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बाबूजी के कपड़े टांगने की कील खाली दिखती तो जी सिहर जाता था

एक कहानी रोज़ में आज पढ़िए वेद प्रकाश की कहानी 'सूनी कील'

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7 जून 2016 (Updated: 7 जून 2016, 01:03 PM IST)
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सूनी कील वेद प्रकाश


  "बिजली चली गई, मोमबती ला दो", उसने अपनी मां को आवाज दी. मां ने रसोई घर से ही आवाज दी, "ठंड बहुत है. तुम रजाई के अंदर घुस जाओ." अपने कॉपी-पेंसिल को फर्श पर बिछी चटाई के ऊपर ही छोड़ कर वो बिस्तर पर चला गया. अभी खाना नहीं पका था. रजाई के अंदर घुसते ही स्कूल फील्ड की घटना आंखों के सामने आ गई. क्लास 4 के भैया लोग क्रिकेट खेल रहे थे, और घुंघराले बाल वाले भैया ने जोर का शॉट मारा था और संयोगवश बॉल बाउंड्री टच करने से पहले इसके पैर पर आकर लगी. जब वो मैदान पार कर रहा था. दूसरे भैया लोग तो खुश हुए लेकिन शॉट मारने वाले भैया दौड़ते हुए आए और कॉलर पकड़ कर जोर का धक्का दिया. धमकी भी दी की कल स्कूल में पिटाई करूंगा. ये सोचते ही वो सिहर उठा. ठीक इसी समय लाइट आ गई और सामने कील पर टंगी फुल-पैंट पर नज़र पड़ी. बाबूजी का पैंट. उसने बेड से ही आवाज़ लगाई, "मां बाबूजी अभी तक नहीं लौटे?" मां कुछ बोलती उससे पहले ही आवाज़ आई, "मैं आ गया बेटा."
मन ही मन सोचा की बाबूजी को बोल दूंगा तो उस भैया की अच्छी खबर लेंगे. बाबूजी के पास होने से अंदर का डर जाता रहा. मां ने खाने के लिए आवाज़ लगाई. कुनमुनाते हुए उसने कहा, "मेरा बिस्तर फिर से ठंडा हो जाएगा यहीं खाना ला दो."
बाबूजी ने हाथ पकड़ कर उठाते हुए. कहा, "मैं लेटता हू यहां, तुम खा कर आ जाओ, बिस्तर वैसा ही गर्म मिलेगा." खाते हुए वो सोच रहा था कि आज कौन सी कहानी सुनूंगा मां से.

दो साल बाद

त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव त्वमेव विद्या द्रविणम् त्वमेव त्वमेव सर्वम् मम देव देव

आज क्लास 4 में उसका पहला दिन था. एक नया विषय संस्कृत भी इस साल पढ़ना था. टीचर ने क्लास में आते ही पहला अध्याय खोलने को बोला और पूछा रोल नंबर एक कौन है? उसने हाथ ऊपर किया. शिक्षक ने उसको संस्कृत का पहला अध्याय पढने को कहा. खड़े हो कर एक ही सांस में वो बोल गया. शिक्षक ने अर्थ समझाने को कहा. इसपर वो चुप रहा. अर्थ नहीं पता था. शिक्षक ने क्लास में इसका अर्थ समझाया जो कि उसके दिल और दिमाग में सीधा प्रवेश कर गया.

एक महीने बाद

बुआ की आवाज़ आई. "खाने आ जाओ बेटा." आज काफी सर्द रात थी. उसने रजाई हटाई और रसोई घर में जा कर बैठ गया. बुआ खाना निकालने लगी; मां बाहर आ गई. खाना खत्म कर. वो जब कमरे में आया तो मां लेटी थी उसके जगह पर. उसके आते ही मां उठ कर फिर से रसोई घर चली गई. बिस्तर पहले जैसा ही गर्म था.

बिजली नहीं थी, मोमबत्ती जल रही थी, कमरे में. उस रोशनी में उसने देखा वो कील सूनी थी जिसपर फुल-पैंट टंगी रहती थी. उसके अंदर एक ठंडी सिहरन उठी. अंदर से शायद थोड़ा डर गया था. और तभी दिल के किसी कोने ने संस्कृत क्लास के पहले दिन का पहला पाठ दुहरा दिया और बिस्तर की गरमाहट ने उस पाठ को सारे शरीर में हल्की मालिश की तरह फैला दिया.

मां भी खा कर आ चुकी थी. मां के बगल में लेटते ही वो उनके पास सिमट आया. आज कहानी के लिए उसने नहीं कहा. चुपचाप लेटा रहा, और मन ही मन संस्कृत के पहले अध्याय को अपनी समझ के अनुसार दुहराता रहा. मोमबत्ती की धीमी रोशनी रूम में टंगे एक कैलेंडर पर पड़ रही थी. धीमी रोशनी में गणेश जी मां पार्वती के गोद में आराम कर रहे थे और वो अपनी मां के पास लेटा था. कल सुबह बुआ भी चली जाएंगी.

बाबूजी को गुजरे 15 दिन हो चुके थे और बुआ के अलावा सारे रिश्तेदार लौट चुके थे.


कैसी लगी कहानी?  लड़की की कटी हुई कलाइयों पर किसी के अंगूठे के निशान थे. डरिए मत कल की कहानी का नाम आय था ये. पढ़ी थी न ? एक काम किया कीजिए. आपको पुरानी कहानियां पढ़नी हो, तो वो नीचे जो एक कहानी रोज़ वाला टैग है, उस पर क्लिक कर दीजिए. सारी  कहानियां खुल जाएंगी. ठीक है!

जा कहां रहे हैं? सुनिए तो. आप भी कहानी लिखते हैं? लिखते हैं, हमको पता है. डायरी में लिखिएगा, या फेसबुक पर या नोटबुक पर. हमको काहे नहीं भेज देते. आज वाली कहानी ही ले लीजिए. झारखंड के रांची से वेद प्रकाश ने भेजी थी हमको. हमने लगा दी, इनने फोटो नहीं भेजी थी. आप फोटो भी भेज दीजिएगा. हम फोटो के साथ लगाएंगे. आप भी खुश हम भी खुश. भेजेंगे कहां? ये रहा चिट्ठी का पता. lallantopmail@gmail.com   

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