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मंत्रीजी सुसाइड की पुलिस से जांच कराना चाहते हैं, हम मर्डर की सीबीआई जांच चाहते हैं

एक कहानी रोज़ में आज पढ़िए प्रतिभा की कहानी 'पुनर्जन्म'

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1 जुलाई 2016 (अपडेटेड: 1 जुलाई 2016, 03:17 PM IST)
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प्रतिभा जी के दो कहानी संग्रह आ चुके हैं. 'तीसरा स्वर' और 'अभयदान' उन्हें "तीसरा स्वर" पर हरियाणा साहित्य अकादमी की ओर से फर्स्ट प्राइज भी मिला.
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मैं कुछ समझ नहीं पा रही हूं. ये सन्नाटा कभी गहरी धुंध बनकर मुझे घेर लेता है. और मैं आंखें फाड़-फाड़कर देखने की कोशिश करने पर भी कुछ देख नहीं पाती हूं. कभी कीचड़ की तरह छितर कर मेरे पैरों से लिबड़ जाता है और मेरे लिए एक कदम भी चलना मुश्किल. कभी अंधेरी गुफ़ा बनकर मुझे लीलने के लिए मुंह फाड़े धीरे-धीरे आगे बढ़ता नज़र आने लगता है. और मैं घबराकर आंखें बंद कर लेती हूं. और कभी ये मुझे उड़ाकर ले जाता है और सृष्टि के अंतिम छोर पर ले जाकर खड़ा कर देता है. जहां कोई नहीं होता, न कोई इंसान. न कोई जानवर.
मैं एकाएक सोचने लगती हूं ये सन्नाटा भीतर है या बाहर. या दोनों जगह फिर लगता है, नहीं भीतर नहीं है. शायद बाहर ही है. भीतर कैसे हो सकता है? भीतर तो शोर है, भीषण शोर उस कमरे का गूंजता शोर, जिसमें तुम्हारी लाश पंखे से लटकी मिली. तुम्हारी खुली आंखों से बहती शोर की नदी उसी समय मेरे भीतर प्रवेश कर गई थी. तुम्हें घर में अकेला पाकर उन्होंने तुम्हें मारकर पंखे से लटका दिया और झूठा प्रचार किया कि तुमने आत्महत्या की है. पर मैं जानती हूं तुम आत्महत्या नहीं कर सकते.
पंखे से लटके-लटके तुम्हारी लाश ने तुम्हारे शब्दों को एक शोर में तब्दील कर दिया था. वो शोर उस कमरे से निकलकर पूरे गांव में फैल गया है. वो किसानों के जुलूसों में, स्वयंसेवी संस्थाओं के आन्दोलन में, मीडिया की कवरेज में, पत्रकारों की रिपोर्टों में, एक मज़बूत आवाज़ की शक्ल अख्तियार करता जा रहा है. सब ओर आवाज़ें ही आवाज़ें हैं. स्थगित कर दिए गए जीवन की आवाज़. खंडित होते विश्वास की आवाज़. कांच की किरचों की तरह बिखरे भविष्य की आवाज़. आहत होते सत्य की आवाज़. स्वाह होते हवन की आवाज़. और ये सारी आवाज़ें अपने आप में सवाल भी हैं और जवाब भी.
वेट,वेट,वेट. बाकी कहानी रुक के पढ़िएगा. सुनिए. कहानी पढेंगे बस? भेजेगा कौन? इनने भेजी थी. हमने इनकी कहानी लगाईं. आप भी भेज डालिए. thelallantopmail@gmail.com

  मैं बालकनी से कमरे में आ जाती हूं पीछे-पीछे तुम भी आ जाते हो तुम्हारे चेहरे पर अंकित चिंता की रेखाएं तुम्हारे हंसमुख चेहरे से मेल नहीं खा रही थीं. अटपटी सी लग रही थीं, बहुत मुश्किल से तुम कह पा रहे थे, ''किसी गरीब की ज़मीन हड़प कर कोई अमीर क्यों बनना चाहता है, हिम्मत है तो मेहनत करके अमीर बनें, कौन रोकता है?'' तुम्हारे हर शब्द से प्रवाहित होती, तुम्हारी सच्चाई तुम्हारे पूरे व्यक्तित्व को महीन, चमकीले और शक्तिशाली आशीर्वादों से आच्छादित करती जा रही थी.
मैं तुम्हारे चेहरे पर आते-जाते आक्रोश के बादलों को तुम्हारी आंखों से दिल तक की यात्रा करते देखती रही और तुम्हारी तकलीफ़ को महसूसती रही.
मैं चाहती थी तुम्हें कहूं एक ब्रेक ले लो चलो, पहाड़ों पर चले चलें. इन सब समस्याओं, चिंताओं से दूर तुम्हें देवदार बहुत पसंद हैं न. नहीं तो कोणार्क देख आते हैं. उसमें भी तो तुम सब भूल जाते हो. अब लग रहा है तुम्हें ले ही जाती कुदरत तुम्हें अपनी बाहों में छिपा लेती और ये दुष्ट तुम्हें ढूंढ ही नहीं पाते. पल भर में तुम आंखें बंद कर लंबी सांसें भरते दिखे. अपनी श्वास से तनाव को नियंत्रित करते डीप ब्रीदिंग ऐसे में हमेशा तुम्हारा हथियार रहा है. अपने ही भीतर अपने शक्ति स्रोतों के आगे एकाएक उभर आए व्यवधानों के पहाड़ हमेशा से तुम इसी तरह हटाते रहे हो और फिर ऊर्जा संचित कर उठ खड़े होते रहे हो. मैं हमेशा की तरह मोहित होकर बस तुम्हें देखती भर रहती हूं. लगातार, लगातार, लगातार. लेकिन इस बार तुम्हारी सिटिंग बड़ी लंबी थी. शायद तनाव का विस्तार ज़्यादा था या तुम्हें तैयारी ज़्यादा करनी थी. आंखें खोलने के बाद भी तुम संयत नहीं हो पाए थे. असंयत भाव से ही बोले थे तुम, "कहते हैं हम जो कर रहे हैं करने दो, गरीबों की भूमि हड़पने दो, कर चोरी करने दो नहीं तो जान से हाथ धो बैठोगे चाहते हैं. मैं पूर्व अधिकारियों की तरह उनकी मदद करूं वरना हटा दिया जाऊंगा कितनी बार तबादला करवाएंगे?" मैं तुम्हारे चेहरे पर उभरते विरोध की गरम हवा की तपिश को महसूस कर रही थी डर का एक छोटा सा अंकुर मेरे भीतर फूटा था पर मैंने तुम्हें कुछ नहीं कहा था. मैं हमेशा तुम्हें भ्रष्टाचार के बॉर्डर पर तैनात जवान के रूप में ही देखती आई हूं. कई बार डरती भी हूं फिर एकाएक अपने आप को एक सैनिक की पत्नी के रूप में देखकर डर को लपेट कर एक कोने में रख देती हूं हमेशा से चाहती रही हूं अपने भीतर का सारा बल तुम में उड़ेलती रहूं. बस एक ही बात परेशान करती है. मुझे बचपन से सत्य की असीम शक्ति के जिस विश्वास का महल मैंने भीतर खड़ा किया था. उसे खंडहर होते देखना अति कष्टदायक है. इस टूटन ने मुझे जैसे ध्वस्त कर दिया है. मैं पूरी तरह से बिखरा हुआ महसूस करती हूं. ऐसे हर अवसर पर मैं उसी पंखे के नीचे जाकर खड़ी हो जाती हूं. तुम उस शोर को चीरते हुए निकल आते हो. अपने सीने पर सिर रखकर मुझे रोने देते हो तब तक रोने देते हो जब तक ये बिखराव आंखों के रास्ते बह नहीं जाता. तुम सत्य से विश्वास के अमृत का एक प्याला उधार मांगते हो और एक एक बूंद मेरे भीतर उतार देते हो. मैं जी उठती हूं, तुम धीरे से मुझे अपने सीने से अलग करते हो और अदृश्य हो जाते हो.
याद है मुझे तुमने प्रशासनिक सेवा 2008 की परीक्षा में पूरे भारत में बारहवां स्थान प्राप्त किया था. और जब तुम अकादमी में दो साल की ट्रेनिंग पूरी करके आए थे तो तुम्हारी आंखों में एक सपना था. और वो सपना हर पल तुम्हारे भीतर एक ऐसे जज़्बे का निर्माण करता था कि तुम सब जीर्ण-शीर्ण ढहा कर नवनिर्माण में जुट जाते थे.
तुमने गरीब किसानों के हित में अनेक कार्यक्रम किए, उनका उनकी ताकत से परिचय कराया, उनके लिए शक्ति दूत बनकर आए. बस इसी समय तुम आंख की किरकिरी होने लगे तुम्हारा तबादला हुआ. तुम रुके नहीं तुम्हारा फिर तबादला हुआ यह सिलसिला चलता रहा. पर तुम तो एक जवान थे. अपनी ड्यूटी पर तैनात तुम्हें तो रक्षा करनी थी. तुम घुसपैठ कैसे करने दे सकते थे? तुमने मंत्री जी की तिजोरी तक पहुंचने वाले रास्ते में अवरोध उत्पन्न किया था. उन्होंने प्यार से तुम्हें समझाने की कोशिश की थी पर तुम तो अपनी ड्यूटी पर तैनात एक जवान थे. उनके बताए रास्ते पर नहीं चल सकते थे. वे बौखला उठे और तुम्हें यूं पंखे से लटका गए. मैं आज भी स्तब्ध हूं तुम लटकी हुई लाश नहीं थे. तुम तो सदा से आवाज़ ही थे. वही रहोगे. पूरे गांव के किसान तड़प उठे हैं. असहायता उनके पूरे वजूद पर तारी रहती है. गांव की हर मां ने तुम्हारे रूप में अपना पुत्र खोया है और हर युवा खाली कोटरों जैसी आंखें लिए इधर-उधर डोलता नज़र आता है. अब तो गांव वालों का जीवन हस्तक्षेप का चरम बनकर रह गया है हवाएं भी प्रतिकूल प्रतीत होती हैं. कभी-कभी उस कमरे से शोर की प्रतिध्वनि निकलती है और धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगती है घर से निकल कर पूरे गांव में फैल जाती है और फिर खेतों की ओर बढ़ने लगती है. खेतों की बाडों को तोड़ कर पगडंडी पर साधिकार चलती जाती है. उसकी चाल धीमी होने लगती है. एकाएक वह पगडंडी के दाईं ओर गहरे कुएं की मुंडेर पर जाकर खड़ी हो जाती है फिर सरकने लगती है. कुएं के भीतर गहरे पानी में उतरने लगती है. तुम भागते हुए आते दिखाई देते हो हांफते-हांफते ही घड़ी भर मुझे देखते हो और फिर उस कुएं में उतर जाते हो. उसे गहरे पानी में विलीन नहीं होने देते. क्षण भर बाद ही उस प्रतिध्वनि की सुंदर चमकीली सीपियां हाथ में लिए तुम मेरे सामने प्रकट हो जाते हो. विजयी मुस्कान सब ओर फैल जाती है. तुम मुझे अपनी बांहों में भर लेते हो फिर चुपचाप बड़े प्यार से एक सीपी मेरी कोख से चिपका देते हो, शेष बची सीपियां उस खेत में लहलहाती सरसों की फ़सल पर चिपका देते हो. चहुंओर सीपियों की फ़सल चमक उठती है. तुम्हारी आंखों की कोरों में संतुष्टि का सागर लहराने लगता है. तुम प्यार से मेरी गाल थपथपाते हो और चले जाते हो. एक बात और, मां पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो चुकी है. वह एक-एक तवे से उतरी गरम-गरम चपाती लिए घर भर में तुम्हें ढूंढती रहती है. तुम्हें पुकारती है तुम कहीं नहीं मिलते फिर विधवा कुम्हारिन के बेटे प्रताप को खिला कर आ जाती हैं. मां की रोती आंखों को सारे चैनलों ने खूब दिखाया है. तुम्हारी जघन्य और निर्मम हत्या को आत्महत्या कहकर प्रचारित करने का विरोध किया है. पर अब जाने क्यों एकाएक सबको सांप सूंघने लगा है. मंत्री जी पुलिस द्वारा सारे केस की जांच करवाना चाहते हैं जबकि हम सीबीआई से जांच चाहते हैं. कोई हमारी मदद नहीं कर रहा है. कुछ समय तक सब जोश में थे अब धीरे धीरे सबका जोश ठंडा पड़ने लगा है. पिताजी बस लगातार न्याय के लिए भटकते रहते हैं. इस अन्याय के खिलाफ निरंतर आवाज़ उठाने के आश्वासन अब झूठे वादे प्रतीत होने लगे हैं. मीडिया और स्वयंसेवी संस्थाएं अब बचती प्रतीत होती हैं या शायद उनके लिए अब ये पुरानी खबर हो गई है.
कहीं ठीक पढ़ा था मैंने कि किसी भी खबर की उम्र टीवी और अखबार में ज्यादा से ज्यादा एक सप्ताह होती है. पत्रिका में एक माह फेसबुक पर झलक भर. लेकिन उस परिवार के लिए जनम भर.
तुम अब भी बालकनी से अंदर तक मेरे साथ ही आते हो. बार- बार मुझे कहते हो जवान की शहादत शोक का सबब नहीं होती. यही शहादतें दुश्मनों के कफ़न का कपड़ा बुनती हैं. तुम लगातार मेरे पीछे-पीछे चलते हुए बोलते रहते हो. पर मैं तुम्हारे इस कथन को आत्मसात नहीं कर पाती हूं. हां लेकिन कोई है जो इस कथन को सुनता भी है, गुनता भी है और तुम्हारी इच्छानुसार आत्मसात भी करता है. वो कोई और नहीं तुम ही हो. तुम्हीं हो मेरे भीतर छ: महीने की नन्ही सी उम्र में तुमने जीवन के सबसे बड़े सत्य को अपनी आत्मा में उतार लिया है. मैंने तुम्हारी सुरक्षा की कसम ली है. इस दुनिया में कोई भी तुम तक नहीं पहुंच पाएगा. निश्चित अवधि के बाद तुम बाहर आओगे. फिर से सीमा पर तैनात हो जाओगे. वो लोग आंखें फाड़े देखते रहेंगे तुम्हारे पुनर्जन्म के रहस्य को नहीं समझ पाएंगे. तुम एक देवदूत की शक्ल अख्तियार कर लोगे. तुम्हारी अपार असीम शक्तियों के आगे वे बौने प्रतीत होंगे वो फिर बौखला उठेंगे. पर इस बार तुम सचेत होगे वो तुम्हें पंखे पर नहीं लटका पाएंगे. तुम फिर से उनकी तिजोरियों के रास्ते में अवरोध उत्पन्न करोगे पर इस बार वे समझ नहीं पाएंगे क्या करें क्योंकि वो तुम्हें नहीं पहचान पाएंगे.
एक कहानी रोज़ में कल पाने पढी थी कहानी, कहानी कौन सी.  गुआड़ी की कविता कभी मां बनना चाहती थी, कभी बुआ, कभी मैडम

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