निशांत बीस बरस के हैं. इन्होंने विद्यालय में आठवीं के बाद कभी हिंदी नहीं पढ़ी.लेकिन मुक्तिबोध, निर्मल वर्मा, मोहन राकेश, भीष्म साहनी, कमलेश्वर, इस्मत चुगताई,मंटो, दुष्यंत कुमार को पढ़ना अच्छा लगता है और अज्ञेय को पढ़ना चाहते हैं. फिलहालराष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान रायपुर में छठवीं सेमेस्टर के छात्र हैं. इनकी एककहानी 'निरबंसिया प्रेत' एक कहानी रोज़ में हम कुछ रोज़ पहले आपको पढ़वा चुके हैं. अबनिशांत ने एक और कहानी हमें भेजी है. हम आपको पढ़ा रहे हैं…यूं तो विद्यालय से खत्म होकर विश्वविद्यालय में शुरू होने वाला सफर एक साधारणव्यक्ति को बदलने के लिए काफी होता है. पर पिछले पांच सालों में शायद मैं उतना नहींबदल सका जितना आस-पास के लोग बदल गए. अगर बदलाव में एक रफ्तार न हो तो लोग उसेबदलाव मानने से इंकार कर देते हैं. कई घटनाएं मेरी जिंदगी मे बिन बुलाए आती रहींजिन्हें नहीं आना चाहिए था. मैंने पहले घटनाओं को समझने की कोशिश करने के बादउन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया. अब उनका खुलासा करने का भी मन नहीं होता जिसके चलतेघटनाओं का अर्थ और गहराता चला जा रहा है. विद्यालय के समय में मैं अपने आपको लेकरबहुत असहज रहता था. कुछ ऐसी चीजों से डरता था जिनका आज अस्तित्व ही नहीं मालूम पड़ताहै. एक अजीब-सी घबराहट रहती थी. बोलने में डर लगता था, बोलने से पहले हजार बारसोचता था. ऐसा लगता था कि कहीं मेरे बोलने पर लोग हंस न दें. खासकर अगर लड़कियां हंसदेती तो मन में ग्लानि लिए कुछ दिनों तक निराश रहता. बारहवीं में बहुत अच्छे अंकोंसे मैंने परीक्षा पास की. फिर पापा ने मुझे एक अनजान शहर में भेज दिया, पढ़ने केवास्ते. एक गांव से शहर में आना मेरे लिए अपने खालीपन के बोझ के तले दबने जैसा था.मन बिल्कुल नहीं लगता. जब किसी बस को देखता तो ऐसा लगता की बस मेरे गांव ही जा रहीहै. मेरी दादी जो की अनपढ़ हैं, अपना हस्ताक्षर भी नहीं कर सकती, मैं उनकी बातों कोयाद करके कुछ दिनों तक जीता रहा. दादी अक्सर कहती थी कि जिनके पास आज धन नहीं है,पढ़ाई ही उनके लिए सबसे बड़ी पूंजी है. मेरे गांव का माहौल ऐसा रहा है कि लोगपढ़ाई-लिखाई के लिए अपना खेत तक बेच देते हैं. खेत एक निशानी होता है हमारे पूर्वजोंद्वारा किए गए संघर्ष का. खेत बस खेत भर नहीं होता, खेत में हमारे पूर्वजों काखून-पसीना और पानी लगा रहता है. हमसे दूर जाकर भी इन खेतों की वजह से ही तो वेहमारे करीब होते हैं. इसीलिए मैं खूब जी लगाकर पढ़ाई करता. समय से उठता, कॉलेज जाता.अपने भीतर की असहजता को खत्म करने के लिए मैंने शहर से बात करना शुरू कर दिया. मैंशहर को जानने की कोशिश करने लगा. रविवार के दिन मैं अकेले ही दुपहरी में अनजानमुहल्लों में किसी बंजारे की तरह विचरने लगा. इससे मेरे भीतर जो एक डर बना रहता था,उस डर पर मैंने काबू पा लिया. पर असहज अभी भी था. अगर कोई लाश को गुजरते देखता तोअपनी दादी की याद आने लगती. दादी उम्र की जिस दहलीज पर थी उसका डर बना रहा. किसीरोती हुई औरत को देखता तो मां की याद आने लगती क्योंकि अपनी मां को मैंनै कभी हंसतेहुए नहीं देखा था. हंसती हुई औरतों को देखकर मुझे कभी डर लगता तो कभी क्रोध भी आता.क्योंकि मेरी मां अक्सर ही कुछ हंसती हुई औरतों को देखकर रोने लगती थीं. सब कुछअलभ्य चाहतों की तरह होता चला जा रहा है. मैं भी घटनाओं को बिना छेड़े अपने भीतर सेगुजरने दे रहा था. अगर कुछ अच्छा नहीं हो रहा हो तो अलभ्य घटनाओं का महत्व और बड़ाहो जाता है. इन्हीं घटनाओं के बीच एक और घटना घटी. मेरे हॉस्टल के कमरे में मेरेसाथ रहने के लिए एक लड़का आया – चंद्रमाधव. राजनीतिशास्त्र का छात्र था चंद्रमाधव.चंद्रमाधव मेरी जिंदगी में कुछ इस तरह आया जैसे कि एक मछली का पानी में पहली बारजन्म हुआ हो. चंद्रमाधव का स्वभाव तो मेरे स्वभाव से मिलता था पर वह एकदम सहज था औरउसको भी अपने गांव को छोड़ कर एक अनजान शहर में आने का मलाल था. मैं चंद्रमाधव केबारे में जो कुछ भी बताने जा रहा हूं, वह उसकी जुबानी है, मैं बस लिख रहा हूं.चंद्रमाधव की जिंदगी में उसके लिए आखिरी और अंतिम सच्चाई उसकी दादी बची हुई हैं. वहअपनी दादी को दादी-मां बोलता है क्योंकि दादी में अपनी मां का अंश सबसे अधिक होताहै. चंद्रमाधव कहता कि दादी को मां कह कर पुकारना तो थोड़े अपनेपन के लिए है औरअपनेपन का दिखावा करना पड़ता है, अपनों के लिए नहीं पर दुनिया के लिए जरूर. दादी कोमां बोलने का एक कारण यह भी हो सकता है कि जब चंद्रमाधव की मां मर रही थी, तब वहअपना सारा प्यार, छोह, मोह, स्नेह, स्पर्श दादी मां की गोद में छोड़ कर ही इस दुनियाको अलविदा कह रही होंगी. चंद्रमाधव की मां उसको आठ साल की उम्र में ही उसको छोड़ करचली गई थी. ये बातें चंद्रमाधव को याद नहीं पर इन बातों का जिक्र चंद्रमाधव की दादीउससे अक्सर करती हैं. मैं सोचता हूं कि एक बूढ़ी औरत के लिए अपनी बहू की मौत कीदास्तान सुनाना किसी प्रलय की कहानी को सुनाने जैसा है. अपने प्रलय की कहानी एकमजबूत और सशक्त औरत ही सुना सकती है. कोई कह सकता है कि वह औरत कठोर और निर्ममहोगी. पर प्रलय के बाद अस्तित्व संघर्ष और मूल्यों के स्थापत्य को बनाए रखने के लिएशायद कठोर और शांत होना जरूरी होता है. शायद दादी मां के मस्तिष्क में प्रलय का कोईशिलालेख मौजूद है जो उन्हें जीने की ताकत देता रहता है. मैं धीरे-धीरे चंद्रमाधवमें बस गया और इस बीच एक बार गांव होकर भी आ गया. खुशी की बात यह थी कि गांव केमुखिया के घर में टेलीफोन का कनेक्शन लग गया था और मां नहीं तो दादी से पंद्रह दिनमें एक बार बात भी हो जाती थी. हमारी परीक्षाएं भी समाप्त हो गई थीं और अब बस घरजाने की जल्दी थी. उसी रात चंद्रमाधव ने मुझसे कहा कि क्या तुम मेरे साथ मेरा गांवनहीं चलोगे. मैं भी आखिर में राजी हो गया. अपने गांव के मुखिया के यहां फोन करके इसबात की खबर अपनी मां तक पहुंचा देने को कह दिया. नई जगह जाने में एक अज़ीब तरह कीललक होती है. मन में अजीबोगरीब प्रश्न उठते रहते हैं. पांच घंटे का सफर था. पांचघंटे बाद मैं एक पुराने खपड़ैल के मकान के सामने था. ऐसा मकान अमूमन जमींदार लोग हीबनाते थे गांवों में. बड़ा -सा फाटक, खपड़ैल अटारी, बड़ा -सा आंगन और घर के आगे एक बड़ासा दलान. दलान को अगर कोई गौर से देखे तो पता चल सकता था कि अब जमींदारी के दिन लदगए थे. दलान बिल्कुल खंडहर का रूप ले चुका था. दीमकों के आक्रमण के चलते चौखट-किवाड़भी बदरंग दिख रहे थे. चंद्रमाधव को देखते ही उसकी दादी उससे लिपटकर रोने लगीं. एकयही करीब पंद्रह साल की कोई लड़की ओसारे में एक कमरे के चौखट पर बैठी थी. चंद्रमाधवको देखते ही वह आकर उससे लिपट गई. लड़की चंद्रमाधव की छोटी बहन थी. उसका नाम दीपाथा. चंद्रमाधव ने मेरा परिचय अपनी दादी से करवाया. हमलोग हाथ-पांव धोकर घर के बगलवाले कमरे में आराम करने चले गए. उसकी दादी इस कमरे को मेहमान कोठरी कहती थी. खानाखाने से पहले मैं जिस बात के बारे में सोच रहा था, आखिर वह बात सच निकली. एक फूल कीथाली में दीपा खाना लगा रही थी और दादी परेशान -सी दिख रही थीं. कुछ देर बात वहकमरे में आईं और मुझसे बेधड़क एक सवाल कर दिया? बाबू, कौन जाति-बिरादर के हौ?चंद्रमाधव ने तुरंत जवाब दिया – अपने बिरादर का है. फिर मेरे लिए भी फूल के बर्तनमें ही खाना लगाया गया. जाति जमींदारी के बीच ही बसी होती है. तरह-तरह से वह अपनीपहचान को छुपाए रहती है. अजगर की तरह कुंडली मारकर सोती रहती है. समय आने पर वहअपने शिकार को निगल जाती है. दो दिन तो जाने क्षण भर में बीत गए. सप्ताह भर रहने केख्याल से मैं गया था. तीसरे दिन से ही दादी से खूब बात होने लगी. अब मैं जो कुछलिखूंगा वो दादी की जुबानी होगी. बीच-बीच में मैं आता रहूंगा. दादी और दीपा हमदोनों को खिला-पिला कर ड्योढ़ी वाले घर में आराम करने लग गईं. कुछ देर बाद दादी नेहम दोनों को वहीं बुला लिया. एकाएक चंद्रमाधव को देखकर दादी फफक कर रोने लगीं.‘‘बबुआ एगौ तूही तो अंतिम आशा बचल हौ. अब तो हम तोरे देखकर जीयै मरै ली. न तो ईअभागिन के दुनिया में केकर (किसका) आशा रहै. अब तो तोरै भरोसे चारो धाम टीकल है. ईअभगिनीया के कहियौ न भूलयै बाबू.’’ चंद्रमाधव जब चार साल का था तब उसके पिता घर-बारछोड़ कर न जाने कहां चले गए. दादी को आशा थी कि वह जरूर आएंगे. इसी आशा मेंचंद्रमाधव की मां भी सब्र करती रहीं, साज-सिंगार करती रहीं. दादी कहती हैं, ‘‘एकरमाय (मां) के भरा-पूरा शरीर रहै, कमर तक लंबे-लंबे करिया (काला) केश, गोल-गोल बांह,हिरनी जैसन सुंदर आंख रहै बबुआ. अपन मरद के भागला के बाद भी चेहरा पे निराशा के भावन आवै दी. मैंने भी देखा है कि जो जवान औरतें दीवारों में कैद रहती हैं, उनके पासकुछ भी तो नहीं होता सिवा उनके जवान शरीर के और इस शरीर की तृष्णा को तृप्त करने केअतिरिक्त. अगर शरीर गल गया तो औरत भी भीतर से मर गई. खैर, चार वर्षों के बादचंद्रमाधव के पिता लौट कर आए पर एकदम अलग रूप में. एक जोगी का रूप धारण किए. गेरुआवस्त्र, एक लाठी और एक कमंडल. अपने पति को इस रूप में देख कर तो चंद्रमाधव की मांपहले ही मर चुकी थीं. जब कोई आदमी जोगी बनता है तो वह अपनी मां से भीख में चावलमांगता है - सिद्ध होने के लिए. कहते हैं कि जोगी सांसारिक मोह-माया से मुक्त होजाता है. पर जब जोगी गाता है तो ईंट-ढेला तक भर धार रोता है. दादी मां गस खाकर गिररही थीं. सच में कितना कठिन होता होगा एक मां के लिए अपने बेटे को भीख देना.चंद्रमाधव के पिता जी गाते थे और दादी रोती थीं : ‘‘राम बिन लक्ष्मण अधूरा सीता केमनवा पियासल कौशल्या के अंखियां गैले पथरायी, राजा दशरथ जी त्याग दिहले अपन देहियाअब होखबो न करी हो राम से मिलनवा राम बिन अयोध्या व्याकुल अब कहियो होखबो न करीमिलनवा...’’ इसके बाद वह कहां गए कुछ अता-पता नही है. उसकी मां भी दो-तीन साल बादचल बसी. तबसे दादी मां के लिए चंद्रमाधव ही सब कुछ था. दादी में एक अजीबइच्छा-शक्ति थी. इन बातों को निकाल कर भी बड़ी दृढ़ रहती. शायद दुख भी नए उभर आएदुखों के साये में विलीन हो जाता है. दुखों में एक समता का भाव स्थापित हो जाता हैऔर आदमी उसका आदी हो जाता है. दादी बातों को शायद खत्म करके गहरी सांस ले रही थीं,तभी घर के पीछे से बच्चों का एक झुंड निकला जो गाते हुए चला जा रहा था : ‘‘जयकन्हैया लाल की मदन गोपाल की लड़िकवन के हाथी-घोड़ा बूढ़वन के पालकी जय कन्हैया लालकी...’’ दादी समझ गई थीं की अब ठाव-चौका का समय हो गया है. रात को दादी ने मुझे,चंद्रमाधव और दीपा को बुलाया. दादी बोल रही थीं : ‘‘जै घर में जवान लड़की है, वो घरमें कैसे केहू के नींद आयै हो. बबुआ (चंद्रमाधव के पिता) अपने तो चल गैलें हमर माथापर ई एको महाजन छोड़के. ई जवान लड़की के भाग्य मे न जाने का लिखल है. कम उम्र मेंदेहै फूट के जवान हो गैलै हे. अब आंख से कुछौ देखल न जायले बबुआ. जवान लड़की के घरमें रखै से तरह-तरह के बात सूने में आवेलै. ई बदनामी से बहुत कलेजा कांपे लेबबुआ.’’ कुछ देर बाद दादी ने दीपा के हाथ को पकड़ कर मेरे हाथों में रख दीं और बोलीं: ‘‘बबुआ अब ई तोर जिम्मेदारी, अब तू ही निबाह करीह. चंद्रमाधव एक कोने में अवाकखड़ा था. भगवान दूनौ (दोनों) के आबाद रखौ!!’’ *** निशांत शर्मा की एक और कहानी'निरबंसिया प्रेत' यहां पढ़ें : अंत में तेतर ओझा ने प्रेत को बातचीत के लिए राजी करलिया