'एक जरा-सी लापरवाही और वह मुझे नमस्ते कर लेगा'
आज पढ़िए रघुवीर सहाय की कहानी 'मुठभेड़'

एक कहानी रोज़ में आज रघुवीर सहाय की कहानी-
मुठभेड़
किसी ने बड़े सवेरे मुझे टेलीफोन से जगाया. वह जगानेवाली टेलीफोन ऑपरेटर नहीं थी. शिवराम की मां मर गई थी. उस दिन बड़ी ठंड थी. वे लोग साढ़े दस-ग्यारह बजे चलेंगे.
छलांग मारकर मैं बिस्तर से कूदा. पर उसके बाद क्या करूं, एकदम से तय न कर पाया और खड़ा रह गया. साढ़े दस-ग्यारह में जो अनिश्चय था उसके हिसाब से जान पड़ा कि घर चलने के लिए बहुत समय है. तब मैं फिर बिस्तर में घुस गया. लेकिन फिर निकलकर रसोईघर की ओर दौड़ा. दौड़ने को वहां बहुत न था. पतीले में नहाने का पानी चढ़ाकर मैं फिर दौड़ा और इस बार सीधे छज्जे तक गया जो कि इस घर में हद थी और जहां अभी-अभी अखबारों का बंडल धड़ाम से आकर गिरा था.
सारे शहर के अखबार उसमें थे, सबको तख्त पर बिछाया. कितनी दयनीय स्थिति थी. सारी दुनिया में कुछ आदिमियों ने अपनी बुद्धि के अनुसार चौबीस घंटे के अंदर हमारी नियति को जहां-तहां से मोड़ने की कोशिश की थी. रात की पाली पर बोदे उपसंपादक को उसमें से चुनाव की कितनी सीमित आजादी थी. (क्या इसी को अखबार की स्वतंत्रता कहते हैं?) जो हो, उन्होंने भरसक अपनी मूर्खता से काम किया था और पांचों अखबारों के पहले बड़े समाचार एक ही न थे. मैंने गर्व की सांस ली, पर दूसरे ही क्षण बाकी खबरें भी पृष्ठ पर कहीं-न-कहीं दिख जाने से सब बंटाधार हो गया.
उस वक्त तक शिवराम की मां के मरने की खबर ही ताजी खबर थी. इसे एक कागज पर चींटी जैसे अक्षरों में लिखूं और उसे अखबार में चिपका दूं. पर सबमें नहीं. और फिर उस एक की हर एक प्रति में? एकाएक यह खयाल फेंककर मैंने कुछ उठाकर ओढ़ लिया. फिर तख्तवाले कमरे से बिस्तरवाले कमरे में चला, मगर देखा कि बीच के दरवाजे से नहीं जा सकते क्योंकि रात को वहां पता नहीं क्यों तिपाई इस तरह रख दी थी कि रास्ता छिंक गया था. तब बरामदे से होकर उस कमरे में जाना शुरू किया, मगर रसोईघर में चला गया और पतीले से पानी निकालने लगा, मगर वह गरम न था. तो भी निकाला और दाढ़ी बनाने के मग में डाला जिसको नीचे रखा ही था कि पतीला बहुत बड़ा मालूम हुआ और उसकी जगह भगौना चढ़ा दिया क्योंकि चाय पहले चाहिए. यह एक बहुत ही निजी, यहां तक कि छिपाने योग्य बात है, गुलामी की बात, पर यहां कौन देखता है और सारे घर में मैं अकेला था. चाहता तो नंगा हो जाता, पर बड़ी ठंड थी. अब मेरा हर काम निश्चित कार्यक्रम के अनुसार हो रहा है. चाय, पहला प्याला गरम, दूसरा कम गरम, तीसरा कड़वा, आधा, बदजायका, खत्म. दौड़ा, चैन मिला. खूब अच्छा रहा. स्वस्थ, सुगठित और स्वच्छ.
अब मैं पहले से ज्यादा साफ समझने लगा था कि मुझे वक्त से शिवराम के यहां पहुंच जाना चाहिए. उबलते हुए पानी से नहाने से मेरा मकान रोशन हो गया था. घबराकर मैंने टेलीफोन उठाया. उसे रख दिया. बनियान पहनी और तौलिया खोलकर फेंक दी. यह रहा मेरा सुंदर शरीर, अपने बालों सहित, दोनों पैर एक-एक करके जांघिए में डाले, कसा, आराम मिला. फिर दौड़ा. दूसरे कमरे में दरवाजा नहीं, रास्ता बंद बरामदे से होकर, समय से पहुंचा, पतलून के लिए समय से. फिर घड़ी पहनी, फिर मोजा, फिर कुछ और. आखिरकार मुझे पहनना बंद करना पड़ा.
मैं अच्छी-खासी चुस्त तैयारी के साथ घर से निकला था और इत्तिफाक से वक्त ऐसा था कि जो देखता यही समझता कि दफ्तर जा रहा हूं. यह सबसे बड़ी विडंबना की बात थी, क्योंकि मैं ही जानता था कि मैं किस घपले में पड़ा हुआ था. मुझे जाकर अपने को सिर के बल अड़ा देना था. वह दफ्तर जाने में नहीं किया जाता. कितने दिन बाद मैंने जाना था कि मैं सीधे कहीं जाना चाहता हूं. शिवराम का मकान पास था. सवारी से मैं वहां दन से पहुंचता, पर वह ज्यादा दन से हो जाता. मैं अपने पैरों चलने लगा. मैंने जाड़े से बचाव कर रखा था और मुझे सड़क पर अकेले बहुत अच्छा लग रहा था.
घर के सामने बाग में तमाम लोग आधा दायरा बनाकर खड़े हुए थे. माफ कीजिएगा, थोड़ी देर हो गई, मैं मुस्कराकर बहुत जोर से या बहुत जोर से मुस्कराकर कहना चाहता था, पर यह न करना ही ठीक समझा, इसलिए कि स्वर कितना ऊंचा रहे यह ठीक-ठीक, ठीक नहीं कर सका. सबसे पहले मुझे मिस्टर धर्मा ने देखा जो मुझ पर हमेशा के लिए यह छाप डाल देने में सफल हो चुके हैं कि मैं हर जगह देर से पहुंचता हूं. वे मुस्कराए जिससे मुझे लगा कि वे एक और भद्दे, ठस, गधे हैं, सिर्फ उतने खूबसूरत नहीं.
तब मैंने उसे देख लिया. मैदान के बीचोंबीच बांस की टिकटी पड़ी हुई थी और उसके पास पालथी मारे नंग-धड़ंग शिवराम बैठा हुआ था.
मैं दायरे के एक छोर पर खड़ा हो गया. वहां से सब दिखाई पड़ता. दिन बड़ी सफाई से निकला था और उस तरह का मौसम था जिसमें जमीन दोपहर तक मुलायम रहती है.
लाश को लाओ, मैंने अपने मन में कहा और यह जोड़ दिया कि मैं आ गया हूं. शिवराम का मंत्रोच्चारण शुद्ध है. वह बिल्कुल नंगा नहीं है.
बाकी लोगों ने मुझे एक-एक कर देखा. मैं उनमें से बहुतों को जानता था और कई ऐसे थे जिनके बारे में सिर्फ इतना मालूम था कि मुझे उनसे नफरत है. कुछ लोग मुझे अच्छे लगते थे. एक बार, कम-से-कम एक बार, मैं न तो किसी को नफरत से देखूंगा, न पसंदगी से. यहां नहीं. किसी को देखूंगा ही नहीं. मैंने तय किया. यहां नहीं. उम्दा धूप में लोग अपने अंदर से एक तरह की चीज निकालकर बाहर फेंकने लगते हैं. वह लोग करते हैं ठीक, पर क्यों? अभी, इसी समय क्यों?
मेरे बिल्कुल पास बढ़ी दाढ़ीवाला एक आदमी खड़ा था. वह मेरी जात का और उसका कद बिल्कुल उस खास तरह से मंझोला था जैसा मेरी जातवालों का होता है. वह बार-बार नजरें उठाता. सिर नीचे किए हुए ही वह मुस्कराना शुरू करता और सिर उठाते-उठाते जब मुझे मुखातिब न पाता तो मुस्कराहट समेट अपना सिर नीचे कर लेता. एक जरा-सी लापरवाही और वह मुझे नमस्ते कर लेगा. मुझे याद है कि वह इस तरह नमस्ते करता है जैसे जाने कौन-से समझौते, जो मेरी जात के लोग अपनी खास बेईमानियों के साझीदारों से करते हैं, मैं इससे भी किए बैठा हूं.
इतनी देर तक वह मुझसे नजरें मिलाने की कोशिश करता रहा कि मेरे मन में संदेह उठने लगा कि कहीं मैं इससे खामख्वाह नफरत तो नहीं कर रहा हूं. फिर धीरे से मैंने यह जान लिया. हां, मैं बिल्कुल बिना वजह उससे नफरत कर रहा था. और यह कितनी अच्छी बात थी. सिवाय एक छोटी-सी घटना के और मुझे कुछ याद आया नहीं जिससे मेरी नफरत के कोई व्यक्तिगत माने होते. और वह भी कोई घटना न थी. एक बार मैं उसके दफ्तर गया था तो चाय तो मेज पर रखे था, मगर मेज की दराज से कुछ निकाल-निकालकर खाता जा रहा था. बराबर वह दोनों हाथ इस तरह नीचे कर लेता था जैसे इसने कुछ खाया ही न हो और मुंह ऐसे चलाता था जैसे खा थोड़े ही रहा है.
हांड़ी में आग जलाई गई थी. अब मैंने देखा कि सभी लोग क्यारियों में अंखुओं के ऊपर खड़े थे. शिवराम की देह सुंदर थी. मेरे घर में जब इतने लोग आएंगे तो कहां खड़े होंगे?
क्या उसे यहां नहीं लाएंगे? मैं अंदर चलूं? ठंडे सादे कमरे, धुला हुआ फर्श, अधेड़ औरतें, छोटी-सी लाश. छोटी-सी सिकुड़ी हुई बूढ़ी देह. शरीर को झकझोर देनेवाले हजार अनुभवों से कुटी-पिटी कुचली मींजी हुई देह. निपट गई वह देह, जो घर के अंदर संभालकर रखी हुई है.
शिवराम हाथ में कुश लेकर कुछ बोला; उसका उच्चारण पुरोहित से अच्छा था. पुरोहित ने जैसे झख मारकर उसके हाथ में एक और कुश दे दिया.
बिल्कुल नई काट का कोट पहने हुए एक आदमी इन दोनों के ठीक सामने खड़ा हो गया. वह घास पर जूता पहने चलता गया था. उसने कमर पर हाथ रख लिया और पैरों पर इस तरह बोझ डाला जैसे शिवराम के सीने पर सवार हो. शिवराम अपना काम करता रहा. सब लोग शिवराम को जानते थे. जब वह हाथ में पात्र लेकर घर के अंदर गया तब कोटवाले आदमी ने घूमकर इधर मुंह किया. वह कहना चाहता था इंटरवल. पर उसको कोई पहचाना ही नहीं. मिस्टर धर्मा हिले - मेरी तरफ. उन्होंने जेब में दोनों हाथ डाल लिए जैसे चोर हों. जेब में दोनों हाथ डाले और गर्दन सिकोड़े दो आदमी वहां और थे. इनमें एक की गरदन थी ही वैसी. उन्हें सब लोग ओछी नजरों से देख रहे थे. वे जेब में हाथ डाले दाएं-बाएं हिलने लगे.
शिवराम और पीछे-पीछे दूसरा आदमी घर से आ गया. वे लाश के पास से आए हैं. हांडी से जोर का धुआं निकला. जो कुछ हो रहा था पूरा हो गया. और शिवराम ने किसी को नहीं पहचाना. वह धूप में जाकर खड़ा हो गया और इंतजार करने लगा.
मैंने सोचा, इस वक्त एक दौर खूब तेज शराब का हो जाए. इस वक्त न सही, शाम को हम लोग फिर आएं. जेब में हाथवाले न आएं और चाहें तो शिवराम के रिश्तेदार भी न आएं. मेरी जात का आदमी भी न आए.
लाश की गाड़ी. नहीं, यह कोई और गाड़ी थी.
दो आदमी धीरे-धीरे बहुत उदास चेहरा लिए मैदान में दाखिल हुए. वे दबे पांव सीधे शिवराम की तरफ गए. हांडी को लांघ न जाएं, मैं डरा. बहरहाल अब सब कुछ हो चुका था. इतने धीरे चलने की जरूरत न थी. एक मोटा था. दुबले ने सफेद कमीज पर इतनी कसके टाई बांधी थी कि उसकी आंखें निकली पड़ रही थीं. मोटा बेअंदाज, जरूरत से ज्यादा उदास हो गया था और उसका चेहरा प्यार में डूबी औरत जैसा भरभरा आया था.
पहले मोटा शिवराम से कुछ बोला. उसने हाथ जोड़े और इस तरह गर्दन झुकाई जैसे अपने किए पर पछता रहा हो. दुबले ने मुस्कराकर सिर हिलाया जैसे यही वह भी कहना चाह रहा हो. दोनों दबे पांव वापस चले गए.
लाश की गाड़ी को ग्यारह बजे आना था. वह अभी तक नहीं आई थी. शिवराम धूप में अकेला खड़ा था. अगर वह किसी से बात करना शुरू कर देता तो बाकी लोग जा सकते थे. उनका काम खत्म हो गया था.
लाश को लाओ, मैंने कहा, यही वक्त है, अब मैं अकेला हूं.
मुख्यमंत्री के संपर्काधिकारी मिस्टर धर्मा को बता रहे थे कि मुख्यमंत्री जब तीस बरस के थे तब उन्होंने अपना लंबा कोट और ऊंचा साफा ईजाद किया था और तब से हर वक्त वही पहने रहते हैं. उनका मतलब था, वही पहनकर घर से बाहर आते हैं.
सिकुड़ी गर्दनवाले आदमी ने अपना झोला लपेट लिया और साइकिल खींचकर सड़क पर ले जाने लगा.
'कुछ लोगों को दफ्तर जाना है - तुम्हारी लाश की गाड़ी अभी तक नहीं आई?' एक ने किसी से पूछा.
नगर-निगम की लापरवाही पर थोड़ी-सी बहस हुई. किसी ने कहा, 'अच्छा हम लोग चलेंगे, जाना है.' 'हम लोग' पर जोर था, पर वह अकेला गया. एक और आदमी बोला, 'हम लोग भी जाएं.' फिर बाकी बात बिना कहे ऐसे सिर हिलाने लगा जैसे गिड़गिड़ाने में हिलाया जाता है.
जिस वक्त लाश की गाड़ी आई वे सब लोग जा चुके थे जिन्हें मैं जानता था. तब जो बचे थे वे सब शिवराम के घर के अंदर चले गए. मैं बाहर खड़ा रहा. अब यह घटना खत्म हो रही है; मैंने सोचा. आखिरकार यह घटना जहां तक मेरा सवाल है, ठीक-ठाक खत्म हो जाएगी.
लाश की गाड़ी बहुत छोटी थी. ऐसा लगता था जैसे सिर्फ लाश की जगह उसमें रखी गई थी - जैसे कि यह मरनेवाले की जिम्मेदारी है कि वह उसमें चला जाए.
ड्राइवर ने उतरकर जोर से दरवाजा बंद किया. आवाज से मालूम हुआ कि गाड़ी मजबूत है. मुझे खुशी हुई.
शिवराम और तीन आदमी लाश को बाहर लाए. तीन दूसरे आदमी गाड़ी में सरक गए. लाश गाड़ी के आकार के लिहाज से ठीक बड़ी थी. उन्होंने उसे अंदर फर्श पर रख दिया.
फिर उन्होंने उसे बाहर निकाला क्योंकि शिवराम को अंदर बैठना था. पर शिवराम खुद टिकटी में हाथ लगाए था.
मैं देखने लगा कि कैसे करते हैं. उन्होंने मुझे नहीं बुलाया. शिवराम की तरफ का हत्था दूसरे ने अपने दूसरे हाथ से थाम लिया. शिवराम खाली हो गया. वह अंदर आ गया. अभी भी वह नंगे बदन था.
लाश दोनों लंबी सीटों के बीच फर्श पर लिटा दी गई. पीछे का दरवाजा बंद हो गया.
इसके बाद मैं निश्चिंत था. लेकिन गाड़ी नहीं चली. ड्राइवर झाड़ियों की आड़ में गया हुआ था.
जल्दी से चलकर मैं सड़क पर आ गया. बहुत कम वक्त था. ड्राइवर को आखिर कितनी देर लगती, भले ही जाड़े के दिन हों. उसके फारिग होने से पहले ही मुझे ओझल हो जाना था.
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