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"मेरे प्रेम को समझ नहीं पाई. छोटी जात की थी न. और ये छोटी जात किसी की सगी नहीं होती."

एक कहानी रोज़ में आज पढ़िए पुनर्वसु की कहानी.

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4 जुलाई 2017 (अपडेटेड: 4 जुलाई 2017, 11:08 AM IST)
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दरवाज़ा बंद कर लो बाबूजी - पुनर्वसु

इस रास्ते से जाऊंगा तो गिर सकता हूं. कई गड्ढे हैं इस रास्ते में. मुझे पता है मैं अनुभवी हूं. रास्ते का मामला हो या ज़िन्दगी का, मैं अनुभवी हूं. अपनी तमाम उम्र मैं गिरता-सम्भलता रहा हूं. हर गड्ढे की अलग तकलीफ़, अलग दर्द, अलग मज़ा रहा है. अब मेरी दाढ़ी के बाल सफ़ेद हो गए हैं. अब हर बाल एक कहानी सुनाता है. कहानी एक गड्ढे की. अब किसी मनपसंद गड्ढे को खोजता हूं. और जान बूझकर उसमें गिर जाता हूं. कुछ पुराने ज़ख़्म ताज़ा हो जाते हैं. कुछ क़िस्से जो कभी पुराने नहीं हुए थे याद आ जाते हैं. कभी डरा जाते हैं तो कभी बस गाली दे के चले जाते हैं! पर यूं अच्छा नहीं लगता की ख़ुद से चुनूं गड्ढों को. इसमें वो मज़ा नहीं है जो अनायास आए गड्ढे में होता है. पैर अचानक फिसलता है और मोच आ जाती है और मिलता है जीवन भर का अनुभव. 'अनुभव' मनुष्य जीवन की हार है. ये वाक्य मेरा नहीं है. लेकिन मेरी कहानी में सटीक बैठता है! अब किसी नए ज़ोखिम का आनंद नहीं ले सकता. क्यूंकि मेरे पास अनुभव है! साला अनुभव! आपकी नज़र में उपलब्धि, मेरी नज़र में हार. अब अपने जीवन में आई किसी भी पासी महिला को ठीक नज़र से नहीं देख सकता मैं. एक घृणा है अंदर. छूत-अछूत नहीं था कभी मन में पर अब अपने आपको पंडित कहलाने का मौक़ा नहीं छोड़ता. बड़ी जात, छोटी जात. कहानी सुनाता हूं. इस गड्ढे की. गड्ढे की जात की. देखिए ये छोटी जात किसी की सगी नहीं होती! मैं अकेला रहता हूं इस बड़े से घर में. या कोई और भी रहता है मेरे साथ. हां! मेरी तन्हाई! फ़िल्मी डायलॉग! नहीं लेकिन सच भी है. मेरी तन्हाई. जो मुझे और उस हरामिन को महसूस होती थी! उसका नाम कमला भारती था. चमाइन थी. नहीं, बल्कि पासी थी साली! क्या फ़र्क़ पड़ता है. एक ही होते हैं सब साले. ख़ैर इस बात को मैं थोड़ा विस्तार दूं, इससे पहले थोड़ा अपने बारे में बता दूं. मैं एक शांती प्रिय इंसान हूं. नाम है 'भगवतीदास तिवारी'. मुझे अपनी दूसरी बीवी को खोए पच्चीस साल हो गए और पहली को खोए तेइस! मेरी दोनों ही बीवीयों ने आत्महत्या की थी. राम जाने क्यूं? मेरी कुंडली में ही स्त्री का सुख नहीं लिखा है. अकेला था. अकेला हूं! मेरी दोनों ही पत्नियों के स्वर्गवासी हो जाने के बाद मैंने कमला को घर के कामकाज के लिए रख लिया था. कमला रही होगी कुछ बीस एक साल की. सांवली सी. आंखें ख़ूबसूरत थी उसकी. एकदम पंडित लड़कियों की तरह! वो सुबह झाड़ू पोछा करने आती. बरतन भी. दिन में आके खाना बना जाती और शाम को भी आके चौका बरतन कर जाती. कमला और मेरे बीच के सम्वाद सिर्फ़ इतने थे, "दरवाज़ा बंद कर लो बाबूजी." मैं उसकी ओर ज़्यादा ध्यान भी नहीं देता था. वो सुबह मेरे और अपने लिए अदरक वाली चाय बनाती थी. जिसमें तुलसी मैं अपने हाथ से तोड़ कर डालता था. लेकिन, धीरे-धीरे वो भी मेरा अकेलापन समझने लगी थी. शायद मैं धीरे-धीरे उसकी तरफ़ आकर्षित हो रहा था! कमला आज सुबह चाय देने के बाद झाड़ू-पोछा कर रही थी. अभी उसने पलंग की चादर उठाकर नीचे से कूड़ा लेना शुरू किया था कि उसके झुकने के कारण उसकी छाती साफ़ दिख रही थी. मुझे ना जाने क्या हो गया था. मैं जल रहा था और अगले ही दिन से मैं उसकी तरफ़ ज़्यादा आकर्षित होने लगा. वो बरतन मंज रही है और मैं उसकी पीठ देख रहा हूं. कमला अचानक मुड़ी. "कुछ चाहिए बाबूजी?" "कुछ नहीं. ये कप रख लो बेसिन में." पंडित आदमी झट से बात न बना ले तो काहे का पंडित? मैं मुस्कुरा कर वापस पलंग पे बैठ गया. मैं भगवतीदास तिवारी, कमला भारती पासी की ओर आकर्षित हो रहा हूं. और अब मन में उच्च कोटि के विचार तैर रहे हैं! "ये जात-पात कुछ नहीं होता. छी-छी-छी. सभी एक ही ईश्वर की संताने हैं. क्या पंडित, क्या पासी. अरे ख़ून तो सबका लाल ही होता है. कल से तुलसी के पौधे से कमला ही तोड़ेगी पत्ती. मैं उसे मना नहीं करूंगा. और क्यूं करूं मना? मैं और कमला अलग थोड़ी हैं." धीरे धीरे दिन बीतते गए. मैं रोज़ाना पलंग पर बैठकर कमला के चादर उठाने का इंतज़ार करता हूं. रोज़ उसकी पीठ और छाती मुझे जला कर रख देती है. मैं धीरे-धीरे जलता हूं और धीरे-धीरे मेरे अंदर का जानवर बड़ा होता जाता है और उसी तरह मेरे मन के विचार उच्च उत्कृष्ट और उत्कृष्टतम होते गए! आज सुबह जब मुझे कमला ने चाय दी तो उसका हाथ मुझे ऐसे छू कर गया जैसे वो भी मुझे पसंद करती है. लेकिन अब उसका मुझे बाबूजी कहना मेरे अंदर खीज भर देता है. मैं कुलबुला जाता हूं. लगता है जैसे कोई नाखूनों को रगड़ रहा हो ब्लैक बोर्ड पे. आज शाम को जब वो बरतन मंज रही थी तो मैंने उसे पीछे से पकड़ लिया. कस कर उसे अपनी बाहों में भर लिया! वो चीख़ कर ज़मीन पर बैठ गयी और मुझे एक टक देखने लगी. अब वो सुंदर नहीं बल्कि मासूम लग रही थी. उसका मुझे इस तरह देखना मुझे अच्छा नहीं लग रहा था. मैं उसकी आंखों में ख़ुद को नंगा महसूस कर रहा था. वो अब भी वैसे ही विस्मय से मुझे देख रही थी. मैं उससे नज़रें नहीं मिला पा रहा था. मैंने उसे खींचकर चांटा मारा और वहां की घुटन भरी ख़ामोशी को तोड़ा. "साली डायन! निकल जा मेरे घर से" मैं कांप रहा था. मेरा थप्पड़ इतना तेज़ था कि मेरे हाथ में अब तक दर्द हो रहा था. लेकिन वो न रोई. न चीख़ी. बस उठी. दरवाज़े तक गई, मुझे देखा और हिक़ारत भरी हंसी के साथ उसने कहा, "दरवाज़ा बंद कर लो बाबूजी!" कानों में जैसे ज़ोर की सीटी बजने लगी. उसके उस वाक्य के बाद बहुत देर तक कुछ सुनाई नहीं दिया. बस कानों में सीटी बजती रही. बहुत देर तक. मैं घंटों पलंग पे बैठा रहा और फिर बोला, "मेरे प्रेम को समझ नहीं पाई. आख़िर छोटी जात की थी न. और ये छोटी जात किसी की सगी नहीं होती." मैंने अपने आपको संतुष्ट कर लिया कि मैं ग़लत नहीं था. और अब मैं अपनी कुंडली को दोष दे रहा हूं. मेरे जीवन में स्त्री का सुख ही नहीं है - "अकेला था. अकेला हूं"

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