आप कभी किसी पहेली से मिले हैं क्या? नहीं? कोई बात नहीं. हमारे पास एक पहेली हैआपसे मिलवाने के लिए. लंपटा बासू. जैसे किसी पहेली की कोई शक्ल नहीं होती, वैसे हीबासू की कोई शक्ल नहीं है. अपने मन से जैसी चाहे लाइनें खींच लीजिए.मौके-बेमौके जब पुराने किस्से कुलांचे मारते हैं, तो बासू कविता-कहानी ठेल देता है.उसकी कहानियां पहाड़ों जैसी होती हैं. निर्मोही मगर ताज़ी. एक नॉवेल बड़े दिनों सेउसके गले में हड्डी की माफिक अटका हुआ है. हड्डी से याद आया, वो बुढ़ापे में कुत्तापालेगा. पहाड़ों पर नारंगी छीलने का सपना हर सुबह उसे जगा देता है. ताउम्र पहाड़कहां हर किसी की किस्मत में होते हैं.तो बासू आपको पहाड़ों के किस्से सुनाएगा. उसके लंपट किस्से. ये दूसरी किस्त है.पिंक लिपस्टिक वाली पिंकी. कूच कीजिए.--------------------------------------------------------------------------------आज पिंकी की कहानी! चंचल, शोख, खिलंदड़ लड़की, जिसे देखते ही प्यार हो जाए. जिसकेगुजरते ही तितलियां ठहर जाएं, पेड़ सांस रोक लें और जंगली मुर्गे चीड़ की शाखों परखामोश बैठ जाएं. देवदार के जंगल झूमने लगें और काखड़ उचककर झांकते हुए गुजर जाएं.पिंकी निकलती तो भेड़ें मुंडेर से उतर जातीं. वो जहां से गुजरती, लोग आगे बढ़ आते.बात करने की ऐसी बेताबी कि काम-धाम छूट जाए. लोग आगे बढ़ते तो बेपरवाह पिंकी भीमुस्कुरा जाती. वो फब्तियों को नजरंदाज करती और इन बातों पर लड़के तड़प उठते. शर्तलगती. शिद्दत से किस्से चलते. आंखों में इश्क तैर जाता और पलभर पास जाने की हसरत कासोचनेभर से बदन में रोमांच दौड़ने लगता.खूब तैले पहाड़ पर 50-55 घरों की आबादी वाले गांव पोखरी में रहती थी पिंकी. सामनेजहां तक नजर जाती, सफ़ेद धवल हिमालय. गांव की जिंदगी गोशाला से शुरू होकर गोशाला मेंही खत्म हो जाती. दूध, गोबर, घास, खेत और चूल्हे-चौके से औरतें बमुश्किलन बाहर निकलपातीं. मर्दों के पास अपने काम थे गिने-चुने. लफ्फाजी और गप्पबाजी के लिए पंदेरेनियत थे. औरतें, खास कर भाभियों के इंतजार में गांवभर के लौंडों का जमघट लगता.पंदेरे की दीवाल पर भैया की शर्ट पर भाभी साबुन मलतीं, तो झाग कहीं और निकलता. गांवके मुहाने तक पहुंची सड़क पर दिन में एक-दो जीप धूल उड़ातीं दूर तलक गुजर जातीं. पहाड़दर पहाड़ दबी जिंदगी में रंग भरते थे मेले. ऐसा ही मेला उस साल भी लगा.तीन पहाड़ी पार कौसानी में दुकानदार पहुंचने लगे थे. चाय बागान से लौटते लोगों केजरिए खबर गांव दर गांव फ़ैल गई. बच्चे उत्साहित थे. उनकी माएं भी उत्साहित थीं.बुड्ढे बीड़ी के धुंए के बीच बाजार के अर्थशास्त्र पर गहन मंथन में डूबे हुए थे.लड़कों में मेले की चर्चा थी. पिंकी की चर्चा थी और थोड़ी-बहुत उस मैच की भी, जो होनेवाला था. पिंकी भी खुश थी. उत्सव करीब आने जैसा फील फिज़ाओं में तैर रहा था. रातडूब रही थी. पहले सितारे आए, फिर सकिनधार की चोटी पर अंगड़ाई लेता चांद उतरा.रवि के घर से रेडियो की आवाज तेज हो गई. आकाशवाणी की धुन अंधेरे में गूंजी और फिर'चौदहवीं का चांद हो या आफताब...'. पीछे से रवि का बुड्ढा नशेड़ी बाप चिल्लाया, 'बंदकरो भो%$वालों!'. उसने दरवाजे को जोर से पटका और बिना छज्जे की ओर देखे कमरे कीसांकल चढ़ा ली. वो अपने बिस्तर पर लेटते हुए बुदबुदाया, 'लोगों को चैन की नींद सोनेदो' और मानों पूरी दुनिया अंधेरों के आगोश में डूब गई. अब रात एकदम अकेली थी, जिसपर चंद ख्वाब तैरने थे. काम से थके आधे गांव को ख्वाब नहीं आते, शराबियों केखर्राटे उल्टा नींद भी तोड़ते हैं. जहां शराबी नहीं हैं, वहां बच्चे चिल्लाते. जहांशराबी और बच्चे दोनों नहीं हैं, वहां मुर्दा ख़ामोशी तारी रहती. बीच-बीच में सियारचिल्लाते, तो पक्की नींद की उम्र गुजार चुकीं बुढ़ियाएं थूकतीं. यहां-वहां दीवारोंपर सुबह सूख चुका 'कफ' नजर आता. वहां चूने का रंग गाढ़ा हो जाता.'लिपस्टिक' का ख्वाब सजाती पिंकी की आंखें नींद में उतर गईं. उसके चेहरे पर बुरांशकी लाली उभर आई थी. मालूम नहीं उसने ये पहली बार कहां देखी थी या किससे उसने'लिपस्टिक' का जिक्र सुना था. बस उसे 'लिपस्टिक' से मुहब्बत हो गई थी. लाल सुर्ख'लिपस्टिक' उसे लुभा नहीं पाई थी, तब उसने शायद पिंक लिपस्टिक उठा ली थी, उस दुल्हनके डिब्बे से जो कुछ रोज पहले गांव में पहुंची थी. पूरी इजाजत लेकर... वो उसे अपनेसाथ ले आई. दो बार खोलकर उलट-पलट कर देखा और फिर शीशे के सामने अपने होंठों पर मलदी. उसने एक लंबी सांस खींची, होंठों को गोल किया और शीशे को चूमा. उसकी आंखों मेंशरारत तैर गई. फिर मां की आवाज सुनते ही होंठ पोंछ लिए, लेकिन रंग नहीं छूटा. मद्धमगुलाबी होंठ लिए वो आवाज की दिशा में दौड़ गई.सेरों में धान की चादर बिछी हुई थी. चोटियों से कोहरा छंट रहा था. छन-छनकर धूपछज्जों पर बिखर गई. कुछ महिलाएं खेतों में जा चुकी थीं, कुछ बच्चों को रवाना करदेरी होने पर हंगामा मचाए हुई थीं. इनके बाद घरों से दुकानदार निकले, फिर नौकरीपेशाऔर थोड़ी देर बाद स्कूल जाने वाले बच्चे. पिंकी और नैना भी दूर खेतों से गुजरकरस्कूल जा रहे थे. पीछे-पीछे बाकी बच्चे. 2 क्लास निपट गईं, पिंकी के दिमाग से'लिपस्टिक' का ख्याल नहीं गया. ब्लैक एंड वाइट फिल्मों से निकलकर मधुबाला पिंकी कीआंखों के सामने 'पिंक लिपस्टिक' में बैठी हुई नजर आतीं. किशोर कुमार गुलाब मुंह परमारते. पिंकी ख्वाबों में डूबी हुई है.नमकपारे खाते लड़कों में इतना सब्र कहां था. वो झट-पट वाले थे. गुलाब किसी के गालोंमें टकराना छी-छी था. हां, मौके-बेमौके लड़के, लड़कियों को टटोल जाते. यही 'इश्क' था.इसमें रजामंदी का मतलब ही नहीं था. इसके लिए भी भला कोई रजामंदी लेता है! ये लड़कोंका ख्याल था. बस आंखें टकराईं, दो बातें हुईं, फिर तो तीसरा काम तृप्त होने का था.मन के तृप्त होने का. मन, जहां सांकल नहीं चढ़ाई जा सकती. दिन ढलने लगा था. धूपछज्जे से निकलकर चबूतरे पर रखे कद्दू पर आ टिकी थी. बच्चे लौट रहे थे. पिंकी भी लौटरही थी. बेमतलब का दिन था. बेवजह. जैसे अक्सर बेवजह दिन गुजर जाते हैं, वैसे हीबेवजह. शाम क्यों हुई, क्योंकि उसे होना था. जैसे सुबह हुई थी. ऐसे ही ख्याल पिंकीके जेहन में भी थे.दिन गुजर रहे थे. पिंकी पर उस दौर के कई लड़के जान छिड़कते थे. पिंकी का मन अभी चौखटके भीतर था. नैना के लिए सब आम बात थी. जिंदगी का हिस्सा. उसे उसका राजकुमार छूसकता था, टटोल सकता था. नैना ही थी, जो पिंकी को बताती, 'मां कसम मेरे को रोने आगया. बहुत जोर से दबाया. यहां देखो छाती अभी भी लाल पड़ी हुई है.' इश्क में ये छातीलाल क्यों पड़ गई? किसी को चूमने से शरीर हल्का कैसे हो सकता है? नींदें क्यों उड़जाती हैं? गाने क्यों अच्छे लगते हैं? ये पिंकी के लिए नया था.आखिरकार मेला शुरू हुआ. तीन पहाड़ी पार जाने का उत्सव. नए कपड़े पहनने का उत्सव.छुट्टी का दिन. बच्चे कौसानी के लिए निकल गए. खाली उदास धूलभरी सड़क पर आज जीप दौड़रही थी. लोग जल्दी पहुंचने की जल्दी में थे. नैना और पिंकी भी तैयार थीं. गहरेसमुद्र सा नीला सूट (ऑउटफिट) पहन पिंकी ने होठों पर लिपस्टिक घुमा दी. पिंकलिपस्टिक. उसने होठों को गोल घुमाया, गंदी हवा छोड़ी, एक गिलास पानी पिया और घर सेबाहर निकल आई. नैना को आवाज लगाई और दोनों धान के खेतों के बीच से गुजरकर सड़क पर आगईं. यहां पहले से तीन लड़के तैयार खड़े थे. थोड़ी देर में जीप भी आ गई.मेले में दसियों गांवों के लोग जमा थे. हर माल दस रुपए वाला भी और रोज के दुकानदारभी. सब सड़क पर थे. दुकानें सजी हुई थीं. औरतें पहले खाने-पीने की दुकानों पर टूटीं,फिर कच्छों के इलास्टिक खींच-खींचकर जांचतीं. 'एक दीनू के लिए हो गया, अब भैया इसकेपापा के लिए दिखाओ. हां ये ठीक है. भूरा. गंदा नहीं होता. अच्छा सुनो भैया, लेडीजभी दिखाओ. प्लेन दिखाओ. धारी वाला है मेरे पास.' ऐसे कई दफा दुकानदार ने कई औरतोंको कच्छे दिखलाए. मर्द गुजरते. तो औरतें जांच बंद कर साड़ी के नीचे चड्डी खिसकादेतीं, जैसे सबूत छिपा रही हों. हर दस कदम पर जलेबी छन रही थी. चक्की आज उदास पड़ीथी. स्टेशनरी की दुकान पर भी भीड़ नहीं थी. होटल की मेजों के नीचे आज सुबह से हीपव्वे सरक रहे थे. शराबी ईमानदार थे. पिए था तो छिपे नहीं थे. सरेआम मेले में औरतोंको छूकर गुजर जाते. भीड़ में से गुजरते हाथ शरारत करते. गाली खाते पर बाज़ नहीं आते.दिन होते-होते शराबी दो से चार हो गए.पिंकी ने आज पहली दफा उड़ान भरी. चरखी ऊपर को उठती, तो पिंकी आंखें भींच लेती. ऊंचाईसे देखने की हिम्मत नहीं थी, लिहाज़ा जोर से चिल्लाती और फिर नीचे उतरती चरखी के साथधीरे-धीरे अपनी मोटी-मोटी आंखें खोलती. दस-बारह दफा ये सिलसिला चला. फिर दोनों मेलेसे निकलकर घर की ओर चलने लगे. नैना का राजकुमार इंतज़ार में खड़ा था. साथ में 3 लड़केऔर थे. पिंकी और नैना, दोनों उनके करीब से गुजरे, तो राजकुमार ने नैना का हाथ खींचलिया. 'छोड़ो... पागल हो गए क्या! क्या कर रहे हो?' नैना ने इनकार किया, पर राजकुमारने उसे अपनी ओर खींच लिया. पिंकी सहमकर आगे बढ़ गई. पीछे-पीछे तीनों लड़के. रास्ते केदो घूम पार होते ही लड़के करीब आ गए. नैना कहीं पीछे रह गई.लड़कों ने पिंकी पर फब्तियां कसीं. जवाब नहीं मिला. वो पास आए और उनमें से एक मोटेहाथ वाले लड़के ने पिंकी को कंधे से पकड़कर अपनी ओर खींच लिया. उससे बदबू आ रही थी.शराब की बदबू. दो घूम पार दुनिया खेल-तमाशे में मस्त थी, दो घूम पार के इस छोर परसुनसान रास्ता. दूसरा लड़का करीब आया और उसने अपना हाथ पिंकी की छाती पर रखा. पिंकीचिल्ला उठी, लेकिन आवाज़ बिना मदद के बैरंग लौट आई. उस मोटे हाथ वाले लड़के ने पिंकीको कसकर पकड़ लिया. पिंकी के चेहरे की गुलाबी रंगत डर से काफूर होने लगी. लड़कों नेउसे जमीन पर गिरा दिया.गहरे नीले समुद्र से रंग का सूट मिट्टी के रंगों में एकरूप हो गया. करीने से बंधेबाल चेहरे पर फ़ैल गए. मोटे हाथ वाले लड़के ने आखिरी में पिंकी की छाती से हाथ हटाया.तीनों तृप्त हुए. पिंकी स्तब्ध थी. उसकी आंखों के आंसू काजल को छूकर मोटे होते चलेगए. उसके होंठ सर्द पड़ चुके थे. 'पिंक लिपस्टिक' तीनों लड़कों के होठों से गुजरकरछूट चुकी थी. नैना बेपरवाह लौटी, 'कमीना साला! ये देख छाती लाल कर दी हरामी ने! ओये तुझे क्या हुआ...'. दोनों लड़कियां रास्ते पर बैठ गई थीं. दूर से जीप के गुजरनेकी आवाज आई. उसी रास्ते से रवि का बाप भी गुजरा. वो लड़खड़ा रहा था. वो फिर चिल्लाया,'कोई मर गया क्या...?' जंगली मुर्गे झाड़ियों में दुबक गए. काखड़ कहीं दूर कुलांचेमारकर भाग गया और सियार चिल्ला उठे. सकिनधार की पहाड़ी आज रूखी और बदरंग दिख रही थी.चाय बागान उजड़े हुए और मेला भी बेनूर हो चला था!जो पल्ले न पड़ा हो: काखड़: हिमालयन डियर. तैला: धूप वाली जगह. पंदेरे: पानी भरने कीसामूहिक जगह. सेरे: पहाड़ों में नदियों के किनारे वो खेत, जहां सिंचाई की व्यवस्थाहो.-------------------------------------------------------------------------------- लंपटा बासू का पिछला किस्सा: चकोर झाड़ियों से निकल आई, बटेर दौड़ भागे और तीतर ने'तीन तौला छप' कहा