मुकेश चंद्र पांडेय इस संसार की सुंदरतम जगहों में से एक रानीखेत से हैं. युवा हैंऔर खुद को खोजने के एक जरूरी काम में जो बहुतों को गैर-जरूरी भी लग सकता है, व्यस्तरहते हैं. जब भी कुछ लिखते हैं तो बहुत सच्चा और मासूम-सा लिखते हैं. सिनेमा औररंगमंच में खासी दिलचस्पी रखते हैं. मूलतः कवि हैं, लेकिन भूलतः (भूल से) कभी-कभीकहानियां भी लिखते हैं. एक कहानी रोज़ में आज हम इनकी ही एक कहानी ले आए हैं... किरदारों के सच खुलने लगे थे, कहानी अब न बराबर बची थी. आखिर के पृष्ठ बिन पढ़े भीछोड़ दिए जाते तब भी कुछ नहीं बदलने वाला था. बुनावट कसी हुई थी इसमें कोई दोरायनहीं, लेकिन अब जिज्ञासा धूसरित हो चुकी थी और रेशे खुलने लगे थे. कहानी चरमोत्कर्षपर लड़खड़ा गई थी. भ्रम, उत्सुकता और विस्मय पंक्तिबद्ध चलने वाली चींटियों की टोलीसरीखे जो कहानी के शब्दों के साथ लगातार कदमताल कर रहे थे, एकाग्रता भंग होते हीअचानक टेढ़ी-तिरछी लकीरों में भटकने लगे. पाठक ऐसा अंत नहीं चाहता था. वह अधीर होउठा. उसने पीछे कई कहानियां पढ़ी थीं, लेकिन यह कहानी विशिष्ट थी. यह पहली किरदार थीजिसकी जीवित छवि पाठक की कल्पना के बुलबुले से छिटक कर उसके सिरहाने आकर बैठी थी.उपन्यास में सिर झुकाए नीले लिबास में बैठी वह उदासीन लड़की, रेगिस्तान से सटे एकशाही शहर में डेरा डाले हुए थी. कई मोहक वाद्य यंत्रों की कर्णप्रिय ध्वनियों, सधेहुए स्वरों में लंबे आलाप भरती वे प्रौढ़ आवाजें, दूर तक फैले वे विस्तृत किले,गुलाबी हवाओं के छिद्रों वाले महलों का देस. सैलानियों की भीड़, रंगों की चकाचौंध केबीच एक असहाय सन्नाटे में गुम वह कोमल देह लंबे अरसे से जहर वाले रंग की गिरफ्त मेंउलझी हुई थी. चूंकि कहानी अपनी लय में चल रही थी इसलिए पाठक को इसका कोई बोध नहींथा. एक दिन उनींदी आंखों से जैसे ही पाठक ने किताब को मूंदना चाहा सहसा एक विचित्रघटना घटी. कहानी के गुलाबी हिस्से से नाजुक स्वर में एक संवाद किताब से फिसल करबाहर आ निकला : ‘‘कैसे हैं आप?’’ वह जादुई आवाज पाठक के कानों में कुछ इस तरह सेघुल गई जिस तरह कच्चे सरसों के तेल की तासीर. पाठक अचंभित हो उठा. अंधेरे से भरेहुए उस खाली कमरे में वे तीन शब्द निरंतर गूंजने लगे जैसे पहाड़ों की सबसे ऊंची चोटीपर चढ़ कर किसी पहाड़न ने दूर देस में बसे अपने प्रेमी की तरफ उसकी खैरियत के बायसकुछ फूल उछाले हों और देखते ही देखते उनकी खुशबू पूरी फिजा में तैर गई हो. अब पूराकमरा भी मुग्ध कर देने वाली एक विचित्र सुगंध से भर गया था. पूरब की तरफ मंदिर मेंप्रज्वलित दीप की लौ उत्कट हो उठी और पाठक के चेहरे पर का आलोक उदित हो गया. उसकीनींद भरी आंखें अब चंख हो चुकी थीं. पाठक ने आश्चर्य से जैसे ही किताब को पुनः खोलाउसके सभी छवि चित्र जीवंत हो उठे. उसने कभी स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि जो कहानीवह पढ़ रहा था, अचानक उसके साथ घटने लगेगी. दूर समंदर किनारे बैठा हुआ वह जिस कश्तीको लहरों पर हिचकोले खाते देख रहा था, उसने पाया कि अचानक वह भी उसका ही एक सवारथा. पाठक अभी पूर्व से बाहर भी न आ पाया था कि एक और विस्मय अनुगमन करता हुआ उस तकआ पहुंचा. रुआंसी आवाज में एक बार फिर किरदार ने पाठक को पुकारा : ‘‘सुनिए क्या आपमुझसे बात करेंगे. मुझे अकेले डर लगता है, यहां इस अनंत सन्नाटे ने जाने कब से मेरीगर्दन जकड़ी हुई है और मेरा अकेलापन मुझे खुद में सोख लेने को आतुर है. न जाने मुझेक्या हो गया है, मुझे डर है...’’ और वाक्य पूरा किए बिना ही किरदार फूट-फूट कर रोनेलगी. जैसे संभल पाना उसके बस में ही न हो या फिर वह संभलना चाहती ही न हो या वह रोन रही हो बल्कि खुद को खाली कर रही हो, जैसे वह रुदन क्षणिक न हो करके कई बरसों कामलाल हो या फिर एक लंबी अवधि से चले आ रहे शून्य ने अपना रिसाव ढूंढ़ लिया हो. पाठकअब भी आश्चर्य में ही डूबा हुआ था. उसने अपनी आंखें मसलीं और खुद की बाईं बांह मेंएक तीक्ष्ण चिंगोटी काट कर पुष्ट किया कि वह स्वप्न नहीं था. ...और अब यहां से पूरीकहानी यथार्थ के धरातल पर अभिनीत होने जा रही थी. किरदार की आवाज में ऊंटों की सीलचक थी. उसका रुदन शक्कर में पगाया गया महसूस हो रहा था. उसके कंठ से निकला हर एकशब्द बड़ा हल्का लेकिन छटपटाया हुआ था. आवाज से हट कर जैसे ही पाठक की नजर किताब मेंछपी किरदार की छवि पर पड़ी तो उसके चेहरे की सुंदर आभा ने पाठक को अविलंब ही अपनेवशीभूत कर लिया. लेकिन ये सब इतना तीव्र गति से घट रहा था कि पाठक को कुछ नहीं सूझरहा था. किरदार का रुदन सुन पाठक का मन विचलित हो उठा. वह उस उदासी में हंसी केहजारों ठहाके भर देना चाहता था. उसने किरदार को खुश करने के लिए उसकी ही भाषा काचयन किया और उसे दूसरी किताबों के जो उसने पहले से रट रखे थे संवाद सुनाना शुरूकिया. जिस शिद्दत से पाठक किरदार को एक के बाद एक संवाद सुना रहा था किरदार केहोंठों पर यकायक एक हंसी तैर उठी और दोनों की खिलखिलाहट साथ घुल दूर रेगिस्तान केउस जहरीले सन्नाटे में खलल पैदा करने लगी जहां एक मायावी अपने घिनौने इरादों के साथसेंध लगाए सुंदर कोमल मादाओं को अपने शब्दों के भ्रमजाल में फंसा कर उनमें दुख,अवसाद, कुंठा, निराशा फलत: कुरूपता भरने में व्यस्त था... पाठक और किरदार की बातेंअब ज़ोर पकड़ चुकी थीं. लगभग दोनों ही एक दूसरे के आदी हो चुके थे. पाठक अलस्सुबहकिताब खोल लेता और दोनों देर रात तक बतियाते रहते. एक दिन किरदार ने पाठक से अपनीडायरी का परिचय करवाया जहां उसने अपने उदास शब्दों की एक पूरी दुनिया ईजाद कर लीथी. हर एक शब्द झकझोर कर रख देने वाला. हर भाव तीव्र उदासीन, विषादग्रस्त औरअवसादपूर्ण. उन शब्दों को पढ़ते ही पाठक का कंठ सूखने लगा, चेहरा पीला पड़ने लगा,रोंगटे खड़े हो गए और पूरी देह में एक कंपन उत्पन्न हो उठा. ‘‘आपको क्या दुःख हैमुझे बताइए? कोई इतना उदास कैसे रह सकता है... कोई बात तो जरूर है.’’ किरदार नेपाठक के भाव भांप लिए, लेकिन सरपट खिलखिलाते हुए कहने लगी, ‘‘हाहाहा. मुझे कोई दुःखनहीं है, मैं बहुत खुश हूं. बस मुझे उदासियां लिखना पसंद है.’’ ‘‘ऐसा कैसे हो सकताहै, उदासीन हम सारे ही हैं. ये पूरी दुनिया ही अवसादों पर आधारित है, पर फिर भी कोईबेवजह इतना उदास कैसे रह सकता है. आप चाहे कुछ न कहें आपका हर शब्द एक अभिव्यक्तिहै. चलो शब्दों को नकारा भी जा सकता है, पर भावों का क्या? कोई कैसे इतना उदासीनसोच सकता है जब तक उसके साथ कुछ ऐसा ही न घटा हो. और जहां तक मैं जानता हूं हम सबअपने अनुभव ही लिखते हैं. आप यकीनन कुछ छुपा रही हैं. जरूर कोई बात है.’’ इस बारकिरदार के होठों पर हंसी कुछ अधिक तीव्र और दुगुनी अवधि के लिए ठहर गई. ‘‘हाहाहा,ऐसा कुछ नहीं है. आप मनोविश्लेषण करने का प्रयास न करें. मैं बहुत खुश हूं. सुनिए,मैंने आज भी कुछ लिखा है. पढ़ना चाहेंगे??’’ ‘‘बिल्कुल.’’ ‘‘कुछ दिन पहले की ही तोबात थी जब इन्हीं रास्तों पर चलते हुए तुम्हारा हाथ छू गया था मेरे हाथ से पल भर केलिए, और मेरी निगाहें शर्मगीं होकर झुक गई थीं. शर्म का एक कतरा, तुम्हारा लम्स औरवह पल सब धूल में गिरे हुए हैं. आते-जाते लोग उन्हें कुचलते हुए गुजरते हैं. येकुचली हुई बेजान चीज़ें उन्हें नहीं दिखतीं और न ही खून के धब्बे उन्हें नजर आतेहैं.’’ पाठक पढ़ते ही कुछ देर के लिए एकदम नि:शब्द हो गया, उसने एक गहरी सांस भरी औरपूछा : ‘‘बहुत अच्छा लिखा है, पर ये है कौन? किसके लिए लिखती हैं ये सब?’’ ‘‘हाहा!अरे बाबा किसी के लिए नहीं लिखती, कहा न आपको मुझे ऐसा ही लिखना पसंद है. आप खामखांही सोचते रहते हैं.’’ किरदार ने धीमे मगर स्नेहपूर्ण लहज़े में उत्तर दिया और पाठककुछ न कह सका. किरदार की उदासियों ने दिन-ब-दिन उसके प्रति पाठक की भावनाओं कीतीव्रता को बढ़ावा देना शुरू कर दिया और देखते ही देखते पाठक में किरदार के लिए एकअजीब किस्म का लगाव पैदा हो गया. किरदार को भी पाठक के हल्के-फुल्के हंसी-ठहाकों कीआदत पड़ गई और अब ऐसे ही कहानी आगे बढ़ने लगी. वक़्त बेसुध दौड़ा चला जा रहा था और अबउन दोनों को मिले हुए एक पूरा मौसम बीत चुका था. बातों के दौर अब भी निरंतर जारीथे. कहानी अपने अंत की तरफ बढ़ रही थी. ये पहला मौका था जब किसी कहानी से पाठक इतनाजुड़ गया था और उसे डर था कि कहानी के अंत के साथ ही वह किरदार उसको छोड़ कर कहानी केदेस वापिस लौट जाएगी. वह ऐसा नहीं चाहता था. उसने तय किया कि वह कभी कहानी को पूरानहीं करेगा. इसलिए हजार जिज्ञासाओं के बावजूद वह किरदार से ज्यादा जवाबतलब नहींकरता था. वह भ्रम में बने रहना चाहता था और सिर्फ प्रेम करना चाहता था, सिर्फ औरसिर्फ प्रेम... बिना कुछ सोचे, समझे और जाने. किरदार की उदासी की वजह जानना इतनाजरूरी नहीं था जितना कि उसकी खुशी का बायस बन जाना. और इसलिए आगत के गर्त में गड़ेहुए कई गहन विस्मयों से अनजान पाठक अपने हर संभव प्रयास के साथ किरदार के जीवन मेंखुशियों के रंग भरने में मशगूल हो गया. यह समय उसके जीवन-पृष्ठों पर स्वर्ण-अक्षरोंसे दर्ज होने जा रहा था. लेकिन सब कुछ इत्मीनान से होता रहे और कोई बम न फटे, ये भीकोई कहानी हुई भला. कहानी ऐसी नहीं होती. कहानियां न किरदार के अनुसार घटती हैं, नपाठक के. लिखने वाले के हाथ में तो कुछ होता ही नहीं. कहानियां नियति द्वारासंचालित की जाती हैं जो कि अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच कर असर दिखाना शुरू करती हैं.आप ताउम्र भविष्य में घटने वाली घटनाओं का अनुमान लगाते रह जाते हैं, लेकिन घटितवही होता है जो जिस क्षण के लिए बाध्य होता है. हर हाल में आपका पाठक होना सुरक्षितहोता है, आपको बस कहानी को घटते हुए देखना होता है और दिलचस्पी बनाए रखने के लिएकुछ-कुछ कयास लगाने होते हैं. लेकिन किरदार होना नियति के हाथ की वह कठपुतली बनजाना होता है जिसके अपने वश में कुछ नहीं होता. वह चाह कर भी अपने जीवन की बागडोरखुद नहीं संभाल सकता. किरदार जिसके इर्द-गिर्द पूरी कहानी घूमती दिखती है, वह एककहानी का सबसे विवश तत्व होता है. यहां भी किरदार कोई अपवाद नहीं थी. एक कोमल विवश,कमजोर, हताश, वेध्य, शापित और शिथिल स्त्री जो कि पाठक से मिलने से पूर्व ही एकनीले रंग के मायावी जाल में फंसी हुई छटपटा रही थी. रेगिस्तान के रेतीले बियाबानमें बसा वह मायावी उसे सम्मोहित कर अपने शाब्दिक जाल में फांस चुका था. वह चाहतेहुए भी उसके मायावी चक्र को भेद कर बाहर नहीं आ पा रही थी. वह लाख प्रयास कर चुकीथी, लेकिन रह रह के उस मायावी के शब्द उसे नाग फांस की तरह बांध लेते. उनमें इतनासम्मोहन होता कि वह क्षणिक आनंद से भर जाती और मायावी के इशारों पर नाचने लगती. औरजब उसे इसका बोध होता तो वह मुक्त होने को अधीर हो उठती. उसने सोच-सोच कर खुद काबुरा हाल कर रखा था. उसके अंतर में एक खोखलापन तैयार हो रहा था. वह घंटों-घंटोंबिना बत्ती जलाए अंधेरे में बैठी रहती. उसके नजदीक हमेशा ही एक लौ रौशन रहती जिसकेताप से वह जब-तब खुद के अंग जलाया करती. कभी बेहोश हो गिर जाती तो कभी उलटी सांसेंभरने लगती. वह बीमार रहने लगी, अधूरी-सी, बावली हो भटकती रहती यहां से वहां. उसमायावी की याद में उदासियां लिखती रहती. और अब देखते ही देखते उसके पूरे शरीर परजहरीले रंग की महीन झांइयां भी उग आई थीं. इस सबके बावजूद ये एक बात उसने कभी भीपाठक से साझा न की और अकेले ही सब कुछ झेलती रही. पाठक अब तक पूरी तरह किरदार केप्रेम में डूब चुका था, जैसे-जैसे कहानी का अंत निकट आ रहा था उसके चेहरे के भावबुझने लगे थे. किरदार के ओझल हो जाने का भय उसे दिन-ब-दिन कमजोर करता जा रहा था. औरअचानक उसने इन दिनों किरदार के व्यवहार में एक अजीब किस्म की खीझ और क्षोभ भी महसूसकिया. ये कोई शुभ संकेत नहीं थे. पाठक के मन में कई तरह की शंकाओं ने जन्म ले लिया.किरदार के प्रति अब उसकी चिंताएं दुगुनी हो चली थीं और अकुलाहट बढ़ने लगी थीं. वह अबसब कुछ छोड़-छाड़ कर पागलों की तरह घंटों-घंटों किरदार की डायरी के पन्ने पलटने लगा.उसका पूरा-पूरा दिन किरदार की लिखी उदासियों में ही उलझ कर रह गया था. विडंबना यहरही कि वह उस समस्या का समाधान ढूंढ़ने निकला था जिसका उसे कोई बोध ही न था. ...औरएक दिन अंतत: अपनी अस्थिर प्रतिबद्धता और अथक प्रयासों के फलस्वरूप वह किरदारद्वारा ईजाद की हुई उदास दुनिया में दाखिल हो पाने में सफल हो गया. अंदर घुसते हीजो उसने देखा उसके पैरों तले की जमीन खिसक कर रह गई. वह विचलित हो उठा और उसकी पूरीदेह घबराहट से भरने लगी, इससे पहले उसने इतना भयावह दृश्य कभी सपने में भी नहींदेखा था. उसके हलक से शब्दों का प्रवाह यकायक बंद हो गया. उसकी आंखें बुझने लगीं औरचिपचिपे पसीने से उसके पूरे कपड़े तर-ब-तर हो गए. कुछ पलों के लिए तो जैसे उसकीसांसें ही रुक गई थीं. उसको अपनी नजरों पर बिल्कुल भरोसा नहीं हो रहा था जो रह-रहके उस मायावी की तस्वीरों पर जा कर ठहरती थीं. हर तरफ यहां-वहां हर दीवार पर जिसकीसैकड़ों तस्वीरें चस्पां थीं. परिप्रेक्ष्य से निरंतर बजती कानफोड़ू शोकाकुल धुनेंपाठक के मस्तिष्क में चक्रवात-सी घूमने लगीं. पूरा घर नीले रंग के गाढ़े धब्बों सेभरा हुआ. एक अजीब-सा कोलाहल, चीत्कारें जो दुनिया भर के सन्नाटे से अकेले ही निबटलेना चाहती थीं. रक्त रिसती कलम और उदासियों में लहराते जख्मी शब्द. किरदार के अंतरका अवसाद कुंठा की तेज आंच पर निरंतर तप रहा था और जिसके प्रभाववश वहां हर तरफ दमघोट देने वाली एक असहनीय गंध उत्पन्न हो चुकी थी. दुखों के चमगादड़ पर फैलाए सिर केठीक ऊपर मंडरा रहे थे और उनकी सीधी परछाइयां बीच में बैठी किरदार के ललाट पर पड़ रहीथी. जैसे ही पाठक की नजर किरदार पर पड़ी, वह अकस्मात विषाद से भर गया. छवियों से इतरएक पीला पड़ा हुआ बदसूरत चेहरा, आंखें अंदर को धंसी हुईं, बाल बेतरतीब बिखरे हुए.पूरी देह पर नीली महीन किरचों के अमिट निशान. हाथ-पैर फूले हुए, होंठ सिकुड़ के कालेपड़े हुए, नाखूनों की पोरें मलिन मैल से भरी हुईं, आंखों पर बेख्याली, बेसुधगी तारीऔर सिर लटक के नीचे की तरफ झूलता हुआ. पाठक गूंगा, चुप्पा, विचारशून्य भौंचक-सा खड़ाकुछ देर एकटक किरदार को देखता रहा, उसका मस्तिष्क अब निष्क्रिय हो चला था. आंखों केआगे अंधकार की कई परतें जमा हो गईं और वह अचेतन मुद्रा में निर्जीव-सा वहां खड़ारहा. यह दृश्य बहुत भयानक था, एक क्षण में उस कब्रिस्तान जैसे माहौल में वहां दोजिंदा लाशें मौजूद थीं. अपनी-अपनी जिंदगियों से बेबस, लाचार, टूटी, हारी हुई दोमुर्दा देह. ‘‘सिर्फ प्राणों को त्यागना भर ही तो मृत्यु नहीं होता. यह तो ताउम्रसाथ बनी रहती है. हर एक उम्मीद के मर जाने से जुडी होती है मृत्यु. इसका बायसविश्वास के धागों का उधड़ जाना होता है. जब स्वप्न धूमिल होते हुए दीखते हैं, तबमृत्यु जन्मती है. हम जीवन में आए हर एक शून्य के साथ मृत्यु की सीमा के अंदरप्रवेश करते हैं. यह नकारात्मक बोध नहीं और न ही यह अंत है बल्कि पश्चात का आरंभहै. हम ताउम्र कई-कई मोड़ों पर मरते हैं और उसके उपरांत एक नए अंदाज़ में अपनेजीवन-चक्र की शुरुआत करते हैं. मृत्यु बेहतर जीवन की अथाह संभावनाओं का संसार है.’’पाठक ने खुद को संभालते हुए एक लंबा दम भरा और किरदार की ठोढ़ी को ऊपर सरका उसको सुधमें लाने का प्रयास करने लगा. ऐसा करते हुए अचानक उसकी आंखें छलकने लगीं और पूरीदेह में एक सरसरी-सी लहरा गई. उसने रुआंसे स्वर में कहा : ‘‘यह क्या हाल बना रखा हैअपना, आज तक इतने अवसादों में डूबी रहीं और मुझे एक भनक तक न होने दी. मुझे दुःख इसबात का नहीं कि आपने प्रेम किया, दुःख इस बात का है कि आप भ्रमित रहीं. आप जानतीथीं कि वह प्रेम नहीं बल्कि सिर्फ शाब्दिक जाल था जिसमे आप फंसीं और फिर भी उलझतीचली गईं. मुझे आपको इस हाल में देख कर अब कोफ्त हो रही है. सबसे अधिक दुःख इस बातका है कि मैं हर एक चीज से अनजान रहा. जितनी भ्रमित आप रहीं, उतना ही मैं भी.’’‘‘क्या बताती आपको, कुछ था ही नहीं बताने लायक, और मैं धीरे-धीरे उभरने का प्रयासकर रही थी.’’ ‘‘यह था आपका उभरने का प्रयास, आपने अपनी हालत देखी है. खोखली हो गईहैं आप. जरा अपनी सूरत आइने में देखिए.’’ ‘‘मैं ऐसी ही दिखती हूं. मैंने आपसे कहाथा कि तस्वीरों पर न जाइए.’’ दरअसल जो आप तस्वीरों में दिखती हैं वह आपकी असलियतहै, वही सच्चाई भी जिसे आप इस भ्रमजाल में फंस कर बद से बदतर करती जा रही हैं. आपकीसुंदर आभा जिसने मुझे आकर्षित किया था न जाने कहां खो गई है. मैंने कभी नहीं सोचाथा इस तरह आपसे मुलाकात होगी.’’ ‘‘आप यहां आए कैसे? आपको किसने हक दिया मेरी दुनियामें प्रवेश करने का. मैं जिस भी हाल में हूं. खुश हूं. यह मेरी बनाई हुई दुनिया है.ये अवसाद मेरे हैं. इन्हें मैं सीने से लगा कर रखना चाहती हूं. इनके एवज में मुझेकभी बेइंतहां प्यार नसीब हुआ था.’’ ‘‘वह प्रेम नहीं था, सिर्फ छलावा था.’’ ‘‘मैं सबसमझती हूं, लेकिन ये मेरे चुने हुए रंग हैं. मैं इनके साथ खुश हूं.’’ ‘‘नहीं आप खुशनहीं हैं. आपको इनसे बाहर आना ही होगा.’’ ‘‘कहा न मैंने कि मैं कोशिश कर रही हूं.आप समझने की कोशिश कीजिए कि मुझे मेरे हाल पर छोड़ दीजिए. यही हम दोनों के लिए बेहतरहै. मैं नहीं चाहती कि आपकी हालत भी मेरे जैसी ही हो जाए.’’ ‘‘मेरे लिए अभी सबसेबड़ी चिंता का विषय आप हैं. मैं आपको ऐसे जूझता हुआ नहीं देख सकता.’’ ‘‘आपको क्योंहै मेरी इतनी चिंता?’’ ‘‘मुझे आपसे प्रेम है.’’ थोड़ी देर के लिए एकाएक वहां सन्नाटाबरपा हो गया. शब्दों के मौन का समय आ गया था. किरदार अपनी नजरें झुकाए खड़ी थी. पाठककी आंखों में करुणा और आशा एक साथ तैर रही थी. दोनों में से कोई भी कुछ न कह सका.सिर्फ इंतजार करने लगे. ऐसे समय इंतजार में रहना बहुत असुविधाजनक होता है. तत्कालक्षणों में इंतजार आपको भटकाता है. आपकी प्रतिबद्धता को कमजोर करता है. कुछ फैसलेबिना इंतजार शीघ्र-अतिशीघ्र ही ले लेने के लिए होते हैं. किरदार ने अपनी नजरें उठाकर पाठक की तरफ देखा और कुछ चिड़चिड़ा कर उसे वहां से जाने के लिए कह दिया. और अचानकपाठक एक बार फिर से टूट गया. उसको किरदार से संवादों के हर एक दौर याद आने लगे. हरवह क्षण जो उन्होंने साथ में बिताए, उसकी नजरों के सामने आकर ठहर गए. किरदारों केसच खुलने लगे थे. कहानी अब न बराबर बची थी. आखिर के पृष्ठ बिन पढ़े भी छोड़ दिए जातेतो भी कुछ नहीं बदलने वाला था, लेकिन पाठक ऐसा अंत नहीं चाहता था. वह अधीर हो उठा.उसने एक बार फिर से किरदार की तरफ देखा. किरदार जो वहीं बीच में जा कर बैठ गई.चमगादड़ों की परछाइयों के ठीक नीचे. जैसे वह अवसाद ही उसकी नियति हो. जैसे वह उसभ्रम से निकलना ही न चाहती हो. एक बार फिर से वही शोकाकुल संगीत, वही दम घोटतीअसहनीय गंध. वही नीले धब्बे और उदास शब्द. नहीं पाठक से किरदार की वह हालत न देखीगई और अचानक जाने उसे क्या सूझी, उसने किरदार के प्रति अपना सारा प्रेम, करुणा-भावसंचित किया और उसकी तरफ बढ़ने लगा. सतर्कता से उसकी दोनों बांहों को पकड़ कर उसे ऊपरउठाया, अपनी आंखें उसकी बुझती हुई आंखों पर केंद्रित कर धीरे से पलकें बंद कर लींऔर प्रेम से लबरेज अपने होंठ आराम से उसके सिकुड़े हुए होंठों पर रख दिए. ऐसा करतेहुए साथ ही उसने अपनी दोनों जेबों से निकाल कर फूलों की घाटी से संचित दुर्लभ फूलहवा में लहरा दिए और अब देखते ही देखते वह असहनीय गंध एक सम्मोहित कर देने वालीविचित्र सुगंध में तब्दील होने लगी, कानफोड़ू संगीत की जगह सुरीले राग बजने लगे.सारी उदासीन परतें उखड़ कर नीचे गिरने लगीं. किरदार की देह में तत्क्षण बदलाव नज़रआने लगे. वे नीली झांइयां अदृश्य होने लगीं. बिखरे हुए बाल सलीके से एक साथ लय मेंआकर बंध गए. चेहरे का आलोक एक बार फिर से उदित हो उठा. आंखें चमकने लगीं और अबतस्वीरों पर दिखने वाली वह सुंदर गुलाबी आभा एक बार फिर से उसके मुख पर आकर ठहर गई.कुछ ही क्षणों में वह पूरी उदासीन दुनिया स्वर्ग सरीखे एक जादुई लोक में बदल गई औरअब अचानक नेपथ्य से एक छोटी-सी बच्ची की उल्लासपूर्ण किलकारियों की गूंज सुनाई देनेलगी. उसकी खिलखिलाहट ने पूरे माहोल को और भी खुशनुमा बना दिया. वह बच्ची आज आनंद सेलबरेज थी. उसकी मां ने एक लंबे अंतराल के बाद जीवन में वापसी की थी.