शिवानी जन्मीं थीं 17 अक्टूबर 1923 को. विजयादशमी का दिन था. राजकोट की बात है.पढ़ाई-लिखाई शांतिनिकेतन में हुई. साठ और सत्तर के टाइम में इनकी कहानियां खूब फेमसहुईं. 12 साल की उम्र में उनकी पहली कहानी प्रकाशित हुई थी. और ये अंत तक कहानियांलिखती रहीं. औरतों पर लिखा और बहुत अच्छा लिखा. खूब नाम कमाया. अभी जन्मदिन काहफ्ता है. हम आपको उनका लिखा पढ़ाएंगे. हफ्ते भर. राजकमल प्रकाशन को थैंक्स कहिए.उन्हीं की हेल्प से आपको ये कहानियां पढ़ा पा रहे हैं. सिंह नर्सिंग होम में बड़ा-साताला लटक रहा था. लोकप्रिय डॉ. सिंह के अकस्मात् इस तरह अलोप हो जाने पर, उनके कईमरीजों की अवस्था और बिगड़ गई थी. अब क्या होगा? अपने हाथों का चमत्कार दिखा, उन्हेंमृत्युंजयी औषधि पिलानेवाला मसीहा ऐसे अदृश्य क्यों हो गया? यह ठीक था कि कई दिनोंसे डॉ. सिंह ने अपने क्लीनिक में किसी भी नए मरीज को नहीं लिया था, फिर भी निराशमरीजों के असहाय आत्मीयों की एक लम्बी कतार, उनके सेक्रेटरी के चरणों पर सिर रखकरगिड़गिड़ाती रही थी. जैसे भी हो, एक बार डॉ. सिंह उनके मरीजों को देख-भर लें, परसेक्रेटरी बेचारा क्या करता? डॉ. साहब अपनी सजी कोठी के सबसे ऊपर के कमरे में स्कॉचलेकर बन्द थे. किसकी मजाल थी कि द्वार खटखटा दे. बीच-बीच में उनका गूंगा नौकर बदलू,काली तेज़ कॉफी की ट्रे वहीं पहुंचाता रहता. ‘साहब क्या कर रहे हैं?’...‘कैसा मूडहै?’- ‘बैठे हैं या लेटे हैं?’...किसी भी प्रश्न का उत्तर गूंगा नहीं दे पाता तोडॉक्टर सिंह का सेक्रेटरी सुशील रॉय झुंझला उठता. कैसी भी अटूट सम्पत्ति क्यों नहो, ऐसे भला कितने दिनों तक काम चलेगा? बंधे मरीज क्या उनके लिए बैठे रहेंगे? यहीसब कहना चाहता था उनका युवा सेक्रेटरी. डॉक्टर सुशील राय पर कठोर प्रभु का आदेश थाकि सिवाए गूंगे बदलू के उनके कमरे में कोई न आने पाए. न जाने कितने इष्ट-मित्रआ-आकर लौट गए. जब रंगे बालों और लम्बे नाखूनोंवाली विधानसभा की सदस्या रानीशिवसुन्दरी भी बड़ी देर तक व्यर्थ द्वार भड़भड़ाकर भुनभुनाती लौट गई, और शांत स्वर मेंडॉक्टर सिंह को कहते सुशील ने सुन लिया, ‘शिवी मुझे कुछ दिन क्षमा कर दो, मैं शरीरऔर मन दोनों से अस्वस्थ हूं’ तो वह समझ गया कि लौहद्वार अब किसी मिलनेवाले के लिएनहीं खुलेगा. पर दूसरे दिन आधी रात में कुछ पलों तक द्वार खुला था. नर्सिंग होम केजिस वी.आई.पी. मरीज को दूसरे दिन छुट्टी मिलनेवाली थी, उसे अचानक दिल का दूसरा दौरापड़ गया. डरते-डरते डॉक्टर रॉय ने द्वार खटखटाया. न खटखटाता और इसी बीच मरीज को कुछहो जाता तो शायद सिंह नर्सिंग होम की नींव ही हिल जाती. मरीज किसी जनसंघी मन्त्रीका साला था. एकदम टाइम बम, कब घातक रूप से फट पड़े, ठीक नहीं! देखभाल करने को साथमें निरन्तर बनी रहती उनकी समाज-सेविका साली. उसी ने डॉक्टर सुशील को एक प्रकार सेकन्धा पकड़कर सीढ़ियों पर धकेल दिया था. ‘‘जैसे भी हो, डॉक्टर सिंह को नीचे खींच लेआओ. नहीं आएं तो उनके हक में ठीक नहीं होगा. मरीज को जब यहां लाए हैं, तब उनके जीवनकी जिम्मेदारी भी वहन करनी होगी.’’ डॉक्टर सुशील ने शायद घबराकर द्वार कुछ जोर सेही भड़भड़ा दिए थे, ‘‘सर, मन्त्रीजी के साले की हालत बहुत ख़राब है, एक बार चलकर देखलिया जाए.’’ ‘‘भाड़ में जाए तुम्हारा मन्त्री का साला.’’ सौ दानव कंठ एकसाथ गरज उठेथे. पर फिर कुछ सोचकर उन्होंने स्वयं ही द्वार खोल दिया. प्रभु का स्याह चेहरादेखकर सुशील सहम गया था. लगता था, कई दिनों से कमरे में स्वेच्छा से बन्दी बनेडॉक्टर सिंह ने शरीर पर मनमाना अत्याचार किया है. अव्यक्त व्यथा से चेहरा झुलसकरएकदम काला पड़ गया था. जिसे उसने दस वर्ष के साहचर्यकाल में एक बार भी बिना दाढ़ीबनाए नहीं देखा था, जिसका तीखा-सुडौल चिबुक, भरे कपोल सदा नवजात शिशु के नरमगालों-से ही दिखते, उन्हीं पर खुरदरी सफेद झाड़ी-सी दाढ़ी उग आई थी. जो व्यक्ति दिनमें नित्य दो बार भड़कीले सूट बदलकर ही मरीजों की नाड़ी पकड़ता था, और जिसकी रोबीलीपकड़ में आते ही नाड़ी स्वयं आश्वस्त हो ऐक्यूजर बनी, किसी अपराधी-से पक्के रोग दस्युको पकड़ा, उसका पूरा इतिहास उगल देती थी, वही सुदर्शन व्यक्ति आज स्वयं कठघरे मेंखड़ा अभियुक्त-सा लग रहा था. केवल बनियान और पायजामा पहने ही वह मरीज देखने उतरनेलगा तो सुशील के जी में आया उसे टोक दे, ‘सर, ड्रेसिंग गाउन डाल लीजिए, वहां उनकीसाली भी हैं.’ वह जानता था कि स्वाभाविक मानसिक अवस्था होने पर ऐसी बेढंगी पोशाकमें डॉक्टर सिंह शायद घर की जमादारनी के सम्मुख भी नहीं खड़े होते. मरीज की अवस्थासचमुच ही शोचनीय थी. पर डॉक्टर सिंह उसे देखते ही एक बार फिर पुराने डॉक्टर सिंह होगए. मरीज की शोचनीय अवस्था ही तो उन्हें पुलकित कर उठती थी. शत्रुपक्ष के साथ ली गईटक्कर तब ही आनन्द दे सकती है, जब दोनों ओर का पलड़ा समान हो. अपने कठिन शत्रु कीदुर्बलता को उन्होंने इस बार भी पकड़ लिया. सिद्ध पहलवान की भांति आत्मविश्वास कागंडा बांधकर वह अखाड़े में कूदे, और पल-भर में शत्रु उनके चतुर दांव-पेंच से उलटापड़ा था. ‘‘ऑक्सीजन प्लांट लाओ...फलां इंजैक्शन, फलां दवा.’’ ‘‘आप यहां क्या कर रहीहैं? जाइए बाहर.’’ उन्होंने हो-हल्ला मचाती मरीज की तेजस्वी साली को ऐसे डपट दिया,जैसे वह स्कूल की बच्ची हो. मरीज के कमरे में आत्मीय स्वजनों की भीड़ देखकर वहतुनकमिजाज डॉक्टर ऐसे ही भड़क जाता था. रात-भर वह मरीज की छाती पर अपने हाथों से ऐसेमालिश करता रहा, जैसे कोई स्नेही घोसी अपनी भैंस को रगड़-रगड़कर नहला रहा हो. पौ फटीतो मृत्यु-द्वार से प्रत्यावर्ती रोगी चैन की नींद सो रहा था. समाज-सेविका सालीविधुर जीजा के धड़क रहे हृदय पर हाथ धर एक बार फिर आश्वस्त हो बैठ गई थी. इस अद्भुतडॉक्टर की कृपा से काल-कुठार इस बार उसके वैधव्य कल्पतरु के तने का स्पर्श भी नहींकर पाया था. धन्यवाद देती, इससे पहले ही वह रूखा डॉक्टर धड़धड़ाता अपने कमरे में चलागया था और उसने कुंडी चढ़ा ली थी. विधि की भी कैसी विचित्र विडम्बना थी कि सहस्रोंमुर्दों में ऐसी जान फूंक देनेवाला यह अनोखा जादूगर आठ दिन पूर्व हाथ बांधे खड़ादेखता ही रह गया था और बलवती मृत्यु अपनी शत-सहस्र पराजयों का एक ही आघात मेंप्रतिशोध ले, उसे अंगूठा दिखाकर चली गई थी. फ्रिज में धरे तरबूज के लुभावने रक्तिमअन्तस्तल में छिपी घातक कुटिल मृत्यु मुस्करा रही है. यह तब पिता-पुत्र क्या जानतेथे? तरबूज की एक फांक तो पिता ने भी खाई थी, फिर मृत्यु पुत्र को ही क्यों ले गई?पिता और पुत्र भी क्या ऐसे-वैसे थे? दोनों साथ-साथ खड़े होते तो लगता कि दो जुड़वांभाई खड़े हैं. डॉक्टर सिंह पचास से कुछ ऊपर ही थे, पर चाहने पर अब भी सेहरा बांधसकते थे. न एक बाल सफेद, न एक झुर्री. दिल्ली के उच्चतर तबके के नारी-समाज की प्रौढ़सदस्याएं लुक-छिपकर डॉक्टर सुशील से भेद लेने की चेष्टा करतीं, ‘कौन-सा हेयर डाईयूज करते हैं डॉक्टर सिंह?’ और जब हंसकर सुशील उनसे कहता कि डॉक्टर के व्यक्तित्वमें किसी हेयर टॉनिक के विज्ञापन-से चमकते उनके सिर से लेकर स्त्रियों को भीलजानेवाले और गौर चरणयुगल तक सबकुछ विधाता प्रदत्त है, तो वे उसे अविश्वास से घूरकरचली जातीं! दोष उनका भी नहीं था. डॉक्टर सिंह की मोती-सी दन्त-पंक्ति देखकर तोतीन-चार वर्षों तक स्वयं सुशील को ही धोखा हो गया था. यहां बत्तीस वर्ष की आयु मेंही सामने के तीन नकली दांत बनवाने में उसके डेढ़ सौ लग गए थे. उस पर भी दिल्ली केप्रसिद्ध डेंटिस्ट ने ऐसा ठगा कि जीभ का स्पर्श पाते ही तीनों दांत कागजी शटलकार्क-से उछलने लगते. ‘आप ही का-सा डेंचर बनवाना चाहता था सर, डेंटिस्ट कौन थाआपका?’ उसने लड़कियों की भांति लजाकर पूछा था. ‘डेंचर?’ डॉक्टर सिंह ठठाकर हंस पड़ेथे, ‘किसने कहा, मेरा डेंचर है? हिलाकर देखो.’ वह फिर ज़ोर-ज़ोर से अपने दांत हिलानेलगे थे, ‘किसी डेंटिस्ट के बाप की हथौड़ी भी इन्हें नहीं हिला सकती, जानते हो इसडेंचर का रहस्य?’ टेढ़े होंठों की हंसी हंसने पर वह कठोर व्यक्ति कितना मधुर लगनेलगता था! चेहरे में अब भी न जाने कैसा नारी-सुलभ आकर्षण था! ‘मेरे जीवन के पचासवर्षों में आरम्भ के बीस वर्ष छोड़ शेष तीस वर्षों में चीनी के एक कण ने भी मेरेदांतों का स्पर्श नहीं किया है.’ ठीक ही तो कह रहे थे वह. कृतज्ञ मरीजों के घर सेआए न जाने कितने मिष्ठान्न-भरे टोकरे इधर-उधर पड़े रहते. कभी रानी शिवसुन्दरी अपनीकार में भरकर ले जाती, कभी नौकर-चाकर नाक-मुंह से ठूंसते. ‘अरे बेटा, अन्धाधुन्ध केराज में गदहा पंजीरी खाए.’ सुशील की मां कहतीं, ‘पत्नी होती तो ऐसा होता?’ मृतपत्नी का बड़ा-सा तैलचित्र उनके विजिटिंग रूम में टंगा रहता. कुछ दिनों पूर्व उनकाएक प्रतिभाशाली मरीज अपनी समस्त कृतज्ञता डॉक्टर-पत्नी की एक विराट् ताम्र मूर्तिमें ढालकर उन्हें उपहार दे गया था. कैसी तेजस्वी महिला रही होंगी वह! ताम्रतेज सेघुल-मिल गया अद्वितीय गढ़न के चेहरे का गम्भीर तेज आंखों को बरबस बांध लेता था.बालों की एक घनी लट को चतुर मूर्तिकार ने सुडौल वक्षस्थल पर शायद जान-बूझकर ही उतारदिया था. उस मूर्ति का वही अंग उसके लिए मृत्यु का सन्देश लेकर आया था. पच्चीस वर्षकी अल्पावस्था में ही डॉक्टर-पत्नी की अकाल मृत्यु का कारण बना था असाध्य ब्रेस्टकैंसर. फिर उन्होंने पिता के लाख कहने पर भी विवाह नहीं किया. अपनी अधूरी डॉक्टरीपूरी कर वह कुछ दिनों विदेश में ही बसे रहे, फिर स्वदेश लौट आए. ताल्लुकेदारी बेचकरदिल्ली में ही उन्होंने अपना क्लिनिक खोल लिया था. पुत्र विदेश में ही पिता के पेशेकी शिक्षा ग्रहण कर रहा था. पिछले ही वर्ष वह आश्चर्यजनक रूप से छोटी अवस्था मेंएफ.आर.सी.एस. कर लौटा, और अनायास ही पिता की दक्षिण भुजा बन गया. पुत्र-प्रेम केलिए जिस अर्द्धांगिनी के विरह की कफनी उन्होंने स्वेच्छा से ही ओढ़ ली थी, उस त्यागका पुरस्कार दे दिया स्वयं पुत्र ने. पिता लाखों में एक सर्जन था तो पुत्र लाखोंमें एक चिकित्सक. पिता वामहस्त से भी कठिन ट्यूमर चीरकर ऐसे रख देता, जैसे सुगृहिणीसधे हाथों से अचार का नींबू चीरती है, और पुत्र उसी अनुभव के अन्दाज से औषधि केमसाले भर देता. फिर वर्षों तक शरीर के पारदर्शी कांच के से बोयाम में भरे उसस्वरचित प्रिजर्व को पिता-पुत्र बड़े गर्व से देखते. अब वर्षों तक उसके सड़ने-गलने काप्रश्न ही नहीं उठ सकता था. पर कभी-कभी नाम की भी कैसी व्यर्थ मरीचिका बनकर रह जातीहै! डॉक्टर सिंह के श्वसुर थे, रसिक कवि. अवध के सुप्रसिद्ध ताल्लुकेदार. उन्होंनेनाती का नाम धरा था मृत्युंजय. पर मृत्यु को नहीं जीत सका बेचारा! मृत्यु ने ही उसेजीत लिया. उसके क्लिनिक में बैठते ही मरीजों की संख्या में समृद्ध गृहों की सुन्दरीकिशोरियां ही स्वेच्छा से नकली रोगों का वरण कर डॉक्टर सिंह की पैनी छुरी पर गिरनेबहुत बड़ी संख्या में आने लगीं तो डॉक्टर सिंह मुस्कराए थे. चंचल पतंगे सुदर्शनपुत्र के पौरुष दीप पर ही जलकर झुलसने जुट रहे हैं, वह समझ गए. कुछ बीमारी नहींजुटती तो अपने टौंसिल ही सुजा लेतीं. पुत्र के आते ही किशोरी रोगिणियों की संख्याऐसी बढ़ी कि उन्हें अपने क्लिनिक में नया विंग बढ़ाना पड़ा. रिश्तों का तो पूछना हीक्या था! पर पुत्र पिता से भी अधिक चतुर था. विदेश की सुरा-सुन्दरियों ने क्या कभीउनके कार्तिकेय से पुत्र को निरामिषभोजी रहने दिया होगा? अपने अनुभव की डायरी खोलवह अपने विदेश प्रवास के रंगीन पृष्ठों की स्मृति में घंटों तक डूब जाते. भारत केसुस्वादु छाया-ग्रास को विदेशी सिंहिकाएं किस स्वाभाविकता से ग्रस लेती हैं, वे खूबजानते थे. इंडियन करी की ही भांति इंडियन पुरुष को देखकर भी उनकी लार अनायास ही बड़ेगंवारू ढंग से टपकने लगती है, इसका उन्हें स्वयं अनुभव था. पुत्र के चेहरे को देखकरवे सन्तुष्ट हो गए थे. वह चेहरा अनुभवहीन युवक का नहीं था. ऐसा न होता तो अब तक वहन खाए-पिए भिक्षुक की भांति उनके क्लिनिक की विमान-परिचारिकाओं सी सुन्दरी नर्सोंके इंगित मात्र से परसे जाने को तत्पर थालों पर कब का टूट पड़ा होता. स्वयं विधुरपिता के मिलनेवालों में आकर्षक मिलनेवालियां ही अधिक संख्या में रहती हैं. यहसंसारी पुत्र भी समझता था. मां की आदमकद ताम्रमूर्ति की ओर कभी डॉक्टर सिंह आंखउठाकर भी नहीं देखते या शायद देख नहीं सकते, यह वह खूब समझता था, फिर नर्सिंग होमका नाम धरा था- ‘सुधा नर्सिंग होम’. कभी-कभी दिवंगता मां के चित्र को एकान्त मेंदेखता तो युवा मृत्युंजय के होंठ व्यंग्य से टेढ़े हो जाते. पिता का यह कैसा खोखलाप्रदर्शन था. उसी मूर्ति के पास ब्रिज-टेबल पर क्या वह उस विधानसभा की धूर्त सदस्याके साथ पिता की ही-ही-ठी-ठी नहीं सुन चुका है? ‘जिस पति को अपनी पत्नी से सच्चाप्रेम होगा, वह कम-से-कम अपनी कोठी, किसी कॉलेज या उद्यान-पार्क का नाम अपनी पत्नीके नाम पर कभी नहीं धरेगा सुशील!’ उसने एक दिन अपने मित्र डॉक्टर सुशील से हंसकरकहा था, ‘सच पूछो तो मुझे ताजमहल देखने की भी कभी इच्छा नहीं हुई. यह सब दिखावा भलाक्यों? अरे, अपनी बीवी को चाहते हो तो सारी दुनिया में अपनी मुहब्बत का ढोल क्योंपीटते हो जी?’ और सचमुच ही उसने ज़िद कर क्लीनिक से अपनी दिवंगता मां का नाम हटादिया था. पर पिता की समस्त दुर्बलताओं को जानने पर भी वह स्नेही पुत्र पिता से एकक्षण भी विलग नहीं हो पाता था. शॉयलॉक-सा क्रूर पिता, मरीज के प्राण जाने से पूर्वभी अपनी ऊंची फीस का बीमा करवा लेता है, यह मृत्युंजय से छिपा न था. पिता की आसव सेआसक्ति, नारी-लोलुप चटोरी जिह्वा, कुछ भी उससे लुका-छिपा नहीं था, पर फिर भीस्वेच्छा से अनजान बना, वह डॉक्टर सिंह के समस्त दुर्गुणों को काला परदा डालकर ढांपदेता. पुत्र के इसी क्षमाशील व्यक्तित्व को देखकर पिता ने सन्तोष की सांस ली थी, परठीक तीसरे महीने ही वर्षों से मित्र बना पुत्र अचानक शत्रु बनकर कलेजे में खंजरभोंक देगा, वह क्या जानते थे? पलक झपकते ही सबकुछ हो गया था. दो उल्टियां, दो-तीनदस्त और नैन-पुतलियां उलट गई थीं. केवल एक बार अरथी पर अबोध शिशु की भांति पछाड़खाकर डॉक्टर सिंह ने पूछा था, ‘यह मुझे कैसा दंड दे दिया प्रभो?’ कुछ ही क्षणों कोवह लौहपुरुष टूट गया था, फिर भागकर उन्होंने कमरा बन्द कर लिया था. अरथी कौन लेगया, किसने कन्धा दिया, किसने मुखाग्नि दी? उन्हें कुछ पता नहीं रहा. कभी-कभी सुशीलके जी में आता, उन्हें बाहों में बांधकर कहे, ‘सर, क्यों जी छोटा करते हैं, मैं अबआपका बेटा हूं. वचन देता हूं सर, जीवन-भर कुंआरा रहकर आपके पास बना रहूंगा. आपकापुत्र नहीं रहा तो दूसरों के पुत्र तो हैं. उन्हें असाध्य रोगों से मुक्त कर अपनेपुत्र का अमर स्मारक बनाइए.’ पर वह मन-ही-मन सब समझता था. सगे पुत्र का धुंधलाटिमटिमाता तारा जब टूटकर गिरता है तब फिर नक्षत्रखचित व्योम भी उस क्षतिग्रस्तशून्य की पूर्ति नहीं कर सकता. फिर भी रात-भर जागकर उसने कई बार रटकर वे वाक्य कंठमें साधे थे, जो वह डॉक्टर सिंह से कहेगा, जैसे भी होगा, वह उन्हें आज क्लीनिक मेंखींच ही लाएगा. वह जाने के लिए तैयार हो ही रहा था कि गूंगा बदलू डॉक्टर सिंह कापत्र थमा गया. ‘सुशील, लम्बी छुट्टी पर जा रहा हूं. शायद लौटूं और शायद नहीं. साराएकाउंट और क्लीनिक तुम्हें सौंप गया हूं. जी में आए तो चलाना और जी में आए तो तालाडाल देना. तुम्हारा डॉ. सिंह’ बदलू की आंखों से अविरल अश्रुधारा बह रही थी- कहांगए? कब गए? एक प्रकार से उसे हिला-हिलाकर सुशील ने झिंझोड़कर रख दिया था, पर फलहीनठूंठ वृक्ष सा गूंगा बदलू हिलाए जाने पर भी फल कैसे गिरा सकता था? गूंगी जिह्वा कोबड़ी चेष्टा से हिलाकर उसने कहा, ‘पफ पफ’. फिर विवशता से शून्य में फैले दोनों हाथोंके दुहत्थड़ माथे पर मार दिए. डॉक्टर सिंह, लूप लाइन की उसी गाड़ी में जाकर बैठ गएथे, जिसमें अट्ठाईस वर्ष पूर्व बैठे थे, यह कौन जान सकता था? वीरभूम का युगपुरुषकरवट बदलकर शायद बेसुध पड़ा होगा. जहां से एक बार सांस रोककर भाग आए थे, वहीं अब फिरसांस रोककर भागे जा रहे थे. क्या खींच रहा था उन्हें? रांगामाटी के बीच सर्पिणी सीबल खाती कोपाय नदी या वर्षा से भीगी सन्थाल झोंपड़ियों की खस के भीगे पंखे सी सुगन्धया कच्ची सन्थाल ताड़ी की मादक स्मृति? जीवन के रस से छलकती गागर, जब रीती होकर ढुलकगई, तब इस ग्राम की स्मृति ने उन्हें क्यों पुकारा? पिता के अंतरंग मित्र थे,वीरभूम के जमींदार सुधीर रंजन रॉय चौधरी. पूजा की छुट्टियों में उन्हीं सन्तानहीनजमींदार स्नेही दम्पति द्वय का अतिथि बनकर वह गोआलपाड़ा गया था. अपने विदेशी मित्रोंके लिए बनाए गए अतिथिगृह को, स्नेही जमींदार साहब ने उसके लिए खोल दिया था. ‘एकान्तमें तुम मन लगाकर परीक्षा की तैयारी कर सकते हो. यहां कोई व्याघात डालने नहींआएगा.’ उन्होंने कहा था, वह स्वयं नित्य ही व्याघात डालने पहुंच जाएं तो भला कोईक्या कर सकता था? मोटी-मोटी चिकित्सा विज्ञान की पुस्तकों में डूबा तरुण डॉक्टरजैसे ही खिड़की खोलकर बैठता, वैसे ही पास ही जमींदार साहब की पुत्री की स्मृति मेंबन रहे कन्या पाठशाला भवन का निर्माण कार्य आरम्भ हो जाता. छत पीटती सन्थालयुवतियों की आकर्षक पदचाप का मृदु संगीत उसके अध्ययनशील चित्त को नीरस जीव-विज्ञानकी पुस्तकों से उत्कोच देकर, फुसला रहे किसी लम्पट व्यसनी मित्र की ही भांति खींचले जाता. ‘राजा गेलो सरके-सरके रानी गेलो कांची सरके ओ राजार छाता पड़े गेलो जलेरानी हांसिलो मने मने.’ (राजा पक्की सड़क पर चल रहा है, रानी कच्ची सड़क पर.- राजा काछाता पानी में गिर पड़ा और रानी मन-ही-मन हंसने लगी.) कभी-कभी सरल सन्थालभाव-व्यंजना सुनकर युवा डॉक्टर मन-ही-मन हंसने लगता. फिर देखता, पतली रज्जुसोपान केटेपोज पर किसी सर्कस सुन्दरी की सहज भंगिमा से चल रही कतारबद्ध सन्थाल किशोरियांखिलखिलाती गारा-सीमेंट ढो रही हैं. सांचे में ढले अंग, चिकना मोहक मरोड़ में बंधापंखे के आकार का सन्थाली जूड़ा, काले कोबरा की सी चिकनी काली खमकती नंगी पीठ, घुटनोंतक बंधी धोती और चेहरे के काले रंग का विरोधाभास प्रस्तुत करता लाल जवा का फूल. कभीकिसी सुडौल वक्षस्थल से अचानक ही उस युवा डॉक्टर की निर्दोष आंखें टकरा जातीं और वहसहमकर आंखें फेर लेता, पर जिन्हें देखकर वह लजाकर आंखें फेरता, उन्हें लजाने का नअवकाश था, न चिन्ता. शायद उसका चित्त पढ़-लिखकर सयाना हो गया था और उन अनपढ़, प्रकृतिकी निर्जन वनस्थली में जन्मी-पली वन-कन्याओं का चित्त था शिशु-सा निष्कपट, निर्दोष.अबोध शिशु को क्या कभी अपने नग्न अंगों की लज्जा डस सकती है? कभी-कभी ठेकेदार केकर्कश स्वर में, एक ही नाम की बार-बार आवृत्ति होती, ‘अरी चांदमनी, तू छोकरी अपनेको समझती क्या है री? अपने इस रूप का इतना घमंड क्यों है री तुझे? अतिरूप से हीजनकसुता हरी गई थी, इतना याद रख छोकरी! तब से बस एक ही तसला गारा लाई है!’ अतिरूपसे हरे जाने का भय दिखाकर डराई गई उस सुन्दरी जनकसुता को देखने का लोभ, एक दिन सिंहभी नहीं संवरण कर सका. तसला सिर पर धरे, ढीठ चांदमनी जान-बूझकर ही अलस मन्थर गति सेचली जा रही थी कि बूढ़ा ठेकेदार कर्कश स्वर में चीखा, ‘तुमसे अब काम नहीं होने का.घाघू से आज ही कहना होगा कि तुझे अब बीरू को सौंप दे. एक लाठी धरेगा बीरू और यह कमरकी लचक-पचक सब भूलकर रह जाएगी.’ खिलखिलाकर चांदमनी हंसी और चौंककर डॉक्टर की आंखेंस्वयं उठ गईं. बांस-वनों के झुरमुट से घिरे उस जंगल में सन्ध्या नित्य कुछ समय सेपूर्व ही उतर आती थी. झुटपुटे अन्धकार के म्लान कैनवस पर तसलाधारिणी मुग्धा की वहसांवली-सलोनी छवि, सिंह को किसी कलाकार के बनाए काले लिनोकट-सी ही आकर्षक लगी. चटपटउसने खिड़की बन्द कर दी. अच्छा, तो वही थी घाघू की बेटी! एक दिन वह कुछ कह तो रहा थाकि उसकी एक ही बेटी है, उसने सगाई भी कर दी है, पर ठेकेदार के यहां काम कर रही है,कुछ पैसे कमा लेगी तो ब्याह देगा. घाघू मांझी, जमींदार साहब का सन्थाल भृत्य था औरउन्होंने उसे मित्र-पुत्र की सेवा के लिए वहीं भेज दिया था. काले हब्शी सा वहचुपचाप रहनेवाला भृत्य, परदेशी नवीन स्वामी की भाषा न समझने पर भी उसके एक-एक आदेशको ऐसे पूरा कर देता कि सिंह दंग रह जाता. ऐसे कदर्य-कुत्सित पिता की पुत्री ऐसीसुन्दर कैसे हो गई होगी! बड़ी देर तक पुस्तकें पढ़ता सिंह दूसरे दिन देर तक सोता रहा.अचानक तीखे अपरिचित नारी कंठ को सुन, वह हड़बड़ाकर उठ बैठा. देखा, उसकी खिड़की पर खड़ीसुन्दरी चांदमनी ठेकेदार को अंगूठा दिखा रही है. वह जिस भाषा में हंस-हंसकर अपनीसखियों से जो कुछ कह रही थी, उसका एक शब्द भी सिंह के पल्ले नहीं पड़ा, पर अंगूठाप्रदर्शन की विजयी मुद्रा से वह जान गया कि वह अब ठेकेदार के यहां काम नहींकरेगी. अचानक उसने खिड़की बन्द कर दी और उसकी ओर मुड़कर हंसने लगी. दूर से आकर्षकदिखने वाली यह श्यामांगी निकट से देखने पर निश्चित रूप से सुन्दरी थी. मोती जैसेउजले दांतों की मनोहारी पंक्ति को पहले सिंह देखता रहा, फिर अचानक उसे स्मरण हो आयाकि वह केवल नाइटसूट का पायजामा ही पहनकर सो रहा था. उसका चेहरा लाल हो गया. कैसीबेहया लड़की थी यह, उसके नग्न शरीर को कैसी मुग्ध दृष्टि से देख रही थी! प्रकृति भीकैसी उल्टी गंगा बहा रही थी! ‘कौन हो तुम? यहां कैसे चली आईं? घाघू-घाघू!’ सिंह नेविवश स्वर में हांक लगाई. तभी उस वनकन्या ने मराल ग्रीवा को झटके से पीछे कर अपनीपहाड़ी झरने की सी मीठी हंसी से कमरा गुंजा दिया. ‘चैचाद्दिश कैनो रे बाबू?’ (चिल्लाक्यों रहा है रे बाबू)- फिर अपने गूंगे पैंटोमाइम से उसने माथे पर हाथ धर, नकलीखांसी खांस अपनी कलाई पकड़कर उसे समझा दिया कि घाघू बीमार है और अब वही कामकरेगी. अजीब मूर्ख है जंगली घाघू. अपनी इस सुन्दरी चंचल पुत्री को उसने परदेशी युवकके कमरे में भेज कैसे दिया! फिर तो कुछ ही घंटों में चांदमनी ने उसके कमरे की छत हीकिसी प्रचंड गति के साइक्लोन की भांति उड़ाकर धर दी थी. पहले महा उत्साह से उसके लालजूते पर काला पालिश पोत आई. जब तक वह जूते की दुर्गति देख, छीनने लपका, नये लालजूते का अर्द्धांग काला बन चुका था. फिर उसने स्टोव में न जाने कितने अनाड़ी पम्प भरडाले कि मिट्टी के तेल की फुहारें छोड़ता स्टोव क्रुद्ध सर्प सा फुंफकारने लगा.भागकर झुंझलाए सिंह ने स्टोव बुझाया और हाथ हिला-हिलाकर उसे दूध का कटोरा, डबल रोटीदिखाकर समझाया कि वह चली जाए. खाने को यह सब है, वह खा लेगा. मुस्कराकर वह ऐसे बैठगई, जैसे वह समझ गई हो. तब बैठ क्यों गई? हारकर वह अपने पलंग पर बैठ गया. बड़ी देरतक जब उसके जाने की आहट नहीं मिली तो उसने सहमकर चौके में झांका. देखा, तो सुन्दरीचांदमनी दूध के कटोरे में समूची डबलरोटी डुबो-डुबोकर खा रही थी. नवीन स्वामी कोदेखते ही निर्दोष हंसी से सांवला चेहरा उज्ज्वल हो उठा. ‘तुई बोलेहीश खा.’ (तूनेकहा था- खा) उसने कहा. हाय रे दुर्भाग्य! पता नहीं, ये कुछ-का-कुछ समझनेवाली पगली,कभी कुछ अनर्थ न कर बैठे. खा-पीकर चांदमनी उसकी भोजन-व्यवस्था में जुट गई. न जानेकहां से वह आंचल में ढेर सारी ‘शुकटी’ (सुखाई गई छोटी मछलियां) ले आई थी, उन्हीं कोतेल में चटपट भूंजकर वह पल-भर में आतप चावल रांध लाई. मेज पर चावल की प्लेट लगाकरउसने गलाया गर्म गाय का घी, महा औदार्य से स्तूपाकार चावल पर बिखेर दिया. जितनी देरवह खाता रहा, वह स्वयं चौके के अन्तराल में छिप गई. शायद वह जान गई थी कि उसकीउपस्थिति संकोचशील अतिथि को पेट-भर खाने नहीं देगी. वह हाथ धोने उठा तो अपने पिताही की भांति चिलमची, जग, तौलिया लेकर उपस्थित हो गई. तसले में सीमेंट-गारा ढोनेवालीवह मजदूरनी कैसे यह सब सीख गई थी. तीन ही दिनों में उस कर्मपरायण सुन्दरी-सेविका नेअपनी निःस्वार्थ सेवा से सिंह को ऐसा जीत लिया कि तीन दिन पूर्व जिसकी वन्यउपस्थिति युवा डॉक्टर को झुंझलाहट से बौखला देती थी, अब उसी के आने का समय होता, तोउसकी आंखें स्वयं ही दर्पण की ओर उठ जातीं. पहले दिन अपनी छाती और पीठ की नग्नता कास्मरण कर वह लज्जा से लाल पड़ गया था और नाइट कोट ढूंढने को छटपटा उठा था. अब स्वयंही वह अपने पौरुष का दर्पण उस किशोरी की आंखों पर डाल, उसे चौंधिया देता और वहमुग्धा एकटक उसकी नंगी छाती को देखती रहती. अधूरा डॉक्टर, शायद नवीन प्रेमिका कोप्रभावित करने के लिए ही उसके पिता की पसलियां ठोंक-पीट, एक छोटा-मोटा नुस्खा भीलिख आया था. चांदमनी की बड़ी आंखें प्रशंसा में विस्फारित होकर और बड़ी हो गई थीं.कभी-कभी प्रणयकेलि में डूबी याचिका को चूल्हे पर जलती मछली का ध्यान ही नहीं रहता.जलांध पाकर वह मछली उतारने भागती तो युवा प्रेमी उसे फिर बांहों में खींचलेता. कैसी अद्भुत देहगन्ध थी उस वनकन्या की! नई बन रही इमारत की सोंधी गन्ध हीउसके शरीर में रिस गई थी, या कच्ची ताड़ी के रस की मादक सुगन्ध थी, उस मधुरश्वास-प्रश्वास में. कैसा सरल आत्मसमर्पण था उसका! एक बार तरुण डॉक्टर के संस्कारीचित्त के अधमरे विवेक ने विरोध में गर्दन उठाकर घोर आपत्ति भी की थी- यह तुम्हारासरासर अन्याय है, क्या परिणाम से आंखें मूंद रहे हो? इस निर्दोष अनुभवहीन किशोरी केसाथ की गई छलना, क्या तुम्हें जीवन-भर नहीं डसेगी?’ पर उद्दाम मुंहफट चौबीस वर्ष कायौवन, सोलह वर्ष का कैशोर्य, तालतमाल अरण्य से घिरा अतिथिगृह और डूबती सन्ध्या सबमिल-जुलकर विवेक को मुंह, हाथ-पैर बांध दूर कोने में पटक देते. क्रूर नियति दोनोंको शतमुखी विनिपात की खाई में खींच ले गई. चांदमनी सचमुच ही चन्द्रपातमणि-सी हीतेजस्वी बनती जा रही थी. सातवें दिन घाघू स्वस्थ होकर लौट आया. चांदमनी को कभी-कभीवह उसके पिता के सम्मुख ही हंसी-हंसी में छेड़ देता. ‘क्यों घाघू कब कर रहे हो इसकाब्याह? बीरू तो कह रहा था, इसी बैसाख में वह इसे ब्याह ले जाएगा.’ बीरू मांझी कानाम सुनते ही वह भड़क उठती. घाघू कुछ कहता, इससे पहले ही वह कहती, ‘बीरू मुखे आगुन’(बीरू के मुंह में आग). सात दिन के लिए आए पाहुने को बीस दिन हो गए थे. चांदमनीनित्य आधी रात को निर्भीक अभिसारिका बनी, उसकी खिड़की के नीचे खड़ी हो जाती. दोलम्बे-लम्बे हाथों की रस्सी उसे ऐसे ऊपर खींच लेती, जैसे वह कागज का फूल हो. एक दिनदोनों हाथ उसे उठाने झुके तो वह नित्य की भांति खड़ी नहीं थी. महुआ वृक्ष के नीचेबैठी उल्टी कर रही चांदमनी थोड़ी ही देर में फिर हंसती खिड़की के नीचे खड़ी हो गई. ‘आजमौसी ने ढेर सा रस पिला दिया, इसी से सिर चकरा गया.’ उसने हंसी के फूल बिखेर दिए.सिंह रात-भर नहीं सो पाया. क्या मौसी के पिलाए ताड़ी के रस से ही उसका माथा चकरायाथा? ईश्वर करे ऐसा ही हो. सारी रात वह यही मनाता रहा. दूसरे दिन उठते ही उसने अपनासामान बांध लिया. चांदमनी उस दिन अपनी मौसी के साथ शिउड़ी के मेले में रस बेचने जारही थी. चांदमनी से उसने अपने जाने की बात ही नहीं की और चुपचाप खिसक गया. चलने लगातो उसने घाघू के हाथ में सौ-सौ के दो नोट धर दिए. कॉलेज फीस के लिए धरे दो सौ घाघूके हाथ में धर उस मूर्ख स्वार्थी युवक को लगा था कि वह संसार का सबसे उदार व्यक्तिहै. इतने रुपए! सरल घाघू की आंखें ही फट गई थीं. ऐसी टिप तो उसे जमींदार साहब केअतिथियों ने कभी नहीं दी. ‘चांदमनी के ब्याह में लगा देना.’ उसने फिर बुजुर्गानाआवाज में कहा था, ‘अब विवाह में देरी मत करना घाघू!’ फिर तीसरे ही महीने डॉक्टरसिंह ने पिता को अपने विवाह की स्वीकृति दे दी थी. इतने वर्षों तक अपने वैभव औरप्रभुता के मद से अन्धा बना वह जान-बूझकर ही अतीत को सशक्त भुजाओं से पीछे ढकेलतारहा था, पर आज उन सशक्त भुजाओं की शक्ति चुककर रह गई थी. जिस सरला किशोरी को वहअसहाय अवस्था में छोड़कर भाग आया था- जिसके निःस्वार्थ आत्मसमर्पण की सुध शायद हीकभी सुख के क्षणों में आई थी उसी सांवले चेहरे पर जड़ी दो करुण आंखों का मूक उपालम्भआज उसे अपने जीवन के चरम दुःख के क्षणों में पागल बना उठा. अपनी निरुपायता, आवारापनउसे धिक्कारने लगा और वह फिर उसी विस्मृत गांव की ओर भागने लगा. पहुंचा तो दिन डूबचुका था. पंसारी की छोटी-सी दुकान कालचक्र में विलुप्त होकर, वहां एक जगमगाताडिपार्टमेंटल स्टोर खड़ा था. जमींदार साहब का पता पूछना व्यर्थ था, वह सन्थाल ग्रामकी ओर बढ़ गया. वही वेणुवन और एक कद की, परेड सी करती झोंपड़ियां. अंधेरे ने बढ़करपरिचित हाथ कन्धे पर धर दिया. अचानक विलाप का करुण स्वर सुनकर वह ठिठक गया. ‘‘आबलाई चांद रे- सोना!’’ उसका सर्वांग सिहर उठा. धीरे-धीरे उसने चोर की भांति बढ़करखिड़की से झांका. पहले उसके जी में आया, वह जोर से चीख पड़े. छोटे-से कमरे का संकुचितक्षेत्रफल घेरे, जो लम्बी लाश पड़ी थी, वह तो स्वयं ही मृत्युंजय का जीवित संस्करणथा. क्या वही पिता को चमत्कृत करने एक बार फिर अरथी में बंधने लौट आया था? वहीचेहरा, देह की वही सुगठित ललाम श्यामल कान्ति. उसके चारों ओर घेरा-सा बनाए सन्थालस्त्रियां घुटनों में सिर डाले, करुण सिसकियों का वैसा ही छन्दबद्ध संगीत प्रस्तुतकर रही थीं, जैसा छत पीटने में किया करती थीं. मृतक के सामने पछाड़ खाती मां कोपार्श्व में बैठे व्यक्ति ने बड़े यत्न से उठाया और डॉक्टर सिंह ने कच्ची मिट्टी कीदीवार थाम ली. बूढ़े बीरू मांझी को घनी सफेद मूंछों के बीच भी उन्होंने पहचानलिया. ‘‘मत रो चांद, वह अब क्या तेरे रोने से लौटेगा?’’ उन्मादिनी चांदमनी एक बारफिर पछाड़ खाकर गिर पड़ी. डॉक्टर सिंह मुड़े और तेज़ी से भागने लगे. कुछ पलों के लिएशायद वह सचमुच ही मानसिक सन्तुलन खो बैठे थे. उन्हें लग रहा था, उन्मत्त सन्थाल भीड़उनका पीछा कर रही है, मृत बलाई की लाश लेकर. उन्हें पकड़, वे अरथी उन्हीं के कन्धोंपर टिका देंगे. हांफते पसीने से लथपथ जब डॉक्टर सिंह बोलपुर पहुंचे तो सब पैसेंजरगाड़ियां जा चुकी थीं. ‘‘पर मुझे तो अभी जाना है.’’ उन्होंने फटे स्वर मेंकहा. ‘‘अभी कोई गाड़ी नहीं जाएगी साहब.’’ छोकरे स्टेशन मास्टर ने उस विक्षिप्त-सेव्यक्ति के प्रश्न के उत्तर में कहा, ‘‘एक मालगाड़ी यार्ड में अवश्य खड़ी है. आठवेंदिन कलकत्ता पहुंचेगी, चाहें तो उसी में चले जाइए.’’ पर उसके व्यंग्य को ग्रहण करनेकी अवस्था भी शायद उनकी नहीं रही थी. ‘‘धन्यवाद, धन्यवाद.’’ कहता वह नित्यएयरकंडीशन गाड़ी में यात्रा करनेवाला सुरुचि-समृद्ध स्वामी, चोरों की भांति इधर-उधरदेखता, सचमुच ही मालगाड़ी के डिब्बे में बैठ गया. सहयात्री थे बड़ी-बड़ी दाढ़ीवाले दोपछांही बकरे और चार गायें. सबने एक साथ चौंककर, उस डरे-सहमे यात्री को देखा, फिरजुगाली करती बड़ी-बड़ी करुण आंखोंवाली गाय ने सींगों की स्वीकृति दे दी, जैसे सबकुछजान गई हो. अंजर-पंजर हिलाती मालगाड़ी चली. बकरों के साथ-साथ वह भी धक्का खाकर गिरा,फिर तिकोनी खुली खिड़की पकड़कर बैठ गया. खिड़की के उसी छिद्र से वर्षों पूर्व केपरिचित स्टेशन एक-एक कर हाथ मिला गए. मुस्करा, बोनपास, तालित और भेदिया गीली घास औरगोबर मिश्रित सुगन्ध, उसे संसार की सर्वश्रेष्ठ सुगन्ध लगने लगी. अपने दोनोंपरिष्कृत रुचि के नथुने भींचकर उसने आंखें मूंद लीं. पास खड़ा दढ़ियल पछांही बकराउसका घुटना चाटने लगा. शायद एक पशु ने दूसरे पशु को अब पहचान लिया था. हिलतीमालगाड़ी के कम्पन से, टुनटुनाती गाय के गले की घंटियां बज रही थीं. डॉक्टर सिंह कोलगा, वह किसी पवित्र देवस्थल में बैठे हैं और उसी मन्दिर की नन्हीं घंटियां बजनेलगी हैं. ‘‘मुझे यह दंड क्यों दिया प्रभो?’’ पन्द्रह दिन पूर्व, जवान बेटे की अरथीपकड़, इस मूर्ख ने विधाता के न्यायालय में अपनी तर्कहीन नालिश की थी. जिसने जीवन-भरकभी जन्मदाता का स्मरण नहीं किया, उसी नास्तिक सन्तान के कमजोर मुकदमे का निर्णयदेने शायद वह न्यायप्रिय न्यायाधीश उसे इतनी दूर ले आया था. मृत्युदंड सुनकर,बहुतसे अभियुक्त चेहरे पर स्वयं ही रूमाल बांध लेते हैं. डॉक्टर सिंह ने अपनेकांपते घुटनों में मुंह छिपा लिया.--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़िए... गाड़ी स्टेशन छोड़ रही थी, किसी भी भावुकता के लिए अब समय नहीं था वहहिन्दू रोगिणी थी, यह मुस्लिम युवती उसकी कौन हो सकती थी? 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