कहानी का प्लॉट शिवपूजन सहाय--------------------------------------------------------------------------------मैं कहानी-लेखक नहीं हूं. कहानी लिखने-योग्य प्रतिभा भी मुझ में नहीं है.कहानी-लेखक को स्वभावतः कला-मर्मज्ञ होना चाहिये, और मैं साधारण कलाविद् भी नहींहूं. किंतु कुशल कहानी-लेखकों के लिए एक 'प्लॉट' पा गया हूं. आशा है इस 'प्लॉट' परवे अपनी भड़कीली इमारत खड़ी कर लेंगे. मेरे गांव के पास एक छोटा-सा गांव है. गांव कानाम बड़ा गंवारू है, सुनकर आप घिनाएंगे. वहां एक बूढ़े मुन्शीजी रहते थे अब वह इससंसार में नहीं है. उनका नाम भी विचित्र ही था - 'अनमिल आखर अर्थ न जापू' - इसलिएउसे साहित्यिकों के सामने बताने से हिचकता हूं. खैर, उनके एक पुत्री थी, जो अब तकमौजूद है. उसका नाम - जाने दीजिये, सुनकर क्या कीजियेगा? मैं बताऊंगा भी नहीं! हां,चूंकि उनके संबंध की बातें बताने में कुछ सहूलियत होगी, इसलिए उसका एक कल्पित नामरख लेना जरूरी है. मान लीजिये, उसका नाम है 'भगजोगनी'. दिहात की घटना है, इसलिएदिहाती नाम ही अच्छा होगा. खैर, पढ़िये.मुन्शीजी के बड़े भाई पुलिस-दरोगा थे, उस जमाने में, जब कि अंग्रेजी जाननेवालों कीसंख्या उतनी ही थी, जितनी आज धर्म-शास्त्रों के मर्म जाननेवालों की है. इसलिएउर्दू-दां लोग ही ऊंचे ओहदे पाते थे.दारोगाजी ने आठ-दस पैसे का करीमा-खालिंकबारीपढ़कर जितना रुपया कमाया था, उतना आज कॉलेज और अदालत की लाइब्रेरियां चाटकर वकीलहोने वाले भी नहीं कमाते.लेकिन दारोगाजी ने जो कुछ कमाया, अपनी जिंदगी में ही फूंकताप डाला. उनके मरने केबाद सिर्फ उनकी एक घोड़ी बची थी, जो थी तो महज सात रुपये की, मगर कान काटती थीतुर्की घोड़ों की - कंबख्त बारूद की पुड़िया थी. बड़े-बड़े अंग्रेज-अफसर उस पर दांतगड़ाये रह गये, मगर दारोगाजी ने सब को निबुआ-नोन चटा दिया. इसी घोड़ी की बदौलत उनकीतरक्की रह गई, लेकिन आखिरी दम तक वह अफसरों के घपले में न आये - न आये. हर तरफ सेकाबिल, मेहनती, ईमानदार, चालाक, दिलेर और मुस्तैद आदमी होते हुए भी वह दारोगा केदारोगा ही रह गये - सिर्फ घोड़ी की मुहब्बत से! किंतु घोड़ी ने भी उनकी इस मुहब्बत काअच्छा नतीजा दिखाया - उनके मरने के बाद खूब धूम-धाम से उनका श्राद्ध करा दिया. अगरकहीं घोड़ी को भी बेच खाये होते, तो उनके नाम पर एक ब्राह्मण भी न जीमता. एक गोरेअफसर के हाथ खासी रकम पर घोड़ी को ही बेचकर मुन्शीजी अपने बड़े भाई से उऋण हुए.दारोगाजी के जमाने में मुन्शीजी ने भी खूब घी के दिये जलाये थे. गांजे मेंबढ़िया-से-बढ़िया इत्र मलकर पीते थे - चिलम कभी ठंडी नहीं होने पाती थी. एक जूनबत्तीस बटेर और चौदह चपातियाँ उड़ा जाते थे. नथुनी उतारने में तो दारोगाजी के भी बड़ेभैया थे - हर साल एक नया जल्सा हुआ ही करता था. किंतु, जब बहिया बह गई तब चारों ओरउजाड़ नजर आने लगा. दारोगाजी के मरते ही सारी अमीरी घुस गई. चिलम के साथ-साथचूल्हा-चक्की भी ठंडी हो गई. जो जीभ एक दिन बटेरों का शोरबा सुड़कती थी, वह अबसराह-सराहकर मटर का सत्तू सरपोटने लगी. चपातियाँ चाबने वाले दांत अब चंद चने चाबकरदिन गुजरने लगे. लोग साफ कहने लग गये - थानेदारी की कमाई और फूस का तापना दोनोबराबर है. हर साल नई नथुनी उतारने वाले मुन्शी जी को गांव-वार के लोग भी अपनी नजरोंसे उतारने लगे. जो मुन्शी जी चुल्लू-के-चुल्लू इत्र लेकर अपनी पोशाकों में मला करतेथे, उन्हीं को अब अपनी रूखी-भूखी देह में लगाने के लिए चुल्लू भर कड़वा तेल मिलना भीमुहाल हो गया. शायद किस्मत की फटी चादर का कोई रफूगर नहीं है. लेकिन जरा किस्मत कीदोहरी मार तो देखिये. दारोगाजी के जमाने में मुन्शी जी के चार-पांच लड़के हुए, परसब-के-सब सुबह के चिराग हो गये. जब बेचारे की पांचो ऊंगलियां घी में थीं, तब तो कोईखानेवाला न रहा, और जब दोनों टांगे दरिद्रता के दलदल में आ फंसी, और ऊपर से बुढ़ापाभी कंधे दबाने लगा, तब कोढ़ में खाज की तरह एक लड़की पैदा हो गई! और तारीफ यह किमुन्शीजी की बदकिस्मती भी दारोगाजी की घोड़ी से कुछ कम स्थावर नहीं थी! सच पूछिये तोइस तिलक-दहेज के जमाने में लड़की पैदा करना ही बड़ी भारी मूर्खता है. किंतु युग-धर्मकी क्या दवा है? इस युग में अबला ही प्रबला हो रही है - पुरुष-दल को स्त्रीत्वखदेड़े जा रहा है. बेचारे मुन्शीजी का क्या दोष? जब घी और गरम मसाले उड़ाते थे, तब तोहमेशा लड़का ही पैदा करते रहे, मगर अब मटर के सत्तू पर बेचारे कहां से लड़का निकाललाएँ! सचमुच अमीरी की कब्र पर पनपी हुई गरीबी बड़ी जहरीली होती है.--------------------------------------------------------------------------------'भगजोगनी' चूंकि मुन्शीजी की गरीबी में पैदा हुई, और जन्मते ही मां के दूध से वंचितहोकर 'टूअर' कहलाने लगी, इसलिए अभागिन तो अजाहद थी - इसमें शक नहीं, पर सुंदरता मेंवह अंधेरे घर का दीपक थी. आज तक वैसी सुघराई लड़की किसी ने कभी कहीं देखी न थी.अभाग्यवश मैंने उसे देखा था. जिस दिन पहले-पहल उसे देखा, वह करीब 11-12 वर्ष की थी.पर एक ओर उसकी अनोखी सुघराई और दूसरी ओर उसकी दर्दनाक गरीबी देखकर - सच कहता हूं -कलेजा कांप गया! यदि कोई भावुक कहानी-लेखक या सहृदय कवि उसे देख लेता, तो उसकीलेखनी से अनायास करुणा की धारा फूट-निकलती. किंतु मेरी लेखनी में इतना जोर नहीं हैकि उसकी गरीबी के भयावने चित्र को मेरे हृदय-पट से उतारकर 'सरोज' के इस कोमल 'दल'पर रख सके. और सच्ची घटना होने के कारण, केवल प्रभावशाली बनाने के लिए, मुझसेभड़कीली भाषा में लिखते भी नहीं बनता. भाषा में गरीबी को ठीक-ठीक चित्रित करने कीशक्ति नहीं होती, भले ही वह राजमहलों की ऐश्वर्य-लीला और विलास-वैभव के वर्णन करनेमें समर्थ हो. आह! बेचारी उस उम्र में भी कमर में सिर्फ एक पतला-सा चिथड़ा लपेटे हुएथी, जो मुश्किल से उसकी लाश ढकने में समर्थ था. उसके सिर के बाल तेल बिना बुरी तरहबिखर कर बड़े डरावने हो गये थे. उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में एक अजीब ढंग की करुणा-कातरचितवन थी. दरिद्रता-राक्षसी ने सुंदरता-सुकुमारी का गला टीप दिया था. कहते हैं,प्रकृति सुंदरता के लिए कृत्रिम श्रृगांर की जरूरत नहीं होती, क्योकि जंगल में पेड़की छाल और फूल-पत्तियों से सजकर शकुंतला जैसी सुंदरी मालूम होती थी, वैसी दुष्यंतके राजमहल में सोलहों सिंगार करके भी वह कभी न फबी किंतु, शकुंतला तो चिंता और कष्टके वायुमंडल में नहीं पली थी. उसके कानों में उदर-दैत्य का कर्कश हाहाकार कभी नगूँजा था. वह शांति और संतोष की गोद में पलकर सयानी हुई थी, और तभी उसके लिए महाकवि'शैवाल जाल - लिप्तकमलिनी' वाली उपमा उपयुक्त हो सकी. पर 'भगजोगनी' तो गरीबी कीचक्की में पिसी हुई थी, भला उसका सौंदर्य कब खिल सकता था! वह तो दाने-दाने को तरसतीरहती थी - एक बित्ता कपड़े के लिए भी मुहताज थी. सिर में लगाने के लिए एक चुल्लूअसली तेल भी सपना हो रहा था - महीने के एक दिन भी भर-पेट अन्न के लाले पड़े थे. भलाहड्डियों के खंडहर में सौंदर्य-देवता कैसे टिके रहते? उफ! उस दिन मुन्शी जी जबरो-रोकर अपना दुखड़ा सुनाने लगे, तो कलेजा टूक-टूक हो गया. कहने लगे - 'क्या कहूंबाबू साहब, पिछले दिन जब याद आते हैं, तो गश आ जाता है. यह गरीबी की मार इस लड़की कीवजह से और भी अखरती है. देखिये, इसके सिर के बाल, कैसे खुश्क और गोरखधंधारी हो रहेहैं. घर में इसकी मां होती, तो कम से कम इसका सिर तो जूंओं का अड्डा न होता. मेरीआंखों की जोत अब ऐसी मंद पड़ गई कि जूंएं सुझती नहीं. और, तेल तो एक बूंद भी मयस्सरनहीं. अगर अपने घर में तेल होता, तो दूसरे के घर जाकर भी कंघी-चोटी करा लेती - सिरपर चिड़ियों का घोंसला तो न बनता. आप तो जानते हैं, यह छोटा-सा गांव हैं, कभी सालछमासे में किसी के घर बच्चा पैदा होता हैं, तो इसके रूखे-सूखे बालों के नसीब जागतेहैं! गांव के लड़के, अपने-अपने घर, भर-पेट खाकर, जो झोलियों में चबेना लेकर खाते हुएघर से निकलते हैं, तो यह उनकी बाट जोहती रहती है - उनके पीछे-पीछे लगी फिरती हैं,तो भी मुश्किल से दिन में एक दो मुट्ठी चबेना मिल पाता हैं. खाने-पीने के समय किसीके घर पहुँच जाती है, तो इसकी डीट लग जाने के भय से घरवालियां दुरदुराने लगती हैं.कहां तक अपनी मुसीबतों का बयान करूं, भाई साहब, किसी की दी हुई मुट्ठी भीख लेने केलिए इसके तन पर फटा आँचल भी तो नहीं है! इसकी छोटी अंगुलियों में ही जो कुछ अंटजाता है, उसी से किसी तरह पेट की जलन बुझा लेती है! कभी-कभी एक-आध फंका चना-चबेनामेरे लिए भी लेती आती है, उस समय हृदय दो-टूक हो जाता है. किसी दिन, दिन-भर घर-घरघूमकर जब शाम को मेरे पास आकर धीमी आवाज से कहती है, कि बाबू जी, भूख लगी है - कुछहो तो खाने को दो, उस वक्त, आप से ईमानन कहता हूं, जी चाहता है कि गले-फांसी लगाकरमर जाऊं, या किसी कुएं-तालाब में डूब मरूं. मगर फिर सोचता हूं, कि मेरे सिवा इसकीखोज-खबर लेने वाला इस दुनिया में अब है ही कौन! आज अगर इसकी मां भी जिंदा होती, तोकूट-पीसकर इसके लिए मुट्ठी-भर चून जुटाती - किसी कदर इसकी परवरिश कर ही ले जाती, औरअगर कहीं आज मेरे बड़े भाई साहब बरकरार होते, तो गुलाब के फूल-सी ऐसी लड़की को हथेलीका फूल बनाये रहते. जरूर ही किसी 'रायबहादुर' के घर में इसकी शादी करते. मैं भीउनकी अंधाधुंध कमाई पर ऐसी बेफिक्री से दिन गुजारता था कि आगे आने वाले इन बुरेदिनों की मुतलक खबर ही न थी. वह भी ऐसे खर्राच थे कि अपने कफन-काठी के लिए भी एकखरमुहरा न छोड़ गये - अपनी जिंदगी में ही एक-एक चप्पा जमीन बेच खाई - गांव भर से ऐसीअदावत बढ़ाई कि आज मेरी इस दुर्गति पर भी कोई रहम करने वाला नहीं है, उल्टे सब लोगतानेजानी के तीर बरसाते हैं. एक दिन वह था कि भाई साहब के पेशाब से चिराग जलता था,और एक दिन यह भी है कि मेरी हड्डियां मुफलिसी की आंच में मोमबत्तियों की तरहघुल-घुल कर जल रही हैं. इस लड़की के लिए आस-पास के सभी जवारी भाइयों के यहां मैंनेपचासों फेरे लगाये, दांत दिखाये, हाथ जोड़कर बिनती की, पैरों पड़ा - यहां तक बेहयाहोकर कह डाला कि बड़े-बड़े वकीलों, डिप्टियों और जमींदारों की चुनी-चुनाई लड़कियों मेंमेरी लड़की को खड़ी करके देख लीजिये कि सब से सुंदर जँचती है या नहीं, अगर इसके जोड़की एक भी लड़की कहीं निकल आये, तो इससे अपने लड़के की शादी मत कीजिये. किंतु मेरे लाखगिड़गिड़ाने पर भी किसी भाई का दिल न पिघला. कोई यह कहकर टाल देता कि लड़के की मां ऐसेघराने में शादी करने से इनकार करती हैं, जिसमें न सास है, न साला और न बारात कीखातिरदारी करने की हैसियत. कोई कहता कि गरीब घर की लड़की चटोर और कंजूस होती है,हमारा खानदान बिगड़ जायगा. ज्यादातर लोग यही कहते मिले कि हमारे लड़के को इतना तिलकदहेज मिल रहा है, तो भी हम शादी नहीं कर रहे हैं, फिर बिना तिलक दहेज के तो बात भीकरना नहीं चाहते. इसी तरह, जितने मुंह उतनी ही बातें सुनने में आईं. दिनों का फेरऐसा है कि जिसका मुंह न देखना चाहिये उसका भी पिछाड़ देखना पड़ा. महज मामूलीहैसियतवालों को भी पांच सौ और एक हजार तिलक-दहेज फरमाते देखकर जी कुढ़ जाता है -गुस्सा चढ़ आता है. मगर गरीबी ने तो ऐसा पंख तोड़ दिया है कि तड़फड़ा भी नहीं सकता.साले हिंदू-समाज के कायदे भी अजीब ढंग के हैं. जो लोग मोल-भाव करके लड़के की बिक्रीकरते हैं, वे भले आदमी समझे जाते हैं, और कोई गरीब बेचारा उसी तरह मोल-भाव करकेलड़की को बेचता है, तो वह कमीना कहा जाता है. मैं अगर आज इसे बेचना चाहता, तो इतनीकाफी रकम ऐंठ सकता था कि कम-से-कम मेरी जिंदगी तो जरूर ही आराम से कट जाती. लेकिनजीते-जी हरगिज एक मक्खी भी न लूँगा. चाहे यह क्वाँरी रहे, या सयानी होकर मेरा नामहँसाये. देखिये न, सयानी तो करीब-करीब हो ही गई हैं - सिर्फ पेट की मार से उकसनेनहीं पाती, बढ़ंती रुकी हुई है. अगर किसी खुशहाल घर में होती, तो अब तक फूटकर सयानीहो जाती - बदन भरने से ही खूबसूरती पर भी रोगन चढ़ता है, और बेटी की बाढ़ बेटे सेजल्दी होती है. अब अधिक क्या कहूं बाबू साहब, अपनी ही करनी का नतीजा भोग रहा हूं -मोतियाबिंद, गठिया और दमा ने निकम्मा कर दिया है. अब मेरे पछतावे के आंसुओं में भीईश्वर को पिघलाने का दम नहीं है. अगर सच पूछिये, तो इस वक्त सिर्फ एक ही उम्मीद परजान अटकी हुई है - एक साहब ने बहुत कहने, सुनने से इसके साथ शादी करने के वादा कियाहै कि गांव के खोटे लोग उन्हें भी भड़काते हैं, या मेरी झाँझरी नैया को पार लगानेदेते हैं. लड़के की उम्र कुछ कड़ी जरूर है - 41-42 साल की, मगर अब इसके सिवा कोई चाराभी नहीं है. छाती पर पत्थर रख कर अपनी इस राजकोकिला को. इसके बाद मुन्शीजी का गलरूंध गया - बहुत बिलख कर रो उठे, और भगजोगनी को अपनी गोद में बैठाकर फूट-फूटकर रोनेलग गये. अनेक प्रयत्न करके भी मैं किसी प्रकार उनको आश्वासन न दे सका जिसके पीछेहाथ धोकर वाम-विधाता पड़ जाता है, उसे तसल्ली देना ठट्ठा नहीं है. मुन्शीजी कीदास्तान सुनने के बाद मैंने अपने कई क्वाँरे मित्रों से अनुरोध किया कि उस अलौकिकरूपवती दरिद्र कन्या से विवाह करके एक निर्धन भाई का उद्धार और अपने जीवन को सफलकरें. किंतु सब ने मेरी बात अनसुनी कर दी. ऐसे-ऐसे लोगों ने भी आनाकानी की, जोसमाज-सुधार-संबंधी विषयों पर बड़े शान-गुमान से लेखनी चलते हैं. यहां तक किप्रौढ़ावस्था के रँडुए मित्र भी राजी न हुए. आखिर वही महाशय डोला काढ़कर भगजोगिनी कोअपने घर ले गये और वहीं शादी की. कुल रस्में पूरी करके मुन्शीजी को चिंता के दलदलसे उबारा. बेचारे की छाती से पत्थर का बोझ तो उतरा, मगर घर में कोई पानी देने वालाभी न रह गया. बुढ़ापे की लकड़ी जाती रही, देह लच गई. साल पूरा होते-होते अचानक टन बोलगये. गांववालों ने गले में घड़ा बाँधकर नदी में डुबा दिया. भगजोगनी जीती हैं, आज वहपूर्ण युवती है. उसका शरीर भरा पूरा और फूला-फला है. उसका सौंदर्य उसके वर्तमाननवयुवक पति का स्वर्गीय धन है. उसका पहला पति इस संसार में नहीं है. दूसरा पति है -उसका सौतेला बेटा.