शिवानी जन्मीं थीं 17 अक्टूबर 1923 को. विजयादशमी का दिन था. राजकोट की बात है.पढ़ाई-लिखाई शांतिनिकेतन में हुई. साठ और सत्तर के टाइम में इनकी कहानियां खूब फेमसहुईं. 12 साल की उम्र में उनकी पहली कहानी प्रकाशित हुई थी. और ये अंत तक कहानियांलिखती रहीं. औरतों पर लिखा और बहुत अच्छा लिखा. खूब नाम कमाया. अभी जन्मदिन काहफ्ता है. हम आपको उनका लिखा पढ़ाएंगे. हफ्ते भर. राजकमल प्रकाशन को थैंक्स कहिए.उन्हीं की हेल्प से आपको ये कहानियां पढ़ा पा रहे हैं. अमला बार-बार बाहर आती औरअपने सजे बंगले की अनूठी सज्जा देखकर स्वयं ही मुग्ध हो जाती. रंगीन नीली मद्धिमरोशनी के लट्टू पेड़ की हर पत्ती पर जुगनू बने चमक रहे थे. शामियाने की रंगीन छांहमें कई सोफे और कुर्सियां मंडलाकार घेरे में रखवाते श्यामबिहारी एक साथ कई निर्देशदेते किसी कुशल बैंडमास्टर की भांति हवा में दोनों हाथ उठा-उठाकर गिरा रहे थे. अमलाको पति की हड़बोंग देख, हंसी आ गई. एक तो वैसे ही सामान्य-सी घटना से उत्तेजित होउठते थे, उस पर आज पहली पुत्री का विवाह था. वह पति से कहीं अधिक मात्रा मेंआश्वस्त हो बारात की प्रतीक्षा कर रही थी. आखिर घबराती भी क्यों? सब ही कुछ तो देरही थी कनक को! फ्रिज, रेडियोग्राम, फियेट और फिर एक तगड़ा-सा चेक. बीसियों भूखीशेरनी-सी माताओं के मुख से वह अपने भावी जामाता को पुष्ट ग्रास लुभावने दहेज केबूते ही तो छीन पाई थी. उसकी कनक सांवली थी पर इस युग में क्या जामाता भावी पत्नीका रंग देखता है? उसे तो अब भावी श्वसुर के ओहदे का रंग ही अधिक आकर्षित करता है.जहां तक इसका प्रश्न था, श्यामबिहारी अपने ओहदे के चोखे रंग से किसी भी सुपात्र कोचुम्बक की भांति खींच सकते थे. एक तो वे कमिश्नर थे, उस पर आई.सी.एस.. ‘हमआई.सी.एस. अब रीवां के अलभ्य सफेद शेरों की भांति, अपनी वंश- वृद्धि की क्षीणसम्भावनाओं के कारण अनमोल हो उठे हैं.’- ये प्रायः ही हंसकर अमला से कहते रहते. आजतो उन्हें बात करने की भी फुर्सत नहीं थी. सुबह से जनवासे का ही प्रबन्ध देख रहेथे. नाऊ, तम्बोली, धोबी, सबके तम्बू तन चुके थे और तीनों किसी अन्तर्राष्ट्रीयप्रदर्शनी के-से विभिन्न स्टॉल में खडे़ अधिकारियों की ही तत्परता से मुस्करातेखडे़ थे. यह भी इस अनोखे युग का एक अनोखा रिवाज़ चल पड़ा था. आएंगे छैला बाराती बनकरपर दर्जनों घड़े से निकाले गए सूट इस्तरी करवाने कन्या के पिता के यहां ही लाएंगे.जिसे देखो, वही हजामत बनवाने बैठ जाएगा, चाहे घराती हो या बाराती! ‘मुफ्त का चन्दनघिस मेरे नन्दन’ इसी को कहते हैं. कहीं बारातियों के आने के पहले ही सब पान निगोडे़घर ही के मेहमान न चर डालें- अमला मन-ही-मन भुनभुना रही थी. एक तो घर के हीमेहमानों ने चार दिनों में उसका पटरा बैठा दिया था. पांच दर्जन तो बच्चे ही भिनभिनारहे थे, उस पर देवरानी-जेठानी और चचेरी-ममेरी ननदों के नख़रे देख उसका ख़ून खौल रहाथा. इसी से भागकर बाहर आ गई थी. बरेलीवाली ममिया सास को लहसुन-प्याज की बदबू से दिलके दौरे पड़ने लगते थे, उनका कमरा अलग करके उठी ही थी कि दो चचेरी ननदों में बच्चोंको लेकर भयानक युद्ध छिड़ गया था. दोनों सगी बहनें थीं, पर आज आमने-सामने तनी रणचंडीही बन गयी थीं. उन्हें छुड़ाकर अलग किया, तो उसकी स्विस भाभी एक ही पेटीकोट और बिनाबांहों का ब्लाउज पहने अर्धनग्नावस्था में अर्दली-चपरासियों के सामने ही उससे साड़ीपहना देने का अनुरोध करने आ धमकी. पिछले माह उसका छोटा भाई विदेश से एक लम्बतड़ंगीब्याह लाया था. क्या करती बेचारी अमला! भाई को बुलाती और भाभी को कैसे छोड़ देती!उसकी ताड़-सी देह में साड़ी लपेटना आकाश में चंदोवा टांकना था. साड़ी पहनाते ही वहचटपट बाहर निकल आई थी. बारात भी तो आती ही होगी. उसने घड़ी देखी, अभी देर थी. परबारात के आने से भी अधिक चिन्ता उसे एक और व्यक्ति के आने की थी और वह थी उसकीफ्रांस-प्रवासिनी ननद मीना, जो पूरे बीस वर्ष बाद माइके लौट रही थी. कभी यह ननदउसकी प्राणप्रिया सखी थी. वही उसे सिर-आंखों पर बिठाकर इस गृह में लाई थी. उसकी सासने तो दूसरी लड़की पसन्द की थी. कुछ दिनों तक दोनों की मैत्री मुहल्ले-भर कीस्त्रियों के हृदय में विष घोलती रही. दोनों एक-से कपड़े पहनतीं, हंसती-खिलखिलातीएक-दूसरे को बांहों में लिए फिरती रहीं, फिर जैसे प्रायः ऐसी प्रगाढ़ मैत्री का अन्तहोता है, वैसा ही हुआ. अचानक दोनों में ऐसी ठनकी कि आंखों ही आंखों में नंगीतलवारें लपलपाने लगीं और दो टूटे हृदयों की दरार मीना की विदा तक नहीं जुड़ी. झगड़ेका सूत्रपात हुआ था आभूषण को लेकर. मीना की विधवा मां का पूरा गहना, एक सामान्य-सीपोटली में बंधा काठ के बक्स में पड़ा रहता. कई बार पुत्र के समझाने पर भी वे बैंकमें रखने को राजश्ी नहीं हुई थीं, तो खीझकर श्यामबिहारी ने कहना ही छोड़ दिया, परइधर उनका अधिकांश समय तीर्थयात्रा में ही निकलने लगा था और वे एक-एक कर अपने आभूषणकभी बद्रीनाथ चढ़ा आतीं, कभी रामेश्वरम्. एक दिन अमला और मीना ने मन्त्रणा की, जैसेभी हो, अम्मा के इस धार्मिक औदार्य के सैलाब को बांधना ही होगा. "अम्माजी, अब मीनाकी सगाई हो गई है, आप ऐसे गहने मत लुटाइए.’’ अमला ने एक दिन सास को टोक दिया. "हां,अम्मा, आज फैसला ही कर दो, क्या मुझे दोगी और क्या भाभी को,’’ मुंहलगी मीना नेदोनों बांह अम्मा के गले में डाल दीं, "कहीं ऐसा न हो कि कभी इसी करमजली पोटली केपीछे हम दोनों लड़ पड़ें.’’ अमला हो-हो कर हंस उठी थी. तब तक दोनों ननद-भाभी, अटूटमैत्री के इस रस-सागर में आकंठ डूबी थीं, इसी से कलह की काल्पनिक सम्भावनाओं काप्रसंग भी हास्यास्पद लग उठा था. "ला मरी, निकाल ला पोटली, आज ही बांट-बूंटकर झगड़ानिबटा दूं.’’ अम्मा ने चाबी का गुच्छा हंसकर पटक दिया था और मीना चटपट पोटली निकाललाई. ओफ, कैसे-कैसे भारी गहने थे- टोंक, मगर, अनन्त, जयपुरी झूमर, रामपुरी मछलियां,चन्द्रहार, बेसर और कुन्दन की पहुंची. मीना के नाना सिविल सर्जन थे. अम्मा इकलौतीपुत्री थीं, इसी से नाना ने गहनों से लाद दिया था. सबसे विलक्षण आभूषण था एक लम्बीनीली मख़मली डिबिया में बन्द नागिन के आकार की लचकती करधनी. उसकी जालीदार नक्काशीपहले भी कई बार ननद-भाभी को झुमा चुकी थी, पर तब ईर्ष्या का सर्प फन फैलाकर दोनोंमें से एक को भी डसने नहीं दौड़ा था. आज दोनों के कलेजे एकसाथ धड़क उठे. पता नहींअम्मा करधनी किसे देंगी! मीना सोच रही थी- ‘मैं तो अम्मा की इकलौती बिटिया हूं,करधनी मुझे ही देंगी.’ अमला सोच रही थी- ‘कितने अरमानों की बहू हूं मैं! करधनी हो नहो, मेरे ही हिस्से में आएगी.’- अम्मा की ख़याली हंडिया में उधर उबाल पर उबाल आ रहेथे. सब गहना मन-ही-मन बांट चुकी थीं, पर दोनों की तृष्णा के प्राण उनकी करधनी पर हीअटके हैं, वे जान गई थीं. बेटी तो पराया धन है, कल-परसों ब्याह होगा तो परायी होजायेगी. ज़िन्दगी तो उन्हंे बहू के साथ ही काटनी थी. फिर करधनी भी साधारण नहीं थी.एक चिररुग्ण जड़िया को, मीना के नाना ने उसका खोया पौरुष लौटा दिया था. अपनी मूककृतज्ञता को उसी अनूठी करधनी की कारीगरी में वह सदा के लिए अमर कर गया था. कैसीलपलपाती जीभ थी नागिन की! आंखों में जगमगाती दो हीरों की कनियां जड़ी थीं. उसचमत्कारी करधनी का एक और आकर्षण था. एक पेंच घुमाते ही वह अपनी केंचुली छोड़ देती,जो क्षण-भर में सिमटकर, बाईं ओर चाबी का गुच्छा बनकर लटक जाती थी. अम्मा कहा करतीथीं, जब करधनी बनकर आई तो उसे देखने लाट साहब की मेम भी आई थीं. वही करधनी आज किसभाग्यशालिनी को मिलेगी! अम्मा ने एक-एक कर गहनों की दो ढेरियां बना दीं. टोंक,बेसर, चन्द्रहार अमला का. कंकण, झूमर, सतलड़ी मीना की. राजस्थानी बोरला, अटर-बटर आयाअमला की ढेरी में. कुन्दन की चम्पाकली, उड़ीसा की कटकी, सोने की कंघी मीना की. दोनोंढेरियां ऐसी न्यायपूर्ण सूझबूझ का प्रतीक थीं कि किसी में भी घट-बढ़ का प्रश्न हीनहीं उठता था. अकेली करधनी बच गई. मीना अचानक मचल गई, "अम्मा, चाहे हमारी ढेरी केदो-तीन गहने भाभी की ढेरी में डाल दो, पर हम तो करधनी ही लेंगी.’’ उसने करधनी सचमुचउठा ली. सास ने बहू की गम्भीर मुखमुद्रा देखी, तो बड़े चातुर्य से बिगड़ती स्थितिसंभाल ली. "अच्छा-अच्छा, देखा जाएगा, अभी तो तू दोनों पोटलियां बक्से में डाल दे.करधनी अलग रख दी है मैंने. पुर्जी डाल दें. क्यों, है ना बहू?’’ पर अम्मा की पुर्जीके पहले ही नियति की पुर्जी पड़ गई. मीना के विवाह की तिथि निश्चित हुई तो गहनेझलवाने सुनार बुलवाया गया. दोनों पोटलियों के गहने ज्यों के त्यों धरे थे, अकेलीकरधनी ही नहीं थी. अम्मा तो पागल-सी ही हो गयी थीं. एक तो शुभकार्य के पहले सोना खोगया था, महाअपशकुन, उस पर उनका सबसे प्रिय आभूषण. अम्मा ऐसा फूट-फूटकर बाबूजी कीमृत्यु पर भी नहीं रोई थीं. पर यह हो कैसे गया, चाबी तो निरन्तर उन्हीं के पास रहतीथी, कभी-कभी बहू मांग लेती और कभी बिटिया. शीशम का वह बक्सा उन्हीं के कमरे में धरारहता और वे दिन-रात उसी कोठरी में खजाने पर बैठे सर्प की भांति कुंडली मारे बैठीरहतीं. भोली अम्मा भागती-भागती भृगुसंहिता के पंडितजी के पास भी गई थीं. ‘खोई वस्तुका चोर घर ही में है, पर मिलेगा बीस साल में.’ ‘भाड़ में जाए करधनी!’ मीना के आंसूटपकने लगे थे. बीस वर्ष तक क्या उसकी कमर ऐसी लचीली रह जाएगी? क्या करेगी करधनी का,जब कमर ही नहीं रहेगी? फिर बेचारी रिक्त कमर लेकर ही ससुराल चली गई थी. श्वसुरफ्रांस में इत्र के प्रसिद्ध व्यवसायी थे. पति के साथ मीना ने स्वदेश त्याग दिया.धीरे- धीरे वह मां, भाई-भाभी सबको भूल गई, पर करधनी को नहीं भूल सकी. इतना वह खूबसमझती थी कि चतुरा नटिनी-सी भाभी की फुर्तीली उंगलियों ने ही भोली अम्मा की चाबीतिड़ी कर रात ही रात में करधनी गायब कर दी थी. आज पूरे बीस वर्ष पश्चात् वह भाई कापत्र पाकर स्वदेश लौट रही थी. अम्मा अब नहीं रहीं, पर फिर भी मायका, मायका ही था.भैया को देखा, तो वह रही-सही पूर्वशत्रुता भी बिसर गई. भैया ने मूंछें रख ली थीं,कनपटी के बाल सफेष्द हो गए थे और क्षण-भर को उसे लगा जैसे बाबूजी ही हंसते खड़े होगए हैं, और मौसी! कितना बुढ़ा गई थीं मौसी. सामने के दो दांत टूट गए थे, ठीक जैसेअम्मा की पोपली हंसी का नक्शा फिर से उतारकर रख दिया था विधाता ने. वह तो आंसू हीनहीं रोक पाई, "क्यों री मुनिया, दामाद को नहीं लाई?" मौसी ने पूछा. "अरी मौसी,उन्हें क्या अपने कारोबार से फुर्सत रहती है!" उसने बड़े गर्व से कहा और भाभी की ओरबांहें फैला दीं. उसकी तन्वी भाभी बेहद फूल गई थी. करधनी धरी भी होगी तो इस विराट्परिधि को कहां घेर पाएगी! उसे मन-ही-मन गहरा सन्तोष हो गया. उसकी कमर तो अभी भीविदेशी कौर्सेट के बन्धन में कसी, उसकी कौमार्यावस्था का इक्कीस इंच घेरा निभा रहीथी. "तुम तो मीना, वैसी की वैसी ही धरी हो," भाभी का कंठ-स्वर भी शरीर के साथ-साथमांसल हो उठा था. "भतीजी कहां है मेरी?" मीना ने बडे़ लाड़ से पूछा और भाभी ने एकसांवली-सी लड़की को उसकी ओर ठेल दिया. मीना ने भतीजी का माथा चूमकर कहा, "मेरीदिव्या से सवा महीने बड़ी है तू." "उसे क्यों नहीं लाईं बुआ?" भतीजी ने पूछा. "उसेअपनी दुकान सौंप आई हूं रानी! एक दिन भी बन्द रहती तो लाखों का नुकसान हो जाता,क्रिसमस आ रहा है," बुआ ने दर्पपूर्ण उक्ति से महिलावृन्द को घायल किया और धम्म सेकुर्सी पर बैठ गईं. मीना की दुकान ‘भारती’ वास्तव में फ्रांसीसी सुन्दरियों के लिएएक बहुत बड़ा आकर्षण थी. भारतीय गहने, साड़ियां, आलता, नकली चोटियां, झूमर, यहां तककि मांग भरने का सिन्दूर और बिछुए का जोड़ भी मिल सकता था वहां. कभी फ्रांस मेंइक्के-दुक्के भारतीय विवाहों के लगन खुलते तो मीना की दुकान ही सोहान-पिटारीजुटाती. काश, अम्मा की करधनी होती तो वह टिकट लगाकर प्रदर्शनी से ही मालामाल होजाती! ऐसी व्यावसायिक खटकेबाजी में उसकी कल्पना बेजोड़ थी. "कुल जमा तीन दिन के लिएआई हूं भाभी, इधर तुम्हारी रानी विदा हुई और मैं उड़ी फ्रांस को." अपने तीक्ष्ण,रंगे नखों को उसने चिड़िया के उड़ जाने की मुद्रा में चमकाकर भतीजी को बुरी तरहप्रभावित कर दिया. जयमाल का समय हुआ तो अतिथियों की दृष्टि सलोनी दुल्हन के चेहरेपर टिकने के बजाय उसकी प्रौढ़ा बुआ की सांवली गर्दन पर जम गई. मीना, एक अद्वितीयहीरों का हार पहने द्वार पर खड़ी मुस्करा रही थी. फुसफुसाहट तीव्र हो उठी. "कैसेजगमगा रहे हैं!" "असली हीरे हैं.’’ "चल हट, विदेशी नकली हार भी ऐसे ही जगमगाते हैं.पिछले साल मेरा छोटा भाई माण्ट्रीयल से लाया था." "नहीं-नहीं, फ्रांस में इनकेश्वसुर का लाखों का व्यापार है, इनकी भी तो दुकान है." "क्या बेचती हैं?" ही-ही-ही-ईर्ष्यालु स्त्रियों का अशिष्ट स्वर उनके कानों के पास ही सरक आया, पर उस जगमगातीबुलन्द इमारत के सामने छोटे-मोटे आभूषण पहने भड़कीली नारियों की आभा सहसा तुच्छ होउठी, जैसे झोंपड़ियों पर धरे दीये टिमटिमा रहे हों. "क्यों री मुनिया, हार तो असलीलगै है, आठ-दस हजार का तो होगा ही!" मौसी ने बड़ी ललक से हार के लोलक को हाथों मेंले लिया. "अस्सी हजार का है मौसी," मीना ने कुछ ऊंचे ही स्वर में कहा. अपने दामीआभूषण का मूल्य बताने में क्या कभी नारी चूकती है! फिर तो दूल्हे को देख ही कौन रहाथा! आंखों ही आंखों में हार की आलोचना चल रही थी. "कहा था ना मैंने, अस्सी हजशर काहै." "ऊंह, सूरत तो सवा सौ की भी नहीं है!" पर एक-एक कर झोंपड़ियों के टिमटिमातेदीये बुझ गए, बुलन्द इमारत जगमगाती रही. दूसरे दिन बारात विदा हो गई और अतिथियों केबिस्तर बंधने लगे. एक तो लड़की के विवाह की रौनक, विद्युत-छटा-सी क्षण-भर में हीलुप्त हो जाती है, उस पर गृहस्वामिनी भी अतिथियों को रोकने के मूड में नहीं थी.मीना ने भी भाभी के तुच्छ स्वभाव को परख लिया था. उसने जाने का प्रसंग उठाया, तोअमला ने औपचारिक स्नेह की सामान्य दलीलें दीं, फिर मान गई. "बाजार से तुम्हारे लिएमेवे और ताजी मिठाई लेती आऊं," कह वह झोला लेकर चली गई, तो मीना विवाह के भब्भड़ केबाद पहली बार घर में अकेली रह गई. जाने के पहले मायके की ममता और घनेरी हो आई.घूम-घुमाकर वह अम्मा का बचा-खुचा सामान देख रही थी और स्मृतियों के पट खुलते जा रहेथे. बाबूजी की आरामकुर्सी, अम्मा का पीढ़ा, उसका बोर्डिंग का सहचर काला स्टील काबक्सा. सहसा वह ठिठक गई. शीशम का वह बक्सा, जिसके अभेद्य ताले को बिना खोले ही किसीकुशल हुडूनी ने करधनी गायब कर दी थी. बडे़ लाड़ से उसने ताले को हाथ में लिया, और नजाने किस ममता के अदृश्य स्पर्श से ताला खट से खुल गया. शायद बाजार जाने की हड़बड़ीमें भाभी ठीक से बन्द नहीं कर पाई थी. देखूं, भाभी इसमें अब क्या रखती हैं, मीना नेदोनों हाथ से भारी ढकना उठाया. पर क्या केवल इसी कौतूहल ने उसे प्रेरित किया?पुराना किनारी- गोटा, टूटे प्लग और अम्मा का फुलवरी दुपट्टा. कैसी प्यारी-प्यारीकस्तूरी की-सी महक थी, ठीक अम्मा की देह-परिमल की-सी परिचित लपट! बड़े लाड़ सेभावुकता के आवेश में उसने दुपट्टे को गालों से लगाने को उठाया तो एक भारी-सी पोटलीभी उसी के साथ-साथ उठ आई. उसका कलेजा उछलकर बाहर आ गया. वही चमक-दमक और वे ही चमकतीआंखें! अनुभवी हाथों के अनुभूत स्पर्श ने पेंच घुमाया, क्षणभर में सर्पिणी कीकेंचुली चाबी का गुच्छा बनकर लटक गई. कुछ देर तक वह सोचती रही, फिर एक तड़प से करधनीलेकर उठ गई. काठ का बक्सा फिर ज्यों का त्यों ताला लटकाए निर्जीव बन गया. भाभी लौटीतो मीना अपनी साड़ियां तह कर रख रही थी. भोले चेहरे पर शिकन भी तो नहीं उभरी. "हायमीना, तुमने अभी से सामान बांध लिया?" अमला ने पूछा और हाथ का बैग जमीन पर पटक, ननदके गले में बांहें डाल, धम्म से वहीं बैठ गई, "हाय, मत जाओ मीना, इतने सालों में तोलौटी हो!" वह रुआंसे स्वर में बोली. मन-ही-मन वह जानती थी कि ननद का एयर-पैसज भीबुक हो गया है और वह रुक नहीं सकती, इसी से वह दुलार-भरा बनावटी आग्रह कर रही थी."मैं जानती हूं," उसने रूमाल से आंखें पोंछीं, "तुम अभी भी हमसे रूठी हो. उससड़बिल्ली करधनी का सत्यानाश हो, जिसने हमें चीरकर धर दिया. तुम्हारे भैया की कसमखाकर कहती हूं मीना, मैंने उस हरामखोर महाराजिन को रात के दो बजे अम्मा के कमरे सेनिकलते अपनी आंखों से देखा था." "सच भाभी!" मीना को बड़ा आनन्द-सा आ रहा था. सांप कापैर आखिर सांप ही पहचानता है. "फिर तुमने पकड़ क्यों नहीं लिया बदजात को?" "हाय,मेरा कलेजा तो तुम जानती हो, एकदम पिद्दी-सा है. सोचा, एक तो अम्मा के गौने मेंमहाराजिन आयी थी, कितना मानती थीं अम्मा, कहीं करधनी नहीं निकली तब?" भाभी के चेहरेपर ऐसा बचपना खेलने लगा, जैसे दूध के दांत भी न टूटे हों. "हाय रे मेरी पिद्दी!"मीना ने बड़े लाड़ से भाभी को बाहुपाश में कस लिया, "अब खबरदार जो उस करधनी का नामलिया, मुझसे बुरी कोई नहीं होगी, हां! सामान बांध लूं, फिर रात को खूब आराम सेबातें करेंगे." करधनी सबसे नीचे धरी फ्रेंच शिफौन की साड़ी के नीचे, हीरों के हार केसाथ, कुंडली मारे पड़ी थी. उस रात को बारह बजे तक ननद-भाभी बतियाती रहीं. "हारसहेजकर रख लिया ना मीना, कहीं बटुए में ही धरकर तो नहीं भूल गईं? बड़ी लापरवाह होतुम." भाभी ने पूछा तो मीना अंधेरे ही अंधेरे में मुंह फेरकर मुस्करा ली. "हांभाभी, वह तो मैंने कल ही सूटकेस में बन्द कर लिया था." "मैं तो आज तुम्हारे ही साथसोऊंगी, पता नहीं फिर कब मिलना हो!" वह कूदकर मीना के साथ लिपट गई. सुबह उठी तोभाभी उठकर उसके साथ धरी जानेवाले पकवानों की टोकरी सजा रही थी. भाई-भाभी दोनों उसकेसाथ स्टेशन भी आए, पर तीनों ऐसे ठीक समय पर पहुंचे कि सामान लगाते ही गार्ड ने झंडीहिला दी. बड़ी हड़बड़ी में मीना द्वार पकड़कर ही खड़ी रह गई. अपने वातानुकूलित डिब्बेमें वह अकेली थी. "दामी चीज लेकर सफर कर रही हो मीना, सूटकेस को सिरहाने धर लेना."भाभी उसके पास ही आकर फुसफुसाई तो मीना का चित्त पश्चात्ताप से खिन्न हो गया. कितनीनीच थी वह! बीस वर्ष पहले भाभी ने उसकी गर्दन पर छुरी फेरी थी, आज वह उसी जघन्यअपराध को दुहरा रही थीं. अब तो उसके जी में आ रहा था, वह करधनी निकालकर भैया-भाभीके चरणों में लोट, अपना अपराध स्वीकार कर ले. विदा की बेला पुनः अम्लान हो उठेगी.पर गाड़ी स्टेशन छोड़ रही थी, किसी भी भावुकता के लिए अब समय नहीं था. भाई और भाभी कीआंखें गीली हो आई थीं. अमला बुरी तरह नाक झझोड़ती सिसक रही थी. मीना भी अब अपने कोनहीं रोक सकी और बच्चों की भांति सुबक उठी. एक घंटे बाद तूफान धड़धड़ाती पटरियों काकलेजा रौंदती चली जा रही थी और मीना दोनों हाथों से माथा पकड़े, शून्य दृष्टि सेअपने चारों ओर बिखरे साड़ियों के अम्बार को अविश्वास से देख रही थी. वह बार-बारएक-एक साड़ी को झटक रही थी, यह क्रम वह पिछले एक घंटे में बीसियों बार दुहरा चुकीथी. नहीं, कहीं नहीं थी- आखिर सुई तो थी नहीं. रात-भर भाभी उसे गलबहियों में घेरकरसोई थी, चाबी का गुच्छा पार करने में उन अद्वितीय उंगलियों ने फिर अपनी प्रतिभा काप्रदर्शन कर दिया था. करधनी तो गई ही, साथ में उसके हीरों का हार भी ले गई. अब वहअतुल को क्या मुंह दिखलाएगी! जल्दी-जल्दी में बीमा भी तो नहीं करा पाई थी. फिरमायके में गहने की चोरी क्या कुछ कम लज्जास्पद घटना है? अब क्या करे? क्या फिरमायके लौट जाए? क्या कहेगी भाभी से? यही ना कि ‘भाभी, तुमने मेरे हीरे का हार चुरालिया!’ पर भाभी तो पलटकर जिह्वा का घातक प्रहार सिद्ध कर सकती थी- ‘मीना, तुम क्यामेरी करधनी चुराकर नहीं भागीं?’ उसके हीरे के हार का केवल लोलक ही बेचने पर भाभी केपूरे खानदान की बेटियां ब्याही जा सकती थीं. हाय, कितने छोटे अपराध की कितनी बड़ीसजा दे गई भाभी.(अपराधी कौन पुस्तक से, प्रकाशक राधाकृष्ण प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, नईदिल्ली-110002)शिवानी का हफ्ता में आज पढ़िए ‘गंगा बाबू कौन’शिवानी का हफ्ता में पढ़िए पहली कहानी ‘लाल हवेली’‘शिवानी का हफ्ता’ में तीसरे दिन पढ़िए कहानी ‘गूंगा’वह हिन्दू रोगिणी थी, यह मुस्लिम युवती उसकी कौन हो सकती थी?