शिवानी जन्मीं थीं 17 अक्टूबर 1923 को. विजयादशमी का दिन था. राजकोट की बात है.पढ़ाई-लिखाई शांतिनिकेतन में हुई. साठ और सत्तर के टाइम में इनकी कहानियां खूब फेमसहुईं. 12 साल की उम्र में उनकी पहली कहानी प्रकाशित हुई थी. और ये अंत तक कहानियांलिखती रहीं. औरतों पर लिखा और बहुत अच्छा लिखा. खूब नाम कमाया. अभी जन्मदिन काहफ्ता है. हम आपको उनका लिखा पढ़ाएंगे. हफ्ते भर. कल पढ़ाया था 'गंगा बाबू कौन' आजपढ़िए गूंगा. राजकमल प्रकाशन को थैंक्स कहिए. उन्हीं की हेल्प से आपको ये कहानियांपढ़ा पा रहे हैं.--------------------------------------------------------------------------------सर्जन पंड्या को दूर से देखने पर लगता, कोई अंग्रेज चला आ रहा है. सुर्ख गालों परसुख, सन्तोष और स्वास्थ्य की चमक थी. उनके हाथ में कुछ ऐसा यश था कि उनकी प्रतिभाका स्पर्श पाते ही, मुरझाए मरीज भी चंगे होकर बैठ जाते. उनकी फीस भी उनकेव्यक्तित्व की ही भांति रोबीली थी, ऐसा-वैसा व्यक्ति तो उनकी फीस सुनकर ही पीला पड़जाता, पर रोगी के पीले चेहरे से भी उनकी आंखों में करुणा नहीं उभरती. कभी-कभी वेअपनी विकट फीस में थोड़ा-सा अन्तर भी कर देते थे. बशर्ते, मरीजा सुन्दरी हो या मरीजकिसी मौलिक बीमारी का नमूना हो. पर असंख्य रोगियों को जीवन-दान देने वाला यह अनोखामसीहा अपनी ही पत्नी का इलाज नहीं कर सका था. एक ही पुत्री को जन्म देकर उसकी पत्नीसौर में ही पगला गई थी और सर्जन उसे ठीक नहीं कर पाए थे. सोलह वर्ष से वह आगरा केपागलखाने में पड़ी थी. बीच-बीच में सर्जन उसे देखने भी जाते थे और कुछ लोग तो कहतेथे कि वह उतनी पागल नहीं थी कि उसे घर न लाया जा सके, पर सर्जन कभी लौटकर पत्नी केउन्माद का प्रसंग भी पुत्री के सामने नहीं छेड़ते और न पुत्री ही कुछ पूछती. सर्जनकी कन्या का नाम था कृष्णा. रंग था गेहुंआ, पर मुखश्री अनुपम थी. सघन कृष्ण वेणी कोवह ढीली-ढाली गूंथकर पीठ पर डाल देती. मां के अभाव को पिता के स्नेह ने कभी खटकनेनहीं दिया था. देखरेख की लगाम तो नहीं थी, पर पिता का शासन कड़ा था. कृष्णा ने पढ़ाईके साथ संगीत और नृत्य की शिक्षा प्राप्त की. पैरों में घूंघर बांधते ही वह स्वर्गकी अप्सरा बन जाती, बड़े से बड़ा कला-मर्मज्ञ हो या नृत्य-संगीत से एकदम ही अनभिज्ञकोई अरसिक, सब उसके नृत्य की रस- माधुरी में डूबकर रह जाते; यही उसके नृत्य कीविशेषता थी. एक बार एक नृत्योत्सव में तीन घंटे तक नाचकर दर्शकों को मन्त्रमुग्धकिया और अन्त में जब हाथ जोड़कर दर्शकों की ओर सिर झुकाया तो तालियों से हाल गूंजउठा. सर्जन की आंखों में आनन्दाश्रु छलक उठे. अन्तःकरण को अमृतवृष्टि से परिप्लावितकरती उस छवि को एकटक देखते, एक और व्यक्ति की भी आंखें तरल हो गई थीं और वह था तरुणस्क्वैड्रन, लीडर वी. डीसूजा. वह कृष्णा के पड़ोसी डॉ. डीसूजा का पुत्र था. उसकेपिता सर्जन के क्लिनिक में ही काम करते और सर्जरी में ही हाथ में छुरी लग जाने सेटिटनेस से उनकी मृत्यु हो गई थी. पिता की मृत्यु के बाद मातृहीन डीसूजा सर्जन केसाथ ही छुट्टियां बिताता. कृष्णा के आकर्षण-जाल में वह किस बुरी तरह फंस गया है यहवह उसी दिन जान पाया. स्वभाव से ही लजीले उस सौम्य गोवानी युवक पर सर्जन का अत्यन्तस्नेह था. उसके लम्बोतरे चेहरे पर सांवले रंग की चमक थी, पतली मूंछों के नीचे उसकेपतले होंठों पर सदा संयम की चाबी लगी रहती. वह बड़े नम्र स्वर में बोलता और बड़े हीसलीके से कपड़े पहनता. उसके जूते ऐसे चमकते कि कोई चाहे तो अपना मुंह देख ले! सर्जन,उसके जूतों की इसी चमक पर फिदा थे. "शाब्बास बेटे, तुम्हारे जूतों की चमक देखकरहमारी तबियत खुश हो जाती है. जो शख्स अपने जूते चमकाकर रखता है उसका दिल भी हमेशाचमकता रहता है." पता नहीं, सर्जन का कथन किस अंश तक सच था, पर डीसूजा का दिल सचमुचही एकदम साफ था. वह जितना ही कृष्णा से बचकर निकलता, वह उसे उतना ही घेर लेती. इसीबीच सर्जन को अपने निःसन्तान बूढ़े चाचा की क्रिया निबटाने पहाड़ जाना पड़ा. कुछ हीदिन पूर्व उसके चाचा का अनुनय-भरा पत्र आया था- "मैं मरणासन्न हूं, मेरी मृत्यु केबाद जैसे भी हो, मुझे पीपल-पानी कर जाना, नहीं तो मेरी आत्मा भटकती रहेगी." सर्जनप्रगतिशील विचारों के होकर भी घोर सनातनी थे. अपने राजप्रासाद के गुसलखाने मेंलघुश्ंाका से निवृत्त होने भी जाते, तो जनेऊ कान पर चढ़ा होता. चाचा की आत्मा को तोउन्होंने भटकने से बचा लिया, पर पुत्री की आत्मा भटक गई. तेरहवीं कर लौटे तो चित्तप्रसन्न था. आत्मीय स्वजनों ने उनकी पुत्री के लिए एक हीरे-सा टुकड़ा वर ढूंढ़ दियाथा. कृष्णा उन्हें लेने एअर पोर्ट पर आई- "क्यों बेटी, कान्तम्मा तुम्हें छोड़करछुट्टी ले घर तो नहीं चली गई थी?" उन्होंने पूछा. कान्तम्मा उनकी वर्षों पुरानीबूढ़ी आया थी. "ना पापा," नम्रमुखी कन्या उन्हें कुछ पीली-सी लगी. "पापा, मेरे लिएपहाड़ की मिठाई बालसिंघौड़ी लाए या नहीं?" बच्ची की तरह मचलकर उसने पूछा. "लाया क्योंनहीं, और भी एक चीज लाया हूं अपनी दुलारी बेटी के लिए, जानती हो क्या?" सर्जन नेमुस्कराकर कहा. "क्या पापा?" "एक सुन्दर-सा वर, जिसे ढूंढ़ने ही शायद भगवान ने मुझेपहाड़ भेजा था." सर्जन ने कनखियों से बेटी की ओर देखा और ममता से उनका गला भर आया.थोड़े ही दिनों में उनकी बेटी पराई हो जाएगी. कृष्णा का चेहरा आश्चर्यजनक रूप सेसफेद लग रहा था, वह पहले गुमसुम हो गई, फिर अचानक दृढ़ स्वर में बोली, "आपको मेरेलिए वर नहीं ढूंढ़ना होगा- मैंने वर ढूंढ़ लिया है!" सर्जन दंग रह गए, कहती क्या हैलड़की- कहां से वर ढूंढ़ लिया, यहां तो अपने समाज का एक परिवार भी नहीं था. "क्या बातकर रही है पगली, कैसा वर?" उन्होंने स्वर को करुण बनाकर पूछा. "हां पापा, मैं विकीसे ही ब्याह करूंगी." सामान्य-सी किशोरी के कंठ की दृढ़ता में कहीं भी नम्रता कीमिठास नहीं थी. सर्जन क्रोध से कांपते चुपचाप अपनी मूंछें नोचने लगे. सामान्य-सापाइलट डीजूसा, उस पर भी ईसाई और कहां कुमाऊं के महापंडितों के खानदान की पुत्रीकृष्णा! कार घर पहुंची, तो डीसूजा को बुलाने आदमी भेजा, पता लगा- डीसूजा मद्रास चलागया है. शासन की लक्ष्मण-रेखा में पुत्री को बांधकर सर्जन निश्चिन्त हो गए. बिनाउनसे पूछे अब वह गुसलखाने भी नहीं जा सकती थी. सर्जन को इसी बीच जयपुर की मेडिकलसेमिनार में अध्यक्षता करने जाना पड़ा. कान्तम्मा को कड़ी हिदायतें देकर वे दो औरबूढ़ी नौकरानियां तैनात कर गए, किन्तु तीन जोड़ी बूढ़ी आंखों को धोखा देने के लिएकृष्णा की एक ही जोड़ी जवान आंख काफी थीं. डीसूजा खबर पाते ही छुट्टी लेकर आ गया औरदोनों फिर लुक-छिपकर मिलने लगे. "पापा के आने में केवल आठ दिन हैं विकी." एक दिनकृष्णा ने उसकी छाती पर माथा टिकाकर कहा, "तुम्हें पांच दिन बाद लम्बी टेªनिंग केलिए फ्रांस जाना है, क्यों न हम सेंट पाल के बूढ़े पादरी की खुशामद कर शादी कर लें?पापा फिर कर ही क्या लेंगे?" एक शाम, दोनों जंगल में खो गए. बच्चों की भांति,एक-दूसरे का हाथ कसकर पकड़े, सेंट पाल से लौटे. तीसरे दिन डीसूजा चला गया. सर्जनलौटे, ढाई-तीन माह तक मरीजों में फंसे रहे. एक दिन लेटे-लेटे वे अखबार पढ़ रहे थे किपहले ही पृष्ठ पर ‘तरुण भारतीय पाइलेट की मृत्यु’ की खबर देखकर चौंक गए. डीसूजा कीमृत्यु हो गई थी. वे मन-ही-मन ईश्वर को लाख-लाख धन्यवाद दे रहे थे कि एक चीख सुनकरचौंक पड़े. कृष्णा उनके पीछे खड़ी थी. उसका रोना और कोई न सुन ले, यह सोचकर सर्जन नेचट से उसे उसके कमरे में धकेलकर अन्दर से चिटकनी चढ़ा दी. पर कृष्णा सिसकती रही."क्या तूफान मचा रखा है तुमने? कोई नादान बच्ची तो नहीं हो, तुम्हें पता होना चाहिएकि तुम्हारी शादी तय हो चुकी है." बाल बिखराए ही कृष्णा तड़पकर उठ बैठी- "मेरी शादीहो चुकी थी पापा!" "क्या बकती है?" सर्जन ने तिलमिलाकर बेटी की ओर चांटा साधा; फिरबड़ी चेष्टा से बिना मारे ही हाथ खींच लिया. "हां पापा, तीन माह पहले सेंट पाल केपादरी ने हमारी शादी करवाई थी- विकी मेरा पति था." उसके होंठ कांपने लगे. "चुप करबेहूदी! तुम अभी नाबालिग हो, शादी हो ही कैसे सकती थी?" गुस्से से पैर पटककर सर्जनधड़धड़ाते पादरी के पास गए, न जाने कितने के चेक से उसका मुंह बन्द किया. लौटे तोकृष्णा को समझाते हुए कहा, "मैंने पादरी को समझा दिया है, वह सब रिकार्ड जला देगा.खिलवाड़ को कोई भी धर्म शादी नहीं कह सकता." "पर एक बात और है पापा," सिर झुकाकरकृष्णा जमीन में गड़ गई. "क्या?" चीखकर ही पूछा सर्जन ने. "मैं मां बननेवाली हूं."दोनों हाथों से मुंह ढांपकर वह सिसक उठी. नियति से जूझकर सर्जन अब धराशायी थे.रात-भर वे पिंजड़े में बन्द शेर की तरह चक्कर लगाते रहे, फिर भोर होते-होते उन्होंनेकमर कस ली. दूसरे दिन वे पुत्री को लेकर यह कहकर चले गए कि सगाई की रस्म पूरी करनेवे पहाड़ जा रहे हैं. मार्ग में उन्होंने बेटी को कितना समझाया, अठारह वर्ष कीजिन्दगी, वह अकेली नहीं काट सकती. देहली में एक बहुत बड़े महिला आश्रम की संचालिकाकाशीबाई को वे जानते थे. कुछ वर्ष पूर्व उसे ब्रेस्ट कैन्सर हो गया था. उन्होंने उसविधवा सुन्दरी को कभी जीवन-दान दिया था. आज उसी का प्रतिदान मांगने जा रहे थे.सबकुछ सुनकर काशीबाई हंसकर बोली, "आप निश्चिन्त रहें सर्जन, किसी को कानों-कान खबरनहीं होने की." भाग्य ने सर्जन पर दया करके समय से पूर्व कृष्णा को मुक्ति दे दी.सतमासी पुत्र को जन्म देकर वह चार माह बाद घर लौट आई. कुछ ही दिनों बाद उसके विवाहकी तैयारियां जोर-शोर से होने लगीं. सात फेरे लगाकर सप्तपदी पूर्ण हुई तो सर्जन केदिल का पहाड़ हट गया. काशीबाई पर उन्हें पूरा भरोसा था और किसी को कानोंकान कुछ खटकाभी नहीं हुआ था. धीरे-धीरे समय बीतता गया. विवाह को अब छः वर्ष पूरे हो गए थे.कृष्णा के एक पांच वर्ष का पुत्र भी था, किन्तु अभी भी उसके सौन्दर्य में वहीअल्हड़-सा भोलापन था. वह नृत्य का निरन्तर अभ्यास करती थी, उसके ओडिशी और भरतनाट्यम्की ख्याति राजधानी तक पहुंची और महारानी के स्वागत-समारोह में उसे आग्रहपूर्वकआमन्त्रित किया गया. वह अपने पति और पुत्र के साथ ही आई थी, क्योंकि ठीक सातवें दिनउसके पति को वाशिंगटन दूतावास में सेक्रेटरी के पद का भार ग्रहण करने पहुंचना था.दुर्भाग्य से ठीक नृत्य-समारोह के दिन ही राजीव को तेज ज्वर हो आया. इकलौता जिद्दीलाड़ला, मां के गले में अपनी ज्वराक्रान्त तपती बांहें डालकर झूल गया- "नहीं ममी,तुम यहीं रहो." बड़ी कठिनता से एक इलेक्ट्रिकल टेªन और चाकलेट का उत्कोच देकर कृष्णाको छुट्टी मिली. उस दिन के नृत्य-प्रदर्शन ने उसके गले में कीर्ति की जयमाला डालदी. स्वयं महारानी एलिजाबेथ ने उसके दोनों हाथ पकड़कर उसे बधाई दी. प्रशंसा औरतालियों के नशे में झूमती वह पति के साथ कार में लौट रही थी कि सर्र से महिला आश्रमके पास से कार गुजर गई. एक पल ही में उसकी सारी प्रसन्नता उड़ गई. जिस घाव की सूखीपपड़ियां तक झर गई थीं, वही आज नासूर बन गया था. घर पहुंची और बच्चे को छाती सेचिपटाकर लेट गई, पर सो नहीं सकी. मां को पाकर राजीव ने प्रसन्नता से छाती में मुंहछिपा लिया. पीपल के पेड़ के साये में घिरी आश्रम की छोटी-सी कोठरी में मूंज कीझूला-सी चारपाई पर एक अभागा सो रहा था, उसके पास मुंह छिपाने को किसी की छाती नहींथी. उसे सदा के लिए छोड़ जाने पर भी मां ने किसी प्रकार का समझौता नहीं किया था. नउसे मां के लौटने का इन्तजार था, न बिछोह का दर्द. वह दिन-भर आश्रम के लावारिसबच्चों से पिटता रहता. उसकी शान्त आंखों में एक अजब उदासी थी, न वह किसी से बोलताथा, न किसी से झगड़ता. झगड़ता भी कैसे? वह बहरा था और बोलता भी क्या? बेचारा जन्म सेही गूंगा था. कृष्णा को यह सबकुछ पता नहीं था. पांच वर्षों में वह कई बार उसे देखनेको व्याकुल हो उठी थी, पर उसने पापा को आश्रम में कभी पैर भी न रखने का वचन दियाथा. फिर क्या पता, शायद मर ही गया हो. बेचारी कृष्णा क्या जानती थी कि ऐसे बच्चे,जिनकी मौत की मिन्नतें मांगी जाती हैं, कभी नहीं जाते. जाते हैं वे जिनकी जिन्दगीकी भीख के लिए दामन फैलाए जाते हैं. सोमवार को उसे विदेश जाना था. बच्चे का बुखारउतर गया था और वह अपनी रेल से खेल रहा था. पति कहीं गए थे. कृष्णा ने अपनी कारनिकाली और उसी दुकान पर पहुंची, जहां से खिलौने की रेल खरीदी थी. ठीक वैसी ही रेलखरीदी, एक बड़ा-सा भालू लिया और कई चाकलेटों से बैग भरकर आश्रम की ओर चल पड़ी. थोड़ीदूरी पर कार पार्क कर उतरी तो कलेजा धड़कने लगा. क्या पता, काशीबाई की बदली हो गईहो! साहस कर भीतर गई तो काशीबाई गेट पर ही मिल गई- "ओह तुम! वाह आओ, आओ! दफ्तर हीमें बैठें." हाथ पकड़कर उसे भीतर ले गई. "कहो, आज बहुत दिनों में याद किया." स्वर कातीखा व्यंग्य कृष्णा के हृदय के घाव पर नमक छिड़क गया. "आती कैसे! पापा को वचन दियाथा." कहकर कृष्णा ने माथा झुका लिया. "क्या उसे देखोगी?" बड़ी आत्मीयता से काशीबाईआगे को झुक गई. सिर झुकाकर कृष्णा ने मौन स्वीकृति दे दी. "देखो कृष्णा, बुलवा लेतीहूं, पर जरा अपने दिल पर काबू रखना. वह अभागा गूंगा है, ये नौकरानियां साली बड़ीहरामी हैं, जरा भी शुबहा होगा, तो ब्लैकमेल करना भी जानती हैं.’’ ‘पूरनदेई!’ कहकरउसने घंटी बजाई, एक अधेड़-सी जल्लाद औरत आकर खड़ी हो गई. ‘देखो, गूंगा बाबा को ले आओ,बड़ी डाक्टरनी आई हैं. उसकी जबान देखेंगी.’ पूरनदेई चली गई तो संसार की सारीहथौड़ियां कृष्णा की कनपटी पर चलने लगीं. रूमाल निकालकर वह पसीना पोंछ रही थी कि‘चल-चल’ कहती हुई खच्चर की तरह हांकती पूरनदेई गूंगे को ले आई. वह शायद किसी कीमंगनी की कमीज पहने था, जिसकी बांहें, उसके हाथों से बहुत नीचे लटक रही थीं, याशायद कमीज की लम्बाई महज इसलिए बढ़ा दी गई थी कि जीर्ण निक्कर ने नीचे के अंगों कीलाज ढांकने से एकदम ही इन्कार कर दिया था. "तैयार क्यों नहीं किया इसे?" सकपकाकरकाशीबाई ने पूरनदेई को डांटा. "जिद्दी कैसा है यह हरामी! कितना कहा, कपड़े बदल ले,माने तब न." पूरनदेई आग्नेय दृष्टि से गूंगे को भस्म कर बाहर चली गई. कृष्णा की सजलआंखों में नन्हें राजीव का चेहरा नाच उठा, जिसके सौ-सौ नखरे उठाते हुए वह, आया औरउसके पति हार-हार जाते थे. द्वार पर कुंडी चढ़ाकर काशीबाई ने इशारे से गूंगे कोनजदीक बुलाया- "आओ बेटा!" "घम-घम" गूंगे ने किसी महान दार्शनिक की भांति हंसकर अपनीगूंगी दलील पेश की. जैसे कृष्णा से कह रहा हो- ‘मां, इसकी बातों में मत आना, यह बड़ीलबारी है.’ कृष्णा ने बेटे की बात समझ ली. ऐसी भाषा केवल मां ही समझ सकती है.झरझरकर उसकी आंखें बरस पड़ीं. छोटा-सा डीसूजा ही तो खड़ा था. वही संयमी दृष्टि औरवैरागी मुस्कान. लपककर उसने गूंगे को खींचकर छाती से लगा लिया. कभी उसकी लटों कोचूमती, कभी मैल से काली कलाइयों को. लगता था, चूम-चूमकर ही गूंगे को अपने में भरलेगी. "अरे, बस भी कर. क्यों गूंगे का सिर फिरा रही है?" अपनी जल्लादी आंखों को औरभी कठोर बनाकर काशीबाई बोली. तिलमिलाकर कृष्णा ने उसे छोड़ दिया. मुक्ति पाते हीगूंगा खिलौनों के पास खड़ा हो गया. "ले, सब तेरे हैं." कहकर काशीबाई ने उसे डिब्बेथमा दिए. गूंगी आंखें चमक उठीं, कभी इंजन को उठाता, कभी रंगीन लाल-हरे रेल केडिब्बांे को, कभी ताली बजाता और कभी गोल-गोल घूमकर नाचता- "घम घम मम मम!" "अब तुमजाओ कृष्णा, बड़ी देर से दरवाज़ा बन्द है, मुई पूरनदेई कहीं द्वार पर ही कान लगाए खड़ीन हो. वाह, अंगूठी तो बड़ी सुन्दर है तुम्हारी!" लालची दृष्टि का सन्देश कृष्णा समझगई. चट अंगूठी उतारकर उसने काशीबाई को पहना दी और मूक करुण दृष्टि से अपना सन्देशभी दे दिया- ‘मेरे गूंगे का ध्यान रखना.’ फिर हृदय पर पत्थर रखकर वह उठी, एक बारगूंगे को चूमा और तीर-सी बाहर छिटक गई. सोमवार को वह पति के साथ विदेश चली गई. कुछही महीनों में भारतीय सेक्रेटरी की नृत्य-प्रवीणा पत्नी की चर्चा पूरी एम्बेसी मेंथी. एक बार टेलीविजन पर उसका नृत्य हुआ और एक दिन उसे एक पत्र मिला, एक गूंगे-बहरेबच्चों की संस्था-संचालिका मदर मारिया का. "क्या वे उनके अभागे बच्चों के सम्मुखअपना मनोहारी नृत्य प्रस्तुत कर कृतार्थ करेंगी!" कृष्णा ने एकदम स्वीकृति दे दी.तीन घंटे तक वह नाचती रही. गूंगे चेहरों पर खुशी की चमक उसके लिए करोड़ों तालियों कीगड़गड़ाहट से भी बढ़कर थी. नृत्य समाप्त हुआ और मदर का हाथ पकड़कर एक देवदूत-सा सुन्दरबालक आया और उसे फूलों का गुच्छा भेंट किया. "धन्यवाद बच्चे, क्या नाम हैतुम्हारा?" पूछते ही कृष्णा को अपनी अल्पबुद्धि पर क्रोध आया. "ओह मिसेज त्रिपाठी,यह बेचारा तो जन्म से ही गूंगा है." मदर ने कहा, "इसकी मां इसे हमारे आश्रम केद्वार पर डाल गई थी, फिर पलटकर नहीं आई- ईसू उसे क्षमा करे." मदर ने क्रास बनाया.कृष्णा एकटक उस बच्चे के सुनहरे माथे को देखती रही. फिर टपटप कर उसके आंसू रत्नजटितवलयों को भिगोने लगे. "यह क्या मिसेज त्रिपाठी, आप रो रही हैं?" आश्चर्य से मदर नेपूछा और फिर बढ़कर उन्होंने कृष्णा के दोनों हाथों को चूम लिया. "काश, ऐसे हीप्रत्येक मानव दूसरे के दुख-दर्द के लिए रो सकता! एक विदेशी गूंगे बच्चे के लिएआपकी आंखों में आंसू देखकर मुझे कितनी प्रसन्नता हुई, कितनी!" बेचारी मदर क्याजानती थी कि वे आंसू केवल उस विदेशी गूंगे बालक के लिए ही नहीं थे. वे उसके लिए भीथे जो अपनी दुबली कलाइयों से, खिड़की की सलाखों को जकड़े ही सो रहा था. उसकी छाती सेएक मैला-सा कपड़े का भालू चिपका था. उसकी रेल काशीबाई ने आश्रम के खिलौने के कमरेमें बन्द कर दी थी. वह कितना रोया था, पर कौन सुनता? आश्रम में, मोटरों में बैठकर,खादी की टोपी लगाए मेहमान आते, बच्चे को साफ कपड़े पहनाए जाते, मिठाई बंटती, परगूंगा मिठाई फेंककर, अपनी रेल के लिए मचलता रहता. समुद्र की उत्तुंग लहरों कोभांति, नाना तर्क-वितर्कों की लहरें उसके नन्हे-से कलेजे की कछार पर सिर पटक-पटककरव्यर्थ ही लौट जातीं. वह कितना कुछ पूछना चाहता है- मेरी रेल क्यों छीन ली? इतनेमेहमान आते हैं, पर वह क्यों नहीें आती जिसने मुझे चूम-चूमकर खिलौने दिये थे? आजमेरी पीठ पर काशीबाई ने बेंत क्यों मारे? मैंने तो पूरनदेई की पीठ पर दांत ही काटेथे; पर वह जो मुझे रोज-रोज मारती है, उसे बेंत क्यों नहीं पड़े? पर वह अभागा कुछ भीनहीं पूछ सकता. अन्धे बेजान भालू को छाती से चिपकाकर खिड़की के अंधेरे कोने में दुबकगया है, जहां थोड़ी देर तक न उसे काशीबाई ढूंढ़ सकती है, न पूरनदेई. सात समुद्र पारउसकी मां भी सिसक रही है- शायद उन्हीं लाड़भीनी सिसकियों की लोरी ने गूंगे को भीसुला दिया है. मीठी नींद में डूबा गूंगा, अपने गूंगे सपनों की दुनिया में पहुंचकरखो गया है, वहां न काशीबाई है न पूरनदेई. वहां तो बस बड़ी-सी बिजली की रेल है, सोनेके पेड़ों पर खिलौने झूल रहे हैं, और वही सुन्दर-सी औरत उसे गोद में उछाल-उछालकर चूमरही है. नींद ही में गूंगा मुस्कराकर भालू को और भी कसकर छाती से लगा लेता.--------------------------------------------------------------------------------शिवानी का हफ्ता में आज पढ़िए 'गंगा बाबू कौन'शिवानी का हफ्ता में पढ़िए पहली कहानी ‘लाल हवेली’