वापसी प्रकृति करगेती--------------------------------------------------------------------------------उसने कब्रिस्तान का चरमराता, हांफता गेट खोला, और बाहर निकल गया. घर ज़रा दूर था.बहुत समय बाद चलने का मौका मिल रहा था. एकांतवास जैसे उस छोटे से कस्बे में बिनागाड़ी के लम्बे-लम्बे रास्ते यूं ही चल कर काटे थे. ऐसा करते उसकी ज़िन्दगी बीती थी.पर इतने लम्बे समय तक लेटकर वो ऊब चुका था. इसलिए चलकर ही घर जाना पसंद किया. घर कागेट दुरुस्त था. उसका लोहा अपनी जवानी में था. तंदुरुस्त आवाज़ करते हुए गेट खुला तोवो अन्दर चला गया. आंगन से दरवाज़े तक का रास्ता नापते, भौंकती हुयी ‘डिम्पी’ को ज़रापुचकारा. डिम्पी दुम दिलाती, दूर खड़ी बस भौंकती रही. अब दरवाज़ा खटखटाना था.खटखटाया. डोर-बेल बजाई. दरवाज़ा खुला. उसे दरवाज़ा खोलने वाले की बेहोशी अपेक्षित थी.पर मिली बस ख़ामोशी. ख़ामोशी जितनी लम्बी हो सकती थी, उतनी रही. ‘अन्दर आओ’ ये कहकरउसकी लम्बाई काटी गयी. सैवियो ,मार्गरेट से ये पूछे बिना नहीं रह पाया “तुम्हेंहैरानी नहीं हुई ?” सोफ़े पर बैठते हुए जवाब आया “ में सपनों में हैरान नहीं होती.सपना है. टूट जाएगा. और ये सपना तो बहुत बार आया है.” सैवियो ने बात साफ़ करने कीकोशिश करी “ ये सपना नहीं है. हकीकत है. मैं जिंदा हो गया हूं.” मार्गरेट हंस दी.सैवियो आहत आवाज़ में बोला “ ईशु के रेसरेक्शन पर तो तुम्हें विश्वास है बड़ा!”मार्गरेट नींद खुलने की उम्मीद में खुद को चिकोटी काटती चुप-चाप उठकर रसोईघर मेंचली गयी. उसकी नींद जैसे अभी भी न खुली हो. इस बीच सैवियो ने घर पर गौर किया. कुछख़ास नहीं बदला था, पर ये साफ़ था कि बदलना शुरू हो गया था. दीवारें पहले जैसी पीलीही थी. पर सोफ़े के सामने की दीवार पर एक नई पेंटिंग लगी हुई थी. सैवियो ने हड़बड़ातेहुए अपनी तस्वीर भी खोजी. हां, एक कोने पर वो भी लगी हुई थी. उसने ख़ुद को इतना गौरसे शीशे मेँ भी कभी नहीं देखा होगा. 60 साल से ज़्यादा जवान तस्वीर थी. वो तस्वीर काभविष्य था, जो तस्वीर के सामने आ खड़ा हुआ था, या तस्वीर उसका भूतकाल जो उसके सामनेआया था ? वो समझ नहीं पाया. इसी उधेड़बुन में घबराकर उसने आसपास देखा. गौर किया किघर भी थोड़ा-थोड़ा बदल रहा था. आज घर को देखना उसके लिए बचपन के न्यूजपेपर वाले'स्पॉट द डिफरेंस', खेल जैसा था. उसकी याद का पहले का वो बैठक और आज का बैठक, दोनोंसामने आए. और वो खोजने लगा कि क्या-क्या अलग है. टेबल और कुर्सी, वहीं की वहीं, परकालीन गायब! जिस सोफ़े पर बैठा था, उसमें एक नए सदस्य की तरह एक तकिया और जुड़ गयाथा. एक दीवार के कोने में दरार की शुरुआत भी मिली. और ढूंढता तो और कुछ नया ज़रूरमिलता. थोड़ी देर बाद, मार्गरेट चाय लेकर वापस बैठक में आई. बत्तीसी दिखाते, सैवियोअभी भी वहीँ बैठा था. मार्गरेट ने गरम चाय में अपनी उंगली डाली कि अब तो नींद खुलजाए. पर झटके से तुरंत निकाल भी ली. सैवियो की बत्तीसी एक ठहाके में बदल गयी. क्यावो सच में जिंदा था, या सिर्फ़ एक भ्रम? डिम्पी अब भी भौंक रही थी. शाम तक वो चिरशान्ति में सोफ़े पर आमने-सामने बैठे रहे. बीच-बीच में मार्गरेट उठती और अपने कामोंमें लगती, और वापस सोफ़े पर बैठ जाती. जब मारियो काम से घर वापस आया, उसे भरोसा थाकी वो सपने में नहीं था. वो तो मिली से भी मिलकर आया था. वो भी सपने में या सपने काहिस्सा नहीं थी. और बॉस की झाड़ उसने सपने में नहीं खायी थी. तो सैवियो जिंदा हीहोगा! पर कैसे? मार्गरेट और मारियो दोनों सोफ़े पर बैठ पिछले साल की कड़ियां जोड़नेलगे. सैवियो को मरे एक साल हो चुका था. उसका देहांत उसी तरह हुआ जैसे एक 60 साल केवृद्ध का दिल का दौरा पड़ने से हो सकता था. मार्गरेट के अन्दर जितना एक विधवा कासूनापन समा सकता था, समाया. मातम के दिनों में वो मुरझाई सी, काले कपड़े में, राख़हुए जंगल जैसी लगती. वो कालिमा लपेटे, बिस्तर से यूं उठती जैसे कब्र से उठ रही हो.मारियो पर, एकलौता बेटा होने के नाते, घर की ज़िम्मेदारियों का बोझ आया. उसने देहाड़ीके मजदूर सा ज़िम्मेदारियों का भारी-भरकम बोरा उठाना शुरू किया. ऐसा होते एक साल बीतचुका था, ये दोनों को याद भी नहीं था. और कब वो मातम का दामन छोड़ चुके थे, इसकाजवाब देना मुश्किल था. पर आज तो सवाल ख़ुद सामने सोफ़े पर बैठा था, बत्तीसी दिखातेहुए. सैवियो एक हंस-मुख आदमी था. उसके कॉलेज के छात्र भी यहीं मानते थे. ब्लैकबोर्डके सामने खड़े हो वो बाज़ की नज़र रखता. बातूनी और सिरदर्दी देने वाले छात्रों की तरफ़खाड़ियां फेंक-फेंक तीरंदाज़ी करता. छात्र ज़रा सकपका जाते तो एक लतीफ़े से बात सुलटालिया करता. और वापस कोवेलेंट बौंड और ट्राईवेलेन्ट बौंड की श्रृंखलाएं बनाने मेंमशरूफ़ हो जाता. सैवियो डिसूज़ा, स्थूल काया, सांवली सूरत लिए एक हट्टा-कट्टा आदमीथा. पर कॉलेज के बाक़ी प्रोफेसरों के मुक़ाबले कद में ज़रा नाटा. ये सारी चीज़ें उसकेविनोदी स्वभाव से मिलकर, सैवियों को एक रोचक आदमी बनाती थी. जब रिटायर हुआ, तो जिनछात्रों पर खाड़ियां मार-मार उनका रसायनशास्त्र दुरुस्त किया था, उन्हीं ने आकरफूलों के गुलदस्ते भी दिए. रिटायरमेंट के बाद की ज़िन्दगी इतनी बोझिल हो जायेगी, उसेमालूम नहीं था. काम तो बहुत थे, पर कॉलेज की गलियों से निकलकर सीधे ‘रॉकिंग-चेयर’पर आना उसे ज़रा नागवार गुज़रा. अपनी कक्षाओं का प्लेटफार्म बार बार याद आता, जहां वोअज्ञानियों को रसायनशास्त्र के बुड़बुडाते समुद्र में डुबाया करता और अज्ञानियों कीजमात रासायनिक प्रतिक्रिया से मानो बदलकर बाहर निकलती. किसी पैगम्बर के आगम से क्याछोटा काम था ये! कम से कम सैवियो तो यहीं सोचता था. सैवियो के बताये किस्सों केज़रिये उसकी उस दुनिया का हिस्सा मार्गरेट और मारियो अक्सर बना करते थे. पर उसकीअचानक वापसी ने उस दिन दोनों को किसी और दुनिया मेँ जाकर फेंक दिया था. अब सवाल येथा कि वो सैवियो की वापसी पर विश्वास करें या न करें. विश्वास करने जैसा कुछ भीनहीं था. बस इतना था कि सैवियो उनके सामने सोफ़े पर बैठा था. इस बात को वो तब तकनहीं नकार सकते थे, जब तक उनका सपना टूट नहीं जाता. बहुत देर हो चुकी थी. मार्गरेटने उठकर कमरे की बत्ती जलायी. मारियो भी अचानक चेत गया. और उसने इस बात को सपने मेंचेतना समझा. सैविओ भी उसके चेतने पर चेत गया. उसका ध्यान पूरे बैठक पर गया. बत्तीके उजाले में चीज़ें सुबह से अलग लगीं. चीज़ें वहीं थी, पर रौशनी बदल गयी थी.मार्गरेट रसोईघर में गयी और मारियो मुंह-हाथ धोने. सैवियो को उन दोनों का यूं उठकरजाना उसके ज़िंदा होने की सहमति लगा. मानों दोनों ने अब मान लिया हो कि मरे हुए काज़िन्दा होना, बहुत सारी संभावनाओं में से एक है. पर मार्गरेट और मारियो के लिए येअभी भी एक सपना ही था, जिसके किरदार और आसपास की गतिविधियाँ असल ज़िन्दगी जैसी थी.बस सैवियो की वापसी ही एक अटपटी चीज़ थी. यूं तो सपने अटपटे ही हुआ करते हैं, जिनमेंअक्सर बेतुकी चीज़ें होने लगती हैं, और कहानी बन जुड़ती जाती हैं. पर शायद सैवियो कीवापसी अपने आप में ही इतनी अटपटी थी कि सपनों को प्लॉट के संतुलन के लिए गतिविधियांसामान्य रखनी पड़ी हों. मारियो को अपना ये विश्लेषण काफ़ी पसंद आया. वो अन्दर हीअन्दर मुस्कुराने लगा. मारियो अक्सर ऐसा सोचता था . उसने कई बार कोशिश करी थी कि वोअपने सपनों को रोज़ सुबह उठ कहीं उतार के रख ले. पर सपने पानी से लिखे किसी नाम कीतरह, आँख खुलते ही धीरे-धीरे मिटने लगते. और बिस्तर से वॉश-बेसिन तक पहुँचने तक यादसे बिलकुल सूख चुके होते. और सामने होता, सुबह का आयना, जिसमें मारियो ख़ुद सेमिलता, सपनों की बस इतनी सी याद लिए हुए- कि एक अजीब सा सपना आया था, जिसे लिखा जासकता था. दफ़्तर भी जाता तो हर ख़ाली पन्ना उसे अपना पिछली रात आया सपना ही लगता.सोचता-सपना ही तो है, मिटा हुआ सपना ही सही . सैवियो के जिंदा होने का ये सपना उसेअच्छा भी लग रहा था और बुरा भी. अच्छा इसलिए, क्यूंकि सब कुछ कितना असल था, जिसेउठने के बाद अच्छे से कहीं उतारा जा सकता था. बिलकुल होश में हुई किसी घटना की तरह.पर बुरा भी इसीलिए लग रहा था क्यूंकि सबकुछ असल जैसा था. एक डर था- अगर सपना न हुआतो ! खाने की टेबल पर अजीब सी ख़ामोशी छाई रही ! पर ये सपने वाला अजीब-अटपटा नहींथा. ये असल ज़िन्दगी वाला अटपटा था. जैसे तब हुआ था जब मारियो एक दफ़ा फेल हुआ था. औरतब भी जब सैवियो ने मारियो और मिली को बांहों में बाहें डाले देख लिया था.डाइनिंग-टेबल पर ऐसा असल ज़िन्दगी वाला अटपटा कई बार हुआ था. उस वक़्त भी ऐसा ही था.आज दो के बजाये तीन प्लेटें थी. तीसरी सैवियो हँसते हँसते ख़ुद ही रसोईघर से उठालाया था. और हँसते हुए उसने मार्गरेट से कहा था “ पता है डार्लिंग! मरने के बाद औरज़्यादा भूख लगती है.” इसके बाद वो ज़ोरों से हँसा. मार्गरेट के सामने एक कंकाल केहँसने की तस्वीर बनी- बिलकुल वैसी जैसी सस्ती हॉरर फिल्मों में होती है. मार्गेरेटने अपनी हँसी दबाते हुए, चावल और चिकन- करी परोसी, बिलकुल इस तरह जैसे कह रही हो–“खूब खाओ ! वहां नहीं मिलता होगा न ये सब.” कई दिनों से मार्गरेट अपने ही आपमुस्कुराने लगी थी. किसी के सामने नहीं, बस अकेले, या सपनों में. सैवियो ने भी बड़ेचाव से खाया, जैसे कह रहा हो, “ हां, तुम्हारे हाथ का स्वाद नहीं मिलता वहाँ.”मारियो ने खाते हुए पिता को यूं घूर के देखा, जैसे कह रहा हो “ पर मैंने तो सुना हैकि भूत खाना नहीं खाते. ज़रूरत ही नहीं पड़ती.” सैवियो ने ये बात नहीं सुनी. वो खातागया. खाने के बाद, मार्गरेट और मारिओं ने अपने बर्तन उठा, रसोईघर में जाकर रखे.पीछे-पीछे सैवियो भी अपने बर्तन रखने आया. मार्गरेट ने बर्तन धोना शुरू किया, औरसैवियो ने रसोईघर को साफ़ करना. हमेशा पहले भी ऐसा ही होता था. पर सैवियो के बादमारियो ऐसा करने लगा. पर आज मारियो ज़रा रुक गया. शायद ये देखने के लिए कि सैवियोअपना पुराना काम करता है या नहीं. उसने सोचा था कि ऐसा करने से सपने और हकीक़त कीपुष्टी भी हो जाए शायद. पर जानकारी ने नाम पर इतना ही पता चल पाया कि सैवियो रसोईघरघर साफ़ कर रहा था, और मार्गरेट के धोये बर्तनों को वापस रख रहा था. मारियो बैठक मेंचला गया. मार्गेरेट को बैठक से टीवी चलने की आवाज़ आई. काम ख़त्म करके मार्गरेट बैठकमें गयी, और मारियो के साथ सोफ़े पर जा बैठी. थोड़ी देर में सैवियो भी आ गया. उसकेबैठने पर दोनों को सोफ़े पर वैसा ही दबाव महसूस हुआ जैसे पहले होता था. ये सपने औरहकीक़त के बीच झूलती एक जानकारी थी. टीवी पर वहीँ पुराना कार्यक्रम चल रहा था, जोअक्सर मार्गरेट और मारियो देखा करते थे. ये भी एक जानकारी थी. पर दोनों को ये समझनहीं आ रहा था कि उन जानकारियों का वो क्या करें. अब नींद आने लगी थी. ‘डिम्पी’, जोसुबह से कई बार भौंक चुकी थी, वो भी चुप थी. वो भी सो गयी हो शायद. दोनों उठे औरआसपास की बत्तियां बुझाते हुए अपने-अपने कमरे में चले गए. मार्गरेट को अंदाज़ा था किसैवियो भी उसके साथ कमरे में आएगा. वो भी आया. मार्गरेट और सैवियो अंधेरे में एक हीबिस्तर पर पसर गए. सैवियो का ‘स्पॉट द डिफरेंस’ का खेल भी ख़त्म हुआ. वो अब अपनीविधवा बीवी के बगल में सोया था, और विधवा बीवी अपने पति के बगल में. बिलकुल पहले कीतरह. मार्गरेट की आंखों में नींद भरी थी. वो नींद जो सोने नहीं देती थी. और सैवियोकी आंखों में जिंदा होने के सपने. वो नहीं चाहता था कि मार्गरेट सोये. क्यूंकि नींदके उस पार, सैवियो नहीं रहेगा. नींद के उस पार, सैवियो का होना, नहीं रहेगा. उसनेसपने और हकीक़त की दो बल्लियों की सूली बनायीं थी. और उसी सूली पर मार्गरेट को लटकादिया था- हमेशा के लिए.--------------------------------------------------------------------------------हुलर-हुलर दूध गेरे मेरी गाय, आज मेरा मुन्नीलाल जीवेगा कि नाय