अनघ शर्मा हिंदी के युवा कहानीकार हैं. लिखने-पढ़ने और मिलने-बतियाने में बहुत यकीनऔर काम से काम रखते हैं. भारत भवन, भोपाल के युवा-5 कार्यक्रम में 16 जनवरी कोगाजियाबाद से एक कहानी सुनाने जा रहे हैं. यही कहानी हम आपको आज एक कहानी रोज़ मेंपढ़ाने जा रहे हैं...(1) " जब मोरे राजा पिया गए हैं बगीचा भौंरा भनर-भनर होए मेरी गुइंयां"लक-दक करके दामन से झाड़ो तो अनगिनत यादें झड़ जाती हैं, पर ये भी तो सच ही है किइतनी आसानी से कभी कोई याद भी नहीं आता. दिली तौर पर याद करना और जहनी तौर पर यादकरना दोनों अलग-अलग हैं, फिर भी कुछ यादें जहन और दिल के बीच कहीं अटकी रहती हैं.उसकी याद भी कुछ ऐसी ही थी, कहीं जहन और दिल के बीच सुस्त पड़ी. पर एक कोशिश तो करनीही थी इसे निकालने की. सो यह तय हुआ कि यादों के तोशखाने से एक रजाई निकाली जाए.फिर रात भर कोई याद ओढ़ो. पुरानी याद की धुंधली गंध रिसते-रिसते दिल के तहखाने मेंबैठ जाएगी. यूं एक कहानी के जन्म की बात होगी. शर्त यह कि पैदाइश तक रजाई तोशखानेमें वापस न रखी जाए. उसकी तो पूरी कहानी ही शर्तों पर टिकी हुई थी. पहली शर्त यह किउसे उसके असली नाम से बुलाया जाए न कि लोक-प्रचलित धीमरी नाम से. दूसरी यह कि वहकहां से है, ये कोई न जान पाए. दूसरी शर्त तो जायज है. पर पहली? भला यह भी कोई बातहुई कि असली नाम से पुकारें. उसके मां-बाप या हमारी मां को छोड़ इक्का-दुक्का ही कोईहोगा जो उसका असली नाम जनता होगा. सभी तो उसे धीमरी कह कर बुलाते थे, अब इस नाम मेंक्या बुराई है भला? बुराई है, यह बड़ा व्यक्ति-वाचक है. एक बार लो तो तमाम दुनियाजान जाए. सो असली नाम छद्म पहचान का काम करेगा. न लिखने वाले के मन पर ही कोई बोझऔर न उसके ही मन पर. कई बार बड़ी बहन से कहा कि तुम ही लिख मारो उसकी कहानी.किस्से-कहानियों में तुम्हारा हाथ सधा हुआ है. पूरा न्याय कर पाओगी उसके साथ, जैसेअनुभवी शल्य-चिकित्सक के हाथों त्वचा को सिलने में टांका इंच भर भी इधर-उधर नहींहोता, ठीक वैसे ही. सो हर बार की तरह वही एक जवाब. अरे! उस पर कहानी लिखना कोई डबलरोटी का टुकड़ा खाने जैसा है क्या? कि जैम नहीं तो न सही मार्मलेड लगाकर खा लेंगे.यह तो याद है, ठीक नमक की तरह, अगर स्वाद लेना हो तो खुद ही चखना पड़ता है. बाकीमौका-बेमौका, वक्त-बेवक्त तुम्हें ठोंक-पीट कर दुरुस्त करते रहेंगे. फिर तुम्हारीयारी-दोस्ती भी थी उसके साथ सो तुम ही लिखो. अजी क्या खाक दोस्ती थी? असल नाम तक तोयाद नहीं हमें उसका. करो, अब करो दुरुस्त? अच्छा याद कर जब वो कोई काम बिगाड़ देतीथी तो क्या कहती थीं अम्मा? ‘‘एक काम भी ठीक से नहीं होता तुझसे, वही हाल है तेराआंख के अंधे नाम नयनसुख. आंखें है या बुझते दिए, देख के भी नहीं चलती.’’ ये अलग बातहै कि नजर उसकी बिल्कुल पाक-साफ थी. तो पहली शर्त के लिहाज से उसका नाम नैनतारा था.उसकी जो सबसे स्पष्ट याद है, वही बड़ी धुंधली है. चेहरा-मोहरा, कद-काठी तो अब यादनहीं ढंग से, मगर कुछ याद है तो उसके कॉलर-बोन के गड्ढे. वे इतने बड़े और इतने गहरेथे कि मुझे हमेशा लगता था जैसे दो सूखे हुए तालाब हों, और कभी इनमें बेतवा कासाफ-ठंडा पानी भरा रहता होगा. बेतवा इसलिए कि दूसरी शर्त के लिहाज से वह ऐसे इलाकेसे भाग कर आई थी जो कहीं बेतवा के किनारे था.(2)मुझे हमेशा यूं ही लगता था कि उसका मन बेतवा के ढाल-सा होगा. हमेशा साफ, भरा औरछलछलाता हुआ. चाहे कितना ही सूखा क्यों न आ जाए, पर मन के स्नेह का स्रोत हमेशालबालब भरा हुआ रहेगा. पर लबालब भरे स्रोत से भी कई बार प्यासा ही लौटना पड़ता है. उनदिनों दो बड़े बदलाव हो रहे थे मुझमें पहला तो होंठों के ऊपर मूंछों की लकीर उभर रहीथी, और दूसरा मन भीतर एक किस्सागो बेचैन-सा करवटें ले रहा था. सो एक दिन उसी धुनमें मैं उससे कह बैठा कि मैं एक दिन तुम्हारी भी कहानी लिखूंगा धीमरी. क्या तय हुआथा? पूरा नाम, असली नाम छोटे लल्ला. अच्छा ठीक है, नैनतारा. अब खुश? कहानी लिखनाक्या इतना आसान होता है छोटे लल्ला? बीस-पचीस बरस इंतजार करो, जब हमें भूल जाओ,हमारे कने दिमाग पे जोर डालना पड़े तब लिखना. चलो यह भी तय रहा, सो अब न शक्ल याद नआवाज. जाने-अनजाने जिंदगी की तरफ कभी कोई शर्त उछालो तो वह उसे एक ही बार में कैचकर लेती है, लपक लेती है, और फिर हर बीतते समय के साथ उसकी आवाज मंद पड़ जाती है. परएक आवाज कभी मंद नहीं पड़ी. यूं भी जिंदगी जो मसौदे तैयार करती है, खाका खींचती है.आदमी की आरजू उसे दो कौड़ी का मान सिरे से नकार देती है, धड़े से खारिज कर देती है.और जो चार सतरें चोरी-छुपे आरजू किसी लिफाफे में भेजती है, उसे जिंदगी बड़ी होशियारीसे गायब कर देती है, या पूरा मौजूं ही बदल देती है. आखिर में जीत जिंदगी की ही होतीहै. उसकी जिंदगी के मसौदे उसकी आरजू से जीत गए. * ऐ धीमरी हमारे लड़के का कान बह रहाहै कई दिन से? जिजी बबूल के फूल सरसों के तेल में पका कर ठंडा तेल दिन में तीन बारडालो, एक दिन में कान बहना बंद. अच्छा धीमरी और मेरे लड़के का कान दुःख रहा है रातसे. लो बहन, किसी जच्चा का दूध डाल दो थोडा-सा दर्द ये गया वो गया. धत्त! पगली. ऐसेतमाम नुस्खे उसकी अंटी में बंधे रहते थे. बड़ी धीमी-धीमी आवाज में वह एक गीत गायाकरती थी.‘‘भौंरा भनर-भनर होय मेरी गुइंयां गजरा लहर-लहर होय मेरी गुइंयां जब मोरे राजा पियाआएं अटरिया जियरा धुकुर-पुकुर होय मेरी गुइंयां’’ऐं छोटे लल्ला, क्या सारी कहानी हम पर ही लिखोगे? अपनी भी कुछ कहो. अपनी क्या कहेंकुल जमा आठ सतरें लिखे तो हो गई पूरी कहानी. ऐसे न बनेगी बात. अच्छा सुनो. भरा-पूरापरिवार था, बाद में बाप जाते रहे. दिन बदले, थोड़े बिगड़े-थोड़े बने और रफ्ता-रफ्ताजिंदगी चल निकली. ये तो कोई बात न हुई. कहानी में खास बातें होती हैं. कुछ खास होतो बोलो छोटे लल्ला. खास क्या? हां जब्त बहुत था हमें, होता भी क्यों न? मां-बाप कोखासा जब्त था. खूब गालियां सुनीं दोनों ने घरवालों की. पिता ने तो मरने के बाद भीखूब सुनीं. पैसे से कमजोर आदमी को सबसे ज्यादा मार अपने घर के अंदर ही सहनी पड़तीहै. यह न समझना कि हमें प्यार न मिला. बहुत मिला, टूट-टूट मिला पर कम लोगों से.बाकी लोगों से दिली नहीं कामचलाऊ-सा मिला. सो यूं कुछ वाकयों से कुछ लोग दिल से उतरगए. उतरे तो फिर कभी न चढ़े. अच्छा छोड़ो हमारी. अपनी पर आओ, ये कहानी तुम्हारी है.बातें मत उलझाओ. अच्छा ये बताओ तुम वहां से भाग क्यों आईं? बताते हैं सबर रखो. पहलेवादा करो कि हमारी कहानी में एक किस्सा है, उसका जिक्र न करोगे. पागल हो क्या? उसकाजिक्र कैसे न होगा? सब उसी पर तो टिका है इस कहानी का. वैसे भी आदमी की फितरत होतीहै, इधर-उधर से जोड़-जाड़ अपनी समझ लायक कुछ ठीक-ठाक-सा किस्सा बना ही लेता है.तुम्हें मालूम ही नहीं, छोटी जिजी जानती हैं सब. मैं पूछ लूंगा उनसे, समझीं. वह चुपबैठी मेरा चेहरा ताकती रही. खट से मेरी नींद खुल गई. सपना ही तो था ये, आंख खुली औरहवा हो गया. * वह वहां से क्यों भाग आई थी, ये हम में से कोई नहीं जानता था. पर उसेमां से कई बार यह कहते सुना था, ‘‘जानती हो जिजी कोई औरत दो बातों के बिना अपने ठीएसे नहीं भागती. अपने पेट और पीठ, या तो पेट की औलाद पर आंच होगी या अपनी पीठ भारीहोगी.’’ अब सोचता हूं पीठ तो कभी भारी रही नहीं होगी उसकी. उसके भागने में जरूरपहले वाली बात ही होगी. मां से उसकी दोस्ती का किस्सा भी अजीब था. सालों पहले एकदो-तीन बरस की बच्ची के साथ वह हमारी मौसी को आगरा बस-अड्डे पर मिली थी. सो वहां सेपहले उनके घर और बाद में हमारे घर आ गई सदा के लिए, और हमारे जीवन में रच-बस गईजैसे गर्मियों की धूप और सर्दियों का कोहरा. बाद में समय की दौड़ से कदम मिलाने केलिए हम भी बाहर चले गए. महीनों घर नहीं आते थे, जो कभी आते भी तो अपने-अपने मेंमशगूल रहते थे. एक बार कॉलेज की छुट्टियों में जब घर गया तो उसकी बेटी को न पा करबड़ा आश्चर्य हुआ मुझे. ‘‘मीना कहां है?’’ मैंने पूछा. ‘‘चली गई.’’ ‘‘कहां?’’ ‘‘अपनेसासरे और कहां?’’ ‘‘ऐं! पागल है क्या? ब्याह होता तो हमें पता न चलता क्या?’’‘‘हमारे सासरे गई थी, वहीं हो गया.’’ ‘‘कुल तेरह-चौदह की तो थी. इतनी छोटी का?’’‘‘हमारे यहां इतने का ही होता है.’’ ‘‘और हां! तेरा ही कौन सासरा बचा है दुनियामें?’’ उसने एक कातर दृष्टि से मां को देखा और अंदर चली गई. ‘‘क्या हुआ इसे?’’‘‘कुछ नहीं, बीमार थी कई दिनों से.’’ ‘‘क्या बीमारी थी?’’ ‘‘औरतों की बात है,तुम्हें क्या बताएं.’’ मां ने कहा तो मैं चुप हो गया. यह भी भली बात थी कि औरतों कीबात में मेरा क्या काम? फिर यूं भी एक छोटे से वाक्य में निहितार्थ क्या ढूंढ़ना? परसालों बाद खुद ही उस अधूरी बात का सूत्र थम गया. * ‘‘ऐं, छोटे लल्ला रंगीन अखबारहै?’’ ‘‘अखबार, क्या करेगी?’’ ‘‘कुछ रखना है.’’ ‘‘क्या?’’ ‘‘पेटीकोट.’’ ‘‘नहींहै.’’ मैं झूठ बोल गया. हालांकि मेरे पलंग के गद्दे के नीचे खूब रंगीन अखबार रखेरहते थे. फिल्मों का बहुत शौक था मुझे और अखबार में इतवार के इतवार एक रंगीन फिल्मीपन्ना आता था. ‘‘झूठ क्यों बोलते हो? गद्दे के नीचे रखे तो रहते हो. एक-दो दे दो.’’‘‘ले मर!’’ मैंने झटके से हाथ पटका. आह! हाथ झनझनाता हुआ पलंग के पाए से जा टकराया.यह भी सपना था, टूट गया. सपने बहुत आते थे मुझे कहानियों में या सपनों मेंकहानियां. सपने और कहानियां मुझे आते थे और उन्हें लिखने का शऊर बड़ी बहन को. बड़ी दीउन दिनों मानवीय रिश्तों के तमाम आकलन करती कहानियां लिख रही थीं. पर उसका आकलनकरना बड़ा मुश्किल और पेचीदा काम था. ठीक वैसे ही जैसे बकरियों की सवारी पर कोईरेगिस्तान पार करना. ‘‘कोटेड और अनकोटेड बातों के बीच की लकीर, सड़क के तारकोल मेंफंसे छोटे-छोटे पत्थरों की लिपि और किनारे तक जा कर डूबने वाले आसमान को पढ़ने वालेएक रोज बड़े अकेले रह जाते हैं.’’ या फिर ये : ‘‘पीछे उतर कर देखो, तारीख में गहरेबहुत गहरे जा कर देखो. दस, बीस, सौ, दो-सौ, चार-सौ बरस पीछे जा कर देखो कि एकशाहकार के पैदा होने के लिए और कितनों को पैदा होना पड़ता है. यकीं न आए तो पूछोमुमताज से कि एक ताजमहल के पैदा होने के लिए किस-किसको पैदा होना पड़ा था. एकशाहजहां को, एक दारा को, एक औरंगजेब को, एक शुजा को... और भी न जाने कौन-कौन?’’ परउसमें ऐसी कोई खूबी नहीं थी. न वह मुमताज थी, न वह किसी शाहकार को पैदा कर सकती थी.न वह कथ्य-अकथ्य के बीच की पंक्ति ही पढ़ पाई थी. न जीवन भर चलने वाली सड़कों मेंफंसे पत्थरों की लिपि. न ही डूबते आसमानों के किनारे. फिर भी अंततः बहुत अकेली रहगई थी वह. बहुत पहले यह भी मुझे बहन ने ही बताया था कि वह धीरे-धीरे अपना मानसिकसंतुलन खोती जा रही है.(3)अपने बचपन में किसी भूगोल की किताब में पढ़ा था कि दुनिया का सबसे बड़ा ज्वालामुखीविस्फोट इंडोनेशिया में हुआ था. इतना बड़ा कि उसमें से निकले धुएं के कारण अगले पूरेवर्ष धरती के एक बहुत बड़े हिस्से का तापमान सामान्य से कई गुना नीचे दर्ज किया गयाथा. मैं जब तक उसके पास रहा ये जान ही नहीं पाया कि कितना कुछ धधकता है उसके भीतर.अब सोचता हूं कि अगर उसके भीतर का ज्वालामुखी फट गया होता तो कितने वर्षों के लिएहिम-युग आता. पर न ज्वालामुखी फटा, न ऐसा कुछ हुआ. आखिरी बार भी बहन ही ने खबर दीथी उसके बारे में. ‘‘बड़ी बदल गई है वो, अजब बुढ़ापा झांकता है उसके चेहरे से अब.’’‘‘बूढ़ी तो अपनी मां भी लगने लगी हैं, याद है कितनी खूबसूरत थीं हमारे बचपन में.’’मैंने कहा. ‘‘ब्यूटी इज द कर्स.’’ वह बोलीं. फोन रखने के बाद मैं देर तक उसकी हीयाद में डूबा रहा, पर सिवाय एक धुंधलके के कुछ नहीं दिखा. वैसे भी जब से बंगलौरशिफ्ट हुआ हूं, घर जाना ही नहीं हो पाया. पिछले दस सालों में तो एक बार भी नहीं जापाया हूं. रात की शांत फिजा बार-बार खुद में यही दोहरा रही थी कि हर इमारत को एकरोज खंडहर में बदलना ही होता है. ‘‘जानते नहीं खूबसूरती की जिल्द पर सबसे पहले जंगलगती है. फिर टुकड़ा-टुकड़ा, पर्त-पर्त यह जिल्द खुद ही गल जाती है. वर्तमान की जो भीइमारत अपने अतीत में जितनी ज्यादा खूबसूरत रही होगी, भविष्य में उसके खंडहर बनने कीआशंका उतनी ही प्रबल होगी. वैसे भी खूबसूरत चेहरों को बदलने में वक्त ही कहां लगताहै? बस एक वक्फा.’’ ‘‘कहां तक पहुंचे छोटे लल्ला?’’ ‘‘अजब है तू भी, चित्त-पट्ट कामामला थोड़े ही है. सिक्का उछालूं, थामूं, देखूं और फैसला हो गया. ‘‘तुम तो बहुत बखतबरत रहे हो.’’ ‘‘तो क्या किस्सा-कोताही कर दूं?’’ ‘‘तुमसे अच्छा तो छोटी जिजीकह-लिख देतीं.’’ ‘‘तो फिर उसी के पास जा. हट! परे.’’ वो उदासी में डूबा हंसता चेहरालेकर चली गई. पर जाते-जाते एक भेद पकड़ा गई कि सबसे पहले हंसते चेहरों की हंसी उतरकर देखनी चाहिए. आजकल उदासी बड़ी चालाक हो गई है. अगर खुश रहना है तो छुपी उदासी कोनिकाल फेंकना होगा. हां, पता है उदासी और डर बड़े पक्के होते हैं ,एक बार पकड़ लें तोफिर छोड़ते नहीं. शांत बहते पानी में ज्यों अचानक पहाड़ियां निकल आएं, ऐसे मन परकब्जा कर लेते हैं ये. कई बार तो यह भय जीवन की जिजीविषा से भी बड़े हो जाते हैं.फिर भी जीवन जीना ही है आखिर तक. जीवन की चाह को लगातार ईंधन देना पड़ता है, हर हालमें. जीवन की राहें आसान नहीं होतीं, किसी के लिए भी नहीं. उसके जीवन की राह भी बड़ीकठिन थी, उसके नियंत्रण से परे. वह अनगढ़-अनपढ़ भले ही थी पर बड़ी समझदार थी. वह जानतीथी कि राह अगर टेढ़ी-मेढ़ी, पथरीली हो तो भी एक बार को कट ही जाएगी. पर वह सपाट राहजो काई से चिकनी हुई, शैवालों से पटी पड़ी हो, उसका क्या? और अगर ऐसी फिसलन भरी डगरपर मुंह के बल गिरना तय हो तो क्या नंगे पांव खड़े हो संतुलन बनाए रखने की चेष्टाकरना या चप्पल पहन तुरंत ही गिर पड़ना. थोड़ी देर यूं ही बेतरतीब ख्यालों में उलझेरहने के बाद मैंने बहुत दिन घर से बाहर रहने के कारण फोन में जमा हुए वॉइस-मैसेजसुनना शुरू कर दिए. उनमें से एक बड़ी बहन का भी था तो कुछ वक्त बाद उन्हें ही फोनमिला दिया : ‘‘कैसी हो?’’ ‘‘ठीक हूं. तू कैसा है?’’ ‘‘मैं भी ठीक हूं.’’ ‘‘तेरीआवाज थकी हुई-सी लग रही है.’’ ‘‘बस जरा-बहुत थकावट है.’’ ‘‘बड़ी रात गए फोन कियातूने? सब खैरियत?’’ ‘‘हां, आज ही लौटा हूं हैदराबाद से, तुम्हारा वॉइस-मैसेज था फोनमें तो सोचा तुमसे ही बात कर लूं. और क्या चल रहा है?’’ ‘‘कुछ नहीं, अच्छा तुमसे एकबात पूछनी थी.’’ ‘‘क्या?’’ ‘‘मुझे आजकल धीमरी बहुत दीखती है सपनों में. तुम जानतीहो उसके नीम-पागल होने की क्या वजह थी.’’ सोशल-इनजस्टिस, सामाजिक अन्याय और हम सबमें छुपा हुआ सबसे बड़ा भय. तब जमाना आज के जैसा नहीं था कि एक कैंडल-मार्च निकालोलोग साथ जुड़ जाएंगे, भले ही धीरे-धीरे ही सही. दबंगों की दबंगई से तो आज भीमिडिल-क्लास और छोटा तबका डरता है, तब की तो बात ही छोड़ो. छोटे शहरों में तथाकथितबदलाव की गुंजाइश ही कहां होती थी तब? छोटे शहर चुस्त-ट्राउजर्स की तरह होते हैं.धड़ से नीचे घुटनों तक इतने चुस्त कि हवा भी इकहल्लर नहीं निकल सकती. घुटनों से नीचेजिस हिस्से को थोड़ी आज़ादी होती है वह हिस्सा मध्यवर्ग का है, जो चार पैसे जोड़ मौकालगते ही अपने बच्चों को बड़े शहरों की तरफ निकाल देता है ताकि उनका भविष्य सुरक्षितरह पाए, पर सबसे ज्यादा मार खाता है हमारे यहां का निचला तबका. ढंकने को उसके पासकुछ होता नहीं नंगा वह चाह कर भी नहीं हो सकता. बंद पड़े-पड़े ख्यालों में बेड-सोरपैदा हो जाते हैं, कुंठाएं पनप जाती हैं, जहन कुंद पड़ जाते हैं. लूट-डकैती दबंगडालते हैं और पुलिस पकड़ कर ले जाती है गरीब घरों के बच्चों को, जिन्हें ये सिस्टमधीरे-धीरे पेशेवर मुजरिम में ढाल देता है. कुछ सालों में ये बच्चे हाव-भाव,चाल-ढाल,शक्ल-सूरत, रंग-रूप में एक जैसे हो जाते हैं. हां ये सच है कि अब समय बदलाहै और समाज के बड़े प्रोटेगोनिस्ट इन्हीं तबकों से निकलते हैं. ‘‘अरे !छोड़ो येबातें, उसकी बताओ.’’ ‘‘ऐन होली से एक रात पहले दबंगों के लड़के खींच कर ले गए थेउसको. रात भर बिना कपड़ों के नचाया. कपड़ों के बदले सौदा तय हुआ मीना का. बाद मेंखाली पेटीकोट थमा के भेज दिया.’’ ‘‘और कोई बोला नहीं मुहल्ले भर से?’’ ‘‘सब सोतेरहते हैं ऐसे मौकों पर.’’ ‘‘और मीना?’’ ‘‘मीना कब लौटी, किस हाल में लौटी? किसी नेनहीं देखा. जब अम्मा ही महीनों बाद जान पाईं तो कोई और क्या जानता?’’ ‘‘मुझे क्योंनहीं बताया?’’ मैं लगभग रुआंसा-सा बोला. ‘‘तुम बंगलौर थे उस वक्त कॉलेज में. हमेंखुद ही बहुत देर से पता चला तो तुम्हें क्या बताते. बाद में सालों बीतने पर लगा किअब बताने का क्या औचित्य? बाद में अम्मा ही राजघाट जा कर उसका सब सामान बहा आईंथीं. पर कुछ और भेद भी छुपा था उनके मन में जिसे कोई और नहीं जान पाया कभी भी, लोगअक्सर सच छुपा ही जाते हैं. एक बात पता है तुझे कि लाल, नीली, पीली, चमकीली, काली,दुनिया में मौजूद और भी जितनी स्याहियां हैं उन सबका इस्तेमाल करके किस्से-कहानियांलिखने वाले जानते हैं कि वह पूरा सच नहीं लिख रहे हैं. चाहे कल्पना का ही नाम क्योंन दें उसे पर अधूरी ही है हर बात. भले ही कागज पर लिखी जाए या रेशम पर, या फिरपत्थर पर ही उकेरी जाए, हर कहानी सच पर एक कलई चढ़ाए रखती है. चाहे मैं लिखूं या कोईऔर पर पूरा या पूरे जैसा कोई कभी कुछ लिख ही नहीं पाता. सच हमेशा कहानियों मेंनए-नए कपड़े पहने टुकड़े-टुकड़े में ही आ पाता है. पूरा सच तो अनगढ़, उलझा, लस्टम-पस्टमताले लगे मन में कहीं पड़ा हुआ सांस लेता रहता है. मजाल है किसी की जो अपने ही मन काताला खोल सच टटोल सके.’’ फोन काटने के बाद मैं सन्न, अवाक बैठा रह गया. क्या था येजो मुझे अभी पता चला? कोई डरावना सच, या किसी फिक्शन का हिस्सा जो पढ़ा नहीं बस सुनाभर हो. किस दर्जा ट्रॉमा होगा. कैसी भयानक सौदेबाजी होगी वो? जिस्म के बदले जिस्मउफ्फ! मैं पक्षघात के मरीज-सा थम कर रह गया. कोई चिकोटी काटे तो भी महसूस न हो.‘‘देखा छोटे लल्ला मैं कहती थी न कि छोटी जिजी तुमसे अच्छा लिख लेती हैं. कैसीसुघराई से सब बता गईं तुम्हें.’’ घबरा कर इधर-उधर देखा मैंने, कमरे में कोई नहींथा. डर के मारे कहानी के अधलिखे पन्ने फाड़ कर फ्लश-आउट कर दिए मैंने. शांत रात मेंसिर्फ हवाएं बह रहीं थीं, मैंने गौर से कान लगा कर सुना. वे हवाएं एक दर्द-भरा गीतगा रहीं थीं :‘‘मोरी पतुरियां माई गंगे बहा देव मैं तो चली परदेस मोरे लाल’’