाऊ रवैये में वह भी शामिल हो जायें… लेकिन इससे तो पीड़ितों के बीचपस्तहिम्मती ही बढ़ेगी… अपने-आप फैसला लिया उन्होंने- मार्क्सवादी कर्मकांडियों कीसंद्घर्ष और क्रांति की किताबी व्याख्याओं के मकड़जाल से उन्हें बाहर निकलना हीहोगा. बाकी लोग जैसे फ़ेड आउट’ हो गये थे, निरपेक्ष हो गये थे. सापेक्ष थे तो आपसमें केवल वही दोनों- रक्तध्वज और कमलाकांत. दोनों की सोच में डूबी हुई आँखेंमिलीं…चारों आँखों में कसक थी, असहायता के भाव थे. कमलाकांत धीरे से बोले, ”कॉमरेडमैं समझता था कि कम्युनिस्ट इतने भावुक नहीं होते… लेकिन…” उन्होंने आँखें घुमालीं. रक्तध्वज जी के अंदर ग़जब की तितिक्षा थी. बहरहाल, वह एक कम्युनिस्ट इंसान थे.उन्होंने किसी ईसाई संत की तरह कमलाकांत की पीठ पर हाथ रखा, ”कॉमरेड-अ मतवेदों कामैंने कबी बी बुरा नईं माना है. मैंने हमेशा से कुले विचारों का स्वागत किया है.”हठात उनके स्वर में बदलाव आ गया, खट्टी डकारें ले रहे हों जैसे, ”संसदीय पद्धति कोआप पसंद नईं करते…चलिए मैं बी नईं करता… लेकिन मैं पूचता हूँ, यदि जनता आपको ही चुनदे तो आप क्या करेंगे? चुनौती से मुँह मोड़ लेंगे या…?” ”जनता हमें चुन कब पाती है,कॉमरेड?” चुनौती से मुँह मोड़ लेंगे या…?” कमलाकांत के होंठों पर एक तिक्त मुसकान आगयी, ”हाँ, चुनाव जीतने के लिए यदि हम भी उन्हीं चौरासी आसनों और चौंसठ कलाओं कासहारा लें तो बात अलग है.” ”साम्यवादी क्रांति के पहले जनवादी पड़ाव को पार करना हीहोगा, कॉमरेड-अ उपाद्याय! आप बुनियादी बूल कर रहे हैं. इसके लिए जनता को इसीजनतंत्रा में बागीदारी लेनी होगी. चुनने अउर मत व्यक्त करने की जो आजादी मिली हुईहै. उसे बी चोड़ देने पर तो वर्गशत्रुओं को अउर सुविदा हो जायेगी.” अब भी दुर्धर्षचट्टान की तरह दीख रहे थे. कॉमरेड रक्तध्वज. ”सतमासे बच्चे की तरह अविकसित भारतीयजनतंत्रा में हमें जो थोड़ी-बहुत स्वतंत्राता मिली हुई है, उसका वर्गहित मेंइस्तेमाल करना मैं भी पसंद करता हूँ. लेकिन व्यूह के भीतर घुसपैठ के साथ-साथ बाहरसे भी आक्रमण करना पड़ेगा. बाहरी और भीतरी आक्रमण के बीच एक तालमेल होना चाहिए. अगरसिपर्फ़ चुनाव तक ही अपने को समेट लें तो जनतंत्रा में चुनने और मत व्यक्त करने केलिए जिस सामाजिक विवेक की जरूरत पड़ती है, उसे हम खो देंगे.” कमलाकांत बिना किसीहिचक के अपनी बात रखते जा रहे थे ”…यह सामाजिक विवेक जनसंघर्षों के लम्बे अनुभव सेही अर्जित किया जा सकता है. मैं उनमें भी इस विवेक का अभाव देखता हूँ, जिनका दावाहै कि उन्होंने हमें सभ्य बनाया, प्रजातंत्रा का शऊर सिखाया. जी हाँ, कॉमरेड! उसीब्रिटेन! के एक चुनाव के बारे में मैंने कहीं पढ़ा था कि एक बार कावेंट गार्डन कीसीट से कोई चार्ल्स फॉक्ट चुनाव लड़ रहे थे. उनकी एक जवान और खूबसूरत दोस्त जो शायदडेवन शायर की डचेस थी, ने उनको जिताने का एक उपाय सोचा. उसने प्रचार किया किचार्ल्स को वोट देने वाले हर मतदाता को वह अपना चुंबन देगी. पिफर तो ब्रिटेन कीसबसे सुंदर डचेस का चुंबन पाने के लिए मतदाताओं में चार्ल्स को वोट देने की होड़ लगगयी. इससे द्घबराकर विरोधी पक्ष वाले मतदान केन्द्र पर ‘लेडी सेल्सबरी’ को ले आये,लेकिन लेडी सेल्सबरी सुंदरता में डचेस से एक कदम पीछे थीं, इसलिए जीत अधिक सुंदरताकी हुई. अब यदि फोटो देखकर छाप मारने वाली भारतीय जनता मदारियों, भांडों औरबहुरूपियों के झाँसे में आ जाती है तो क्या दोष?” रक्तध्वज जी की एक घुटी-सी कराहनिकल गयी. उन्होंने एक ठंडी साँस ली और नपे-तुले शब्दों में बोले, ”कॉमरेड-अकमलाकांत, आपको जवाब देने की स्थिति में कुद को नईं पा रहा हूँ, न मैं यई कह सकताहूँ कि बारतीय जनता के विक्छोब को कउन-सी पार्टी-ई लीड-अ कर ले जायेगी. वह कोईचोटी-सी बी पार्टी-ई हो सकती है या कई पार्टी के संगठन से बनी कोई बड़ी पार्टी-ई बी.कैर, आपके संतोष के लिए इतना बता दूँ कि सचमुच यदि जरूरत हुई तो अपने आप हमारे पासहतियार आ जायेगा.” अपने को संयत रखने की तमाम कोशिशों के बावजूद रक्तध्वज जी केशरीर में कंपकंपाहट थी, वाणी में निढालपना था, चेहरे पर दुविधा थी. वह चादर से अपनेशरीर को बार-बार ढंकते हुए जम्हाइयाँ लेने लगे, ”अब चला जाय.” ”हाँ-हाँ, जाइए, कलसे आपको बिहार का अध्ययन भी करना है न! खूब मोटी थीसिस लिखिएगा.” व्यंग्य सेकमलाकांत का चेहरा लम्बोतरा हो गया, ”बिहार प्रांत भी अजीब है, कॉमरेड!राजनीतिज्ञों को यह हरे-भरे चरागाह की तरह आकृष्ट करता है. इतना ही नहीं,लेखकों-कवियों-बुद्धिजिवियों को यहाँ का यथार्थ परीकथाओं की तरह आकृष्ट करता है.जलती हुई शमा के इर्द-गिर्द टूटते पतंगों की तरह सभी खिंचे आते हैं यहाँ, लेकिनअभागे बिहार की नियति को बदलने का समय आता है तो सब शिखंडी बनकर ताकने लगते हैं,दूसरों के द्वारा तीर चलाने की प्रतीक्षा में खड़े रहते हैं सब.” रक्तध्वज जी केकेवल होंठ फड़फड़ाकर रह गये. किसी अल्हड़ युवती के दुपट्टे की तरह उनकी चादर बार-बारसरकी जा रही थी. उसे किसी तरह संभालते हुए वह सोने वाली कोठरी में घुस पड़े.कमलाकांत अब वहाँ किसलिए ठहरते. खड़े होकर उन्होंने एक लंबी जम्हाई ली. मीटिंग केपहले जिस जाड़े को वह छोड़ आये थे, अब मौका पाकर वह उनके कंधे पर सवार हो गया और बड़ेप्यार से अपना यख हाथ उनके बदन पर पिफराने लगा. सर्द हवा का एक तेज झोंका आया औरउसके कुछ कतरे उनके कानों में समा गये. सीत्कार के साथ उन्हें अपनी चादर का होशआया. हड़बड़ाकर वहाँ गये, जहाँ चादर उतारी थी… चादर लेकिन नदारद थी. बड़े परेशान हुए.”का खोज रहे हैं?” भूइलोटन गड़ेरिया ने पूछा. कमलाकांत को पत्नी याद आयी… आते समय भीवह चादर खोज रहे थे और जाते समय भी चादर ही. कैसा संयोग है! ”चदरिया नहीं मिल रहीहै, भाई!” शीत लहर भेड़ों के झुंड की तरह चल रही थी… माघ की रात का अंतिम पहर. ”ऊ तोमास्टर साहेब ने लिट्टी झड़वा दी उससे.” मद्धमि ने याद करते हुए बताया. ”तुमने रोकाभी नहीं” कमलाकांत को रामगोबिन मास्टर पर बेपनाह गुस्सा आया. वह आड़े के पास चलेगये. उपले के ढेर पर पड़ी चादर राख और धूल से बुरी तरह किन-किन हो चली थी. वहपछीट-पछीटकर उसे झाड़ने लगे, लेकिन शीत के चलते राख चिपट गयी थी. भद्दा-सा मुँहबनाते हुए उसे वहीं पटक दिया और अलाव के पास चले गये. अलाव कब का बुझ चला था… राखमें दुबकी लूतियाँ यदाकदा झिलमिला जाती थीं. तब तक उनकी नजर बरामदे में खूँटी सेलटकते लाल रूसी कोट से टकरायी… उनकी आँख चिनगारी की तरह जल उठी. वह तड़पकर उठे और चलदिये. पीछे पैरों की आहट सुनायी दी… पलटे तो देखा कि भूइलोटन गड़ेरिया, म(मि यादव औरजियावन रैदास चले आ रहे थे. ”कामरेड, ई कम्मरवा ओढ़ लीजिए.” भूइलोटन ने भरे गले सेकहा. ”और तुम? तुम कैसे जाओगे, साथी?” ”अं-हं . ठीक है. हमनी का दुनो आदमी ओढ़ि केचलते हैं.” उन्होंने अपना कम्बल इस तरह फैला लिया जैसे किसी शिशु चिड़िया को उसकीमाँ अपने पंख में समेट लेती है. …दो बेटे-दो बाप, बीच जिनके तीन ओढ़ना एक-एक कम्बलउन्हें दे दो, नहीं किसी को खुला छोड़ना बच्चो, जरा हिसाब जोड़ना… अभी भी कभी-कभारमौका मिलने पर वह बच्चों के साथ बैठ जाते हैं और उनसे इसी तरह का ‘बैठौव्वल’ पूछाकरते हैं. इसे चुटकियों में हल करता हुआ वह काफिला बढ़ने ही वाला था कि रामगोबिनमास्टर दाँत खोदते हुए आ निकले. उन्होंने आँखें झपटा कर कुछ पल तक उन चारों कोदेखा, पिफर टोक ही तो दिया, ”भूइलोटन भाई, तुम कहाँ?” ”उपधेया जी के साथे… इनकेपहुँचाने बदे.” ”तुम्हारा भी दिमाग खराब हो गया. सब कुकुर काशी ही जावेंगे तो हाँड़ीढूँढ़ने वाला भी कोई चाहिए न?” मास्टर साहब तुनककर बोले. उन्होंने अपने अधिकार काप्रयोग किया, ”मैं कहता हूँ…तुम लौट आओ.” उनकी अनसुनी करते हुए एक कम्बल के दोओढ़वैए चल पड़े. रामगोबिन मास्टर को कुछ शुबहा हुआ, ”कंबलवा में कुछ छुपाये हो क्या?”इस कुत्सित मनोवृत्ति पर उन लोगों को ठिठक जाना पड़ा, मास्टर साहब का संदेह गहराया.कोट उन्होंने भूइलोटन को ही रखने के लिए दिया था और आँख गड़ा-गड़ाकर वही उसे देख भीरहे थे. वह लपककर आगे गये और कम्बल खींचने लगे, ”रक्तध्वज जी का कोटवा तो नहीं लियेभाग रहे हो?” उन्होंने भरपूर जोर लगाया कि लहंगाझारी कर लें. ”काहे कलंक लगाते हैं,मास्टर साहेब?” भूइलोटन व्यथित होकर बोले, ”कोटवा ऊ देखिए खूँटी पर लटक रहा है.”मास्टर साहब सकुचा-से गये. ‘अपजस लागत लाज परानी’…कमलाकांत को गुस्सा उसी घड़ी आयाथा, जब चादर की दुर्गति देखी थी. उन्होंने आव देखा न ताव झटके से बढ़े और कोट उतारलिया. अगले पल वह उनके बदन पर था. ”अब समझिए कि मैं ले जा रहा हूँ.” रामगोबिनमास्टर ने लपककर कोट की आस्तीन पकड़ ली, ”मैं अकारण शक नहीं कर रहा था. आपकी नीयतअपने-आप व्याप गयी.” वह वहीं से चीखने-चिल्लाने लगे. चख-चख सुनकर एक बार फिर लोगएकत्र हो गये-कमलाकांत और रामगोबिन मास्टर के बीच छीनाझपटी जारी थी. बटन खुला कोटउनके बदन पर ऐसे झूल रहा था जैसे कोई बड़े-बड़े लाल डैने वाला मुर्ग लड़ाई में झपट्टामारने पर उतारू हो. चक्रधर जी ने डाँटकर पूछा, ”यह कैसी बेहूदगी हो रही है?””रक्तध्वज जी का कोट चुराकर भाग रहे थे कमलाकांत.” रामगोबिन मास्टर ने हाफते हुएबताया, ”यही इनका सशस्त्र संघर्ष है. इसी के बहाने लूटपाट करना चाहते हैं. अरे,छिनाल का वश चले तो समूचे बधार में अरहर बुवा दे.” रक्तध्वज जी को विश्वास न हुआ तोपास सरक आये और थरथराती आवाज में बोले, ”चुराने की क्या जरूरत ती, कामरेड-अ?”कमलाकांत ने अट्टहास किया, ”ठंड से बचने का एक हथियार है कोट, जो अपने-आप मेरे हाथलग गया. वाकई इसकी जरूरत है मुझे. आपने कहा था न, कॉमरेड! यदि सचमुच जरूरत हुई तोअपने आप हमारे पास हथियार आ जायेगा.” रक्तध्वज जी भौंचक रह गये. वह बुरी तरह कांपनेलगे. न जाने क्यों?… अपमान से या नुकसान से, युयुत्सा से या कुत्सा से, पकड़ सेछूटते कालखंड से या बूँद-बूँद टपकती ठंड से. कमलाकांत ने हँसते हुए कोट उतार दियाऔर बोले, ”मैं तो नब्ज टटोल रहा था कॉमरेड! आप जादुई कोट पहनकर सैद्धातिक किताबेंलिखिए. परवाह मत कीजिए कि कोई बात गाँव के लोगों की समझ में आयी या नहीं. हमेंहमारी हालत पर छोड़ दीजिए. हम खुद निबट लेंगे.” कमलाकांत की आवाज काफी ठहरी हुई थी,जैसे उन्होंने कोई फ़ैसला कर लिया हो. आगे बढ़कर उन्होंने कोट रक्तध्वज जी की ओर धीरेसे बढ़ा दिया. रक्तध्वज जी ने जल्दबाजी में कोट उलटा ही पहन लिया और तमतमाये हुएलौटने लगे. उनके साथ के खड़े लोगों ने कमलाकांत को खौफ से देखा और रक्तध्वज जी केपीछे एक-एक कर लौटने लगे. एक विचित्र सी मुद्रा में कमलाकांत उपाध्याय उनका गुजरनादेखते रहे. उनकी आँख के आगे लाल रंग वाले कोट-ही-कोट तैरने लगे…फ़क़त चलते-पिफरतेकोट, उनमें आदमी नहीं. हठात ये कोट उलटे लटक गये… धुंध में उनके सामने अब एकसीधा-सुधेर पीपल का वृक्ष उगना शुरू हुआ… और कुछ ही क्षणों में वह पूरा उग गया.कमलाकांत को शांति-सी मिली कि अब उन्हें बोलना न पड़ेगा… अब सारा वाकय़ा अपने-आप बयानहो जायेगा. लेकिन उनके कानों ने एक शब्द भी न सुना. चारों तरपफ़ पागल सन्नाटा तारीथा… उस सन्नाटे में ही उन्होंने देखा बिना सिर के चार उलटे लटके हुए धड़ टंग गये-पीपल की डालों से झूलते चार धड़! कुदरत का धुनिया रात-भर ओसों की रुई धुनते-धुनते थकचला था. अब उसके चारों ओर धुनी हुई रुई की तरह कुहरे के पहाड़ खड़े थे. लेकिनकमलाकांत गाँव के ही आदमी हैं, उन्हें भटकने का भय नहीं, अपने शेष साथियों के साथउनके सधे पाँव आगे बढ़ते गये.--------------------------------------------------------------------------------एक कहानी रोज़: सुधा जिसे ताहिरा बनना पड़ा, फिर जा पहुंची 'लाल हवेली'