भाग इन बुरदांफरोशों सेरामानंद सागर-------------------------------------------------------------------------------- "हमारे गांव पर जब मुसलमानों ने हमला किया तो प्रभात का समय था. मैं नदी केकिनारे सूखी टहनियाँ इकट्ठा कर रही थी. लम्बी कड़ी बहुत दूर तक फैली हुई है. मैंबचपन से इन पेड़ों की सबसे ऊँची टहनियों तक चढ़ जाएा करती थी और फिर दूर तक नदी कीचमचम लहरों को देखकर प्रसन्न हुआ करती थी. पर नदी में तैरती भी थी. जब मैंतेरह-चौदह वर्ष की थी तो एक ही साँस में नदी के आर-पार तैर सकती थी.'' वह कईअसम्बन्धित बातों के टुकड़े इस प्रकार जोड़ती चली जा रही थी जैसे वह किन्हीं मीठेसपनों के बीच बड़बड़ा रही हो. और आनन्द को तो उस समय नदी की वो बलखाती, चमकती लहरेंऔर सुम्बल के पेड़ों की लम्बी कड़ी और इसकी टहनियों में झूमते नोकीले लाल फूलों केबीच किसी प्यारी-सी बेल की तरह झूलती हुई, एक नन्हीं-सी लड़की-जैसे यह सब कुछ आनन्दको उसकी आँखों में झूलता हुआ दिखाई दे रहा था. और वह इन आँखों में होनेवाले नाटक कोबस देखे ही जा रही थी. यहां तक कि लड़की को भी इस बात का अनुभव हो गया. और फिर जैसेउसका सपना अकस्मात टूट गया. लड़ियाँ जैसे टूटकर धूल में बिखर गयीं. और वह काल्पनिकआँखों से उतर कर फिर कड़वी वास्तविकता की मिट्टी कुरेदने लगी. मुसलमान नदी के उसपार से नावों में बैठकर हमारे गांव पर हमला करने गये थे. मैं सूखी लकड़ियाँचुनते-चुनते किनारे के बिलकुल समीप आ गयी थी. मेरे पति भी थोड़ी दूर पर इसी कार्यमें व्यस्त थे. मैंने नावों को इधर आते नहीं देखा, केवल कुछ आवाजें सुनीं.''सुबहानअल्लाह, क्या जवान छोकरी है!'' मैंने जो घूम कर देखा तो तीन-चारहटूटे-कट्टे मुसलमान छोटी-छोटी कुल्हाड़ियाँ लिए मेरी तरफ बढ़े चले आ रहे थे. बीसोंअभी नाव से उतर रहे थे और इनके पीछे अभी कई और नावें आ रही थीं. मेरी चीख निकल गयी,मैं लकड़ियाँ फेंक अपने पति को आवाजें देती हुई एक ओर को भागी. पर मैंने देखा, मेरापति मुझसे पहले भागना प्रारम्भ कर चुका था. और अब तक बहुत दूर निकल गया था. उसनेसम्भवत: मुझसे पहले इनको उतरते देख लिया होगा पर मुझे बचाने की बजाय वह अपनी जानबचा कर भाग गया. मैं भी पूरी शक्ति से भागी. और वह कुछ क्षणों के लिए रुक गयी.दोबारा शुरू करते हुए उसकी आवाज पहले से धीमी पड़ गयी थी. मेरी तरह गांव की औरबहुत-सी औरतें इनके चंगुल में आ फँसी थीं. अपने यहां के कई बूढ़े और नवयुवकों कीलाशें हमने गांव में देखी. पर इन में हमारे घर का कोई भी न था और तब मुझे अपने पतिका भाग जाना अत्यन्त बुद्धिमानी का काम लगा. उसने स्वयं को बचा लिया था. और मेरेअमिट प्रेम को भी साथ ले गया था. मेरे साथ कुछ ऐसी महिलाएँ थीं जिनके परिवारजनों कीलाशें भी इन्हीं घरों में थीं जहाँ वे दूसरे मर्दों की दासी बनकर रहती थीं. पर मैंखुश थी कि मेरा पति जीवित रहा. मेरा पुत्र भी जीवित था और.... और जैसे खुशी से उसकागला भर आया. हमारे गांव पर इनका राज्य हो गया था. और एक महीने तक हम अपने ही घरोंमें उनके वश में थे. फिर एक दिन हमने इनकी बातों में सुना कि नदी के इस पार के गांवभारत में आ गये हैं और दूसरे ही दिन पता नहीं इन्हें किस फौज के आने की खबर मिली किइन्होंने सारी महिलाओं को इकट्ठा कर नावों में बिठाया और नदी के उस पार अपने गांवले गये. एक-एक महिला के चारों ओर दस-दस पन्द्रह-पन्द्रह मर्द बैठे हुए थे.थोड़ा-बहुत सामान जो हमारे घरों में था, उसे तो पहले ही वह अपने गांव भिजवा चुकेथे. आखिरी सामान अब हम सब ही बचे थे इसलिए वह हमें भी ले गये. मुझे न जाने क्योंइनके यहां ले जाने का बहुत दुख न था जितनी प्रसन्नता इस बात की थी हमारा गांव इनकेचंगुल से स्वतन्त्र हो गया है. शायद उसी प्रसन्नता की ओट में यह आशा छुपी हुई थी किगांव के स्वतन्त्र होते ही वह फिर अपने घर वापस आ जाएँगे. अपने इसी घर में अपने इसीगांव में जो नदी के दूसरे किनारे पर था. वह दूसरा किनारा जैसे मैं हर समय हर दिनदेख सकती थी-और जब से आयी थी देख ही रही थी. उन्हीं दिनों रावी में पानी चढ़ रहाथा. इसका पाट चौड़ा होता जा रहा था. लेकिन दूसरा किनारा जैसे मेरी आँखों के और भीसमीप आता जा रहा था. हर दिन जो बीत रहा था मुझ में देखने की शक्ति बढ़ाता जा रहाथा. और दूर होते हुए दूसरे किनारे की वस्तुएँ स्पष्ट-से-स्पष्ट होती चली जा रही थींऔर... उसने जैसे क्षणभर के लिए रुकने का प्रयत्न किया पर कहानी के इस स्थान पर आकारएक पल का ठहरना भी इसके बस में न था. और फिर एक दिन सचमुच मैंने अपने प्रेम को नदीके किनारे खेलते देखा. वह अकेला था. उसे अभी तक ठीक से चलना भी नहीं आया था. दो पगबढ़ाता और गिर जाता. इसका पिता शायद समीप ही लकड़ियाँ चुन रहा था, पर मुझे उस परबहुत गुस्सा आया. नदी की लहरें बिफर रही थीं, बाढ़ आने का डर था और उन्होंने नदी केकिनारे खलने के लिए छोड़ दिया था. क्या इन्हें उसकी सुरक्षा की भी फिक्र नहीं. मैंतड़प उठी, मैं एक बार वहाँ जाकर उनसे इतना कह आना चाहती थी कि जब तक मैं लौट न आऊँ,प्रेम को इस तरह अकेला नदी पर मत छोड़ा करें. पर वहाँ एक बार भी इतने समय के लिएजाना बड़ा कठिन था. मैं और मेरी तरह ही हर महिला इन दरिन्दों के बीच जकड़ी हुई थी.उसने उठकर पानी पिया, पर उसने जब दोबारा बात शुरू की तो जैसे उसका गला बैठा था.आनन्द मूर्ति बना सब कुछ सुनता रहा और वह इस तरह कहे जा रही थी जैसे वहाँ कोई सुननेवाला था ही नहीं. फिर मुझे अचानक ये विचार आया कि कहीं वह मुझे तो नहीं ढूँढ रहाहै. वह उसी बड़े सुम्बल के नीचे खेल रहा था. जहाँ उस दिन मैं लकड़ियाँ चुन रही थी.आज पानी वहाँ तक पहुंच चुका था, तो क्या उन्होंने उसे यह भी बता दिया था कि इस जगहसे मुसलमान मुझे उठाकर ले गये है. ये सोच कर मुझे और भी दुख हुआ. उसे अभी तो पूरीबातें करना भी कहाँ आया था, जब मेरे वापस जाने पर वह अपनी तोतली जुबान में केवल एकशब्द में कई अक्षर चुनकर कहेगा-मुसलमान? तो मैं उसे क्या जवाब दूँगी. और अब वह क्यासोच रहा होगा. उस सुम्बल के मोटे तनों के आस-पास वह अपनी माँ को कहाँ ढूँढ़ रहाहोगा. वह किस तरह मुझे बुला रहा होगा माँ...माँ... माँ वारी जाए बेटा-बेधड़क मेरेमुँह से निकल गया पर उस तक आवाज न पहुंच सकी और मैं व्याकुल हो उठी. इतने में औरगजब हो गया कि वह लड़खड़ाता हुआ चलने के प्रयत्न में किनारे के पास ही गिर गया.पानी की लहरें उसके समीप तक आ रही थीं. मुझसे और सहा न गया और मैं इस मकान कीखिड़की से जहाँ से यह सब कुछ देख रही थी, पलक झपकते ही साथ वाले मकान की छत पर कूदपड़ी. वह घास की छत कहाँ से टूटी और मैं कहाँ-कहाँ फिसली मुझे कुछ पता नहीं, केवलइतना पता था कि जमीन पर जहाँ मैं गिरी थी वहाँ बहुत कीचड़ था पर रुकने की आवश्यकताही कहाँ थी. मैं बिना सोचे-बिचारे नदी की ओर भागी. अपनी पूरी शक्ति से तैरती रही परआँखें उसी ओर गड़ी थीं. कि क्या देखती हूँ कि वो भागे-भागे आये और प्रेम को किनारेसे उठाकर गोद में ले लिया. बस मेरे प्राण में प्राण आ गये. थकावट का अनुभव होने लगाऔर साथ ही जिस किनारे से आयी थी, उसी किनारे पर बहुत हंगामा सुनाई दिया. सर घुमा करदेखा तो सारे गांव के मुसलमान इकट्ठे थे. एक नाव तैयार की जा रही थी और विभिन्नप्रकार की आवाजें सुनाई दे रही थीं. तब मुझे इस बात का एहसास हुआ कि मैंने क्याकिया है, और, कि अब अगर मैं पकडी ग़यी तो इसका परिणाम क्या हो सकता है? सबकी आँखेंमुझ पर ही टिकी थीं. मैंने तैरना छोड़ दिया. एक-दो डुबकी खानी शुरू कर दी और फिर एकऐसी लम्बी डुबकी लगायी कि इन्हें यह विश्वास हो जाए कि मैं सचमुच डूब गयी हूँ. बीचमें मैंने जब साँस लेने के लिए एक-दो बार सिर पानी से ऊपर किया तो देखा कि प्रेमअपने पिता की गोद में बैठा घर की ओर जा रहा है. बहुत मन चाहा कि उन्हें जोर से आवाजदूँ कि ठहरिए मैं भी आ रही हूँ. एक दिन जिस जगह तुम मुझे खो गये थे आज उसी जगह सेइकट्ठे चलो...पर फिर उस किनारे के मुसलमानों का विचार आता, और मैं बहाने के तौर परडूबनेवालों की तरह हाथ-पाँव मारने लगती और फिर डूब जाती. दो-तीन बार ऐसा करने केबाद जब मैंने फिर से तैरना प्रारम्भ किया तो मुझे पहली बार इस बात का एहसास हुआ किमैंने कई दिनों से पेट भर खाना नहीं खाया है और मुझ में अब वह शक्ति नहीं रही. मैंबीच तक पहुंच चुकी थी पर इसके बाद मुझे ऐसा लगा जैसे अब मैं और न तैर सकूँगी. उसमकान की छलाँग लगाते समय भी शायद कई चोटें आयी थीं जो ठण्डे पानी में उभर आयी थीं.पर फिर मुझे प्रेम का विचार आया-उनका विचार आया और मैं सोचने लगी कि प्रेम मुझेदेखते ही दूध पीना शुरू कर देगा और फिर मुझे ऐसा लगा जैसे मैं बाहों के जोर से नहींअपनी छातियों के जोर से तैर रही हूँ. मैं दूसरे किनारे पर लगी तो शाम होने को आ गयीथी. और मेरा गांव बहुत ऊपर रह गया था पर इसके बावजूद दूसरे किनारे पर पाँव रखते हीजैसे मेरी सारी थकावट, मेरी सारी परेशानी दूर हो गयी थी और मैं भारत की धरती परपहुंच चुकी थी. मेरी आत्मा खुशी से थरथरा उठी, इस समय मेरे दिल की क्या हालत थी मैंबयान नहीं कर सकती. बस ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे कोई इसके अन्दर बैठा खुशी से नाचरहा हो. मैं गीले कपड़ों के बोझ के बावजूद तेंजी से अपने गांव की ओर भागी जा रहीथी. गीले कपड़े एक-दूसरे से अटकते रहे. पाँव ऊबड़-खाबड़ धरती पर टेढ़े-मेढ़े होकरपड़ते रहे. पर मैंने एक भी ठोकर नहीं खायी. एक बार भी नहीं फिसली और भागती चली गयी.हमारे गांव में कई दीए जल रहे थे. जैसे मेरे आने पर दीपमाला की गयी हो और इन सबसेऊपर हमारे दो मंजिले मकान की रोशनी दिखाई दे रही थी. उस गांव में केवल हमारा हीमकान दो मंजिला था. मेरे ससुराल वाले वहाँ कई पीढ़ियों से साहूकारी का काम करते चलेआ रहे थे. इसलिए आसपास के गांव वाले सब इन्हें जानते थे. मैं अपने घर के समीप पहुंचरही थी. और सोच रही थी कि कल आसपास के कई गांवों से लोग इन्हें मुबारकबाद देनेआएँगे. उनकी बहू दरिन्दों के चंगुल से निकल आयी. लोग उसकी बहादुरी और साहस के चर्चेकरेंगे. दूर-दूर से महिलाएँ मुझे देखने आएँगी. जो इस तरह अकेली इस खूनी-सी नदी कोचीरकर जीवित निकल आयी थी और प्रेम,वह भी तो केवल एक ही शब्द में कई प्रश्न भर केपूछेगा-मुसलमान? तो? मैंने सोच लिया था कि मैं आज रात ही अपने पति से लडूँगी किउन्होंने इस बच्चे को यह सब कुछ क्यूँ बताया. उससे उन्होंने यह क्यूँ नहीं कह दियाकि वह तुम्हारी नानी के घर गयी है .- पर फिर वह जवाब देंगे कि मैं यह कैसे कह देता?तुम्हारी मां तो स्वयं यहां तुम्हें ढूंढ़ने आयी थी. वह स्वयं प्रेम को गोद मेंलेकर घंटों रोती रही थी. और मैंने सोचा कि मेरी मां भी कितनी खुश होगी. वह यह खबरसुनकर मेरे गांव भागी आएगी और आकर खूब रोएगी. पर वह रोना कितना खुशी का रोनाहोगा,जब मैं मैके से ससुराल को जाने वाली होती हूं तो वह बहुत रोया करती है. पर फिरमुझे भी अपने यहां बहुत दिन रहने नहीं देती. हमेशा यह कहा करती है विवाह के बादबेटी के लिए मां के घर में कोई जगह नहीं, वह सौभाग्यशाली तभी है जब वह वहीं, अपनेपति के कदमों में उसी के घर में मरे. मैं सोचती जा रही थी और मुझे पता भी न चला किकब मैं अपने मकान के दरवाजे पर पहुंच गयी. उस समय वह बाहर का दरवाजा बन्द करके उसकीकुंडी चढ़ा रहे थे. मेरे मन की नटखट पत्नी ने सोचा इन्हें पता नहीं कि इस समय वहमकान का दरवाजा बन्द कर रहे हैं जबकि यह मन का द्वार खोलने का समय है. मन में आयाकि बार-बार दरवाजा खटखटाऊँ और बार-बार जब वह खोलकर पूछें कि कौन तो छुप जाऊँ और उसीतरह करती रहूं. अन्त में विवश होकर वह स्वयं बाहर निकलें और चोर को ढूंढ़ने के लिएपुराली के ढेर के पीछे तक आएं. जहाँ मैं छुपी हूं. 'तू....' लेकिन हुआ ये कि मैंनेदरवाजा खटखटाया तो उन्होंने अन्दर से ही आवाज दी, ''कौन?'' मैं चुप रही. फिर आवाजआयी, ''अरे कौन हो?'' पर दरवाजा नहीं खुला. मैं समझ गयी कि अभी तक पिछली घटना का डरजीवित है. वह बेधड़क दरवाजा भी नहीं खोल सकते. फिर मुझे इन पर अंफसोस हुआ, वैसे भीइनकी आवाज सुनकर चुप न रह सकी और मैंने जल्दी से कह दिया ''मैं हूं निर्मला.'' पतानहीं क्यूँ मेरी आवाज इतनी धीमी थी जैसे किसी के कान में कुछ कह रही हूं परउन्होंने सुन लिया था. क़्योंकि उन्होंने जल्दी से कहा ''तुम,'' और फिर चुप हो गये.ऐसी चुप्पी जैसे सारे संसार की सांस एकदम से रुक गयी हो. यहां तक कि एक पल-उसबर्फ-सी चुप्पी के एक पल में जैसे एक मुद्दत बीत रही थी. और फिर दूसरा पल उसी तरहबीत गया पर दरवाजा नहीं खुला. शायद उन्हें अपने कान पर विश्वास नहीं आ रहा था.मैंने सुना हुआ था कि यकायक खुशी की लपक में आ जाने से कभी-कभी आदमी मूर्च्छित भीहो जाता है. और कोई-कोई तो मर भी...मैं डर गयी. मैंने जोर-जोर से दरवाजा थपथपानाशुरू किया, ''दरवाजा खोलो, दरवाजा खोलो...मैं हूं...निर्मला...'' अन्तत: दरवाजाखुला, और मैंने देखा कि वह मेरा पति नहीं था.... फिर वह अचानक चुप हो गयी जैसे, सहमगयी हो. उसने आनन्द की तरफ इस तरह देखा जैसे इससे पहले कभी उसे देखा ही न हो. कहानीने यहां पहुंच कर जोर से झटका दिया था कि आनन्द अपनी जगह से उठ बैठा. ''तो फिर वोकौन था'' उसने पूछा. ''वो मेरा पति न था.'' उसने आवाज में बिना किसी विशेषउतार-चढ़ाव के वही वाक्य सादगी से दोहरा दिया-वह जिसने भरी सभा में मेरा हाथ थामाथा. जिसने विवाह के समय मन्त्रों के साथ कई प्रकार के प्रण और वचन लिए थे. चेहरेमोहरे से उस समय भी वो वैसे ही थे पर...पर पता नहीं इन्हें क्या हो गया था.इन्होंने पहले तो जैसे मुझे पहचाना ही नहीं और फिर उन्होंने अत्यन्त ठंडी आवाज मेंकहा, ''अब यहां क़्या करने आयी हो.'' ऐसा लगा जैसे किसी ने बर्फ की छुरी मेरे दिलमें भोंक दी हो. मेरी रगों में खून बर्फ की डलियाँ बन कर अटक गया. और जीभ सूखीलकड़ी की तरह चुभने लगी. मैं जवाब क्या देती. मैं उन्हें क्या बताती कि मैं क्याकरने आयी हूं. इतने में मेरे ससुर के खड़ाऊँ की आवाज आयी, वह हमेशा की तरह राम नामका पट्टा लपेटे आंगन में आये. मैंने आगे बढ़कर उनके चरण छुए लेकिन उन्होंनेआशीर्वाद भी नहीं दिया. अपने बेटे की ओर एक प्रश्नभरी निगाह से देखा और फिर मेरीओर, और फिर उनकी जुबान से निकला, ''राम राम''. जैसे मेरे अपवित्र शरीर से बचने केलिए वह राम की शरण ढूँढ रहे हों. उसके बाद श्मशान घाट-सी शान्ति छा गयी. हम तीनोंएक-दूसरे की तरफ देखने से कतरा रहे थे. मुझको हर क्षण एक गुनाह का अनुभव जकड़े जारहा था. यहां तक कि इस डरावनी खामोशी के बीच मुझे धीरे-धीरे यह महसूस होने लगा जैसेकिसी ने कलंक की मुहर आग में पता कर मेरे शरीर के हर एक अंग पर दाग दी हो. और गीलेकपड़ों के अन्दर भी मुझे अपना एक-एक अंग दिखता और जलता हुआ दिखाई देने लगा. यहां तककि कपड़ों का चेतन भी जाता रहा और ऐसा महसूस हो रहा था जैसे अपने ससुर के सामने मैंबिलकुल नंगी खड़ी हूं. फिर मुझे पता नहीं क्या हुआ कि मैंने हाथ बढ़ा कर उनके बदनसे वह पटका नोंच लिया जिस पर हंजारों राम नाम छपे थे और उसे अपने चारों तरफ लपेटलिया था. पर फिर भी मैं नंगी थी. ''पागल हो गयी है बेचारी'' मेरे ससुर ने हमदर्दीसे कहा. ''पागल तो हो ही गयी है. नहीं तो इस तरह यहां क्यूँ चली आती'' उसके पति नेकहा. ''पर मैं अब तक पागल न थी. अब हो रही हूं.'' मैंने चिल्ला कर कहा. ''हश्श!आहिस्ता-आहिस्ता'' मेरे ससुर ने धीमे स्वर में कहा, ''आसपास के लोग जाग जाएंगे,उन्हें तो पता है कि तुम मर चुकी हो. '' ''झूठ है, उन्हें यह पता है कि हमारे गांवकी औरतें वह उठा कर ले गये हैं.'' मेरी जुबान चलने लगी. ''ठीक है हर कोई यही कहताहै कि उसकी बेटी ने नदी में कूद कर अपनी जान बचा ली.'' ''तो क्या इनमें से कोई भीअपनी बेटी को वापस नहीं लेगा.'' ''मुर्दों के भूत घर में कौन रखता है.'' ''हाय राम,कितना घोर अन्याय है'', और मैं रोने लगी. ''अन्याय नहीं संसार का व्यवहार ही ऐसाहै. इज्जत-मान के बिना यहां कोई जीवित नहीं रह सकता.'' मेरे ससुर मुझे बड़े आराम सेसमझा रहे थे. ''तुम तो हर दिन रामायण पढ़ा करती थीं. क़्या स्वयं भगवान राम ने अपनेकुल की मर्यादा के लिए सीता को अपने घर से नहीं निकाला था और मां सीता तो सतीथीं.'' माता सीता तो सती थीं-यह कहकर व्यंग्य का एक नया अंगारा मेरे शरीर पर रखदिया गया था. जिससे वह गहरे जख्म फिर से दहकने लगे. रामायण लिखने वाले ॠषियों केलिए मेरे दिल में बद्दुआएं निकलीं. या उन्होंने इसीलिए रामायण लिखी थी? क्या इसीलिएहिन्दुओं को हर दिन रामायण पढ़ने को कहा जाता है? क्या इन ऋषियों ने हर पति कोइसलिये भगवान बना दिया था कि उनके अत्याचार को मर्यादा का सच समझा जाए और मेरामर्यादा पुरुषोत्तम चुपचाप सुन रहा था. मुझे उसपर क्रोध नहीं आया. जो आदमी अपनीआँखों के सामने अपनी पत्नी को औरों की भीड में फँसा देखकर कायरों की तरह भाग सकताथा, वह अब इसे अपने परिवार की मर्यादा के हाथों तबाह होता देखकर और क्या कर सकताथा? घर से निकले हुए मेरे ससुर ने मुझे शाबाशी दी, ''तुमने बहुत बुद्धिमानी की किरात के अँधेरे में यहां आयी हो. नहीं तो इतने बड़े घराने की लाज मिट्टी में मिलजाती.'' आते हुए उन्होंने मेरा ढाढस बंधाने के लिए यह भी कहा कि ''दुखी होने की कोईबात नहीं. हमने बदला ले लिया है. जितनी औरतें मेरे गांवों की वह इकट्ठा ले गये थेउससे कहीं अधिक हम उनकी औरतें गांव में ले आये हैं.'' ''और उन्हें अपने-अपने घरोंमें बसा लिया,'' मैंने चिढ़ा कर पूछा. ''हां, उन्हें घर में रखना तो गर्व की बात हैही...'' मेरे ससुर की छाती गर्व से फूल उठी और उन्होंने अन्दर मकान की ओर इशाराकरके कहा, ''अपने यहां भी दो है.'' इससे अधिक मैं कुछ और नहीं सुन सकी. मुझे यूँलगा जैसे मैं अभी तक औरतों का अपहरण करने वाले दलालों और बुरदांफरोशों के जाल मेंफँसी हुई हूं. मैं वहाँ से भागी और भागती ही चली गयी. मैं भागती चली जा रही थी औरसोच रही थी कि मैं भाग कर कहाँ जा रही हूं. शरीफ औरत के लिए भारत में भी मुझे वहीकुछ दिखाई दिया जो इनके पाकिस्तान में था. ये दोनों देश उन मुर्दों के थे जो शराफतके नकली पर्दे फाड़ कर औरत के नंगे शरीर के आसपास अपने असली ढंग में नाच रहे थे.स्वयं औरत के लिए इनमें कोई स्थान न था. धरती की तरह हमारों शरीरों के बँटवारा तोउन्होंने कर लिया था पर एक औरत, एक मां को शायद कोई भी अपने हिस्से में लेना नहींचाहता था. मैं सोच रही थी और भागी ही चली जा रही थी पर मुझे कहीं शरण न मिल रही थी.हर जगह मुझे भारत की धरती दिखाई दे रही थी. और इस धरती पर जगह-जगह मुझे उस औरत केखून के धब्बे दिखाई दे रहे थे जिसका बलात्कार पाकिस्तान और हिन्दुस्तान ने मिलकरकिया था. इस अय्याशी में वह दोनों एक-दूसरे से मिल गये थे. पर मैं इन दोनों कीपहुंच से कहीं दूर निकल जाना चाहती थी. मेरे सामने रावी थी और वह भी मेरी ही तरहपाकिस्तान और हिन्दुस्तान के बीच जकड़ी हुई दिखाई दी. इसको एक किनारे से पाकिस्तानने पकड़ रखा था और दूसरे किनारे से भारत ने पर फिर भी इसकी पवित्र लहरें अपनीमर्यादा बचाने के लिए कहीं भागी चली जा रही थीं. मुझे एक सहेली मिल गयी, मैंने सोचामुझे भी वह अपने साथ बहाकर ले जाएगी. मैं बहुत थक गयी थी और मुझसे अब अकेले नहींभागा जा रहा था. मैंने अपने आपको रावी की गोद में डाल दिया लेकिन...वह भी मुझे छोड़गयी...शायद इसलिए कि मैं उसकी तरह पवित्र नहीं थी. मेरी इज्जत लुट चुकी थी.--------------------------------------------------------------------------------कल आपने पढ़ा था कि कैसे हिंदुस्तान-पाकिस्तान के बीच वो कुत्ता, कुत्ते की मौत मरगया