एक भविष्य-दृष्टि के साथ देखें या मौजूदा वक्त की निगाह से देखें या बहुत दूर नहींगए व्यतीत के साये में देखें… कैसे भी देखें यह कहते हुए अफसोस होता है कि हिंदीकहानी बहुत देर से खुद को संदेहास्पद बनाने के आयोजन में मुब्तिला है. कहानी एकसुंदर विधा है और अगर उसे एक स्त्री मानें तब यह कह सकते हैं कि वह इन दिनों अपनेरचयिता की जबरदस्ती से आजिज है. यहां मौजूद कवि उस्मान खान का गद्य इस औरत को उसकीआजिजी से आजाद कराने की एक इंकलाबी कोशिश है. गद्य इसे यूं कहा जा रहा है क्योंकिकहानी के मानकों पर यह कहानी पूरी नहीं उतरती. इसकी जिंदगी इसके उन्वान को सही नहींठहराती. ‘निमित्त’ का मतलब शब्दकोशों में ‘कारण’, ‘लक्ष्य’, ‘मकसद’ वगैरह बतलायागया है. इस गद्य में जो घट रहा है, उसका निमित्त जाहिर तौर पर इस गद्य में नहींमिलेगा. यहां गद्यकार के पास वक्त बहुत कम है और घटनाएं बहुत ज्यादा. जैसे एक छोटेसे सफर में कोई हमसफर जब पूरी जिंदगी का सफर जानना चाहता है, तब बयान करने वालीकोशिश ‘क्या घटनाएं हुईं’ यह बताने की होती है, यह बताने की नहीं कि ‘घटनाएं क्योंहुईं’. इस प्रक्रिया में वाग्जाल और विस्तार कम होता है. सुनने वाला इसे संदेह सेनहीं देखता, उसे सोचने का रोजगार मिल चुका होता है. संदेहास्पद कहानियों के दौर में‘निमित्त’ एक ऐसी ही कहानी है— सोचने का रोजगार सौंपती हुई. इसने वह शिल्प नहींचुना है जो मानकों को पूरा करने के लिए अपनी असलियत से अलग हो जाता है. यह कहानी उनकहानियों की तरह नहीं है, एक पैराग्राफ तक चलकर पढ़ने वाले जिनकी उंगली छोड़ देतेहैं. ‘‘जी नहीं, आपके कहने से मैं ईश्वर या धर्म पर विश्वास नहीं कर सकता! आपका खुदाकैसा जीव है! न सुनता है, न देखता है, न बोलता है. उसे कुछ महसूस नहीं होता. वह खुशनहीं होता, नाराज नहीं होता. न्याय-अन्याय से उसे कुछ लेना-देना नहीं. फिर भी आपनेअपनी खुशी के लिए एक कल्पना-लोक बनाया है, जिसमें आप जो चाहें वह हो सकता है. आपकोअपनी कमजोरियों और कमअक्ली को छुपाने के लिए एक खोल चाहिए, आपने अपने बाहर एक शक्तिको मान लिया, जो आपकी कमजोरी और कमअक्ली को दूर कर सकती है, आप उसकी शरण में जातेहैं, उससे गुहार करते हैं, उसकी मनुहार करते हैं, वह नहीं सुनता, नहीं ही सुनता. वहहो तब तो सुने!’’ इतना सुनने की देर थी कि बाबा ने मुझे धक्का मारकर घर से बाहरकिया. ‘‘बदतमीज! हरामखोर! भगवान को गाली देता है!’’ मैं भी चुपचाप निकल गया. बाबाखुद भी जानता है कि उसने रो-रोकर, गिड़गिड़ाकर भगवान से अपनी पहली बीवी की जान की भीखमांगी थी, और भगवान ने उसकी अनसुनी कर दी थी. बाबा जब भी पहली मां की बात करता है,भगवान को एक-दो गाली जरूर देता है. लेकिन मैं कैसे गाली दे सकता हूं? भगवान का ठेकातो बाबा का है. बाबा भी ढकोसलेबाज़ है. मुंह-अंधेरे मैं घर की दीवार से चिपककर सिरझुकाए ऐसे गली पार करता हूं जैसे कोई उल्का-पिंड. तुरंत मेरे पैर इतनी तेज़ी से उठतेहैं जैसे रेल चल रही हो. मैं पूरी कोशिश करता हूं कि घर में किसी के भी जागने सेपहले घर से निकल जाऊं. पहली बार जब आई ने दरवाजा खुला देखा था, तो क्या सोचा होगा!उसने मुझे कुछ कहा नहीं. मुझे पता है, मेरे बाद वही जागती है और सबसे पहला कामदरवाज़ा बंद करने का करती है. रात को भी वह दरवाजा अटकाकर सोती है, मैं जब चाहूं घरआ सकता हूं. घर में सब लोग इस बारे में जानते हैं. कोई कुछ कहता नहीं. सबने मेरे इसरूप को स्वीकार कर लिया है. पहले-पहल बाबा कुछ कहते थे, बाद में उन्हें भी कोई फर्कनहीं रह गया. बाबा कभी-कभी मुझे परेशान करने के लिए दरवाजा बंद कर देते हैं, मैं भीदरवाज़ा नहीं बजाता. चुपचाप लौट जाता हूं. लौट जाता हूं. कहां लौट जाता हूं? कहींभी. घर मेरे लिए मजबूरी है, जैसे सोना. मुझे नींद आने लगती है, तो मैं घर आ जाताहूं. सोता हूं और फिर निकल जाता हूं. कहां? कहीं भी. असल में, घर मेरे लिए एक सरायका काम देता है. जश्न हमारे घर में वैसे भी नहीं मनाया जाता और कभी कुछ हंसी-खुशीका मौका होता है, तो मैं अपनी तथाकथित मनहूस सूरत नहीं दिखाता. त्यौहारों पर भी यहीस्थिति होती है. सब मुझे भूल गए हैं, ऐसा भी नहीं. पर कोई मुझे याद करना चाहता है,ऐसा भी नहीं. मैं उन्हें कुछ दे नहीं पाया. यानी अपने परिवार को. आई हैं, बाबा है,भैया है, भाभी हैं और उनसे जुड़े तमाम रिश्तेदार हैं. रिश्तेदार अक्सर आते-रहते हैंऔर अक्सर ही मैं इधर-उधर भटकता अपनी नींद को बहलाता रहता हूं. भैया की स्थिति भीऐसी ही है, वह भी घर से भागा फिरता है, जबकि वह कमाता है और कमाना अपने-आप में एकजादू है, जो लोगों को आपकी ओर आकर्षित करता है, आप जितना कमाते हैं, लोग उतना हीआपकी तरफ खिंचते चले आते हैं और जहां आपने कमाना बंद किया लोगों को आपसे चिढ़ होनेलगती है, आई भी जली-कटी सुना देती है, फिर और किसी का क्या कहूं. हालांकि मैं भिड़जाता हूं, खासतौर पर रिश्तेदारों के साथ, उनसे मुझे और भी कुछ लेना-देना नहीं रहता.मैं उन्हें खरी-खोटी सुनाता हूं. उनके मुंह पर उनके काले धंधे और धूर्तताओं की बातकरता हूं. वे मुझसे खार खाते हैं. मैं उनसे मजा पाता हूं. आप सोच रहे होंगे मैं कोईकाम क्यों नहीं करता. दरअसल, मैं कोई काम करना नहीं चाहता. काम करने से क्या होताहै? काम करने से आज तक किसी को कोई फायदा हुआ है! कुल मिलाकर रुपए कमाने के अलावाकाम करने का कोई और मकसद मुझे नजर नहीं आता. और मैं रुपए कमाना नहीं चाहता. जीनहीं! ऐसा नहीं कि मैं निठल्ला हूं. मैं पूरा दिन और कभी-कभी पूरी रात भी घूमतारहता हूं. इस गली से उस गली, इस मुहल्ले से उस मुहल्ले, इस चौक से उस चौक. मैंदिन-भर चलता रहता हूं. इस शहर का एक-एक हिस्सा मैं माप चुका हूं. अब यह तो कोई कामनहीं है, और इस काम का कोई रुपए भी नहीं देता. और अगर देता भी, तो मैं लेता नहीं.फिर आप कहेंगे मैं खाता-पीता कहां से हूं? मैं कुछ छोटे-मोटे काम करता हूं.फ्री-लांसिंग समझिए. तब भी मुझे घर से लगाव है. पता नहीं मेरा मन यहां अटका रहताहै. सोने को तो मैं कहीं भी सो सकता हूं. पर कहीं भी सोने पर बाबा घर ले आते हैं.कभी मुझे समझ नहीं आता कि ये लोग मुझसे चाहते क्या हैं? रुपए! बस यही एक चीज! क्यारुपए के बाहर आदमी का कोई काम नहीं! भैया बोलता है कि मैं अव्यावहारिक हूं. मैंध्यान नहीं रखता किसके सामने क्या बोलना चाहिए. मैं मूढ़मगज हूं. ऐसा भैया का कहनाहै. मेरा मानना है कि वह एक हाफ-फ्राई ऑमलेट है, जिसे वास्कोडिगामा ने बनाया था औरजो अब फफूंदा चुका है. वह इंसान नहीं है. रुपए का भक्त है. एक-एक रुपए कानफा-नुकसान जोड़ता रहता है. उसने अपनी एक दुकान डाल ली है. उसी पर ऐंठता है. और कुछनहीं. बाबा जानता है कि भैया मकान के चक्कर में उसकी देख-रेख कर रहा है. अगर आज वोमकान भैया के नाम करा दे, तो भैया कल ही उसे घर से निकाल दे. या कम से कम ऊपरवालीकोठरी में डाल दे, जिसमें अभी मैं डला हुआ हूं. बाबा मुझे ठिकाने से लगाना चाहताहै, लेकिन हार चुका है. वह समझ चुका है कि मुझे नहीं समझाया जा सकता. भाभी अब भीसमझती है कि मुझे दुनियादारी के काम में लगा सकती है, पर मेरा खयाल है वह ग़लत समझतीहै, बल्कि मेरा मानना है कि वह मुझे समझती ही नहीं.उसे मेरी शादी के अलावा कुछ नहींसूझता. उसे लगता है कि शादी ही मेरे मर्ज का ईलाज है. वैसे मेरा मर्ज है क्या?मैंने कहा कि मैं रुपए नहीं कमाता, इधर-उधर घुमता रहता हूं. कभी कोई काम मिल जाए तोकर लेता हूं, वह भी मनमाफिक. मन नहीं हो तो कोई मुझसे काम नहीं करवा सकता, कोईकितना ही बड़ा तीसमारखां क्यों न हो, कितनी ही नौकरियां मैंने ऐसे ही गंवाई हैं.बाबा ने अब किसी से मेरी नौकरी के बारे में बात करना भी बंद कर दिया है. कभी-कभीअच्छा लगता है कि सभी लोगों ने मेरे इस रूप को स्वीकार कर लिया है. खै़र! जब मैंसुबह दीवार से चिपककर तेज कदम गली पार करता हूं, तो मेरा मकसद सीधे बस-अड्डे की तरफजाना होता है. बस-अड्डे पर भाई लोग खड़े रहते हैं. इनमें से अधिकतर लड़के अखबार काइंतजार कर रहे होते हैं. अलग-अलग बसों में अखबारों के बंडल रख दिए जाते हैं और फिरभाई लोग फ्री हो जाते हैं. वे सब मुझे जानते हैं. मैं कभी-कभी उनके साथ भी बैठताहूं, खासकर ठंड के वक्त, जब वे लोग टायर जलाकर हाथ तापते हैं. ज्यादातर लड़के कॉलेजमें हैं, एक-दो अनपढ़ हैं और दो, जिन्हें मैं पहले जुड़वा भाई समझता था, पिछले पांचसाल से दसवीं पास करने की कोशिश कर रहे हैं. यही आठ-दस लड़कों का झुंड हर सुबह यहांपहुंचता है. ये लोग शोर-गुल मचाते हैं. बसों में सवारियां बैठाते हैं, सामान लादतेहैं, ग़रज कि दिन-भर बस-अड्डे पर अपना टाइम काटते हैं और रुपए कमाते हैं. मुझेपढ़ा-लिखा और सीधा-सादा आदमी समझते हैं, सोचते हैं मुझे दुनिया की ज्यादा ही फिक्रहै. लेकिन जैसा कि उस दिन महेश कह रहा था, मैं कुछ नहीं कर सकता. सोचने से कुछ नहींहोता. शायद उस दिन वह किसी से नाराज होगा, और अपना गुस्सा मुझ पर निकाल रहा होगा.वर्ना वह ऐसा क्यों कहता! मैं हर सुबह दो घंटे इसी बस-अड्डे पर बिताता हूं. अब येलोग मुझे हर रोज देखने के आदी हो गए हैं. जब शुरू में मैं यहां आता था, तो ये लोगमुझे हैरत और शक की नजर से देखते थे. धीरे-धीरे मुझे जानने लगे, और मुझे अहानिकारकजानकर मेरी उपेक्षा करने लगे. मुझे उनकी उपेक्षा से कोई फर्क नहीं पड़ता. बसों कीआवाज, लोगों के शोर-गुल के बीच यहां सुबह होती है. अलग-अलग दिशाओं में जाने वालेलोग इकट्ठा होने लगते हैं. कुछ लोग रोज के मुसाफिर हैं, उन्हें भी मैं पहचानता हूं.फिर भी एक अनजानापन सबके चेहरे पर दिखाई देता है. वे लड़के भी मुझे नहीं जानते,दुकानवाले भी नहीं, मुसाफ़िर भी नहीं. वे सब असल में मुझे सनकी समझते हैं. वैसे मैंमृदुभाषी हूं. लेकिन मैं उनकी हां में हां नहीं मिला सकता. खासतौर पर बूढ़ों में मैंयह बीमारी पाता हूं. वे चाहते हैं कि मैं उनकी बातें सिर हिलाकर स्वीकार करता जाऊं,लेकिन ये मुझसे नहीं होता. मैं कैसे काले को सफेद मान सकता हूं, फिर चाहे कोईमहात्मा ही यह बात मुझे क्यों न कहे! पर लोग जब अपने से ही जुदा हैं, तो फिर मुझसेकैसे मिलेंगे! हो ही सकता है, ऐसा मैं सोचता हूं, क्योंकि कभी-कभी मुझे यह भी लगताहै कि यह मेरी हताशा है, जो मुझे ऐसा सोचने पर मजबूर करती है, वर्ना ये लोग तो खुशहैं. अपना काम करते हैं, रुपया कमाते हैं, घर-परिवार देखते हैं, मान-सम्मान पातेहैं. इन्हें बेवजह दुःखी क्यों माना जाए! हर रोज सूरज उस कचरे के ढेर के पीछे सेउगता है. कुत्ते उस ढेर पर लोटते रहते हैं. सुअर चरने के लिए आते हैं. ढेर से कचरानिकालकर ठंड में लड़के जलाते हैं. इस दीवार की टेक लगाए मैं हर रोज की योजना तैयारकरता हूं, यानी आज मुझे कहां जाना है? किधर घूमना है? मैं झूठ नहीं बोलूंगा,कभी-कभी अपनी धुन में मैं शहर से बाहर भी निकल जाता हूं. आस-पास के देहातों मेंचक्कर मारता हूं. मैंने चाय पी, पोहा खाया और त्रिवेणी की तरफ चल दिया. आज का दिनउधर ही गुजारने का विचार था. त्रिवेणी उस जगह का नाम क्यों है? मेरी जानकारी मेंइसीलिए कि कभी वहां तीन नालों का संगम होता था, पर समय के कचरे-गंदगी ने उन नालोंमें बहते प्रसाद जल को काला-बदबूदार बना दिया था और दो नालों पर बस्तियां बन चुकीथीं. एक नाला बचता था, जो अब भी वहीं स्थिर है, काला-बदबूदार जल बहाता हुआ. पर तबजब ये नाले साफ़ पानी से भरे रहते थे कुछ जोगियों ने अपना मठ इनके किनारे बनाया. आजवह मठ बस्ती के बीच आ गया है. लेकिन मठ की बावड़ी बस्ती से थोड़ी दूर है. मठ के पासकाफी जगह है जिसमें कुछ खेत हैं, दुकाने हैं और एक बागीचा और एक बड़ी बावड़ी है. असलमें, त्रिवेणी की तरफ जाने का मतलब इस बावड़ी की तरफ जाना ही है. गर्मियों में बावड़ीके आस-पास इतनी शीतलता रहती है कि सो जाने को मन करता है, पर पुजारी या कभीदुकानवाले आकर उठा देते हैं. और फिर उनसे कौन चिक-चिक करे! पर वे भी मुझे जानतेहैं, और अक्सर टोकते नहीं, पर जानते हैं कि मेरी जेब में माताजी के दान-पात्र मेंडालने के लिए कुछ भी नहीं रहता है, बल्कि भोग वगैरह के वक्त मैं अक्सर उपस्थित रहताहूं. शायद इसीलिए उनके मन में मेरे लिए कुछ कलुष है! पर मैं वहां पहुंच ही गया. अभीआठ ही बजे थे. एक माशूक-आशिक पहले ही बरगद के नीचे बैठे थे. मुझे देखकर थोड़ा संभलगए. किताब लेकर ऐसे देखने लगे, जैसे इतिहास या विज्ञान की सबसे गंभीर समस्या परचिंतामग्न हों. मैंने उनकी उपेक्षा की, और आगे बढ़ गया. देखता क्या हूं कि दूसरेबरगद के नीचे एक और जोड़ा बैठा है. उफ्फ! इन तोता-मैनाओं ने हर दृश्य खराब कर रखाहै. कभी-कभी सोचता हूं कि नौजवानों की उस मुहिम से जुड़ जाऊं, जिसमें ऐसे जोड़ों कोदेखते ही उनके घर फोन कर दिया जाता है, और हीर-रांझे की अच्छी-खासी बेइज्जती कीजाती है। पर, यह क्रूर आनंद मैं मन ही मन लेता रहा. मुझे इन लड़कियों में रुचि नहीं.इन लड़कियों में जान नहीं होती. ये अपने कहे पर टिकी भी नहीं रह सकतीं. मुझे तो लगताहै, मौज-मस्ती के लिए ही ये लोग यहां आते हैं, या किसी भी ऐसी शांत जगह पर जातेहैं, जहां इनकी चहचहाहट कोई न सुने. फिल्मों ने इनके दिमाग का सत्यानाश कर दिया है.हर कोई अपने को फिल्मी नायिका या नायक समझता है. वैसे ही चलते-फिरते हैं.बैठते-उठते हैं. हंसते-रोते हैं. कपड़े पहनते हैं. गाने गाते हैं. इन्हें देश-समाजसे कुछ लेना-देना नहीं है. एक-दूसरे को छूने-चूमने-भोगने के अलावा इनके पास कोईविषय नहीं है. टॉकीज के बच्चे! मैं आगे बढ़ता गया. दूसरे के बाद तीसरा जोड़ा मिला.खै़र हुई चौथा जोड़ा नहीं मिला, फिर भी दो और बरगद छोड़कर मैं सातवें बरगद तक पहुंचा.यह बागीचे का आखिरी बरगद है. इसके बाद खेतों का सिलसिला शुरू हो जाता है. इस बरगदके बाद, कुछ जगह छोड़ कर, जामुन और अमरूद के पेड़ लगे हैं, और साथ में ही मिर्च,धनिया और बैंगन-टमाटर, पुदीना-जैसे पौधे-पत्ते लगे रहते हैं. बागीचे का यह कोना हीमुझे सर्वाधिक पसंद है. इधर तक कोई नहीं आता. मैंने थोड़ी देर में तीनों जोड़ों कीसुध लेने की सोची. समाज में बेहयाई मुझे पसंद नहीं. जो करना है विधि-विधान से करो.यह क्या कि आज इसका हाथ पकड़े घूम रहे हैं, कल उसका मुंह चूम रहे हैं! यह सब मुझेलफंगई लगती है. लड़का करे या लड़की. मैंने देखा तीनों यथावत प्रेम-क्रीड़ा में संलग्नहैं. वे मुझे भूल चुके. एक लड़की की खीं-खीं मेरे तन-बदन में आग लगा गई. झुंझला करमैंने एक पत्थर उठाया, और पहले बरगद की ओर फेंका. मुझे अचानक इन लोगों पर गुस्साआने लगा था. पत्थर सीधे लड़की के सिर पर लगा था. लड़की खून-झार हो गई. लड़का दौड़ करमेरी तरफ आने लगा. मैं शांत मूरत बनकर बैठा रहा. एक पल के लिए लड़का रुका, फिर पीछेदौड़कर गया. लड़की को देखने लगा. फिर दौड़ कर मेरी तरफ आया. लड़की की चीख सुन करबीचवाले दोनों जोड़े भाग गए थे. लड़का मेरे पास पहुंचा, ‘‘भैया, देखिए न दीदी को किसीने पत्थर मार दिया है.’ मेरी जान में जान आई, मुझे समझ आया कि उसे मुझ पर नहीं किसीऔर पर शुबहा है. मैं उसके साथ दौड़ कर उस तरफ गया. देखा कि लड़की प्राण त्याग चुकीथी. उसकी सफेद चुनरी लाल हो गई थी. एकबारगी मेरे शरीर में झुनझुनी दौड़ गई. मैंनेबोला, ‘यह तो गई.’ लड़का वहां से भाग खड़ा हुआ. मैं चिल्लाता रहा, ‘‘अबे! कहां भागरहा है? क्या कर दिया लड़की का?’’ मैंने देखा अब वहां कोई नहीं था. मैंने लड़की काचेहरा गौर से देखा. वह मेरी भाभी थी. अब मैं लड़के का चेहरा याद करने लगा, लेकिनमुझे याद नहीं आ रहा था. मैं धीरे-धीरे उस जगह से दूर निकल गया. मन फिर शांत होनेलगा. मुझे नहीं पता कि मैंने इतनी आसानी से यह फैसला कैसे ले लिया. मुझे अपनी आज कीयोजना में फेर-बदल करना पड़ा. मैं अब शहर के दूसरे कोने की ओर जाना चाहता था. लेकिन,शहर के अंदर से होकर नहीं. मैंने सोचा था कि एक बजे तक गंगानगर पहुंच जाऊंगा. वहींकुछ खाऊंगा, और फिर शाम वहीं काटूंगा. गंगानगर शहर का बाहरी इलाका है. यह नगर अभीबस रहा है. जब सरकार ने गरीबों के लिए घर बनाने की सोची, तो शहर के बाहर इस कूड़ेदानको चुना. इसके आगे खेत शुरू हो जाते हैं और फिर ऊबड़-खाबड़ जमीन जो जंगल में बदलतीजाती है. गंगानगर भी एक बस-अड्डा है. यह एक छोटा बस-अड्डा है. यहां से गांवों कीतरफ जाने वाली बसें मिलती हैं. बस-अड्डे से थोड़ी दूर सड़क के किनारे एक दुकान है,जहां दिन में आपको खाना मिल सकता है. मैं खाना खाकर झरने तक घूमने भी जाऊंगा, औरअगर मन हुआ, तो नहा भी लूंगा. दुकान तक पहुंचते हुए एक बार मेरे पैर लड़खड़ाए, जैसेमुझे चक्कर आ गया हो. मैंने खुद को संभाला और दुकान के बाहर लगी बेंच पर बैठ गया.दुकानवाला मेरा मुंह ताक रहा था. फिर मेरी ओर देख कर मुस्कुराने लगा. मैंने एकदर्दभरी मुस्कान दी. वह मेरे पास आकर बोला, ‘‘क्या हुआ?’’ मैंने कहा, ‘‘चक्कर आगया!’’ वह फिर मुस्कुराने लगा. ‘‘अभी तो गर्मी शुरू भी नहीं हुई, अभी से चक्कर खाकरगिरने लग गए.’’ अब मैं मुस्कुराया. मैंने खाना खाया और एक लस्सी पी. जान में जानआई. पर एक फांस-सी गले में लग रही थी. बार-बार प्यास लग रही थी. आखिर मैं उठकर झरनेकी तरफ चल दिया. इस पगडंडी से मैं कई बार झरने की तरफ गया हूं. मैं देख रहा था,आसमान एकदम साफ था. नीला. कुछ एकदम सफेद-झक बादलों के टुकड़े थे, जो इधर-उधर खिसकरहे थे, ऐसा लग रहा था जैसे नीले दवात पर रुई के फाहे इधर-उधर तैर रहे हों. अब इसपगडंडी पर मैं अकेला चला जा रहा हूं. धीरे-धीरे शहर की सब निशानियां गुम होती जारही हैं. तालखेड़ी आ गया. गांव के किनारे होते हुए मैं आगे बढ़ता जा रहा हूं. देखताहूं कि पगडंडी पर कुछ लोग अर्थी लिए जा रहे हैं. मैं धीरे चलने लगता हूं, ताकि उनलोगों से एक निश्चित दूरी बनाए रख सकूं, पर कदम अपनी गति पकड़ लेते हैं. मैं उनकेकरीब पहुंच गया हूं. उलझन में हूं, उन लोगों से आगे निकलना ठीक नहीं जान पड़ रहा,पता नहीं क्या सोचने लगें. कहीं कोई झगड़ा न करने लगे. आखिर, मैं उनके पीछे-पीछेचलने लगा. एक-दो लोगों ने मुझे पलट कर देखा, और फिर अपनी गति से चलने लगे. कुछ देरमें वे लोग पगडंडी छोड़कर खेत के रास्ते आगे बढ़ गए. मैं झरने की तरफ बढ़ने लगा. झरनेके पास जाकर बैठ गया. शाम हो चुकी थी. दूर-दूर तक पंछियों के झुंड दिखाई दे रहे थे.झरने के पास कुछ पक्षी-दल उतरते, और दाना-पानी करके आगे बढ़ जाते. कुछ ही मिनटों मेंवह जगह पंछियों के कलरव से भर गई. झरने की आवाज पंछियों के शोर-गुल में दब गई. इनपंछियों को मेरे आस-पास भटकने से डर नहीं लग रहा था. मैं मूर्ति की तरह अचल बैठाथा. मेरे कंधे, सिर, गोद सब पर पंछी बैठे थे. मैं आंखें बंद कर उनके नाखूनों औरचोंच के वार सह रहा था. मुझे इस काम में अद्भुत आनंद मिल रहा था. जैसे, शरीर औरदिमाग दोनों एक साथ हल्के होते जा रहे थे. जीवन का कौन-सा सुकून था, जो इस रास्तेमिलना था! मेरा मन शांति से सराबोर था. इस तरह ताजा महसूस हो रहा था, जैसे शरीरश्मशान का धुआं खाने के बाद नहाने पर करता है. मेरा रोम-रोम धुल रहा था कि एक आदमीने हांका लगाया. वह दौड़ कर मेरे पास आ गया. मैंने चौंककर उसे देखा. वह हांफ रहा था.अचरज से मेरी ओर देखते हुए बोला, ‘‘क्या हो रहा है?’’ मैंने पहले अपनी तरफ़ देखा,मेरे शरीर पर जगह-जगह घाव हो गए थे, पर मुझे दर्द नहीं हो रहा था. मेरा शरीर जैसेसुन्न था. दिमाग़ भी कुछ ग्रहण नहीं कर रहा था. मैं उस आदमी को देखता रहा. उसके पीछेनीला आकाश था. मुझे चक्कर-सा आने लगा. जब जागा तो देखता हूं, अपने घर में हूं, मेरीझाड़-फूंक हो रही है. मेरे शरीर के घाव कसक रहे हैं. मैं आई को आवाज़ देता हूं. आईमेरे पास आ कर बैठ जाती है. मेरी नजर भाभी की माला चढ़ी तस्वीर पर पड़ती है. मैं रोनेलगता हूं. आई मेरे सिर पर हाथ रखती है, और कहती है, ‘‘सब ठीक हो जाएगा.’’ लेकिनमेरी आंखों से आंसू बहे जा रहे हैं, और मैं लगातार कहे जा रहा हूं, ‘‘मैं अब रुपयाकमाऊंगा’’ एक साधु मेरे पास आ कर खड़ा हो जाता है. मैं अपनी बात दोहराए जा रहा हूं.वह मेरे सिर पर भभूत मलता है. मुझे पसीना आने लगता है. मैं अपनी बात दोहराए जा रहाहूं. बाबा मेरे पास आकर खड़ा होता है. थोड़ी देर मुझे देखता रहता है, फिर एक जोरदारतमाचा जमाता है, और मैं चुप हो जाता हूं, उसका मुंह देखने लगता हूं. वह एक ऐसा दिनथा, जिसने मेरी जिंदगी बदल दी. मैंने भैया के सामने भाभी के साथ हुई दुर्घटना परदुःख जताया, और अपनी सफाई में यही कहा कि मुझे पता ही नहीं. किसी आवाज़ के पीछे-पीछेमैं झरने तक चला गया था, और फिर आगे क्या हुआ मुझे पता नहीं. बात यही थी कि तालखेड़ीका ही कोई आदमी मुझे झरने के पास से उठाकर लाया था, बाद में गंगानगरवाले दुकानदारसे बात करके पता चला कि उसने ही मेरे मामा को सूचित किया था. वह मेरे मामा कापुराना दोस्त है. फिर मैं एक दिन अस्पताल में भी बेहोश रहा. घर पर भी एक-दो दिनबदहवासी की हालत में रहा. धीरे-धीरे मेरे घाव भर गए. कई बार सोचा कि भैया या आई कोबता दूं कि भाभी को पत्थर मैंने ही मारा था. पर इससे बात उलझ जाएगी. वे लोग समझनहीं पाएंगे, और मैं भी समझा नहीं पाऊंगा. अब मैं बस-अड्डे या त्रिवेणी या गंगानगरया शहर-सराय की तरफ नहीं जाता. इधर-उधर भटकना भी मैंने बंद कर दिया है. मन में एककचोट रहती है, पर कोई तरीका नहीं सूझता, क्या करूं? जो मैंने किया है, उसका कोई दोषअपने ऊपर नहीं मानता. आखिर, मैंने जानबूझ कर कुछ नहीं किया. मुझे क्या पता था किपत्थर सीधा जाकर उसको लगेगा. और वह मेरी भाभी होगी, और वह भी इतनी कमजोर कि एकपत्थर की चोट भी नहीं झेल पाएगी! भैया दूसरी शादी के लिए गोटी सेट कर रहे हैं. उनकीएक मुहब्बत थी. पिछले ही साल उसके भी पति का देहावसान हो गया. वह भी गली में हीरहती है. आई ने उसकी मौसी से बात की है. हो सकता है कि अगले साल मेरे पास फिर सेभाभी हो. आई मेरी भी शादी कराना चाहती है. मैंने भी इनकार नहीं किया. जिनरिश्तेदारों को मैं गाली दिया करता था, उनके साथ भी अब तमीज से पेश आता हूं. भगवानको उल्टा-सीधा बकना भी मैंने बंद कर दिया है. सब्जी-मंडी में हिसाब देखने का कामपकड़ा है. काम अच्छा है. सुबह-सवेरे सब्जी-मंडी पहुंच जाता हूं, दिन-भर वहीं फलों औरसब्जियों की गंध में कटता है. शाम को सीधे घर पहुंचता हूं. टी.वी. देखता हूं. कभीचौक तक घूम आता हूं. फिर सो जाता हूं. भाभी मेरी शादी करवाना चाहती थी. अगर जिंदारहती तो कितनी खुश होती कि मैं काम-धंधे से लग गया हूं और लड़की देखने के लिए उत्सुकहूं. पर कौन जाने, तब ऐसा होता भी! आखिर वह दिन भी आया, मेरी शादी हो गई. मैंने जबकरुणा का घूंघट उठाया, मेरा दिल धक्क करके रह गया. एकबारगी लगा, भाभी है. मैंनेखट्ट से घूंघट छोड़ दिया. दूसरी बार घूंघट उठाने की मेरी हिम्मत नहीं हुई. आखिरकरुणा ने ही घूंघट उठा दिया. मैं उसका चेहरा देखकर फूला नहीं समाया. मेरा वहम था औरकुछ नहीं. मैंने करुणा के कंधों को चूमा. मेरी शादी हो गई थी, पर मैं करुणा से एकदूरी बनाए रहता था. उसके साथ अकेले रहने में मुझे शंकाएं घेरने लगती थीं. वह मेरेअतीत के बारे में कुछ नहीं जानती! मैंने कहां-कहां खाक छानी है? कैसे-कैसे पापड़बेले हैं? वह कुछ नहीं जानती! वह मुझसे कुछ जानना भी नहीं चाहती. वह अपने में खुशहै. बस उसे एक बच्चा चाहिए, फिर वह और खुश हो जाएगी. मुझे लगता है, उसकी जिंदगी मेंबस खुश होना ही लिखा है. वह हमेशा प्रसन्नचित्त रहती है. मैं भी उसे देख कर खुशहोता हूं. वह चपल है. चंचल है. जीवन से भरी हुई है. फिर भी, कभी-कभी मुझे डरा देतीहै. रात को जब वह पानी पीने उठती है, मैं उस पर नजर रखता हूं. अगर वह गु़सलखाने मेंजाए और ज़्यादा देर लगाए, मुझे आतुरता होने लगती है कि वह क्या कर रही है? मेरी शंकाठोस होने लगी जब एक दिन मैंने करुणा को कमरे में अकेले कुछ बुदबुदाते सुना. मैं ऐसीबुदबुद अक्सर सुनता रहता था, पर पहली बार मैंने साफ-साफ सुना. यह करुणा की हीबुदबुदाहट थी. मैंने गुसलख़ाने के दरवाजे पर कान टिका दिए. वह कुछ मंत्र-सा बुदबुदारही थी. बीच-बीच में मेरा नाम ले रही थी. गुसलख़ाने से अगरबत्ती की गंध आ रही थी.उसकी बुदबुदाहट तेज़ हो रही थी. मेरे मुंह से आवाज नहीं निकल रही थी कि एक हल्की-सीआवाज निकली, ‘‘करुणा.’’ अंदर से बुदबुद की आवाज बंद हो गई. मेरी सांस में सांस आईकि देखता हूं करुणा बालकनी से झाडू़ निकालती हुई कमरे में खिसकती आ रही है. वह मेरीओर देख कर हल्के-से मुस्कुराती है, और अपने काम में मगन हो जाती है. मैं गुसलख़ानेका दरवाज़ा खोलता हूं, अंदर बाल्टी में बूंद-बूंद पानी चू रहा है. मेरा हलक सूख रहाथा, मैं गु़सलखाने का नल कसके बंद कर रसोई की ओर चला गया. आई और भैया रसोई में बैठेभैया की शादी में लगने वाले सामान की लिस्ट तैयार कर रहे थे. मैंने पानी पीया और आईके घुटने पर सिर रख रोने लगा. आई बोली, ‘क्या हुआ?’ मैं कुछ कह न सका. रोना बंदकरचुपचाप आई की गोद में लेट गया. मैं सोचता हूं कि अब समय इस बोझ को बढ़ाता ही जाएगा.मैं कभी यह स्वीकार नहीं कर सकूंगा कि मैंने ही भाभी को मारा है, अनजाने में हीसही. उन दिनों की उदासी और खीझ याद करके अब भी मेरा मन भर आता है. पता नहीं, उनदिनों क्या धुन रहती थी. कहीं मन नहीं लगता था. और अब, मन बीच-बीच में बेवजहहड़बड़ाने लगता है. सांस फूलने लगती है. भैया की शादी हो गई. मेरे और करुणा के पास एकलड़की है. पता नहीं क्यों, आई ने उसका नाम महिमा रख दिया है! महिमा भैया की पहलीपत्नी का नाम था. मेरे जीवन में और एक शाश्वत दुःख इस नाम के साथ आ गया. मैं आई कोसमझा भी नहीं पाया कि क्यों यह नाम नहीं रखना चाहिए. उल्टा मैंने देखा, आई ने जबमुझसे पूछा कि इसका नाम महिमा रख दें, तो मैंने ऐसे सहर्ष स्वीकृति दी, जैसे मैंखुद यही नाम रखने वाला था. पर इन दो वर्षों ने मुझे पूरी तरह बदल दिया. मेरे बालसफेद हो गए हैं. चेहरा झुलसा हुआ लगता है. शरीर के पुराने घाव फिर उभर आए हैं. क्याबीमारी है, कुछ पता नहीं चलता. शरीर से मवाद निकलता रहता है. दर्द होता है.हगन-मूतने से भी मोहताज हो गया हूं. करुणा दिन-रात मेरी देख-भाल में लगी रहती है.महिमा से ज्यादा बच्चा मैं हो गया हूं. देखता हूं, सबको मेरी फिक्र लगी रहती है.भैया जैसा रुपयों का दास, मेरे ईलाज पर अपना सब कुछ लुटा चुका है. पर, मेरा शरीरछीजता जा रहा है. घावों के आस-पास लगता है मांस खींचा रहा है, जैसे घाव का छेद औरबढ़ने वाला है. तेज दर्द होता है. मैं चीखता रहता हूं. महिमा का कमरा अलग कर दियागया है. उसे आई के कमरे में सुला दिया जाता है. नई भाभी मुझसे घृणा-सी करती है.उसका चेहरा देखकर मुझे अपने जीवन से और निराशा हो जाती है. लगता है, मैं मर हीजाऊंगा. अब सोचने की क्षमता भी जवाब दे रही है. मैं कुछ बुदबुदाता रहता हूं. कोईसमझ नहीं पाता. करुणा भी रूखी और उदास होती जा रही है. बात-बात पर भाभी से झगड़ पड़तीहै. कभी मुझे एक-दो दिन आराम भी रहता है. पर यह आराम शारीरिक होता है. घाव जैसेटीसना कम कर देते हैं. वह भी आखिर थक जाते हैं. लेकिन दिमाग में ख्यालों का अंबारलग जाता है. करुणा का क्या होगा? महिमा का क्या होगा? कभी एक लाल चुनरी हवा मेंलहराती दिखती है. धीरे-धीरे मैं खत्म हो रहा हूं. एक दिन करुणा महिमा का झूला मेरेपलंग के पास डालकर खाना बनाने रसोई चली गई. महिमा थोड़ी देर हंसती रही, फिर चुप होगई. मैंने पलंग पर लेटे-लेटे ही महिमा को संबोधित कर अपनी बात शुरू की... मैं नहींजानता, उस दिन मुझे क्या हुआ था. पर न जाने क्यों, मैं अब भी, खुद को गुनाहगार नहींमान पाता हूं. आख़िर, वह एक पल का बहाव था. होनी कौन जानता था? आदमी किन-किन चीजोंके वश में नहीं होता. वह सोचता कुछ है, कहता कुछ है, करता कुछ है और होता कुछ औरहै. किसका मनचाहा हुआ है दुनिया में. हां, ठीक है, मैं सच्चे मन से मानता हूं किमैंने ही भाभी को मारा है. बस! मुझे लगा कि मेरे मन से एक बोझ हट गया. धीरे-धीरेरात घिर आई. दो साल में मेरा हाल यह हो गया था कि अगर कोई मुझे पहली बार देखता, तोबाबा का भाई ही मानता. मेरे सारे बाल पक गए थे. दवाइयां खा-खाकर मुंह का स्वाद बिगड़गया था. हमेशा थूकते रहने की इच्छा होती थी. धीरे-धीरे चारों ओर सन्नाटा पसर गयाथा. पूरा शहर इस वक्त सो रहा है. नहीं, पूरा शहर कभी नहीं सोता. लेकिन जितना सो रहाहै, उतनों के सपने हैं, हां ठीक है, सब लोग सपने भी नहीं देख रहे हैं, लेकिन आज रातजो लोग सपने देख रहे हैं, वे सब सुन लें, ‘‘मैंने ही अपनी भाभी की जान ली है.’’हमेशा मैं ऐसा नहीं करता, पर आज मैंने दवाई नहीं ली. मैं चुपचाप लेटा था. कभी नींदका बगुला पलकों पर बैठ जाता था और कभी पंख फड़फड़ाकर उड़ जाता था. मेरी नींदें हरामथीं. इसीलिए मुझे दवाई खाकर सोना पड़ता था, पर कभी-कभी, मैं उसे टाल भी देता था.यानी खिड़की से बाहर फेंक देता था. यह काम सफाई से करना होता था, वर्ना आई, करुणा सबलोग मुझे पचास बातें समझाने लगते, जिनसे मन और कमजोर हो जाता है. चांदनी का एकटुकड़ा खिड़की से कमरे के अंदर गिरा हुआ था. मैं उसी को देख रहा था. करुणा वहीं लेटीथी. करुणा की देह अब भी आकर्षक है. आखिर वह 23 साल की है. कसी हुई. एक बच्चे की मांहोकर भी वह अभी ढिलमढल्ला नहीं हुई है. उसका हंसना कम हो गया है, लेकिन वह आनंद कीमूर्ति है. उसे देखकर मन प्रफुल्ल हो जाता है. अचानक चांदनी के टुकड़े पर एक सायादिखाई दिया. उसने करुणा को हल्के से हिलाया. करुणा जागी, हड़बड़ाई, और पलंग की ओरदेखने लगी. मैंने एक पल के लिए आंखें बंद कर लीं, और फिर पलकों की कोर से देखनेलगा. करुणा उठकर मेरे पास आई. दो पल मुझे देखा, और फिर मुझे हल्के से हिलाया. मैंऐसे पड़ा रहा, जैसे बेहोश हूं. वह आदमी वहीं चांदनी के टुकड़े पर लेटा हुआ था. करुणाभी उसके पास जाकर लेट गई. मैं उनकी काम-लीला देखता रहा. पता नहीं, मेरे मन को क्यासुख मिल रहा था! मेरी आत्मा तृप्त हो रही थी. मुझे लग रहा था, जैसे मेरे मन परबरसों से रखा कोई बोझ हट रहा है. थोड़ी देर में देखा चाँदनी के टुकड़े पर अकेली करुणारह गई थी. लेकिन अब उसकी देह देख कर मुझे घिन आ रही थी. सारा आकर्षण मुलम्मे की तरहउतर रहा था. मेरे मन में ईर्ष्या पैदा हुई. बदले की भावना. अब मैं करुणा से बदलालेना चाहता था. आखिर उसने मुझे धोखा दिया है. भाभी भी तो धोखा दे रही थी, अनजाने हीउसे सज़ा मिल गई. मैं अपने घावों के ठीक होने की दुआ करने लगा. मैं चुप था. करुणामेरी रोज की तरह सेवा कर रही थी. जैसे कुछ हुआ ही नहीं. पर अब उसके हर स्पर्श मेंमुझे अजीब झनझनाहट महसूस होती थी, जैसे उसका बदन कोई गलीज चीज हो. कभी-कभी मैं उसकेहाथ से अपने को बचाने की कोशिश करता था. मुझे लगता है कि करुणा को कुछ भान हुआ था.मैं भी सचेत रहने लगा. धीरे-धीरे मैं ठीक होने लगा. बाल तो सफेद ही रहे, लेकिन घावभर गए. करुणा का हंसता चेहरा धीरे-धीरे उदास होने लगा. अब उसके खाट पकड़ने की बारीथी. आई ने कहा, ‘‘तेरी सेवा ने ही उसे थका दिया है. अब तू उसकी तीमारदारी कर.’’मैंने भी उसकी सेवा का बीड़ा उठा लिया. उसे बुखार आ गया था. काम का बोझ तो उस पर बढ़ाही था. महिमा को जन्म दिया, और फिर मेरी उपचार-व्यवस्था करती रही. फिर घर केकाम-काज अलग! और फिर वह आदमी. मेरे मन ने ईर्ष्यामयी क्रूर अट्टहास किया. वह भी तोमेहनत का काम है. मुझे महिमा के अपनी बच्ची होने पर शक होना लाजमी था. मैं दिन-भरउसके चेहरे से अपना और करुणा का चेहरा मिलाता रहता था. मुझे विश्वास हो गया कि वहमेरी लड़की नहीं है. महीनों बाद मैं बाजार गया. जब लौटकर आया तो रात गहरा चुकी थी.घर पर सब लोग सो गए थे. दरवाजा अटका हुआ था. मैं दरवाजा बंद करके अपने कमरे की ओरचल दिया. कमरे में चांदनी का टुकड़ा वैसे ही पड़ा था. करुणा सो रही थी और महिमा भी.मैंने पास जाकर दोनों को गौर से देखा. मेरे दिमाग में उस रात का दृश्य चलने लगा.धीरे-धीरे दिमाग पर एक धुन सवार हुई. मैं गुसलखाने में गया और वहां से कपड़े पीटनेकी मोगरी ले आया, और मां-बेटी दोनों को दुनिया से पार कर दिया. मेरे मन में नहैरानी थी, न डर. मैं चांदनी का टुकड़ा देख रहा था और दो साए. इस बार भी मुझे सजानहीं हुई. एक आदमी पकड़ा गया, जिसका नाम मनीष था. मैंने सोचा, मुझे अपना जुर्म कबूलकर लेना चाहिए. पर मेरा मन फिर एक क्रूर अट्टहास कर उठा. यह आदमी करुणा का प्रेमीथा. मैं अपना काम करके कमरे से निकला, और कुछ देर में वो कमरे में घुसा. कमरे कीहालत देख कर उसकी चीख निकल गई. सारे लोग दौड़े आए. देखा, तो वह आदमी था और करुणा औरमहिमा की लाश थी. उसे पकड़ कर पुलिस के हवाले कर दिया गया. उसने भी अपना जुर्म कबूलकर लिया. तब मैंने सोचा, मैं क्यों दूसरे के फटे में पांव डालूं. आखिर, यह सब उसीकाकिया-धरा था. अगर वह उस रात न आता, तो मैं एक-दो दिन में मर ही जाता. पर उसी कीमेहरबानी कि मैं जिंदा हूं और दो बच्चों का बाप हूं. अब मुझे ईश्वर पर दृढ़ विश्वासहै. ईश्वर-विरोधी मुझे फूटी आंख नहीं सुहाते. सोचता हूं कि अगर ईश्वर नहीं है तोइतनी बड़ी दुनिया का नियंता कौन है? कोई शक्ति, कोई बल तो है, जो मुझसे परे है, जोमेरे माध्यम से अपना काम करता है. मेरी आत्मा भी तो उस परम-आत्मा का ही अंश है.मेरे मुंह से जो शब्द निकलते हैं, वह भी तो उस परमपिता के हैं. मेरे हाथों जो कुछहोता है, वही करवाता है. मैं तो निमित्त मात्र हूं. कर्ता कोई और है! उसकी लीलाअपरंपार है. वह जैसा सोचता है, वैसा ही होता है. उसकी मर्जी के बिना एक पत्ता भीहिलता हो तो कोई मुझे बता दे! वह सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ है. मैं उसका दास हूं. जोवह चाहता है, मुझसे करवाता है. मैं निर्बल हूं. प्रार्थना के अलावा मैं कर ही क्यासकता हूं. हे परमपिता, परमेश्वर, परमात्मा! विकल-पीड़ित आत्माओं को शांति दे! शांतिदे!! शांति दे!!!