The Lallantop
Advertisement

दस साल की बच्ची ने कहा शाहरुख खान मेरी जान है

एक कहानी रोज़ में आज पढ़िए रामकुमार सिंह की कहानी 'तितली'

Advertisement
pic
6 मई 2016 (अपडेटेड: 6 मई 2016, 10:17 AM IST)
Img The Lallantop
फोटो - thelallantop
Quick AI Highlights
Click here to view more
रामकुमार सिंह. मूल रूप से राजस्थान के रहने वाले. पेशे से पहले पत्रकार और फिर लेखक. 2014 में रिलीज हुई फिल्म जेड प्लस रामकुमार सिंह की ही कहानी थी. बाद में इसी नाम से नॉवेल भी आया. आज एक कहानी रोज में उनकी कहानी तितली पढ़ें.
बाईस साल की उम्र में थ्री बैडरूम फ्लैट का मालिक बनने पर अपने आपको तकदीर वाला समझ रहा था, जरा भी फिक्र नहीं कि मेरे सिर पर पंद्रह लाख रुपए का बैंक का ईनाम था कि यदि वक्त पर दिया उसका यह कर्ज ना चुका पाऊं तो वे कभी भी मुझे बेदखल कर सकते हैं. मैं बैंक में कोई पांच दर्जन दस्तखत एक के बाद एक करता गया. जब आखिरी दस्तखत किया तो फाइल अपने हाथ में लेते हुए सामने बैठी युवती ने तकनीकी मुस्कराहट बिखेरी और बोली, गुड विशेज फॉर योर न्यू फ्लैट मि. निखिल. मैं उसकी खूबसूरती पर लट्टू था. अपनी उम्र के लिहाज से उसे इस कदर घूर रहा था जैसे पूरे पंद्रह लाख की वसूली यहीं से करके जाऊंगा. लेकिन उसकी आवाज सुनते ही लगा कि वह मुझे चेतावनी दे रही है कि आपने अपने डेथ वारंट पर साइन कर दिए हैं. मुझे चाय ठंडी करके पीने की आदत थी. अपनी गणना के लिहाज से वह चैक मेरे हाथ में सौंपने तक मेरे जैसे ग्राहक के सम्मान में मंगाई अपनी चाय पी चुकी थी. चैक मेरे हाथ में आया था कि सामने शेष रही आधा कप चाय चपरासी उठा ले गया. मुझसे बिना पूछे. मैं ताकता रह गया. युवती उठी. हाथ आगे निकाला. चाय अधूरी रहने से मैंने अनमने भाव से हाथ मिलाया. उसका इशारा था कि आप यहां से निकलें. अब बारी अगले मुर्गे की है. आप समझ रहे होंगे कि मैं कहानी के अगले हिस्से में कर्ज में डूब जाउंगा. या बैंक के पैसे खाकर मकान की रजिस्ट्री किसी और के नाम करके फरार हो जाउंगा, या जिस लडक़ी ने मुझे कर्ज दिया है, उसी से प्यार करने लगूंगा तो आप गलत हैं. पंद्रह लाख का चैक हाथ में लिए बैंक से बाहर निकलते हुए मैंने लगभग यही सब खयाल दिमाग में लाने की कोशिश की थी. लेकिन कर्ज की रकम को हड़पने के लिए बैंक के बाहर ही ड्रीमलैंड सोसायटी के बिल्डर अपनी कार में थे. चैक लेकर उन्होंने रसीद और चाबी मेरे हाथ में सौंप दी. बाकी रकम मैं पहले ही उन्हें नकद दे चुका था. आज से ड्रीमलैंड सोसायटी में एक फ्लैट मेरा था. मैं शाम को ही अपनी कार में कुछ जरूरी किताबें और कागज लेकर पहुंच गया था. यह एक पूरी तरह सुसज्जित फ्लैट था. एसी, बिस्तर, गैस की पाइप, चूल्हा सब कुछ पहले से मौजूद था. मैं अपनी साहित्य और फिल्मों से जुड़ी पत्रिकाएं बुकसेल्फ में जमा रहा था कि पीछे से आवाज आई.
हैलो अंकल. मैंने मुडक़र देखा. बाल हेयर बैंड की गिरफ्त में, आंखों में स्टाइलिश काला चश्मा और मासूम से चेहरे पर डेढ इंच मुस्कान. एक दस-ग्यारह साल की बच्ची मेरे फ्लैट के दरवाजे पर खड़ी थी. लंबे इंट्रो के लिए माफ करें. कहानी यहां से शुरू होती है. ‘हाय, मैं आरुषि हूं. मैं छठी क्लास में पढती हूं. सामने वाले फ्लैट में रहती हूं. क्या मैं आपके बारे में जान सकती हूं.’ वह एक सांस में सब बोल गई. मैंने कहा, ‘मैं निखिल हूं. राइटर हूं, जर्नलिस्ट हूं. फिल्मों पर लिखता हूं.’ ‘तब तो आप शाहरुख खान को भी जानते होंगे.’ ‘उसके बारे में जानता हूं. वह बहुत अच्छा एक्टर नहीं है लेकिन उसका सेंस ऑव ह्यूमर बहुत अच्छा है.’
वह चिढ गई. मेरी साधारण बात उसे बुरी लगी. उसने कहा, ‘आपकी हिम्मत कैसे हुई, शाहरुख को खराब कहने की. वह मेरी जान है.’ मैंने उसे समझा. फिर उस हां में हां मिला दी कि मैं सिर्फ मजाक कर रहा था. वह एक अच्छा एक्टर है. अच्छा इंसान है. उसने चुपके से मेरे कान में आकर एक महत्त्वपूर्ण जानकारी दी कि वह शाहरुख खान को प्यार करती है. यह बात मम्मी को नहीं बताई जानी चाहिए. क्योंकि जब घर में उसने यह बात सबसे पहले बताई थी कि सब लोग जोर से हंसे थे. पहली ही मुलाकात में वह मुझसे खुल गई थी. उसने आग्रह किया कि मेरे पास शाहरुख का कोई पोस्टर हो तो उसे दे दूं. उसके कंधे पर लटके बैग में कुछ अखबारी कतरने थीं जिसमें शाहरुख से जुड़ी खबरें थीं. कुछ पोस्टर थे लेकिन प्रिंटिंग उनकी घटिया थी. उसने बाद शाहरुख के बारे में मुझे कई जानकारियां दी कि किस तरह गौरी खान से उसकी शादी हुई. वह दिल्ली का रहने वाला था. कैसे मुंबई में जाकर उसने स्ट्रगल किया. उस समय उसकी दीवाना, बाजीगर, डर, गुड्डू, बादशाह, राजू बन गया जेंटलमैन, डीडीएलजे आ गई थी लेकिन ताजा ताजा मोहब्बतें उसने अपनी मां के साथ देखी थी. थियेटर में. खैर, इस पहली मुलाकात में शाहरुख के बारे में इतना जान गया था कि फिल्मों पर लिखते हुए भी नहीं जान पाया था. वह चली गई इस आग्रह के साथ मैं उसे शाहरुख के कुछ पोस्टर उपलब्ध कराऊं. ड्रीमलैण्ड सोसायटी में मेरी यह पहली मुलाकात उत्साहवर्धक थी. वह तितली की तरह आई थी, एकदम बेपरवाह. यह जाने बिना कि मैं कौन हूं और मेरी कहानी क्या है, अपनी सारी रहस्यपूर्ण कहानी सुना गई.
मैंने सारी मैगजींस खंगाली. हरेक में अलग अलग मुद्राओं में शाहरुख खान के पोस्टर छपे थे. मैंने कैंची से उनको सावधानी से क्रॉप करते हुए कुतरा. एक बड़ी पेंटिंग शीट पर छोटे बड़े सारे फोटो चिपका दिए. वह शाहरुख एक्सक्लूसिव कोलाज था. उसे फोल्ड किया और अगली सुबह सामने वाले फ्लैट की घंटी बजाई. एक मुस्कराती हुई खूबसूरत जवान महिला ने दरवाजा खोला.
‘जी, वो आरुषि है? मैं आपके सामने नया आया हूं.’ ‘वो स्कूल गई है, बोलिए.’ मैंने वो फोल्ड की हुई शीट उनके हाथ थमाते हुए पूछा, ‘आप मम्मी हैं उसकी?’ उसने हां में सिर हिलाया. ‘आरुषि ने कहा था इसके लिए. उसे बताना कि मैंने उसके लिए बनाया है.’ पोस्टर लेकर वह चली गई. उसने अंदर आने को नहीं बोला. नए घर में व्यवस्थित होने में मुझे दस दिन से ज्यादा लग गए. सुबह देर तक सोना और रात को देर से घर लौटना आदत हो गई थी. अखबार से छूटते छूटते दस बज जाते थे. फिर यार दोस्तों ने नया नया बीयर का चस्का लगा दिया था. शहर की बार भी बड़ी अजीब होती हैं. अंदर बैठे लोग इतना शोर शराबा करते हैं कि किसी को कुछ समझ में नहीं आता. ज्यों ज्यों शराब के पैग पेट में बढते जाते हैं, आवाजें और तेज होने लगती हैं. प्रेस क्लब जाने लगे थे. वहां बेहतर यह था कि बाहर लॉन में भी बैठकर भी आप ड्रिंक्स का मजा ले सकते हैं लेकिन पिछले कुछ दिनों से वहां ऐसे लोगों की आवाजाही बढ गई थी जो दलाल किस्म के थे. इसलिए वहां लॉन में भी लगभग वही माहौल होने लगा था जो होटलों की बार में होता था. बावजूद इसके कि शहर में शराबियों के जांचने के लिए ब्रेथ एनलाइजर लेकर घूमने वाली पुलिस की गश्त बढा दी गई थी, हमने बीयर पीने का नया अड्डा अपनी कार में विकसित कर लिया था और एक नया शब्द ईजाद किया था, कि ‘कारोबार’ करेंगे. यानी कार में ही बार का सुख लेंगे. अपनी व्यस्तताओं में आरुषि मेरे जहन से निकल ही गई थी.
वो संडे की सुबह थी, जब मैं बाल्टी में पानी लेकर गीले कपड़े से अपनी कार को चमका रहा था. पीछे से आरुषि की आवाज आई. मैं गर्मजोशी से मिला. उसने मुझे धन्यवाद दिया कि मैंने उसके लिए इतना खूबसूरत कोलाज तैयार किया. शिकायत भी की कि रोज मेरे घर पर दरवाजे की घंटी बजाती है लेकिन कोई खोलता ही नहीं. मैंने बताया कि मेरे घर में मेरे अलावा कोई रहता ही नहीं तो खोलेगा कौन? और मैं रहता ही कितनी देर हूं. रात को देर से लौटता हूं. सुबह जाता हूं उस समय तुम्हारा स्कूल होता है.
उसने पूछा, ‘फिर आप खाना कहां खाते हो?’ ‘होटल में.’ ‘मेरी मैम कहती हैं, होटल में खाने में पेट खराब हो जाता है. बीमार हो जाते हैं. तुमको नहीं खाना चाहिए.’ वह मां की तरह हिदायतें देने लगी थी, ‘और देर से सोना भी नहीं चाहिए. मेरी मम्मी कहती है, कम सोने से आंखों के नीचे काले घेरे पड़ जाते हैं. जरा दिखाओ अपनी आंखें.’ वह डॉक्टर की तरह आंखों का मुआयना करने लगी. रात की बीयर पी हुई थी. उनमें हल्की सूजन दिख रही थी. आरुषि ने नाराजगी जताई, ‘ऐसा लग रहा है तुम्हें पीलिया हो गया है.’ मैंने उसे छेड़ा, ‘तुम दिखती इतनी समझदार हो तो यह बेवकूफी क्यों कर रही हो?’ ‘क्या?’ ‘शाहरुख खान से प्यार करने की.’ सुनते ही वह गुस्सा हो गई. मुंह फुलाकर बैठ गई. मुझे कार छोडक़र उसे मनाना पड़ा. ऊपर लेकर आया. फ्रिज से निकालकर एक आइस्क्रीम खिलाई. गुस्सा शांत होने पर मैंने कहा, ‘शाहरुख को तुम्हारे इस अफेयर का पता भी है कि नहीं..’ ‘नहीं ना, मैंने उसको चिटठी लिखी थी उसके बर्थ डे पर. जवाब ही नहीं आया.’ ‘अगले हफ्ते मैं मुंबई जा रहा हूं.’ ‘शाहरुख से मिलोगे?’ वह चहक उठी ‘प्रोग्राम तो नहीं है, तुम कहोगी तो मिलना पड़ेगा.’ ‘प्लीज, प्लीज, मेरे लिए प्लीज.’ उसने दोनों हाथ जोड़ लिए. उसके आग्रह को यूं ही उड़ा देने का मतलब था उसका दिल दुखाना. मैंने जान बूझकर उसे झूठा आश्वासन दिया कि मैं मुंबई जा रहा हूं तो उससे मिलकर ही आउंगा. यह बात भी इस भरोसे के साथ बोली थी जैसे शाहरुख खान मेरा चचेरा भाई है और वह मेरे मुंबई आने की खबर मात्र से एअरपोर्ट मुझे लेने आ जाएगा. शहर में कई साल से अकेले रहते हुए, तनाव और अकेलापन भोगते हुए कुछ ही मुलाकातों के बाद आरुषि से एक रिश्ता बन गया था. वह छुट्टी के दिन वह सुबह सुबह डोरबेल बजा देती. हालांकि वीकेंड को मैं कभी दो तीन बजे से पहले घर नहीं लौटता था लेकिन उसकी एक ही रट होती थी कि सुबह जल्दी उठना चाहिए. ठंडे पानी से आंखें धोनी चाहिए. उगते सूरज को देखना चाहिए. फिर दिन में जो जी आए करो. अक्सर मेरे स्टडी में किताबों में उठापटक करती रहती. कभी किचन में जाकर फ्रिज खोलती. अधिकारपूर्वक उसमें रखे फल, जूस, कोल्ड ड्रिंक्स को इस्तेमाल करती. मैंने उसकी आवागमन को देखते हुए खास उसके आग्रह पर फ्रिज में चॉकलेट रखवाई थीं. वह मुझे हिदायत देती कि किचन को गंदा नहीं रखना चाहिए. बीमारियां फैलती है. कभी कभी वह अपनी मां को बताकर अपने घर की बाई से मेरे घर की किचन की सफाई करवा देती. उसके पिता महीने में कभी कभार दिखाई देते थे. आरुषि ने बताया कि पापा की टूरिंग जॉब है. वे ज्यादातर बाहर ही रहते हैं. आते भी हैं तो हम पर हुकुम चलाने के लिए. मम्मी किसी स्कूल में टीचर हैं. कभी कभी वह शिकायत भी करती कि उन दोनों के पास उसके लिए वक्त नहीं है. उसकी कहानियां सुनने में दिलचस्पी थी. मैंने उसे खूब कहानियां सुनाईं. धीरे धीरे मुझ पर जिम्मेदारी महसूस होने लगी कि आज मेरे पास सुनाने को कोई नई कहानी ही नहीं है. मैं मेरे बुकसेलर दोस्त राजू के पास पहुंचता. कुछ नई लोकथाओं की किताबों की मांग करता. मुझे आरुषि को सुनाने के लिए खुद को कई कहानियां बनानी पड़ी. वहां रहते हुए मुझे छह महीने कब बीत गए, पता नहीं चला. उस दिन वह सुबह रोते रोते मेरे कमरे में घुसी. अपनी मम्मी को भरा बुला सुना रही थी. उसकी मां कुछ ही देर पहले स्कूल के लिए रवाना हुई थी. उसके स्कूल में इम्तहान के कारण उसकी छुटटी थी. वह नाराज थी. कारण पूछा. उसकी मां ने शाहरुख खान का वह कोलाज उठाकर अपनी अलमारी में बंद कर दिया. उसके कमरे से शाहरुख खान गायब हो गया. मम्मी का तर्क था कि अब वह बड़ी हो रही है और उसे इस तरह की फालतू बातों में ध्यान नहीं देना चाहिए. आरुषि ने बताया कि मां ने उससे अब यह भी हिदायत दी है कि वह मुझसे कम मिला करे. कोई भरोसा नहीं, आजकल. अखबारों में उल्टी पुल्टी खबरें छपती रहती हैं.
मैंने कहा, ‘कोई बात नहीं, मां बाप अपने बच्चों के भले की सोचते हैं. वो ठीक ही तो कहती है, तुम बड़ी हो रही हो. तुम्हें इन सब चीजों से दूर अपनी किताबों में ध्यान देना चाहिए.’ उसने मेरी बात को ध्यान से सुने बिना कहा, ‘तुम किसी से कहो नहीं तो एक बात बताऊं?’ ‘बताओ.’ ‘मम्मी बात बात पर मुझे डांटती रहती है. वह शायद जलती है मुझसे. मुझे लगता है, मम्मी भी शाहरुख खान से प्यार करती है.’ मैं जोर जोर से हंसने लगा. वह नाराज हुई. तेजी से मुझसे बात किए बिना बाहर निकली और अपने घर का दरवाजा बंद कर लिया. मुझे लगा कि वह बच्ची है और मान जाएगी लेकिन बात इतनी सी नहीं थी. अगले कई दिन तक वह घर नहीं आई. ना ही मेरी कोशिश के बावजूद मुझे दिखाई दी.
मैं मुंबई से लौट आया था. एक वेब डिजायनिंग और कंटेंट कंसल्टेंसी की जानकारी लेने मुंबई की एक फर्म के साथ काम करना चाहता था. तीसरे हफ्ते ही मुझे खबर मिली कि मुझे तीन साल के लिए मुंबई ही रहना होगा. साल भर ट्रेङ्क्षनग के बाद कम से कम दो साल मुझे उनके लिए काम करना होगा. मैं जाने से पहले एक बार आरुषि से मिलना चाहता था, लेकिन वो नकचढी मुझे कहां भाव देने वाली थी. एक दो बार कोशिश की लेकिन उसने मेरी तरफ जीभ निकालकर मेरा मखौल उड़ाया. उसकी किसी भी बात को बुरा तो मुझे लगता ही नहीं था. मैंने घर के लिए नए किराएदार ढूंढ लिए थे. पति एक मल्टीनेशनल कंपनी के कॉल सेंटर में हैड था और पत्नी निजी बैंक में लोन आफिसर. मैंने घर छोडऩे से पहले औपचारिक विदाई के लिए मेरे पड़ोसियों के पास गया था. मैंने आरुषि से बोला था कि अब मैं तीन साल बाद आउंगा, तो भी उसने मुझसे बात नहीं की. लड़कियों को समझने के मामले में मैं बहुत कमजोर था. मेरे सब मित्र अपनी गर्लफ्रेंड्स के साथ जश्न मना रहे होते थे, जब मै टुकर टुकर देख रहा होता था. जाहिर है, आरुषि को मैं कैसे समझा सकता था. खासकर तब जब उसका बॉयफ्रेंड ही शाहरूख खान हो. मैंने एक बार मजाक में ही उससे कहा था, ‘यार आरुषि, शाहरुख के बजाय तो तुम मुझे ही अपना बॉयफ्रेंड बना लो.’ ‘सूरत देखो, आइने में एकदम बंदर लगते हो. बनने चले हो शाहरुख खान.’ मैं चुप था. मैं जब निकलने को था तो आरुषि के मम्मी पापा भी मुझ पर पिघल गए. बोले, ‘बेटा, ऐसा नहीं करते. अंकल को बाय बोलो.’ वह टस से मस ना हुई और मैं दरवाजे तक आ गया. उसकी मम्मी ने गलत वक्त पर गलत जिज्ञासा मेरे सामने रख दी, ‘समझ में नहीं आता कि झगड़ा क्या है आप दोनों का.’ मैंने कहा, ‘उसका खयाल है, आप शाहरुख खान से प्यार करती हैं और उससे जलती हैं.’ मम्मी एक पल मुस्कराई. फिर धीरे धीरे ऐसे कठोर हो गईं जैसे उनकी चोरी पकड़ी गई. प्रिय पाठक, अब आपको लग रहा होगा कि इतनी सी साधारण बात के लिए मैं बात को खींचे जा रहा हूं. मैं हमेशा उस लडक़ी पर नजर रखे हुए था और वो मेरी कहानी का पात्र मात्र थी. कितनी ही ऐसी लड़कियां होंगी जो किसी न किसी हीरो के बारे में सोचा करती होंगी. उससे प्यार करने का इरादा रखती होंगी लेकिन मेरे मामले में मैं मन ही मन शाहरुख खान से जलने लगा था. मुझे अक्सर लगता था कि किसी दिन यदि शाहरुख सचमुच अपनी इस फैन को प्यार करने लगा तो मेरा क्या होगा?
वह बहुत छोटी थी मुझसे लेकिन जिस तरह से वह मुझ पर अधिकार समझने लगी थी उसी तरह से मैं भी उस पर अपना अधिकार समझने लगा था. और यह अनायास नहीं था. एक साल तक साथ रहने के बाद जब तीन साल के लिए जा रहा था तो मैं कतई नहीं चाहता था कि मैं उससे बिना मिले जाउं. लेकिन क्या करता?
अब मैं मुंबई में था. कुछ फिल्मी दोस्त, कुछ थियेटर के. लोकल के धक्के. मैं लोकल में चढऩे से ही डरता था. कितनी ही बार मुझे वीटी से अंधेरी आना होता था तो मैं इंतजार करता था कि वीटी से शुरू होकर अंधेरी पर खत्म होने वाली ट्रेन में ही बैठूं. ऐसा नहीं था कि मेरे लिए यह कोई ऊबाऊ यात्रा हुआ करती थी. मुझे लोकल में बहुत अच्छा लगता था. चलती लोकल में चेहरों को पढऩे का एक अलग ही सुख होता था. उन चेहरों में पराजित अभिनेता, जीने के लिए संघर्ष कर रहे यौद्धा की शक्ल वाला आम आदमी, एक दूसरे का हाथ थामे हुए बेफिक्र प्रेमी. उनके चेहरे पर लिखा है, क्या जरूरी है इस रिश्ते को जन्मभर निभाया जाए. घर से वक्त गुजारने के लिए खिडक़ी में कोने वाली सीट पर बैठे बुजुर्ग, भागते हांफते कमर से नीचे जींस बांधे एक ही किस्म की सैकड़ों लकडिय़ा जिनके बारे में बाहर से गया आदमी एक ही तरह से सोचता था कि ये सब की सब चरित्रहीन हैं. इस पूरी भीड़ का भी एक अनुशासन है. अपने जिंदा रहने की जरूरत से पैदा हुआ अनुशासन कि आप कतार से बस में नहीं चढेंगे तो बस चली जाएगी और कोई भी चढ़ नहीं पाएगा. यदि आप लडक़ी छेड़ देंगे तो कोई मोबाइल में आपकी तस्वीर खींच लेगा और वो किसी अखबार में छप जाएगी. सोसायटी वाले ही आपके घर पुलिस को बुलाकर आपको उसके हवाले कर देंगे. जितनी बार मुंबई जाता था, वह उतना ही बार वह नए किस्म का मतलबी और उसी मतलब के कारण ही अनुशासित दिखने वाला शहर लगता था. लेकिन अब मुझे लंबा ठहरना था. इस शहर को और करीब से देखना था. शुरुआती दिनों में मैंने दादर से अंधेरी का टिकट लिया था और अंधेरी पर कूदने को था तो भीड़ के धक्के ने मुझे वापस ट्रेन के दरवाजे में लटका दिया. मेरा पैर प्लैटफार्म की सतह और लोकल के बीच में आ गया था. बमुश्किल एक मिनट के ठहराव के बाद ट्रेन को चलना ही था. भीड़ में जब मैं चिल्लाया कि मुझे उतरना है तो मदद करने के बजाय सहयात्री मुझ पर हंसने लगे. मुझे लगा अपनी फजीहत कराने से बेहतर है, चुप रहूं, अपने पंजे को टूटने से बचाऊं, लिहाजा मैंने पूरी ताकत लगाकर पैर वापस खींचा तो मेरे तीन हजार के जूते में एक तरफ चीरा लग गया. मुझे तुरंत समझ में आ गया कि लोग क्यों कहते हैं कि मुंबई में रहना बहुत महंगा है.
अंधेरी के डीएन नगर में मैं एक मित्र रुस्तम के यहां रुका था. वह अकेला रहता था. स्ट्रगलर भी था लेकिन ठसके वाला. वह अभिनेता था, लिखता भी था. एक दो स्क्रिप्ट हाथ में लिए डायरेक्शन के लिए हाथ पांव मार रहा था. हाथ में तीन मोबाइल होते थे. एक दिल्ली का, एक मुंबई का और तीसरा दुबई का नंबर.
मजे की बात यह थी कि वह कभी दुबई गया नहीं था. उसी ने मुझे बताया कि फिल्म लाइन में यह महत्त्वपूर्ण नहीं है कि आप दुबई गए हैं या नहीं, महत्वपूर्ण यह है कि आप किसी से मिलने जाएं तो आपके कार्ड पर जितनी ज्यादा जगहों के नंबर होंगे वह उतना ही अच्छा रहता है,और कार्ड भी जितने किस्म को हों आपको फायदा होने के चांस उतने ही बढ़ जाते हैं. मुंबई कहने का सपनों का शहर है लेकिन यहां सपने का पर्यायवाची शब्द पैसा ही है. जिसको कम पैसे की चाहत है, उसका सपना छोटा, जिसको ज्यादा पैसा चाहिए उसका सपना बड़ा. मुंबई में आए हैं तो आपके पास सब कुछ छोटा हो सकता है लेकिन सपना जितना बड़ा हो उतना ही अच्छा है. आपका पेट भूखा है, कोई फर्क नहीं पड़ता, आप भूखे दिखने नहीं चाहिए. वह अक्सर बहुत लंबी फेंकता भी था कि उसका कई स्टार्स से फोन पर ही संपर्क है. वह प्रोड्यूसर को यह बताता था कि उसके पास सलमान की डेट्स हैं और किसी दूसरे दर्जे के सितारे के सेक्रेटरी से भूले भटके ही टकरा जाता तो उसे बताता कि उसके पास प्रोड्यूसर तो आ गया है बस सलमान की डेट्स की बात चल रही है. जब कभी अपने होम टाउन जाता था तो गली मोहल्ले के अभिनय के इच्छुक लडक़े लड़कियां उससे मिलने आया करते थे और उनमे से ही किसी को गोली देकर वह अपना पूरा प्रवास प्रायोजित करा लेता था. अपने हर दौरे में वह एक नई अभिनेत्री को ब्रेक देता था. पुरानी अभिनेत्री सवाल करती तो वह उसे बताता कि रोल के हिसाब से डायरेक्टर ने किसी और को चुन लिया, अगली बार वह उसका ध्यान रखेगा. दो तीन साल के इस आश्वासन में लडक़ी भी यह तय कर लेती थी अभिनेत्री बनने के बजाय माता पिता के बताए हुए मर्द के पीछे चलने में भलाई है क्योंकि शादी के बाद के सारे आर्थिक स्ट्रगल उसी पति नाम के प्राणी को करने हैं. अभिनेत्री बनने का चांस तो बरकरार रहेगा ही. और फिर जब कभी हमारे मित्र से वे टकराती तो वह मुस्करा भर के कहता है, ‘देयर इज नो स्पेस इन सिनेमा फोर बहन जी टाइप गल्र्स. तुमने अच्छा किया, समय रहते सही लाइन पकड़ ली. यह तुम्हारे जैसी इज्जतदार लड़कियों का फील्ड नहीं है.’ अपने ही स्कूल टाइम दोस्त के इतने सारे फर्जीवाड़े जानने के बावजूद मैंने एक दिन उससे पूछ लिया, ‘यार, शाहरुख खान से कैसे मिला जा सकता है?’ रुस्तम जोर से हंसने लगा कि मेरे जैसा समझदार आदमी शाहरुख खान से मिलने का लालायित है. मुंबई में आदमी शाहरुख को चुनौती देने के लिए आता है. उससे मिलने के लिए नहीं. रुस्तम बोला, ‘देखना कभी उसके बंगले के बाहर पचास सौ या दो सौ आदमी ज्यादा से ज्यादा मिलेंगे. दो करोड़ की पॉपुलेशन वाले शहर में उनसे चूतिया कोई नहीं है. यार, यह मुंबई है, किसके पास इतनी फुरसत है?’ मैंने स्पष्ट किया कि मुझे उसका इंटरव्यू लेना है. दरअसल, मुझे आरुषि याद आ रही थी और मैं उसे शाहरुख का ऑटोग्राफ वाली स्लैम बुक देना चाहता था. क्योंकि मुझे यकीन था कि वह स्लैम बुक देखकर खुश हो जाएगी, लेकिन यह बात मैं उसे इसलिए नहीं बता सकता था, उस जैसे आदमी के लिए यह बेवकूफी से ज्यादा कुछ नहीं था, लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच था कि सितारे बे-मौसम इंटरव्यू नहीं देते. उन्हें पादने, पालक खाने, संतरा खाने की इच्छा होती होगी तो भी वे पहले अपने पीआर से बात करके पूछते होंगे कि ऐसा करने से उनका फायदा क्या हो सकता है? रुस्तम इनकार तो किसी को करता ही नहीं था. उसने तुरंत किसी हनीफ भाई का नाम लिया, किसी राजेश को याद किया और फिर बताया कि गौरी खान की क्लासमेट आजकल यही वर्सोवा में एक बड़ा फिटनेस सेंटर चलाती है, उसके वहां वह पहले जाता रहा है. उसने बताया कि वह कोई जुगाड़ कर देगा और फिर पत्रकार के नाम से हर स्टार में एक सॉफ्ट कॉर्नर बनता ही है. फिर उसने शायद किसी पीआर वाले से भी जुगाड़ करने की बात कही. हालांकि मुंबई में जब कोई आदमी इतने सूत्र तलाशते हुए आपको प्रभावित करने की कोशिश करे तो समझ में आ जाना चाहिए कि उसके तिलों में तेल नहीं हैं. घाणी की लकड़ी घिसना और बैलों को तकलीफ देने की जरूरत नहीं है. लेकिन वह जिस आत्मविश्वास के साथ लोगों का उल्लू बना सकता था वह काबिले तारीफ था. मैंने उससे यह सीख ले ही ली कि इतना भरोसा हो तो शाहरुख से मिलना नामुमकिन नहीं.
कभी कभी लंबी फेंकने वाले भी आपका आत्मविश्वास बढ़ाने में मददगार हो सकते हैं. यह पॉइन्ट शिव खेड़ा जैसे ऑरेटर्स के काम आ सकता है. यह सारा आत्मविश्वास सिर्फ इसलिए चाहिए था कि मुझे आरुषि को एसआरके के साइन वाली ऑटोग्राफ बुक देनी थी.
उसके दो तीन दोस्तों ने चौथे पांचवें सहायक के रूप में शाहरुख की फिल्म में काम किया था लेकिन उन्होंने भी हाथ खड़े कर दिए. पांच दिन शाहरुख अपनी अगली फिल्म को लेकर होटल जे.डब्ल्यू. मैरियट में शाहरुख की प्रेस कांफ्रेस थी और रुस्तम ने पीआर वाले अपने मित्र से बात की थी. उसने भी यह कहकर टरका दिया कि शाहरुख की पहली वाली फिल्म तो उनके पास ही थी लेकिन इस बार कोई यूके की कंपनी वल्र्डवाइड इसको देख रही है, तो नए जर्नलिस्ट की एंट्री जरा मुश्किल है. कुल मिलाकर रुस्तम का फेंकशास्त्र और उससे पैदा हुआ मेरा कॉन्फिडेंस दोनों मिलकर एक ही पाखाने में बैठे थे. यह अंदाजा लगाना मुश्किल था कि दस्त किसको तेज लगी थी. मेरे पास आरुषि के घर का कोई टेलीफोन नंबर नहीं था वरना मैं उसे बताता कि उसके लिए शाहरुख खान से मिलने के लिए मैं मेरे काम के अलावा भी कितनी मेहनत कर रहा हूं. थोड़ा सा पछतावा इसी बात का था कि मैं जिस जोड़ तोड़ में इतना समय खराब कर रहा था, उसका अंदाजा ना तो शाहरुख खान को था और ना ही आरुषि को. तीन साल बीत गए. मैंने दिल्ली में चैनल में आवेदन किया था नौकरी के लिए. एंटरटेनमेंट हैड के रूप में ज्वाइन कर लिया. दो तीन महीने से उनकी लॉन्चिंग की तैयारियां चल रही थीं लेकिन वह लांच ही नहीं हो रहा था. रोज मैनजमेंट ओर सम्पादकीय के झगड़ होते थे. मेरा दम घुटने लगा था, इस माहौल में. मैंने तय कर लिया कि मैं एंटरटेनमेंट सैगमेंट में बॉलीवुड-हॉलीवुड पर एक नई वेबसाइट डिजायन करूंगा. उसके कंटेंट पर काम करूंगा. मुझे साल भर लग गया. मैंने अपनी साइट विकसित की. मुंबई में रुस्तम को कहकर एक पीआर देखने वाली लडक़ी को वहां के संवाददाता का अतिरिक्त जिम्मा सौंप दिया. एक ऑफिस किराए पर लिया. कुछ स्टाफ रखा. काम ठीक चलने लगा था. इस सारी भागदौड़ के बीच मुझे वो मां की तरह हिदायतें देती आरुषि भी याद आती थी और उसका दोस्त शाहरुख भी. जब मैं वापस अपने फ्लैट पर पहुंचा, जिसकी चार साल की किस्तें जमा कराने के बाद वह कुछ ज्यादा अच्छा लगने लगा था. देश में प्रॉपर्टी के भाव बहुत ऊंचे चले गए थे. मैंने तय कर लिया था कि यह फ्लैट मुझे बेचकर मुंबई शिफ्ट करना है. किराएदारों को मैंने पहुंचने के एक महीने पहले ही किराएदारों का आगाह कर दिया थे. वे घर खाली कर चुके थे. चाबी मेरे कहे अनुसार आरुषि के घर में थी. मैंने डोरबेल बजाई. अंदर से एक खूबसूरत लडक़ी निकली. आरुषि इतनी जल्दी, इतनी बड़ी, इतनी खूबसूरत दिखने लगेगी, कल्पना ही नामुमकिन थी. वक्त ऐसी मशीन है कि चार साल कोई इसमें रह ले तो उसका हुलिया बदलना ही है. तितली अपना चक्र पूरा कर चुकी थी. उसकी कहानी के रोलिंग क्रेडिट्स चल रहे थे. जहां बहुत सारे नामों के बीच मैं अपना नाम ढूंढऩे की कोशिश कर रहा था, लेकिन वह नजर ही नहीं आ रहा था. अब वह चुलबुली नहीं थी. उसकी आंखों की पुतलियां जिस तेजी और जिज्ञासा के साथ घूमा करती थी, वे अब स्लो मोशन में ट्रेक शॉट की तरह धीरे धीरे नीचे हुईं और उसने हल्की सी मुस्कुराहट से मेरी तरफ देखा. मैं अपराध बोध में था कि वह मुझसे पूछेगी कि शाहरुख खान से क्या बात हुई, मैं उससे मिला भी या नहीं लेकिन उसे कोई असर ही नहीं हुआ. मेरे लिए उसकी आंखों में ना आश्चर्य था, ना जिज्ञासा. वह बड़ी हो गई थी. उसकी नजरों में मेरे प्रति वैसा भाव नहीं था. मेरे मन भी उसके प्रति अब कोई उतना मासूमियत भरा भाव नहीं रह गया था. कोई पाप नहीं, बस यूं ही देखना, जैसे एक जवान होती लडक़ी को मेरी उम्र के लडक़े को देखना चाहिए. मैं अपने आपको कोस रहा था कि वह छोटी ही अच्छी थी. मैं उसे देख सकता था. उससे बात कर सकता था. मैं उसके मशवरे सुन सकता था लेकिन एक उम्र है कि कुछ सुनती ही नहीं. हजारों बार मैंने अपने घर में, टीवी में, साहित्य में यह संवाद सुना लेकिन फिर यहां लिखना लाजिमी है कि लड़कियां जल्दी बड़ी हो जाती हैं. मैंने यह पहली बार देखा और महसूस किया. मेरे जीवन ये चार पांच महत्त्वपूर्ण साल जिसमें एक तितली मेरी आंखों से दूर चली गई थी. वह खत्म हो गई थी. उसका कायान्तरण हो गया था.
और एक दिन सुबह के शो में वह आइनॉक्स में दिखी. उसका ध्यान मेरी तरफ कतई नहीं था. एक लडक़े के कंधे पर सिर टिकाए, कमर में हाथ रखे. दोनों की अंगुलियां एक दूसरे में उलझी हुई थी. शायद बारहवीं में थी. स्कूल ड्रेस से ही मैंने अंदाजा लगाया कि वह क्लास बंक करके आई है. फिल्म थी ‘पहेली’ . वही शाहरुख फैक्टर, लेकिन यह लडक़ा कौन है. मुझे गुस्सा भी आया.
मैंने इरादतन प्रयास किया कि वह मुझे देख पाए. जहां वह अपने दोस्त के साथ खोयी हुई थी उसी के ठीक सामने पीने का पानी रखा था. मैं वहां पहुंचा और एक नजर अनभिज्ञता से उनकी तरफ घुमाई. आरुषि से मेरी नजरें मिलते ही उसका चेहरा उतर गया. जैसे उससे बड़ा अपराध हो गया. लडक़ा कुछ समझ ही नहीं पाया कि माजरा क्या है? आरुषि ने बुदबुदा कर कहा, ‘हमारे पड़ोसी हैं, मम्मी-पापा के जानकार.’ फिर रुक कर बोली, ‘मैं तो गई आज.’ उसकी घबराहट देखकर मैंने हल्की मुस्कराहट के साथ उसे आश्वस्त किया, ‘कैरी ऑन.’ फिर इशारे से बताया कि मैं थियेटर के अंदर जा रहा हूं. हालांकि मन ही मन उस लडक़े से भी मुझे जलन हुई. हालांकि वह हट्टा कट्टा खूबसूरत था. शाहरुख से थोड़ा कम, मुझसे थोड़ा ज्यादा. वह चल कर मुझ तक आई. लडक़ा पीछे पीछे था.
‘आप प्लीज, मॉम डैड से कुछ मत कहिएगा.’ मैंने आश्वस्त किया और पूछा, ‘तो शाहरुख के साथ तुम्हारा अफेयर खत्म हो गया मतलब?’ वह खिलखिलाकर हंसी, ‘अभी चल ही रहा है. इसीलिए तो उसकी फिल्म देखने आई हूं.’ ‘दो अफेयर एक साथ.’ इस बार लडक़ा भी मुस्कुराया. ‘आपको जलन हो रही है?’ उसने मुझ पर तंज किया. फिल्म आई गई हो गई और यह बात भी.
खबर थी गोवा में नवंबर में होने वाले अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल का उद्घाटन इस साल शाहरुख खान करेंगे. इस बात को लेकर अमिताभ बच्चन के प्रशंसकों और उनकी लॉबी ने केंद्र में सूचना प्रसारण मंत्रालय को निर्देश देने वाली केंद्र सरकार की तगड़ी आलोचना की थी कि बिग बी को निमंत्रण ही नहीं है और शाहरुख खान इतने बड़े कथित प्रतिष्ठित आयोजन में दीप जलाकर उद्घाटन करेंगे. मीडिया को जब कई दिन तक खबरें नहीं मिलती तो पहले दिन वे दो बड़े सितारों के बीच अनबन की खबर कुछ टूटे फूटे तथ्यों के साथ डालते हैं. एक दिन की उनकी इस मेहनत में एक हफ्ते का काम हो जाता है. खंडन, मंडन, आरोप, प्रत्यारोप के साथ मामला खिंच ही जाता है एक सप्ताह तक. इस समारोह में जाने के लिए मैंने ऑनलाइन मीडिया रजिस्ट्रेशन कराया. वैसे भी इसके कवरेज के लिए जाना ही था. मेरे लिए यह इवेंट एक बिजनेस प्रमोशन का हिस्सा भी था कि देश दुनिया के पत्रकारों से मिलकर अपनी साइट को थोड़ा और विस्तार देने की कोशिश करूंगा. गोवा की कला अकादमी में शाहरुख को शाम को पहुंचना था. मांडोवी नदी के किनारे बनी इस खूबसूरत और एक बड़े आडिटोरियम वाली अकादमी में उद्घाटन समारोह के पास सीमित लोगों के पास थे. मैंने पीआइबी के कुछ मित्रों से जोड़ तोड़ कर मैंने यह पास हासिल किया था. शाहरुख के आने की खबर मात्र से पूरा पणजी मांडोवी नदी के समांतर चलने वाली रोड पर जमा था. सुरक्षाकर्मियों को तगड़ी मशक्कत करनी पड़ रही थी. बिना पासधारियों को अकादमी परिसर में पैर रखने की भी मनाही थी. मैं मन ही मन खुद को वीआईपी समझने लगा था, जैसा कि पत्रकार होने के कारण आदमी में यह बोध आ ही जाता है. ठेले वालों की चांदी थी. शाहरुख के इंतजार में लोग पाव भाजी, रगड़ा पेटी, बड़ा पाव, आइस्क्रीम सब कुछ खा रहे थे. कई स्तर के सुरक्षा घेरे में हमारी जांच ऐसे चल रही थी, जैसे हम फेस्टिवल में नहीं आए हैं बल्कि शाहरुख को निपटाने की सुपारी लेकर गोवा आए हैं. एक आध महिलाएं सुरक्षाकर्मियों से इसलिए उलझ गई कि उनको गलती से पुरुष सुरक्षाकर्मियों ने छू दिया था. दिल्ली की एक महिलाओं और पुरुष प्रतिनिधियों का समूह जबरन ऑडिटोरियम में घुसने की कोशिश कर रहा था लेकिन उन्हें पास नहीं होने के कारण रोक दिया गया. उन्होंने वहां चिल्लाना शुरू कर दिया और शाहरुख का इंतजार कर रहा मीडिया उनकी तरफ लपक पड़ा. विरोध करने वाले समूह ने ऐलान किया कि वे गोवा से इस समारोह को हटाकर ही दम लेंगे. दिल्ली में आज तक किसी की हिम्मत नहीं हुई कि इस तरह बेइज्जत करके हमें बाहर निकाल दे. फिर लंबा सा जटिल सा अंग्रेजी का वाक्य बोला, क्योंकि हमारे गांव देहात कस्बों से आए सुरक्षाकर्मी बम और हमलों का मुकाबला करने का हौसला तो पूरा रखते हैं लेकिन अंग्रेजी बोलने वाले के आतंक का मुकाबला करना वे आज तक नहीं सीख पाए.
‘हू ब्लडी ऑल आर सिटिंग इन द ऑडिटोरियम. दिस फेस्टिवल इज नॉट फोर शाहरुख फैन्स. इट्स फोर सिनेगोर्स, फिल्म लवर्स.’
सारे सुरक्षाकर्मी इस अंग्रेजी बम से डर गए थे. वे ‘मैडम प्लीज, मैडम प्लीज’ का उद्बोधन करने लगे. अचानक अंदर से सुरक्षाकर्मियों का बड़ा अधिकारी बाहर आया और उसने उस मैडम से भी बेहतर अंग्रेजी में जवाब दिया. लोहा लोहे का काटता है. अंग्रेजी वाला ही अंग्रेजी वाले से निपट सकता है. मामला रफा दफा हो गया और शाहरुख की ब्लैक मर्सिडीज अकादमी कैम्पस में घुसी. पूरा मीडिया उस तरफ ऐसे दौड़ा जैसे दौड़ा, जैसे शाहरुख उनको अपने कर कमलों से गिफ्ट वाउचर बांटने वाला है. मेरे गले में भी मीडिया का पट्टा था. मुझे शाहरुख से कोई सवाल ही नहीं करना था. मैंने स्लैम बुक निकाली और शाहरुख की तरफ लपकता इससे पहले ही एक सुरक्षाकर्मी ने मुझे डंडा अड़ाकर रोक दिया. मैंने उसे अंग्रेजी के आतंक से डराने के लिए दिमाग में एक वाक्य बनाने की कोशिश की लेकिन संज्ञा, सर्वनाम और विशेषण का अनुवाद करने में ही इतना समय निकल गया कि वाक्य मेरी जुबान से बाहर आने से पहले शाहरुख ऑडिटोरियम में घुस गया. मुझे लगा जैसे आंखों के सामने आया शिकार चला गया. मैंने उम्मीद छोड़ दी कि इस सुरक्षा घेरे के बीच शाहरुख से ऑटोग्राफ लेना नामुमकिन है. पूरे उद्घाटन समारोह के दौरान मेरा मन शाहरुख के भाषण में नहीं लगा था. मैं मन ही मन आरुषि को सरप्राइज देना चाहता था कि मेरे पास उसके लिए शाहरुख का ऑटोग्राफ है. लेकिन अब कुछ संभव नहीं था. मैंने अपने आस-पास बैठे कुछ आयोजकों से बात की. पता चला, समारोह खत्म होते ही शाहरुख शाम की फ्लाइट से मुंबई निकल जाएगा. अजीब मुश्किल थी. लोग हंस रहे थे. तालियां बजा रहे थे. समारोह खत्म हुआ. ऑडिटोरियम के पीछे वाले गेट से शाहरुख सुरक्षा घेरे के बीच निकला. मैं मुख्य दरवाजे से बाहर भागा. घूमकर देखा तो वह मीडिया से बात कर रहा था. सारे चैनल वालों के माइक इस तरह मुंह के करीब थे कि कोई सिरफिरा तेज धक्का दे दे तो शाहरुख के सारे दांत माइकों के हमले के शिकार हो जाएं. मैं जब तक वहां पहुंचता वह हाथ हिलाता हुआ, काले शीशे वाली कार में बैठ गया. अपने आप पर इतना गुस्सा मुझे पहले क्यों नहीं आया? मैँ एक पढा लिखा आदमी. उल्लुओं की तरह अपने सारे काम काज छोडक़र गोवा आया हूं. एक ऑटोग्राफ लेने. जिससे ले रहा हूं, ना उसको पता है, जिसके लिए ले रहा हूं ना उसको इसकी गंभीरता पता है. मैं अपने आपको अपमानित भी महसूस कर रहा था कि एक लोकप्रिय सितारे के पीछे, जिसे मैं ज्यादा पसंद भी नहीं करता, मैं दीवानों की तरह घूम रहा है. आखिर किसलिए? चलो अच्छा हुआ, किसी को नहीं पता. वरना लोग मेरा मजाक वैसे ही उड़ाते जैसे प्लैटफार्म पर लोकल में लटके हुए मेरा पैर फंसने पर सारे लोग हंसे थे. आरुषि को मैं इतने सारे सच में थोड़ा झूठ का नमक मिर्च लगाकर यह भी कह सकता हूं कि मैंने शाहरुख को तुम्हारा सलाम कह दिया था और बदले में उसने भी उसे सलाम भेजा है. कौनसे आरुषि और शाहरुख एक दूसरे से पूछने वाले हैं? लेकिन फिर सोचा कि झूठ भी क्यों बोलूं ?
दूरदर्शन के लिए समारोह कवरेज करने आए राहुल से मेरा परिचय हुआ. उसने पूछा, क्या मैं शाम की पार्टी में चलूंगा? मैंने बताया कि मेरे को जानकारी ही नहीं है. उसने बताया, ‘गुरु, अपना रजिस्ट्रेशन वाला बैग को चैक करो, सारी पार्टीज के पास भरे हैं. गोवा आए हो तो क्या भजन करने. शराब, शबाब, ग्लैमर के मजे चलो. फेस्टिवल-वेस्टिवल तो सब चूतियापा है, बजट ठिकाने लगाने का. ’
सिडाड डे गोवा. एक फाइव स्टार होटल. अपनी पार्टियों के लिए मशहूर. आप पहली बार गोवा गए हैं तो महसूस करेंगे, शाम होते होते यह एलिस इन वंडरलैंड जैसा बन जाता है. घूमते हुए घाटीनुमा मार्ग में उतरते ही. होटल का मैन गेट. देश विदेश लोगों का जमावड़ा. भीतर घुसते ही मेहमाननवाजी की बनावटी मुस्कराहटें, जिन्हें आसानी से पहचाना जा सकता है. पीछे बने स्विमिंग पूल को पार करते हुए आगे चलें तो एक तरफ समंदर हिलोरें ले रहा है, दूसरी तरफ पूल साइड बने बार में कुछ हिप्पी अद्भुत नृत्य कर रहे हैं. देसी विदेशी जोड़े शराब पीने में मशगूल. तेज संगीत और समंदर की तेज लहरों की ध्वनियां आपस में मिलकर एक जादुई संसार की रचना कर रही थीं. थोड़ा आगे चले तो हमारे पास जांचकर हमें प्रवेश दिया गया. यहां भी सुरक्षा जांच हुई. हमारी फिल्मी पार्टी बीच साइड बने बड़े लॉन में थी. वाइन और बीयर की मेहमान नवाजी थी. गोवा का सी फूड आप स्नैक्स में खा सकते हैं. मैं ऐसी पार्टियों में मेरे शहर में जाता रहा हूं लेकिन गोवा की इस पार्टी में सिनेमाई ग्लैमर था. जो लोग पहले भी आ चुक थे उन्हें पता था कि चूंकि यह सरकारी समारोह है और पार्टी भी किसी प्राइवेट आदमी के नाम से दी जा रही है. सारे मीडिया की नजरें इस समारोह और पार्टी पर थीं लिहाजा नौ बजे तक ड्रिंक्स बंद कर दी जाएंगी. वे लोग कतार लगा कर खड़े थे. ऐसी पार्टियों में सारे संभ्रांत लोग शुरुआती तौर पर कतार में होते हैं. थोड़ा असर होते ही वे कतार तोड़ते हैं, फिर बार बॉय पर चिल्लाते हैं. वह इन सब का आदी होता है. अपनी गति से काम करता रहता है. शराब के नशे में एक समाजवाद होता है. तीन चार पैग लगा लेने के बाद पेज थ्री सेलिब्रिटी भी उसी तरह बार बॉय से शराब मांगता है जैसे बंद होती दुकान से एक दिनभर मजूरी करके आया मजदूर. मुझे वही डीडी वाले राहुल ने बता दिया था कि अपना कोटा पहले से कब्जे में कर लूं. ड्रिंक्स यहां बिना किसी घोषणा के अचानक बंद हो सकती हैं. मैं अपने दो मग बीयर लेकर चल रहा था. हर मेज पर ऐस्थेटिक्स से लेकर वल्र्ड सिनेमा की बातें. कहीं अपनी प्रोडक्शन कंपनी की खूबियां गिनाते लोग. अंग्रेजी झाड़ते, जुबानें लडख़ड़ाते लोग. मर्दों से मुंह चुराते, औरतों की तरफ घूर घूर कर देखते लोग. मुंह फाडक़र जोर जोर से हंसते लोग, मुंह पर हाथ रखे उबासी लेते लोग. अचानक इस पार्टी मे हलचल हुई. सबका ध्यान एक ही तरफ था. फुसफुसाहट थी कि शाहरुख खान पार्टी में है. शुरुआती फुसफुसाहट के बाद इस पेज थ्री पार्टी के लोगों शाहरुख से ज्यादा दिलचस्पी अपनी अपनी वाइन और बीयर में ली. मैंने गटागट गिलास खाली किया और अपनी पीठ पर लटके बैग से स्लैम बुक निकाली. डीडी वाले राहुल ने कहा चलो, अब शायद वह मीडिया से बात करे. लॉन के दूसरे हिस्से में शेखर कपूर और सुधीर मिश्रा भी थे. उन्हीं के बीच चर्चा करते हुए अपने सफेद सूट में शाहरुख. उन दिनों उसके लंबे बाल थे. पीछे चोटी बांध रखी थी. बीयर अपना असर कर रही थी. मैं उसके करीब पहुंचा. राहुल ने हम दोनों का परिचय पत्रकार के रूप में करवा कर ही दम लिया. शाहरुख से हमने हाथ मिलाया. मैं जिस आदमी को सहज भाव से ही पसंद करता था और उसके स्टारडम से आरुषि जितना प्रभावित नहीं था. इसके बावजूद उसकी गर्मजोशी का कायल था. मेरे लिए हालांकि यह अकल्पनीय था कि मैं भारत के सबसे बड़े सुपर स्टार के साथ खड़ा था. मैंने अपनी स्लैम बुक आगे बढाई और कहा,
‘आरुषि एक लडक़ी है जो आपको दस साल की उम्र से प्यार कर रही है. अब वह शायद अठारह की होने वाली है.’ शाहरुख मुस्कुराया. उसने स्लैम बुक अपने हाथ में ली. ‘वह छोटी थी तो उसे शक था कि उसकी मम्मी भी आपको प्यार करती थी.’ मैंने बताया. ‘अब तो उसका शक खत्म हुआ कि नहीं?’ शाहरुख ने पूछा ‘शायद हो गया, आजकल उसने शायद आपकी भी छुट्टी कर दी है. उसके बॉयफे्रंड को देखा है मैंने.’ ‘ओह, आय मिस्ड द अपॉर्चुनिटी.’ वह हंसने लगा. ‘लेकिन मेरी गर्लफ्रेंड की आप इतनी चिंता क्यों कर रहे हैं. इट्स नॉट गुड मिस्टर... ’ ‘निखिल’ मैंने उसे अपना नाम याद दिलाया. शाहरुख ने लिखा, ‘आय लव यू टू आरुषि, विद लव शाहरुख.’ स्लैम बुक मेरे पास थी. अब दस दिन तक फेस्टिवल में रुकने का कारण नहीं था. पिछले कई महीने से मैं अपने घर नहीं पहुंचा था. अब तो आरुषि के लिए मेरे पास सरप्राइज था. मैंने राहुल को कहा, बार में जाकर एक एक बीयर और पिएंगे. लौटकर आए तो मन हुआ बीच पर जाएंगे. गार्ड ने हमें रोक दिया. अव्वल तो हम नशे में थे. ऊपर से उसका तर्क था कि इतनी रात को सिर्फ फॉरेन टूरिस्ट ही बीच पर जा सकते हैं. पत्रकार को मुफ्त की शराब नहीं मिलनी चाहिए. दे ही रहे हो तो उस पर नजर रखनी चाहिए. नजर नहीं रख पाए तो शराब चढऩे के बाद ऊंच नीच, भेद भाव, देश विदेश, मानवाधिकार, मूलअधिकार जैसे बुनियादी प्रश्नों से उसे दूर रखने का प्रयास करना चाहिए. ऐसी शराब पीते ही वह राष्ट्रप्रेम में आकंठ डूबने को आतुर रहता है. यहां प्रश्न बड़ा था. राहुल ने अपनी जेब से व्हिस्की मिले हुए पानी की बोतल निकाल ली थी, जो पीआइबी के किसी दोस्त ने उसको इंतजाम रखने के लिए कहा था और वह आयोजन समेटने में व्यस्त हो गया. आ नहीं पाया. राहुल उसे गटागट पी गया. ऊपर से गार्ड ने उसे रोक दिया. उसने गार्ड को धक्का दिया. गाली दी. ‘भैनचो, देश हमारा, हम ‘बीच’ पर नहीं जाएंगे तो गोरे भी नहीं जाएंगे. गोरे जाएंगे तो पहले हम जाएंगे.’ उसका चिल्लाना बढता ही जा रहा था, ‘ये सब अफीम, हशीश,हेरोइन,स्मैक अपने माथे में चढाकर जाएंगे, हम दो पैग लगाकर नहीं जा सकते. गांधीजी यही दिन दिखाने के लिए इन लोगों से हमें आजाद किया था.’
राहुल की इस नवंबर क्रांति से होटल वाले सब बचाव की मुद्रा में समझाइश पर आ गए. उनका कहना था कि जाने की मनाही नहीं है, ड्रिंक्स के बाद जाने की मनाही है. लहरें रात को तेज हो जाती हैं. लेकिन अब कौन सुनता ? क्या कुछ कब तक चलता रहा. याद नहीं. सुबह आंख खुली तो होटल के कमरे में था मैं. बैग टटोला. सब कुछ सुरक्षित था. माथा भारी था. हैंग ओवर था शायद. राहुल होटल की लॉबी में टकराया. उसे तो कोई अपराधबोध भी नहीं था. शाम की फ्लाइट से मैं लौटा. घर पहुंचत हुए रात के बारह बज चुके थे. रास्ते में मिनरल वाटर का एक कैरट खरीद लिया था. आइस क्ूयब और सोडा भी. मुझे यकीन था, ह्विस्की घर पर मिल ही जाएगाी. कॉलोनी में लगभग सन्नाटा था. आवारा कुत्तों के भौंंकने की आवाजें, एसी की हल्की गरगराहटें, दूर कहीं जाती रेल का हॉर्न. सडक़ के गुजरती इक्की दुक्की मोटरसाइकिलें. मैंने देखा, सामने फ्लैट में अंधेरा था. सो गए शायद सब लोग. किचन में मिटटी की परत जमी थी. बैडरुम में बैडशीट मैंने हटाई. अलमारी से नई बैडशीट लगा दी. उमस सी महसूस हो रही थी. बाथरूम में शॉवर लिया. एसी ऑन किया. ह्विस्की का एक पैग अंदर जाते जाते सब कुछ हल्का हल्का लगने लगा.
सारी दुनिया घूम कर आ जाओ, जो आनंद घर पर बने ऑन द रॉक्स पैग में होता है, वह अलग ही सुकून देता है. खासकर तब जब पिछले इतने महीनों में पेज थ्री पार्टीज, नए क्लाइंट्स, नए शहरों में घूमते हुए बाहर पीने और खाने से बोर हो चुका था.
टीवी पर अतुल कसबेकर अर्धनग्न मॉडल्स के साथ यह बताने की कोशिश कर रहा था कि इस बार का किंगफिशर कैलेण्डर कैसे अलग होने वाला है. नई दुबली पतली कमरवाली लड़कियां मचल मचल कर पानी और कीचड़ में लौट रही थीं. मैंने चैनल बदला, विनोद दुआ लाइव का रिपीट टेलीकास्ट था. वो नेताओं को गरिया रहे थे. फिर चैनल बदला तो डिस्कवरी पर कुछ लोग एक चीते को फॉलो कर रहे थे. उनके बच्चे उनकी जीप में आकर बैठ गए थे. दोनों लोग सहमे हुए बैठे थे. अचानक चीते का शावक उनका मुंह चाटने लगा. यह ठीक लगा. मेरी आंखों में नशा तारी था. थकान थी. फ्लाइट में चिकन सैंडविच खाया था. कुछ और खाने का मन नहीं था. नींद आ गई. अजीब सा सपना था. रेल की पटरी पर दौड़ रहा था. दौड़ नहीं पा रहा था. रेल की सीटी सुनाई दे रही थी. यूं लग रहा था जैसे रेल काट ही जाएगी. हुआ क्या कुछ याद नहीं रहा. फ्लैट की बालकनी में कबूतरों की गुटर गूं सुनकर मैंने अपनी आंखें खोली. धूप खिली थी. मैंने बैग से स्लैम बुक निकाली. आरुषि को देने के लिए. लेकिन उसके घर पर ताला था. कहां गए होंगे इतनी सुबह सुबह. रात को भी थे कि नहीं. मकान पर लिखा था, फोर सेल. एक नंबर दिया था. वह पड़ोस वाले गुप्ताजी का था. गुप्ता जी का मुंह लटका था. उन्होंने बताया कि आरुषि ने आत्महत्या करने की कोशिश की. घर वाले कह रहे थे कि बारहवीं में नंबर कम आए इसलिए डिप्रेशन में थी. हालांकि यह घटना रिजल्ट आने के कई दिन बाद की है. कुछ लोग कहते हैं, उसका गर्भपात कराया गया था. वह घर से भाग गई थी. तीन महीने पहले. वो लडक़ा किसी आइपीएस अफसर का बेटा था. रातों रात पुलिस ने छानबीन की थी. चौथे दिन आरुषि वापस आ गई थी. पुलिस ने उन लोगों को बहुत परेशान किया. कोई बीस दिन पहले ही वे लोग यहां से चले गए हैं. ‘आरुषि तो जिंदा है ना अभी?’ मैं कभी भी सवाल पूछते हुए इतना नहीं डरा था. ‘हां, मां बाप और बेटी में झगड़ा हुआ था. उसी के बाद सुबह वो बेहोश मिली थी. नींद की गोलियां उसके पिता रोज खाते थे. उसने सब एक साथ खा लीं.’ ‘वे लोग गए कहां है?’ ‘मुझे पता है लेकिन मैंने वचन दिया है उनको कि किसी को नहीं बताउंगा. आखिर बच्ची की जिंदगी का सवाल है.’ मैं बोझिल मन से घर लौट आया. मेरी स्लैम बुक, मेरी सारी भागदौड़ बेकार थी. आरुषि ने कितना कुछ बर्दाश्त कर लिया. अब उसे इन मासूमियत भरी चीजों से क्या मतलब? तीन बरस बीत गए. मैं एक बिजनेसमैन हो गया. मुंबई रहने लगा. इस दौर में वेब जर्नलिज्म जोरों पर थी. मेरी साइट बॉलीवुड में जानी पहचानी हो गई. उसके बाद कितनी ही बार मैंने खुद फिल्मी सितारों के इंटरव्यू किए, किसी से कोई ऑटोग्राफ तक नहीं लिया. फेसबुक पर मेरे दोस्त और ट्विटर पर फॉलोअर्स की तादाद तेजी से बढ रही थी. तीस साल की उम्र में भी मैं लड़कियों के मामले में उतना ही शर्मीला था. फेसबुक पर फ्रेंड रिक्वेस्ट थी बटरफ्लाई नाम से. मैंने प्रोफाइल चैक किया. होम टाउन लंदन. फीमेल, 19 साल. लिविंग विद मॉम. शक हुआ यह आरुषि है. फिर शक हुआ आरुषि लंदन क्यों जाएगी?
मैंने रिक्वेस्ट कबूल की. लैपटॉप की स्क्रीन पर मैसेज डिस्प्ले हुआ ‘निखिल एंड बटरफ्लाई आर नाऊ फ्रेंड़स.’ उसका मैसेज था कि वह तीन दिन बाद मुंबई आ रही है. मुझसे मिलना चाहती है. मैंने घर का पता दिया. अंधेरी, वीरा देसाई रोड. सुबह मेरे घर की घंटी बजी. मैंने देखा, दरवाजे पर आरुषि खड़ी थी.
‘बटरफ्लाई?’ मैंने पूछा उसने मुस्कराते हुए सिर हिलाया. फिर लिपट गई मुझसे. मेरी आंखों में पानी भर आया. एक दिन वह अलग थी, आज तो एकदम बदली बदली कॉन्फिडेंट. लंदन का पानी असर कर गया शायद. उसकी आंखों में भी आंसू थे. ‘तुमको कितना ढूंढने की कोशिश की, एक तुम ही थे यार, जो मेरी बात समझते थे. कोई नहीं समझा आज तक.’ मैं चुप था. ‘पता है, उस हरामजादे ने धोखा दिया मेरे को. बाप की घुडक़ी से डर गया उल्लू का पट्ठा. बुजदिल साला.’ मैं फिर चुप था. ‘अबॉर्शन कराना पड़ा मेरे को. आत्महत्या करने की कोशिश की मैंने. तुम्हें कुछ नहीं पता.’ मैं चुपचाप सुन रहा था. समझ में नहीं आ रहा था कि क्या प्रतिक्रिया दूं? ‘तुमने मुझे ढूंढने की कोशिश भी नहीं की. पापा मर गए, मेरे ही दुख से दुखी होकर एक दिन हार्ट अटैक से.’ ‘पानी मिलेगा?’ मैंने इशारा किया किचन की तरफ. वह भीतर चली गई, वैसे ही जैसे पहले चली जाया करती थी. फ्रिज खोला, पानी की बोतल से दो घूंट लेकर बोली, ‘तुम्हारे फ्रिज में वही सब जमावड़ा है.?’ मैं बस थोड़ा सा मुस्कराया. ‘खाना अब भी होटल में खाते हो?’ मैंने हामी भरी. ‘किस मिट्टी के बने हो यार, इधर तो जिंदगी खराब हो गई, तुम्हारा पेट तक खराब नहीं हुआ.’ मुझे हंसी आ गई. वह थोड़ी नॉर्मल हो गई थी
मैंने कहा, ‘मेरे पास तुम्हारे लिए एक सरप्राइज है.’ उसने उत्सुकता दिखाई. मैंने आंखें बंद करने को कहा. वार्डरोब से स्लैमबुक निकाली. मैंने पेज खोला, उसने आंखें. ‘आइ लव यू टू आरुषि, विद लव शाहरुख.’ लिखा था. ‘एक बात बोलूं.’ उसने कहा. मैं उसकी तरफ देख रहा था. ‘मैं तुम्हारे लिए शाहरुख को भी मना कर सकती हंू.’ मैं कांप गया. भीतर तक हिल रहा था. मेरे भीतर एक तूफान भरा था. वह लिपट गई मुझसे. ‘सिर्फ तुम ही मुझे बचपन से समझते हो.’
मेरे भीतर के तूफान ने सब कुछ उथल पुथल कर दिय था. ख्वाबों की असंख्य तितलियां दिल के किसी कोने में सुरक्षित ठिकाना ढूंढ़ रही थीं. उसके टप टप बहते आंसुओं ने मेरा कंधा गीला कर दिया. मैं अब भी कांप रहा हूं कि उसे क्या जवाब दूं?

रामकौरी के मरते ही दादा ने सबसे पहले संदूक खोल डाली

Advertisement

Advertisement

()