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  • Ek kahani roz: pyar waala love aur holi by Maheshwar Dutt Sharma

तन्नू के दिल में 65 प्रतिशत प्रेम है, वर्ना वो चोरी-छुपे क्यों देखती?

एक कहानी रोज़ में पढ़िए 'प्यार वाला लव और होली' लिखा है, महेश्वर ने.

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12 मई 2016 (अपडेटेड: 12 मई 2016, 08:41 AM IST)
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होली का दिन है, मैं जो कुछ कहूंगा सच कहूंगा, गर झूठ कहना भी पड़ा तो उतना ही कहूंगा जितना मिसेज चावला अपने बालो में डाई लगाती हैं. अगर आप कहें तो मैं कसम भी खा सकता हूं, कसम खाना पड़े तो भी कह दूं कि कसम भी उन्हीं में से किसी एक की खा सकता हूं. जिनसे हमारी पहचान है जैसे मुहल्ले के मकान नम्बर जीएफ-11 की. यह जानने की कोशिश न कीजिएगा कि मैं उस मकान की कसम क्यों खा सकता हूं, जनाब मैं यह कतई नहीं बताऊंगा कि उस मकान में पुत्र की चाह में पैदा हो आये आठ से लेकर अट्ठाइस बरस तक की पांच बलाएं (आपकी इच्छा हो तो बालाएं कह सकते हैं) रहती हैं.

दासगुप्ता अपने ख्यालो में ही खोया था कि उसके पिछाड़े में दुबे की एक जोरदार लात पड़ी. 44 किलो का दासगुप्ता स्प्रिंग की तरह वाइव्रेट हो गया. याद करूं तो आज से 15 बरस पहलेवाले नोकिया 3310 मोबाइल के वाइव्रेशन मोड की तरह. लेकिन कोई बात नहीं दोस्तों के बीच ऐसा चलता है. दासगुप्ता ने खैर मनाई कि उसकी प्यारी तन्नू ने यह सब नहीं देखा. उसे पहली बार तन्नू के न होने पर खुशी हुई. दासगुप्ता सबकुछ सह सकता है अपनी गर्लफ्रेंड के सामने अपना अपमान नहीं.
पांडे ब्लैक टी लेकर आया तो बालकनी में हम ऐसे पीने लगे जैसे काली चाय नहीं रम पी रहे हों. कंगाली में बिना दूध के काली चाय शराब का भ्रम पैदा करती थी. कभी दूध न होना तो कभी दूध लाने का आलस हमें जाने-अनजाने में हाई-स्टैंडर्ड बना रहा है हमें तब पता चला जब ग्रीन टी और ब्लैक टी बड़े लोगों के स्टेटस में शामिल होने लगा. खैर!
दासगुप्ता यही सोचकर खुश हुआ जा रहा था कि दुबे अपना तौलिया ढूंढता हुआ आया. तौलिया अधनंगे दासगुप्ता के कन्धे पर टंगा था. दुबे का चिल्लाया बंगाली मेरे तौलिया को हाथ न लगाया कर, सड़े मछली खानेवाला कहीं का... वह बड़बड़ाये जा रहा था. दुबे हमारे ग्रुप का पुजारी था, उसके माथे पर अष्ठगन्ध का तिलक उसके शरीफ होने का सर्टीफिकेट था. पर हमें पता था उसके कमीनेपन के बारे में. हम जब सो जाते वो रात भर गुगल में रंगीन साइटों की तलाश करता, चोरी-छिपे हमारे तकिये के नीचे रखे डिवोनियर के पन्ने पलटते भी पकड़ा गया था. उसे हम कहते साले क्यों खुलकर नहीं जीता. पर वह लकीर का फकीर था, संस्कारों की बात से हमेशा हमें पकाता रहता.

मैं ही नहीं मेरे साथ रहनेवाले पांडे, दुबे, सिन्हा और बंगाली बोका दासगुप्ता तक जीएफ-11 के दीवानों में शामिल हैं. जलन तो तब होती है जब हमारे बाईं ओर की गुप्ता जी के मकान में रहनेवाले लड़के भी वहां तक जाने के बहाने निकालने लगे हैं. होली दिवाली में ही ऐसा संयोग बनता कि हम मुहल्ले के लोगों तक बड़ी आसानी से पहुंच सकते थे, अपनापन दिखा सकते थे उनके साथ त्योहार मना सकते थे, उनसे नजदिकी बढ़ा सकते थे. इस बार की होली में भी यही मिशन था हमारा. जीएफ-11 तक पहुंचना. जीएफ यानी गर्ल फ्रेंड्स; 11 यानी जब एक और एक मिले तो हम एक बनेंगे. प्रेम में एकाकार हो जाना ही प्रेम की सार्थकता है. होलीवाली सुबह. सुबह-सुबह 11 बजे (हमारा अर्ली मॉनिंग) जब पांडे की नींद खुली तो उसने देखा बालकनी में बंगाली दासगुप्ता सिर्फ निक्कर में खड़ा जीएफ-11 को उचक-उचक के देख रहा है, उसकी निगाह जरूर 3 नम्बरवाली 14 वर्षीय तन्नू को तलाश रही थी, वो थी की आधे घंटे होने को आये सामने आई ही नहीं. दासगुप्ता सोच रहा था कि न जाने क्या हो गया एक बार शक्ल ही दिखला जाती तो वह अपने दिनचर्या में लगता. उसकी मौलिक सोच थी की तन्नू की उम्र सही है प्रेम के लिए. इसी उम्र में प्रेम आदि करके फ्री हो जाना चाहिए और आगे अपनी पढ़ाई में मन लगाना चाहिए. आईएएस बनने का सपना लेकर आये इस बंगाली को जीवन में बहुत आगे जाना है. वह यह भी जानता था आज तन्नू भले ही उसे भाव न दे रही हो लेकिन जब वह आईएएस क्वालीफाई करेगा तो पहली मिठाई तन्नू को ही खिलाएगा. और फिर तन्नू भी उसे मना नहीं कर पाएगी, कौन लड़की पगली होगी जो एक आईएएस लड़के को अपना ब्वॉय फ्रेंड न बनाए? दुबे ने झांक कर देखा बगल वाले बिल्डिंग में रहनेवाला चश्मू जिसके बारे में दासगुप्ता का अनुमान था कि उसका चश्मा उससे अधिक नम्बर का है, वह मानता था जरूर माइनस फाइव होगा. चश्मू जब कभी भी तन्नू को ताकता दासगुप्ता उसे बंगला में गालियां देता. उसके दिल के कोने कोने में से आवाज आती की ‘तुम्हे कोई और देखे तो जलता है दिल, बड़ी मुश्किलों से फिर संभलता है दिल...’. नजरे टिकाये जीएफ-11 को ताक रहा है. इस बार हमारा टारगेट था चाहे कुछ हो जाए दासगुप्ता तन्नू को रंग जरूर लगायेगा. इसके इस काम में पांडे और दूबे भी मदद करेंगे. पांडे के हमारी मंडली का सबसे समझदार पढ़ा लिखा मानूस है जो हमेशा हमारी मुसीबत में काम आता है, वह हमारा फाइनेंसर से लेकर ट्रबलसूटर तक है. इसी ने पिछली दिवाली में हमपर एहसान किया था, पहली बार हुआ था जब हमने जीएफ-11 के साथ पटाखे छोड़े थे. पांडे ने ही जीएफ-11 के मालिक मिस्टर टोकस और दासगुप्ता के भावी ससुर जी को यह अहसास दिला दिया था की घर से मीलों दूर पढ़ने आये हम लड़कों का कौन है यहां, आप ही लोग तो हैं जिनके कारण तीज-त्योहार पर घरवालों की कमी महसूस नहीं होती. आज हम सब की निगाहें उस पर है, टारगेह मिस्टर टोकस और उनकी बेटियों के साथ होली खेलना है. दासगुप्ता ने पहले ही सोच रखा है मौक़ा मिलेगा तब भी तन्नू को काले जैसा कोई रंग नहीं लगाएगा. व उसकी सूरत को कभी सपने में भी खराब नहीं कर सकता. उसने पीले और लाल रंग को मिलाकर एक दूसरा रंग तैयार किया था, उसका मानना था कि यह रंग तन्नू पर खुबसूरत लगेगा और उसकी शक्ल भी खराब नहीं होगी. पर वह पांडे, दुबे और सिन्हा को कैसे मनाए? मैंने तो पहले ही सोच रखा था कि डार्क हरा रंग लगाकर तन्नू को सांवला बनाऊंगा. सांवली लड़कियां अधिक सेक्सी लगती हैं. मेरी एनालेसिस के आधार पर तन्नू में सबकुछ ठीक है पर उसका जरूरत से अधिक गोरापन उसके सुन्दरता को बाधित करता है. बोका दासगुप्ता को मैंने इस तर्क से मना लिया था कि बंगाल की सांवली लड़कियां कितनी कातिल लगती हैं. लम्बे बालों वाली बंगाली लड़कियों का कोई मुकाबला नहीं कर सकता. पर पांडे, दुबे और सिन्हा? लाख समझाने पर भी नहीं मानेंगे. इनको तो बस रंग लगाकर तन्नू की शक्ल बिगाड़ने की ही पड़ी है. ये दोस्त नहीं दुश्मन हैं. हमेशा मेरी बर्बादी के लिए उतावले रहते हैं. प्यारी तन्नू...उसका क्या? बोका बंगाली यही सोचता है कि तन्नू के दिल में भी 65 प्रतिशत प्रेम है उसके प्रति वरना वह चोरी-छुपे क्यों देखती है उसे. दासगुप्ता को यह लगता कि तन्नू आखिर है तो एक भारतीय लड़की ही, शर्म लिहाज उसका गहना होता है. और सबसे बड़ी बात यह कि हर जवान होती लड़की का बाप अमरीश पुरी और उसका भाई शक्ति कपूर! ये दोनों न तो फिल्मों में प्रेम को सफल होने देते हैं और न ही असल जीवन में. दासगुप्ता को मिस्टर टोकस ऐसे ही खड़ूस लगते. बच्चों के शोरगुल से मुहल्ले में होली के जवां होने का पता चलने लगा था. दासगुप्ता को बेसब्री से इन्तजार था की तन्नू की छूटकी टिकटिक बच्चों के साथ आ जाए तो वह भी उनके साथ होली खेलता खेलता उसके घर तक पहुंच जाए. उसने तो प्लानिंग तक बना रखा था कि वह जाते ही सबसे पहले अपने भावी सास-ससुर के पैरों पर रंग-गुलाल लगा कर आर्शिवाद लेगा. पर एक सप्ताह से जो पर्क-लेज उसने टिकटिक को खिलाया था उसका कोई असर होता नहीं दिख रहा था. टिकटिक बच्चों के साथ नीचे गली में होली खेल रही थी. दासगुप्ता की बेचैनी बढ़ती जा रही थी. उसने लाख कोशिश की कि बच्चे उसके पास आएं, रंग और पिचकारी का दिया गया लालच भी काम नहीं आ रहा था. बच्चे अपने आप में मस्त थे. घंटों बाद जब तन्नू एक बार बालकनी में मिस्टर टोकस का पायजामा डालने आई तो दासगुप्ता के चेहरे पर खुशी आ गई. वह गुब्बारे में रंग भरने लगा. उसे भरोसा था पायजामा फैलाने आई है तो टॉवल डालने भी जरूर आएगी उसकी प्यारी तन्नू. मेहरा साहब की बालकनी से जब लड़कियों की तेज शोरगुल आई तो हम सब अपनी बालकनी में भागे. हमें तो भागना ही था टिंकी की आवाज जो आई थी. टिंकी यानी दूसरे नम्बर की. पांडे की सपनों की रानी और हम सबकी भाभी. मेहरा जी की बालकनी जैसे फूलों के बाग में बदल गया. अचानक दर्जनों फूल खिल आये. भौंरे मंडराने लगे. उन्हीं के बीच एक काला कौवा दिखा. वह अनुज था, टिंकी का बॉय फ्रेंड.... उसने जेब से रंग निकाला और तन्नू की तरफ भागा, वह भी दौड़ी. हम उनका दौड़ना भागना देखते रहे. दासगुप्ता की नसे ढीली होती जा रही थीं.... दुब्बे ने देखो अनुजवा को अपनी साली को रंग लगाने जा रहा है. मैंने भी हां में हां मिलाते कहा, पकड़ साली को.... दासगुप्ता रूंआसा हो गया. बोला नमक हरामों मेरी दुनिया लुट रही है तुम लोग खुश हो रहे हो.... तुम्हारा मनीऑडर न आये तो आना बताऊंगा. मुझे तो 440 का झटका लगा. याद आया कई बार घर से पैसे न आने पर दासगुप्ता ने ही मदद की है. मैंने माफी मांगते हुए कहा- आई‘म सॉरी. पांडे कहा-आई’म धोती. सभी का ठहाका. सामने अनुज ने तन्नू को लगभग जकड़ ही लिया था. एक दूसरे को रंग लगाने की कोशिश में पकड़ा-पकड़ी जारी थी. उसे बचाने के चक्कर में टिन्नी भी उलझी पड़ी थी. हब निःसहाय सब देखने को मजबूर थे. दासगुप्ता और दुबे की दुनिया विरान हो रही थी. अनुज मजे ले रहा था इधर इनके सीने पर सांप लोट रहा था. पांडे बोला ओह...भाभी.... दासगुप्ता ने धीरे से कहा पांडे अब वो तेरी भाभी नहीं रही. तब तक अनुज तन्नू को रंगने में कामयाब हो गया था. वही हुआ जिसका डर था. तन्नू काले रंग में भूत की लग रही थी. हद से ज्यादा गोरी तन्नू काली भूतनी बन गयी थी. दास गुप्ता चिल्लाया... नहीं.... मुझे याद आया सत्यम् शिवम् सुन्दरम् में जीनत के जले चेहरे को देखकर शशि कपूर की भी ऐसे ही चीख निकली थी. दासगुप्ता बोला लड़किया होती ही हैं बेवफा. उसने रंग से भरे गुब्बारे जो तन्नू के ऊपर फेंकने के लिए बनाये थे उसे गली के बच्चों को देते हुए कहा... जब दिल ही टूट गया, रंग से क्या करेगे. और बालकनी के पर्दे को खींच दिया.

सलीम की अनारकली, जो बिना मदद लिए शुक्रिया अदा कर देती

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