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चकोर झाड़ियों से निकल आई, बटेर दौड़ भागे और तीतर ने 'तीन तौला छप' कहा

एक कहानी रोज़ में आज पढ़िए, लंपटा बासू की कहानी 'टुट्टू हटेला का इकतरफा इश्क और रेशमा'

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24 नवंबर 2016 (Updated: 24 नवंबर 2016, 01:04 PM IST)
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शुरू करें भगवन! तो दरअसल किस्सा कुछ यूं है कि टुट्टू के 'हटेला' होने में अपने ज़माने की 'सत्या' का बड़ा रोल रहा. वही मुंबई का डॉन कौन? भीखू मात्रे वाली! ये वो दौर था जब एक बंदा छत पर उकडूं होकर एंटीना घुमाकर चिल्लाता था- 'आया क्या?' और बदले में जवाब मिलता था- 'चिलमिल बहुत है...बस...बस अब रत्ती भर न हिलाना'. ये वो दौर था जब डीडी की धुन ही पहाड़ी पर अलमस्त गांवों में आधुनिकता का पैमाना थी और शटर वाला भूरा टीवी गांव के दो-चार घरों की शान बढ़ाता था. टीवी को घर की औरतों द्वारा क्रोशिया की कालाकारी से सजे सफ़ेद कपड़े से करीने से ढंका जाता था तब तक, जब तक रामानंद सागर की रामलीला के लिए डकार लेकर पूरा मोहल्ला देखने न बैठ जाए. उसी फैंटसी के दौर में एक शाम 'लौंडों की पंचायत' ने 'आड़े' फूंकते हुए टुट्टू के 'हटेला' घोषित होने का फरमान सुनाया, वो भी पर्याप्त वजहों के साथ. फैसले की वजह बनी टुट्टू की 'बेलगाम' इच्छाएं. जब सिनेमा की भाषा ने मुंबई को- 'ए भीडू अपुन को रानी मंगती' टाइप पहचान दिलवाई ठीक उसी दौर में टुट्टू का जिस्म बगावती हो रहा था. क्या औरतें क्या लड़कियां टुट्टू के लिए सब 'क्या फर्क पड़ता है' वाला मामला था और 'रानी' उसे भी मंगती थी.
इस दौरान 27 के हो चुके टुट्टू के मुंह पर कई बार जवानी के मुंहासे दस्तक देकर रुखसत भी हो गए, लेकिन उसका कभी 'स्वप्नसुंदरी' से सामना नहीं हो पाया. उसकी सांसों की धड़कन कई दफा पहाड़ी चढ़ते-उतरते तो हांफी, मगर इश्क के स्पर्श से 'स्पर्म' ढीले हो जाएं, ऐसा मौका उसके हाथ अभी नहीं लगा था. इधर बंटू, फत्तू, रामभरोसे सब इश्क के रथ पर सवार हो चुके थे. उनके पास अपने किस्से थे. मंगलवार के, सोमवार के यहां तक कि रविवार तक के... बाज़ारों के मेलों के और वहां फड़ पर कांपती उंगलियों से 'ब्रा' टटोलते हाथों को छू भर लेने किस्से. सबके पास अपना एक किस्सा था, बस टुट्टू महरूम था, लेकिन उम्मीद जिन्दा थी.
फ्रस्टेशन में टुट्टू कई चक्कर बाजार के लगा आता. मंदिरों में टुट्टू की धमक सोमवार से अब सुबह-शाम तक पहुंच गई. कई अफवाहें उड़ी कि टुट्टू को फलां लड़की के पीछे जाते हुए देखा गया. इन्हीं अफवाहों के बीच टुट्टू दो जोड़ी चौड़ी मोरी वाली पैंट और क्रीम कलर की शर्ट भी सिलवा लाया. बालों को करीने से पीछे किए हुए अब टुट्टू हर वक़्त सजा-धजा नजर आता, लेकिन मन में टीस बाकी थी. 'लड़की' छूने की हसरत जैसी बात भी तब तक चार भरोसे के यारों के बीच ही हंसी-मजाक में ठेली जाती थी. जीवन में तकलुफ्फी की जगह कम थी ढंकने-लुकने की जगह पर्याप्त. चिट्ठियों में इश्क तैरता था और जीजा-साली के मजाक संता-बंता से ज्यादा बनते थे. टीवी पर अजय देवगन, काजोल की कमर की तरफ हाथ बढ़ाता था तो बुड्ढे खंखारने लगते थे. लड़कियां झुण्ड में निकलती थी. स्कूल से लौटते हुए लड़कियों के पीछे लड़के एक निश्चित फासले पर सरकते थे. कुल मिलाकार चिपटा-चिपटी का ज़माना नहीं था और 'किस्सी' मिलने पर सुख अमृत मिलने जैसा था. ऐसे तनाव भरे दौर में जब टुट्टू बीए कर नौकरी और 'छोकरी' के लिए भटक रहा था, तब सुघड़ बदन वाली रेशमा रेगिस्तान में बारिश की बूंदों सी बरसी. बेइंतिहा भाप उठी. बॉईल अण्डों की पार्टी का आयोजन टुट्टू की ओर से लौंडों के लिए किया गया. दरबान लाला की दुकान पर बच्चे दौडाए गए और 2 प्लेट फुल 'भुटवे' को परोसते हुए टुट्टू ने विजयी अंदाज में घोषणा की- 'ए वो तुम्हारी भाभी है कमीनों!' ये सुनते ही अब तक दो लौंडों ने आधा खाया अंडा नीचे रख दिया. एक उठकर चल दिया, दूसरे ने सवाल उछाला. 'उसने हां कह दिया क्या?' टुट्टू ने सवाल अनसुना किया और बोला- 'देखते जाओ लौंडों'! बात गुजर गई. दिल बैठ गए. रात गहराने लगी थी, आड़े अब ओस से मुकाबला करने में असमर्थ थे, लिहाज़ा सभा समाप्त हुई.
अगली सुबह पहाड़ी उतरते झुण्ड को देख टुट्टू ने दौड़ लगा दी. रेशमा का भी यही वक़्त था. रेशमा वही जो अभी-अभी गांव की स्कूल से निकलकर बाज़ार के इंटर कॉलेज में ग्यारहवीं में पहुंची थी. गोरी-चिट्टी रेशमा. गुलाबी गालों वाली रेशमा. अहा! कितना इश्क आज उडेला जाना था, कितनी बातें आज कही जानी थी, क्या-क्या ख्वाब सजाये जाने थे. लेकिन जैसे रेशमा को तो टुट्टू कहीं नजर ही नहीं आया. आगे-आगे रेशमा तेज़ क़दमों से लगभग भागती सी चली जा रही थी और पीछे-पीछे बैलबॉटम घसीट टुट्टू इश्क की अर्जी लेने की गुहार लगाए जा रहे थे. टुट्टू मनुहार करने लगा... इश्क के हवाले देने लगा. सोमवार वाले महादेव भी गुजर गए, पर टुट्टू का प्रस्ताव न पास हो सका. रेशमा पहाड़ी चढ़ते हुए तेज़ी से ओझल हो गई, टुट्टू बैठ गया! वहीं धंस सा गया था टुट्टू.
बाज़ार में सबसे पहले ये बात पहुंची. जलेबी छानते सुन्नपट्ट लम्बू ने कुछ देखा था कुछ कहानी सुनाई थी. फिर धरमु लाला ने दो बातें हवा में उछाली और किस्सा फैलता चला गया. दिन सर तक आ पहुंचा, दोपहर हुई और अब छुट्टी होने का वक़्त भी हो आया लेकिन टुट्टू डटा रहा. खीझता रहा, टाइमपास करता रहा और आखिरकार जहां रेशमा ओझल हुई थी वहीं प्रकट हुई. पहाड़ी उतरते हुए रेशमा टुट्टू की ओर बढ़ी आ रही थी. टुट्टू ने बालों के बीच उंगलियां घुमाई, बची हुई मूंगफली को जेब में ठेला और दीवार से सटकर करीब आती रेशमा को देखने लगा. टुट्टू की बेसब्री का आलम लहरों का दरिया के किनारे तक सिमटकर आने जैसा था. उसके सूखे होंठों पर थरथराहट हुई. टुट्टू खुद को संभाल पाता इतने में रेशमा उसके करीब आ गई. लड़कियों ने ठिठोली की, रेशमा ने चुनर उड़ा दी. टुट्टू कुछ देख न पाया सिवाय सुघड़ छाया के. उसने पुकारा रेशमा-रेशमा. घाटी में उतर चुकी रेशमा नहीं बोली लेकिन आवाज़ लौटकर आई. रेशमा-रेशमा. ये वो क्षण था जब चकोर झाड़ियों से निकल आई, बटेर दौड़ भागे और तीतर ने 'तीन तौला छप' भी हौले से कहा. गुजरते साधुओं ने चिलम का कश खींचा, चिमटा ठोका और बोले 'भोले लपक ले'! यकीन मानिए टुट्टू ने फिर दौड़ लगा दी. रेशमा के पास पहुंचा और बोला- 'तेरे बिना मन नहीं लगता, तू मेरे साथ बैठेगी तो...तेरा क्या जाएगा? आई लब यू लोली.' वो दिलफरेब टुट्टू के मुंह पर चिल्लाई और मां कसम क्या चिल्लाई, पढ़िए- 'कमर तोड़ दूंगी बुड्ढे. बन्दर अपनी सक्कल देख.'. टुट्टू का दिल भर आया. वो लौट आया. उतनी ही तेजी...उतनी ही खीझ से जितनी शिद्दत से वो रेशमा के पास पहुंचा था. उसने बाज़ार का रुख किया. सिगरेट फूंकी. लाला सुन्नपट्ट के छेड़ते ही बेहिसाब गालियां बकी और लौट आया ढलती शाम में पीले पड़ते पहाड़ की चोटी पर. उसने आवाज लगाईं पास बैठे लौंडों को.... संगे-संगे बड़े होते बच्चे भी पास आ गए. इश्क में टूटा कहिए, हार्मोन का डिसआर्डर कहिए या फिर हारा हुआ, टुट्टू ने बच्चों को दौड़ा दिया. जो उसके हाथ लगा उसके टुट्टू ने लात मारी गाली दी और खदेड़ दिया.
लौंडों से बोला टुट्टू- 'तुम्हारे भाई को ना बोली, साली हरामी होगी'. कुछ को टुट्टू की इस बात से एतराज था. उन्होंने बात नजरअंदाज कर दी. कुछ को इस पर कोई एतराज मालूम नहीं पड़ता था, उन्होंने टुट्टू को कुरेदना चाहा. टुट्टू चल दिया इतना कहकर- 'रोकड़ा हो तो सब दौड़ती हैं पीछे-पीछे'. रेशमा के गांवों में लाइट जलने लगी थी. वो एक दिलचस्प उदास शाम थी. चर्चाएं रात गहराने के साथ रहस्य बन गई. टुट्टू अब सुबह-सुबह रनिंग करने लगा. गढ़वाल राइफल की कई रैलियों में हो आया. दिल्ली-देरादूण भी आना-जाना लगा रहा. और फिर गुजरते सर्द दिनों में एक खबर बम की तरह फूटी. 'रेशमा लुट गई और टुट्टू सिलेक्ट हो गया'. दोनों ख़बरों का सोर्स टुट्टू ही था.खबर आग की तरह बाज़ार में फिर फैली. जंगल के शार्टकट रास्ते से लौटती रेशमा ने निगाहें झुका लीं. बाज़ार घूर रहा था. टुट्टू उत्साहित था, लेकिन कहानी यहां खत्म नहीं होती. थोड़ा आगे बढ़ जाती है.
खबर आती है रेशमा की शादी हो रही है. एक अधेड़ शख्स के साथ. न उस लड़के के साथ जिसके साथ रेशमा उस रोज बैठी हुई थी न अधेड़ टुट्टू के साथ. रेशमा के गुलाबी गालों पर आंसू टपक रहे थे. वो लड़का भी टूटा हुआ था और टुट्टू भी. वो भी एक उदास शाम ही थी. लौंडों ने टुट्टू को हटेला घोषित किया. छोटे बच्चे चुहलबाजी करती 'ए हटेला' और पहाड़ स्तब्ध खड़ा था. एंटीना अब भी घूमता है. शक्तिमान पॉपुलर हो रहा था और. पिंक लिपस्टिक वाली पिंकी और हिना के लिए पहाड़ का मौसम खुशनुमा होने लगा था. जो पल्ले न पड़े वो ईंहा देखे.आड़े: खेत में बचे फसल के ठूंठ को जलाने की प्रक्रिया. सर्दियों में ये किसी उत्सव सरीखा था.भुटवे: बकरी के गोश्त से बनी डिश.लोली: जस्ट लाइक प्यारी.तीन तौला छप: गढ़वाल के एक हिस्से में लोगों को लगता है कि 'तीतर तीन तौला छप' पुकारता है. तौला मतलब जानवरों को पानी-खाना परोसने वाला बर्तन.

चिंटू जी सिर्फ वॉकमैन में कुमार सानू सुनने की लालच से शादी में आए थे

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