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दास कहतीं, दो-तीन साल बाद सारी शादियां एक जैसी हो जाती हैं

एक कहानी रोज़ में आज पढ़िए अनामिका मिश्रा की कहानी 'मिसेज दास'

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21 नवंबर 2016 (अपडेटेड: 21 नवंबर 2016, 01:31 PM IST)
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'दिस कंपनी इज नॉट योर बेबी.' और की-बोर्ड पर मिसेज दास के हाथों की रफ़्तार बढ़ जाती है. खट..खट..खट...खट.. 'दिस कंपनी इज नॉट योर बेबी.' जैसे फिर कोई उनके कान के एकदम पास आकर कहता है. 'नो. नो. इट इज माय बेबी.' मिसेज दास चिल्लाना चाहती हैं. अचानक की-बोर्ड पर फिर उनके हाथ तेज़ी से चल पड़ते हैं. 'चाय पिएंगी?' 'कैफेटेरिया में या बाहर?' 'यहीं चल लेते हैं कैफ़े में.' हम ऑफिस के कैफेटेरिया में हैं. टी-मशीन पर हमेशा की तरह लाइन लगी है. मैं जैसे-तैसे स्ट्रगल करके‘कार्डमम टी’ले आई हूं. मिसेज दास कप में अपनी ग्रीन-टी डिप कर रहीं हैं. 'तुम्हें ये मशीन की चाय छोड़ देनी चाहिए अनु.' मैं मुस्कुराती हूं. 'नहीं, सच. पता नहीं कब साफ़ हुई होगी आखिरी बार ये मशीन.' 'मेंटेनेन्स के नाम पर बंद तो रोज दो घंटे रहती है.' और हम दोनों जोर से हंस पड़ते हैं. सामने खड़े दो लड़के हमें घूर रहे हैं. मुझे पता चलता है जब वो बोलती हैं. 'लुक एट देम. किस तरह से देख रहे हैं. पिछली बार भी ये कंपनी मैंने इन्ही वजहों से छोड़ी थी. पर मेरी किस्मत देखो फिर मुझे इसी कबाड़खाने में आना पड़ा. आज भी यहां के लोग और इनकी थिंकिंग वही की वही है. जो चार साल पहले थी. और सबसे बड़ी बदकिस्मती कि मेरी डेजिगनेशन और पैकेज भी वही के वही है.' वो बोले जा रहीं हैं और मैं नहीं सुन रही हूं. बार-बार इम्पोर्टेन्ट नोट्स की तरह रिवाईज कराई जाने वाली उनकी इस कहानी में मुझे कोई दिलचस्पी नहीं है. अभी ये कंपनी ज्वाइन किए मुझे चार महीने ही हुए हैं. पब्लिशिंग कंपनी में काम करना मेरी ड्रीम जॉब थी. पहले घर वालों की मर्ज़ी के खिलाफ शादी और फिर घर-गृहस्थी की जिम्मेदारियां. कॉलेज के बाद इंटरनेशनल कॉल-सेंटर में जॉब मिल गई तो दो साल उसी में कब निकल गए पता ही नहीं चला. इधर अमित के कहने पर अपने इंटरेस्ट की जॉब सर्च करना शुरु किया तो यहां से कॉल आई. और यहीं मिलना हुआ मिसेज दास से . वो यहां सीनियर एडिटर हैं और मैं सब-एडिटर.
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ऐसा नहीं है कि ऑफिस में मिसेज दास के अलावा लडकियां नहीं हैं. बात यह है कि हम दोनों की सीट एक ही कॉर्नर में है. तो जाहिर तौर पर सबसे ज्यादा बातें उन्ही से होती हैं. और वो कभी ब्रेक पर साथ चलने से मना भी नहीं करतीं. बिना किसी ज्वेलरी या मेकअप के, बॉब कट हेयर स्टाइल में कुर्ती और जेगिंग्स के साथ आंखों पर चश्मा लगाकर खासी इंटलेक्चुअल लगती हैं. पक्की फेमिनिस्ट मिसेज दास दिल्ली यूनिवर्सिटी से मास कॉम पोस्ट ग्रेजुएट हैं. हम अक्सर किताबों पर डिस्कशन कर लेते हैं. मिसेज दास का बर्थ-डे आने वाला है. हस्बैंड से एडवांस गिफ्ट फिलिप्स का अप्लिकेटर मांगा है. लव मैरिज है. वो भी इंटर-रिलिजन. 'दो-तीन साल बाद सारी शादियां एक जैसी हो जाती हैं.' वो अक्सर ऐसे एक्सप्रेशन से कहती हैं मानो सूखी कॉफ़ी चबा ली हो. खैर उनकी शादी को आठ साल हुए हैं. पर किसी एंगल से शादीशुदा नहीं लगतीं. उनके पति कभी-कभी उन्हें पिक करने आते हैं. 'दिस वर्क्स गुड. मैंने तो सारे हेयर निकाल दिए.' 'हम्म. यहां तो वैक्सिंग कम्पलसरी है.' अप्लिकेटर और वैक्सिंग की बातें करते-करते हम ‘बेसिक इंस्टिंक्ट’ गूगल करने लगते हैं. फोटो में शेरोन स्टोन सेक्सी लेग्स के साथ हॉट दिख रही है. हम क्रॉस-लेग सीन ज़ूम करके ट्राई करते हैं. 'पिक्सेल्स ख़राब हैं.' 'तुम्हे पता है ‘फिफ्टी शेड्स ऑफ़ ग्रे’ पर मूवी आ रही है?' 'रियली?' अब वो फिफ्टी शेड्स ऑफ़ ग्रे मूवी गूगल कर रहीं हैं. ‘रेड रूम ऑफ़ पेन’ की पिक्चर्स आती हैं. हम आपस में डिस्कस करते हैं की अगर हमारे हस्बैंड भी क्रिस्टीन ग्रे की तरह किंकी होते तो? 'फिर बिलेनियर भी होना चाहिए था.' हम हंसते हैं. मॉर्निंग शिफ्ट में कम लोगों के आने का यही फायदा है. घर जाने की उन्हें कोई जल्दी नहीं रहती. यहां काफी लोगों से उनकी पुरानी जान-पहचान है. सबको बाय करते-करते और सड़क वाले ढाबे पर चाय पीते हुए 6 का 7 आराम से बजा देती हैं. 'उसके हस्बैंड की नाइट शिफ्ट रहती होगी.' 'नहीं.'
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आज कल काम बहुत बढ़ गया है. गॉसिप का भी टाइम नहीं मिलता. कैफेटेरिया में न्यू-जॉइनर्स की भीड़ लगी रहती है. अभी ये लोग लाइव वर्क नहीं कर रहे न. न्यू ज्वाइनी आकाश मिसेज दास के लिए चाय लाने लगा है. वो भी उनकी टेबल पर. कप रखने के बाद भी काफी टाइम तक बैठा रहता है. पता नहीं क्या बातें करते हैं दोनों. 'अनु तुम्हें आकाश का बिहेवियर कैसा लगता है?' 'कैसा? क्या मतलब?' 'मतलब कुछ एबनॉर्मल' 'कई बार मुझे लगता है जैसे वो ऑब्सेस्ड है आप से.' 'समझाना पड़ेगा इस लड़के को. ये आजकल के बच्चे भी न यूजलेस.' हमने खाना माइक्रोवेब से निकालकर प्लेट्स में डाल लिया है. मिसेज दास बोले जा रहीं हैं. 'और भी टेंशन हैं लाइफ में यार. उस पर ये फालतू के इश्यूज. जब मैंने अपना काम शुरु किया था तब मेरे हस्बैंड मुझे कहते थे कि 'दिस कंपनी इज नॉट योर बेबी. बट मैं.'
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'हम्म. चाय लेंगी आप?' 'नहीं.' मैं चाय लेकर टेबल पर वापस आती हूं. मिसेज दास अभी भी अपने नॉस्टैलजिक क्रिटिक मूड में हैं. 'तुम्हें पता है ये तुम्हारा टी.एल. ऋषभ मेरे साथ ही जॉब करता था. पहली जॉब थी हम दोनों की. जब मैंने वहां से रिजाइन किया था ,तो पागलों की तरह रोया था. फ्रस्टेटेड वन साइडेड लवर. अब देखो टी.एल. बनकर बैठा है. और ये मेनेजर डिम्पी, शेयर ऑटो और मेट्रो में लक्ष्मीनगर से गुडगांव जाती थी. असिस्टेंट एडिटर की पोस्ट पर थी वहां. जब मैंने अपनी कंपनी स्टार्ट की थी तब ये सब खुद आकर मुझे ‘हाय’ बोलते थे. और अब देखो एटीट्यूड.' मैंने अपनी प्लेट डिश वाशिंग एरिया में रख दी है. आज बहुत काम है. 'दैट्स ग्रेट यार. ऐसे हॉलीडेज पर जाते रहना चाहिए.' 'हम्म. हैप्पी बर्थडे इन एडवांस.' 'ओह तो उस टाइम तुम यहां नहीं रहोगी?' 'हां. इट्स अ कम्पलीट वन वीक प्लान.' 'ओहो. मुझे लगा तुम लोग वीकेंड पर जा रहे हो. ये तो और भी अच्छा है. एन्जॉय. मिसेज दास की आंखों की चमक अच्छी लगती है. घर जाकर सारी पैकिंग करनी है. इतने सालों में हम पहली बार कहीं छुट्टी पर जा रहे हैं. टाइम ही कहां मिलता है? सब कुछ वैसा ही हो रहा है जैसा प्लान किया था. मैंने शॉपिंग की है. मनाली का मौसम भी अच्छा है. हम दिल्ली, ऑफिस और घर से बहुत दूर हैं. यहां कोई डिस्टर्बेंस नहीं है. फिर भी लगता है जैसे कुछ हॉन्ट कर रहा है. हम सभी खुद से हॉन्टेड होते हैं शायद. कल हॉलीडेज भी ख़तम हो जाएंगे. 'तुम मेरी सीट पर क्या कर रहे हो?' 'आपकी सीट वो वाली है अब.' आकाश मिसेज दास की सीट की तरफ इशारा करता है. 'सीटिंग प्लान चेंज हो गया है.' 'फिर उनकी सीट कहां है?' 'वो अब नहीं आएंगी.' 'नहीं आएंगी मतलब?' बात कन्फ्यूजन से सरप्राइज मोड ले रही है. 'लास्ट वन वीक से उसका कुछ पता नहीं. इन्फॉर्म भी नहीं किया. अब तो वो वापस आए तो भी हम ज्वाइन नहीं कराएंगे.' डिम्पी ने फ्लैट कॉरपोरेट एक्सप्रेशन से एक्सप्लेन किया. इसलिए इस सिस्टम पर तुम रहोगी. तुम्हारे सिस्टम पर आकाश और आकाश की जगह श्रद्धा. तुम्हें उसके सारे अधूरे प्रोजेक्ट्स पर काम करना है.'
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खट..खट...खट... की-बोर्ड पर अनु के हाथों की रफ़्तार बढ़ गई है. 'हां. मुझे आने में लेट हो जाएगा. आज प्रोजेक्ट की डिलीवरी है. तुम पिक कर लेना. क्या? ओके. नहीं,कोई नहीं. हां मैं ऑटो रिज़र्व कर लूंगी. खट..खट...खट... वो रिपोर्ट तैयार करने की जल्दी में है. “दो-तीन साल बाद सारी शादियां एक जैसी हो जाती है.” मिसेज दास की आवाज उसके कानो में गूंजती है. अचानक की-बोर्ड पर फिर उसके हाथ तेजी से चल पड़ते हैं.

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