निशांत बीस बरस के हैं. इन्होंने विद्यालय में आठवीं के बाद कभी हिंदी नहीं पढ़ी.लेकिन मुक्तिबोध, निर्मल वर्मा, मोहन राकेश, भीष्म साहनी, कमलेश्वर, इस्मत चुगताई,मंटो, दुष्यंत कुमार को पढ़ना अच्छा लगता है और अज्ञेय को पढ़ना चाहते हैं. फिलहालराष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान रायपुर में छठवीं सेमेस्टर के छात्र हैं. हमें एककहानी रोज़ के लिए अपनी एक कहानी भेजी. हम आपको पढ़ा रहे हैं...बलि बाबू सोनपुर मेला से अपने गांव आ गए थे. धनेश्वर बाबू ने बलि बाबू के बरगद तरवाला भूत के परिवार से लोहा लेने वाली बात का जिक्र पूरे गांव-जवार, जिला-पंचायत तकमें कर दिया. जीते जी ही बलि सिंह लोक-परलोक की कथाओं के पात्र बनते जा रहे थे. आगेकी घटना कुछ इस तरह मुझे सुनाई गई है... सुनाई क्या गई है, खेसाड़ी-भूंसा जैसाबोरिया में भर दिया गया है. तो कहानी नहीं कथा इस प्रकार है. बलि बाबू छह फीटहाआदमी थे. चिल्लम गांजा के बाद भी शरीर गामा पहलवान से कम नहीं था. नहीं-नहीं अपनेदेसी दारा सिंह जैसा तो जरूर था. लेकिन जबसे बलि बाबू सोनपुर मेला से लौटे थे तबसेउनके शरीर में पियरी (पीलापन) समा गया था. गंजेड़ियों के साथ मन भी नहीं लग रहा था.दिन भर पूरब भर वाला कटहल के पेड़ तर खाट पर पड़े रहते दिन भर. वहां से कुछ गज कीदूरी पर बांस का एक कोठी था. बलि बाबू सिर्फ वहां जाते और कुछ बुदबुदाकर फिर तेजीसे वापिस लौट आते. बलि बाबू के बारे में धीरे-धीरे उनके दोस्त-यार को पता चला.गाय-भैंस लेने वाले लोग भी परेशान थे. बिन बलि बाबू कैसा मेला. शिव मंदिर के पीछेजो संसद-मजलिस चलता था, बात वहां तक पहुंच गई. साल भर पहले वहां बलि बाबू लीडर ऑफअपोजिशन थे. शिव मंदिर वाले संसद में ही तेतर बाबू भी थे. तेतर बाबू के बारे में ऐसा मत है कि वे कामरूप कामख्या से सिद्ध होकर आए हैं. तेतर बाबू सिद्ध ओझा हैं.लेकिन बहुत पहले ही तेतर बाबू ओझा-गुणी वाला काम त्याग दिए थे. बलि बाबू तेतर ओझाके पकिया (पक्का) मित्र थे. बलि बाबू का हाल सुन कर तेतर ओझा का माथा ठनका. तेतरबाबू मन ही मन गहनता से सोचने-विचारने लगे. लेकिन दिक्कत यह थी कि तेतर ओझा के ओझयीका किराया बहुत था. चार बकरे का बलि और उनका बुताद अलग से. उनका बुताद भी कुछ ऐसाथा- पांच किलो मीठा, पांच किलो अरहर का दाल, बीस किलो बासमती चावल और चार दांत कीगाय का घी अलग से. दिक्कत यह भी थी कि बलि बाबू निरबंसिया थे और जो एक भौजाई थी वहभी मोसमात (विधवा) थी और उनका भी कोई बाल-बच्चा नहीं था. आखिर तेतर बाबू का भार कौनले. अब सब कुछ तेतर बाबू के ऊपर था. तेतर बाबू आखिर अंतिम में तैयार हुए. शर्त यहथी कि अगर बलि बाबू ठीक हो गए तो तेतर ओझा को वह एक बाछी दान करेंगे. अगले दिन तेतरओझा आगे-आगे और अमला-फौजदार का जत्था उनके पीछे-पीछे कटहल तर पहुंच गया. तेतर ओझाने बलि बाबू को देखकर एक मंतर का जाप किया. इतने बलि बाबू कटहल के पेड़ को धर केदोमने (हिलाने) लगे. पूरा शरीर पसीना से लतपथ हो गया. बलि बाबू का यह विकराल रूपदेखकर लोग छत्तीस गज बेलाग (दूर) हट गए. तेतर ओझा की भी हालत खराब हो गई. उनकासिद्ध ओझयी उनके कपार के ऊपर से निकलने लगा. तेतर ओझा ने जोर से कहा : बलि बहुतदिक्कत में फंस गया है. इस पर बारह कोस दूर का कोई भूत सवार हो गया है. बारह कोस परतो चार बार पानी का स्वाद बदल जाता है, तो भूत का क्या कहा जाए. तेतर ओझा बलि बाबूको वश में करने की कोशीश कर रहे थे. मंत्र पर मंत्र पढ़े जा रहे थे : प्रेत सामनेआवै अपन असल रूप दिखावै कामख्या माता कृपा करो कामख्या माता कृपा करो हे! माताप्रेत का पहचान करावो दुहाए इस्सर महादेव गौरा पारबती, नैना जोगिन... गांव के लोगहतप्रभ इस तमाशे को देख रहे थे. प्रेता इतना ढ़िठ की हर मिनट अपना रंग बदल रहा था.अंत में तेतर ओझा ने प्रेत को बातचीत के लिए राजी कर लिया. बातचीत कुछ इस प्रकारहुआ : तेतर ओझा प्रेत को भरमाते हैं, टिकुली-सिंदूर का लोभ देते हैं, साज-सिंगार कालोभ देते हैं. प्रेत टस से मस नहीं होता है. तेतर ओझा बिदक कर कहते हैं : ''खैर यैतो तय है कि ई परेत कोई मरद ही है न तो अब तक वस में आ ही जाता.'' तेतर ओझा अगलागोट्टी खेलते हैं. कहते हैं कि तोरा नाम से मुज्जफरपुर के बाई जी का इंतज़ाम कियैदेते हैं आज और साथ में पुरवारी टोला पर पांच दिन का नाच. बाई जी का नाम सुनकरप्रेत का ईमान भी डोलता है. तेतर ओझा प्रेत की नब्ज पकड़ते हैं. ओझा जी प्रेत सेपूछते हैं, ''कहां कै (कितना) कोस से आए हो?'' प्रेत गरजने लगता है, फिर एकाएक बहुतरोने लगता है. लोग कहते हैं कि जो भूत सियार की तरह रोता है, वह गांव का ही आदमीहोता है, जिसकी अकालमृत्यु हो जाती है. अगर मरने वाला आदमी अठारह वर्ष से कम काहोता है तो वह ब्रह्म बनकर गांव की चौहद्दी में ही मंडराता रहता है. वह इस इंतजारमें रहता है कि उसे कोई अकेला आदमी मिले जिसके शरीर में वह प्रवेश कर सके. ब्रह्मउसी आदमी में प्रवेश कर पाता है जिसकी छाया हल्की होती है. प्रेत लोग आदमी का वजनउसकी छाया से करता है, ब्रह्म तो खासकर. तो अब तो यह तय हो चुका था की प्रेत गांवका ही कोई व्यक्ति था जिसकी मौत हो चुकी है. तेतर ओझा गांव की चौहद्दी को बांध देतेहैं ताकि प्रेत भाग न सके. तेतर ओझा के सामने प्रेत बकने लगता है : ''मैं पूरे गांवको निरबंस कर दूंगा, पूरे गांव को निपुत्र कर दूंगा. आने वाले समय में इस गांव मेंकोई बेटा-बेटी का जन्म नहीं होगा.'' भूत अपना नाम जगदीश कहार बताता है. प्रेत काबयान कुछ इस प्रकार है : जगदीश कलकत्ता शहर कमाने गया था. बहुत दिन बाद जगदीश कुछपैसे कमाकर गांव लौट आया. जगदीश ने कलकत्ते की एक औरत से शादी कर ली थी और उसकोलेकर भी आया था. जगदीश की औरत का नाम नुपूर था. लोग कहते हैं कि वह अथाह सुंदर थीऔर बड़ी लक-दक में रहती थी. किसी की क्या मजाल कि नुपूरवा को आंख उठाकर देख ले.ईमान-धर्म की पक्की औरत थी. जगदीश का घर गांव टोले के उत्तरी छोर पर था. नुपूरवा कोदेखकर गांव के लोगों के मुंह से लार टपकता था. पर वह ऐसी औरत थी की नाक पर मक्खी भीन बैठने दे. लुच्चे-लफंगे उस पर नजर गड़ाए हुए थे और मौके की तलाश में ही थे. जगदीशएक दिन कहीं बाहर गया था और उसकी औरत का पांव भारी था. कुछ लोग उसके घर पर गिद्ध कीतरह मंडरा रहे थे. रात को मौका पाकर उन लोगों ने उसके घर पर धावा बोलकर उस अकेलीऔरत की इज्जत को तार-तार कर दिया और उसे मार भी दिया. आगे की बात गांव वाले भी नहींजानते. लोगों का मानना है कि सोनापुर के पुनपुन नदी में जगदीश नुपूरवा की लाश कोलेकर कूद जाता है. भरला भादो की नदी में कूदने पर आदमी का क्या होता है, यह हमेंबताया नहीं जा सकता. जिस चीज को बताया नहीं जाता उसका संबंध साक्षात मृत्यु से होताहै. मरने के बाद से ही जगदीश नदी किनारे वाला बरगद के पेड़ पर अपना बसेरा बना लेताहै. बलि बाबू जब सोनपुर मेला से आ रहे थे, उसी समय जगदीश बलि बाबू के देह में समाजाता है. तेतर ओझा बलि बाबू को परेत के बंधन से छुटकारा दिलवाना चाहते हैं. जगदीशशर्त रख देता है. वह कहता है कि वह एक ही शर्त पर बलि बाबू की देह छोड़ेगा. शर्त यहथी कि गांव के लोग अपने कुल-देवता के साथ जगदीश को भी बांधेंगे और हर शादी-बियाह औरकोई कार्य-प्रयोजन में जगदीश को ही गांव में सबसे पहले पूजा जाएगा. पहले तो लोग मनाकर देते हैं. लोग कहते हैं कि किसी ने नुपूरवा के साथ कोई गलत काम नहीं किया था.वही मुंह बाये मरद के फेर में इधर-उधर मारल फिरती थी. बलि बाबू के भीतर से एक चीखनिकलती है : ''हम समूचा गांव को निरबंस कर देंगे. नुपुरवा में कोई पय और ऐब नहींथा, बिल्कुल देवी का रूप थी वह. तुम लोगों पर क्या विश्वास करे कोई, रात को मुरगीखाओ और दिन में नेम-धरम करो और मटर-माला जपो. मेरे श्राप से तुम सारे लोग निरबंसरहोगे.'' अंत में लोग जगदीश की शर्त पर मान लेते हैं. नुपुरवा मरकर देवी हो गई.जीते जी तो गांव के लोग छिनाल कहते रहे. अब उसी छिनाल का कुल-देवता से ऊपर स्थानहै.