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पिंक लिपस्टिक वाली पिंकी, जिसके साथ बहुत बुरा हुआ

लंपटा बासू के लंपट किस्से में आज पिंक लिपस्टिक वाली पिंकी की कहानी.

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29 नवंबर 2016 (अपडेटेड: 29 नवंबर 2016, 02:18 PM IST)
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आप कभी किसी पहेली से मिले हैं क्या? नहीं? कोई बात नहीं. हमारे पास एक पहेली है आपसे मिलवाने के लिए. लंपटा बासू. जैसे किसी पहेली की कोई शक्ल नहीं होती, वैसे ही बासू की कोई शक्ल नहीं है. अपने मन से जैसी चाहे लाइनें खींच लीजिए.

मौके-बेमौके जब पुराने किस्से कुलांचे मारते हैं, तो बासू कविता-कहानी ठेल देता है. उसकी कहानियां पहाड़ों जैसी होती हैं. निर्मोही मगर ताज़ी. एक नॉवेल बड़े दिनों से उसके गले में हड्डी की माफिक अटका हुआ है. हड्डी से याद आया, वो बुढ़ापे में कुत्ता पालेगा. पहाड़ों पर नारंगी छीलने का सपना हर सुबह उसे जगा देता है. ताउम्र पहाड़ कहां हर किसी की किस्मत में होते हैं.

तो बासू आपको पहाड़ों के किस्से सुनाएगा. उसके लंपट किस्से. ये दूसरी किस्त है. पिंक लिपस्टिक वाली पिंकी. कूच कीजिए.


आज पिंकी की कहानी! चंचल, शोख, खिलंदड़ लड़की, जिसे देखते ही प्यार हो जाए. जिसके गुजरते ही तितलियां ठहर जाएं, पेड़ सांस रोक लें और जंगली मुर्गे चीड़ की शाखों पर खामोश बैठ जाएं. देवदार के जंगल झूमने लगें और काखड़ उचककर झांकते हुए गुजर जाएं. पिंकी निकलती तो भेड़ें मुंडेर से उतर जातीं. वो जहां से गुजरती, लोग आगे बढ़ आते. बात करने की ऐसी बेताबी कि काम-धाम छूट जाए. लोग आगे बढ़ते तो बेपरवाह पिंकी भी मुस्कुरा जाती. वो फब्तियों को नजरंदाज करती और इन बातों पर लड़के तड़प उठते. शर्त लगती. शिद्दत से किस्से चलते. आंखों में इश्क तैर जाता और पलभर पास जाने की हसरत का सोचनेभर से बदन में रोमांच दौड़ने लगता.

lampat kisse

खूब तैले पहाड़ पर 50-55 घरों की आबादी वाले गांव पोखरी में रहती थी पिंकी. सामने जहां तक नजर जाती, सफ़ेद धवल हिमालय. गांव की जिंदगी गोशाला से शुरू होकर गोशाला में ही खत्म हो जाती. दूध, गोबर, घास, खेत और चूल्हे-चौके से औरतें बमुश्किलन बाहर निकल पातीं. मर्दों के पास अपने काम थे गिने-चुने. लफ्फाजी और गप्पबाजी के लिए पंदेरे नियत थे. औरतें, खास कर भाभियों के इंतजार में गांवभर के लौंडों का जमघट लगता. पंदेरे की दीवाल पर भैया की शर्ट पर भाभी साबुन मलतीं, तो झाग कहीं और निकलता. गांव के मुहाने तक पहुंची सड़क पर दिन में एक-दो जीप धूल उड़ातीं दूर तलक गुजर जातीं. पहाड़ दर पहाड़ दबी जिंदगी में रंग भरते थे मेले. ऐसा ही मेला उस साल भी लगा.

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रवि के घर से रेडियो की आवाज तेज हो गई. आकाशवाणी की धुन अंधेरे में गूंजी और फिर 'चौदहवीं का चांद हो या आफताब...'. पीछे से रवि का बुड्ढा नशेड़ी बाप चिल्लाया, 'बंद करो भो%$वालों!'. उसने दरवाजे को जोर से पटका और बिना छज्जे की ओर देखे कमरे की सांकल चढ़ा ली. वो अपने बिस्तर पर लेटते हुए बुदबुदाया, 'लोगों को चैन की नींद सोने दो' और मानों पूरी दुनिया अंधेरों के आगोश में डूब गई. अब रात एकदम अकेली थी, जिस पर चंद ख्वाब तैरने थे. काम से थके आधे गांव को ख्वाब नहीं आते, शराबियों के खर्राटे उल्टा नींद भी तोड़ते हैं. जहां शराबी नहीं हैं, वहां बच्चे चिल्लाते. जहां शराबी और बच्चे दोनों नहीं हैं, वहां मुर्दा ख़ामोशी तारी रहती. बीच-बीच में सियार चिल्लाते, तो पक्की नींद की उम्र गुजार चुकीं बुढ़ियाएं थूकतीं. यहां-वहां दीवारों पर सुबह सूख चुका 'कफ' नजर आता. वहां चूने का रंग गाढ़ा हो जाता.

'लिपस्टिक' का ख्वाब सजाती पिंकी की आंखें नींद में उतर गईं. उसके चेहरे पर बुरांश की लाली उभर आई थी. मालूम नहीं उसने ये पहली बार कहां देखी थी या किससे उसने 'लिपस्टिक' का जिक्र सुना था. बस उसे 'लिपस्टिक' से मुहब्बत हो गई थी. लाल सुर्ख 'लिपस्टिक' उसे लुभा नहीं पाई थी, तब उसने शायद पिंक लिपस्टिक उठा ली थी, उस दुल्हन के डिब्बे से जो कुछ रोज पहले गांव में पहुंची थी. पूरी इजाजत लेकर... वो उसे अपने साथ ले आई. दो बार खोलकर उलट-पलट कर देखा और फिर शीशे के सामने अपने होंठों पर मल दी. उसने एक लंबी सांस खींची, होंठों को गोल किया और शीशे को चूमा. उसकी आंखों में शरारत तैर गई. फिर मां की आवाज सुनते ही होंठ पोंछ लिए, लेकिन रंग नहीं छूटा. मद्धम गुलाबी होंठ लिए वो आवाज की दिशा में दौड़ गई.

सेरों में धान की चादर बिछी हुई थी. चोटियों से कोहरा छंट रहा था. छन-छनकर धूप छज्जों पर बिखर गई. कुछ महिलाएं खेतों में जा चुकी थीं, कुछ बच्चों को रवाना कर देरी होने पर हंगामा मचाए हुई थीं. इनके बाद घरों से दुकानदार निकले, फिर नौकरीपेशा और थोड़ी देर बाद स्कूल जाने वाले बच्चे. पिंकी और नैना भी दूर खेतों से गुजरकर स्कूल जा रहे थे. पीछे-पीछे बाकी बच्चे. 2 क्लास निपट गईं, पिंकी के दिमाग से 'लिपस्टिक' का ख्याल नहीं गया. ब्लैक एंड वाइट फिल्मों से निकलकर मधुबाला पिंकी की आंखों के सामने 'पिंक लिपस्टिक' में बैठी हुई नजर आतीं. किशोर कुमार गुलाब मुंह पर मारते. पिंकी ख्वाबों में डूबी हुई है.

नमकपारे खाते लड़कों में इतना सब्र कहां था. वो झट-पट वाले थे. गुलाब किसी के गालों में टकराना छी-छी था. हां, मौके-बेमौके लड़के, लड़कियों को टटोल जाते. यही 'इश्क' था. इसमें रजामंदी का मतलब ही नहीं था. इसके लिए भी भला कोई रजामंदी लेता है! ये लड़कों का ख्याल था. बस आंखें टकराईं, दो बातें हुईं, फिर तो तीसरा काम तृप्त होने का था. मन के तृप्त होने का. मन, जहां सांकल नहीं चढ़ाई जा सकती. दिन ढलने लगा था. धूप छज्जे से निकलकर चबूतरे पर रखे कद्दू पर आ टिकी थी. बच्चे लौट रहे थे. पिंकी भी लौट रही थी. बेमतलब का दिन था. बेवजह. जैसे अक्सर बेवजह दिन गुजर जाते हैं, वैसे ही बेवजह. शाम क्यों हुई, क्योंकि उसे होना था. जैसे सुबह हुई थी. ऐसे ही ख्याल पिंकी के जेहन में भी थे.

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आखिरकार मेला शुरू हुआ. तीन पहाड़ी पार जाने का उत्सव. नए कपड़े पहनने का उत्सव. छुट्टी का दिन. बच्चे कौसानी के लिए निकल गए. खाली उदास धूलभरी सड़क पर आज जीप दौड़ रही थी. लोग जल्दी पहुंचने की जल्दी में थे. नैना और पिंकी भी तैयार थीं. गहरे समुद्र सा नीला सूट (ऑउटफिट) पहन पिंकी ने होठों पर लिपस्टिक घुमा दी. पिंक लिपस्टिक. उसने होठों को गोल घुमाया, गंदी हवा छोड़ी, एक गिलास पानी पिया और घर से बाहर निकल आई. नैना को आवाज लगाई और दोनों धान के खेतों के बीच से गुजरकर सड़क पर आ गईं. यहां पहले से तीन लड़के तैयार खड़े थे. थोड़ी देर में जीप भी आ गई.

मेले में दसियों गांवों के लोग जमा थे. हर माल दस रुपए वाला भी और रोज के दुकानदार भी. सब सड़क पर थे. दुकानें सजी हुई थीं. औरतें पहले खाने-पीने की दुकानों पर टूटीं, फिर कच्छों के इलास्टिक खींच-खींचकर जांचतीं. 'एक दीनू के लिए हो गया, अब भैया इसके पापा के लिए दिखाओ. हां ये ठीक है. भूरा. गंदा नहीं होता. अच्छा सुनो भैया, लेडीज भी दिखाओ. प्लेन दिखाओ. धारी वाला है मेरे पास.' ऐसे कई दफा दुकानदार ने कई औरतों को कच्छे दिखलाए. मर्द गुजरते. तो औरतें जांच बंद कर साड़ी के नीचे चड्डी खिसका देतीं, जैसे सबूत छिपा रही हों. हर दस कदम पर जलेबी छन रही थी. चक्की आज उदास पड़ी थी. स्टेशनरी की दुकान पर भी भीड़ नहीं थी. होटल की मेजों के नीचे आज सुबह से ही पव्वे सरक रहे थे. शराबी ईमानदार थे. पिए था तो छिपे नहीं थे. सरेआम मेले में औरतों को छूकर गुजर जाते. भीड़ में से गुजरते हाथ शरारत करते. गाली खाते पर बाज़ नहीं आते. दिन होते-होते शराबी दो से चार हो गए.

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लड़कों ने पिंकी पर फब्तियां कसीं. जवाब नहीं मिला. वो पास आए और उनमें से एक मोटे हाथ वाले लड़के ने पिंकी को कंधे से पकड़कर अपनी ओर खींच लिया. उससे बदबू आ रही थी. शराब की बदबू. दो घूम पार दुनिया खेल-तमाशे में मस्त थी, दो घूम पार के इस छोर पर सुनसान रास्ता. दूसरा लड़का करीब आया और उसने अपना हाथ पिंकी की छाती पर रखा. पिंकी चिल्ला उठी, लेकिन आवाज़ बिना मदद के बैरंग लौट आई. उस मोटे हाथ वाले लड़के ने पिंकी को कसकर पकड़ लिया. पिंकी के चेहरे की गुलाबी रंगत डर से काफूर होने लगी. लड़कों ने उसे जमीन पर गिरा दिया.

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