शिवानी जन्मीं थीं 17 अक्टूबर 1923 को. विजयादशमी का दिन था. राजकोट की बात है.पढ़ाई-लिखाई शांतिनिकेतन में हुई. साठ और सत्तर के टाइम में इनकी कहानियां खूब फेमसहुईं. 12 साल की उम्र में उनकी पहली कहानी प्रकाशित हुई थी. और ये अंत तक कहानियांलिखती रहीं. औरतों पर लिखा और बहुत अच्छा लिखा. खूब नाम कमाया. अभी जन्मदिन काहफ्ता है. हम आपको उनका लिखा पढ़ाएंगे. हफ्ते भर. कल पढ़ाया था ‘गूंगा' राजकमलप्रकाशन को थैंक्स कहिए. उन्हीं की हेल्प से आपको ये कहानियां पढ़ा पा रहे हैं.--------------------------------------------------------------------------------माघी विभावरी में ठिठुरता नैनीताल, अपने नग्न अंग सिकोड़े, किसी दरिद्र शिशु कीभांति सो रहा था. शुक्लपक्ष के अकृपण औदार्य से, झक-झक चमक रहा चीनापीक, मुझेनिर्जीव बांहे फैलाए पड़े, किसी पहाड़ी पट्टू के, विराट भूरे खुरदुरे कोट-सा ही लगा.चांदनी का एक चौकोर दुकड़ा, देखते ही देखते, रामजे अस्पताल की रक्तवर्णी छत परफिसलता, ताल के नीलाभ जल में डुबकियां लेने लगा था. अयारपाटा के इक्के-दुक्केबंगलों पर चमकती बिजलियों की रोशनी, कॉर्बेट के बंगले की अबीरी छत, कालाठुंगी कीनवनिर्मित नवेली सड़क के घुमावदार घेर, मुझसे वर्षों पश्चात जैसे बिछुड़े इष्टमित्रोंकी आत्मीयता से, गलबहियां देकर मिल रहे थे. किन्तु, मध्य रात्रि की उस निस्तब्धतामें, मैं जिस मधुर आह्नान की डोर से बंधी, बाहर आकर खड़ी हुई थी, वह मीठी खनक, सहसाकिस शून्य में खो गई थी! ‘खुदा हाफिज’ कहता, वही परिचित किसी किशोर कंठ-सा स्वरभंगऔर बचकानी हंसी. ठीक इसी पिछली चतुर्दशी को मैंने उसे पहली बार देखा था. लखनऊ का वहअस्पताल भी, उस दिन ऐसे ही उज्ज्वल चांदनी में नहा उठा था. दुर्भाग्य से, आज तक कईअस्पताल देख चुकी हूं, और कई सैनेटोरियम, किन्तु दो ही अरण्यों की स्मृतियां मुझेसहमा पाई हैं, एक अल्मोड़ा सैनेटोरियम की और दूसरी लखनऊ के इस अस्पताल की. लगता है,ये दोनों मृत्यु के प्रिय पिकनिक स्पॉट हैं. अठारह दिनों तक, उस अस्पताल में रहनेकी दुःसह विवशता के बीच प्रायः नित्य ही मैंने काल का कलेवा देखा है. कभी जनरलवार्ड के बरामदे में, विलाप का गगनभेदी आरोह, आत्मीय स्वजनों की भीड़ के बीच, किसीसंयमी कर्त्तव्यपरायण कंठस्वर में दिया गया. लाशगाड़ी बुलाने का आदेश, डॉक्टर-नर्सोंकी पदचाप और फिर थोड़ी देर बाद कोने में पटका गया गद्दा, लाल कम्बल, हवा में उड़तेरुई के फाये, निर्ममता से घसीटा जा रहा खाली पलंग, किसी चलती फिल्मी धुन गुनगुनाकरसम्पन्न की गई कमरे की धुलाई और क्षण-भर पूर्व के महाप्रस्थान के साक्षी, धरा परपड़े एक-आध फूल और कुश के तिनके. एक लाशगाड़ी के विदा होते ही, कभी-कभी दूसरी आकर खड़ीहो जाती. उन अभिशप्त वाहनों के विराट कलेवरों पर अंकित पंक्तियां देखकर, कभी-कभीहंसी भी आती किसी में दोनों ओर पंख फैलाए दो देवदूतों के हाथ में थमी लकड़ी की पाटीमें लिखा गया, किसी रससिद्ध द्वारा प्रदत्त नाम ‘स्वर्गीय वाहन’ और इसके नीचे हीसुस्पष्ट अक्षरों में अंकित, वाहन की विशद प्रशस्ति. ‘यह गाड़ी हमेशा रोशनुद्दौलापार्क के सामने धुली- धुलाई खड़ी रहती है, कृपया एक बार आजमाएं’ और फिर चटकीले नीलेरंग में झक-झक चमकती एक दूसरी लाशगाड़ी, जिसमें चालक की खिड़की के पास लिखे सफेद पेंटकी दूसरी पंक्ति पढ़ने से पूर्व ही, सदा मेरा रिक्शा तेजी से आगे निकल जाता था. उसकीपहली पंक्ति को मैं आज भी जैसे सामने लिखी देख रही हूं. "आरजू यही है, कब्र वहीं पैबने "लम्बी कतार में फैले, अपने प्रतिवेशी मरीजों के साध्य-असाध्य रोगों का परिचयभी मुझे तब कंठस्थ हो गया था. पन्द्रह नम्बर का, लम्बोतरे चेहरेवाला वह सांवलायुवक, जिसे आसन्न मृत्युभय ने, गजब का दुस्साहसी बना दिया था. वह मिल्क डायट पर है,यह मैं उसकी ट्रे देखकर ही जान गई थी, किन्तु डॉक्टर-नर्सों की दृष्टि बचा, वह किसीपैंतरेबाज नट की फुर्ती से, किसी भी खोंमचेवाले को देखते ही, कंटीले तारों केव्यवधान फांदता, दोने के दोने साफ कर जाता और फिर रात-भर कराहता रहता. फिर उन्नीसनम्बर की वह रोगिणी, जिसकी लोकप्रियता का अन्त नहीं था. उससे मिलनेवालों का तांता,सुबह आठ बजे से आरम्भ हो जाता और बड़ी रात तक, लगा ही रहता. धूप निकलते ही उसकावसुधैव कुटुम्ब, उसकी पहियालगी पलंग को, धूप में खिसकाकर, बरामदे में ले आता और फिरआरम्भ होता उनका मूंगफली पर्व. देखते-ही-देखते सेरों मूंगफलियां साफ हो जातीं, साथमें ट्रांजिस्टर का गर्जन, हंसी-ठिठोली उस मनहूस अस्पताली वातावरण को गुलज़ार करदेता. जब मैंने पहली बार, उस रोगिणी को देखा, उसके भीमोदर की, भयावह रूप से विस्तृतपरिधि ने, मुझे सहमा दिया था. लगता था, रुग्ण शरीर के किसी छिद्र से, साइकिल पम्पसे किसी ने उसमें इतनी हवा भर दी है कि एक बार और पम्प मारते ही किसी अबोध शिशुद्वारा निरन्तर फुलाए जा रहे गुब्बारे की ही भांति, फट्ट से फूट जाएगी. गोल तमतमायापृथुल चेहरा, मधुमक्खी-दंश से सूजी-सी आंखें, और फूले कपोलों में कहीं खो गईनासिका. चेतनाहीन सूजे हाथों को उठा-उठाकर, बड़ी बहू उसे कार्डिगन पहनाती, हैंडलघुमाकर, पलंग उठा मंझली, परिपाटी से सास का जूड़ा बना, क्रीम-पाउडर लगा मांग मेंसेंदूर भरती, छोटी, सास की अचल देह में यत्रा-तत्रा चिकोटी काट, निर्विकार चेहरे कीओर देखकर कहती "उंह, अभी भी कोमा में हैं." उसके परम सन्तुष्ट कंठस्वर को सुन मुझेलगता, जैसे सास की इसी कोमावस्था की उसे कामना है. मधुमेह का वह भयानक तांडव नर्तन,मैंने निरन्तर दस दिन तक देखा था, फिर एक दिन रोगिणी को, मृत्यु ने मुक्ति दे दी.उसी दिन, वह कमरा फिर आबाद हो गया था. इस बार किसी मंत्री-पत्नी ने, अपनीसामान्य-सी व्याधि के लिए, उस कमरे को धन्य किया था, इसी से उनके आते ही वहां किसीविवाहोत्सव के-से अदृश्य शामियाने टंग गए थे. लगता था, मंत्री महोदय का सम्पर्क,निर्माण-विभाग से था. पौ फटते ही, जिस तत्परता से कर्मचारी, वहां सामान्य-सीटूट-फूट को ठीक करवाते रहते, मुझे लगता कि यदि कहीं मंत्री-पत्नी को कुछ हो गया तो,पलक झपकाते ही वे स्वामिभक्त अनुचर, एक दर्शनीय ताजमहल भी खड़ा कर देंगे. किन्तु,ऐसा कुछ हुआ नहीं. अपनी सामान्य-सी व्याधि के, असामान्य उपचार से सहमकर ही, शायदउन्होंने समय से पूर्व ही कमरा खाली कर दिया. अपनी मृत्युंजयी शक्ति के प्रदर्शनमें, डॉक्टरों में एक होड़-सी लग गई थी, फलस्वरूप एक से एक प्रभावशाली सुइयों ने,रोगिणी को भयत्रास्त कर, तीसरे ही दिन रोगमुक्त कर दिया. अब उस कमरे में, एकमहाक्रोधी चिड़चिड़ा बूढ़ा आ गया था जिसके पेट में किसी नवनिर्मित नाभिकुंड में लगाईगई रबर की नली, क्रमशः जलबिन्दुनिपात से, हाथ में पकड़ी गई शीशी को छलकाती रहती औरशीशीधारी वह दुर्वासा दिन-भर पूरे अस्पताल की परिक्रमा कर, रात-भर कभी अस्पताल केपूरे स्टाफ को, कभी अपनी पत्नी को ऐसी-ऐसी मौलिक गालियां देता रहता कि कान मेंअंगुली धरनी पड़ती. उसकी सहिष्णु वृद्धा सहचरी बहरी थी, इसी से पति का स्वर,आवश्यकता से कुछ ऊंचा ही रहता "ससुरी, कैसा उल्टा जवाब दे रही है, लगता है तेरेमुंह में बवासीर है." मैं सुनकर सिहर उठती. मुझे लगने लगा था कि अस्पताल में रोगीबनकर रहने की विवशता से भी जटिल विवशता होती है, रोगी की सहचरी बनकर रहने की. अपनेउस खोखले अकर्मण्य अस्तित्व की अल्पज्ञता, मुझे रह-रहकर झकझोर उठती. जिधर देखो, उधरदुःख, यन्त्राणा, मृत्युभय और सर्वोपरि मानव की असहाय, करुण विवशता. मृत्यु आती औरचिकित्सा-विज्ञान की नवीनतम मृत्युंजयी औषधियां ताक पर धरी रह जातीं. प्लेटफार्मपर, एक पल भी अधिक न रुकनेवाली डाकगाड़ी की तत्परता से ही वह आती, और साथ लेजानेवाले यात्राी को लेकर धड़धड़ाती निकल जाती. तेरह नम्बर की रोगिणी का भी, उस रातको शायद टिकट कट चुका था, दिन-भर उसे कनवल्शन्स हो रहे थे. मैं मना रही थी किरात-भर उसे कुछ न हो. एक तो अस्पताल की विमर्ष निस्तब्धता, उस पर ब्लैकआउट कादमघोंट अन्धकार. कभी-कभी बीच में, सायरन की कर्णकटु चीत्कार, अन्धकार को भेदतीअस्पताल की दीवारें कंपा देती और ऑपरेशन थिएटर की तेज बत्ती भी दप से बुझ जाती.कहीं श्मशान में गिद्धिनी के विलाप का प्रसंग पढ़ा था, उस सायरन की हिस्टीरिकल चीखसे, निश्चय ही उस विलाप का स्वर कम भयावना होता होगा. उस रात को, मुझे अचानक फोनकरने जाना पड़ा था. किसी तरह अन्धकार से समझौता करती, मैं तेरह नम्बर तक पहुंची तोरोगिणी कराह रही थी. नित्य के उस परिचित करुण स्वर को अब मैं खूब पहचानने लगी थी.उसके सांवले रंग को, घातक रोग ने इधर एक अनुपम लुनाई से रंग दिया था. बड़ी-बड़ी आंखोंकी वह तरल-करुण दृष्टि से कभी जाते-जाते, प्रत्येक आवागमन का लेखा-जोखा रखती थी, अबउदासीन हो गई थी. सिरहाने बैठा, उदास चेहरेवाला उसका तरुण पति अब चिर-वियोग कीआशंका से शंकित होकर, सामान्य-सी पद-चाप से ही चौंक उठता. पिता के साथ सटकर बैठी,रोगिणी की एकमात्रा शान्त कन्या के सात-आठ वर्ष के चेहरे को, मां की असाध्य बीमारीने कुछ ही दिनों में, किसी अनुभवी प्रौढ़ा का गम्भीर चेहरा बनाकर, बदरंग कर दिया था.रोगिणी के रोग का परिचय, मुझे हृदयहीन वार्डबाय के चीखते कंठस्वर ने, कुछ ही दिनपूर्व दिया था. भरे दूध की बाल्टी और मग लिए, वह दूध बांटता, ठीक उसी के कमरे केबाहर चीख रहा था "अजी, तेरह नम्बर को दूध दिया जाएगा क्या?" "किसको?" बरामदे केदूसरे कोने से, उससे भी तीखी स्वरलहरी ने, प्रश्न का तीर छोड़ा था "अजी तेरह नम्बरकांसर..." और बिस्तर पर पड़ी तेरह नम्बर की उस रोगिणी को निष्पलक स्तब्ध विवशता सेस्वयं अपने घातक रोग से हाथ मिलाते मैंने भी देखा था. धीरे-धीरे ड्यूटी-रूम की ओरबढ़ी. मेट्रन अपनी पुष्ट जंघाओं से पूरा हीटर घेरे गहरी निद्रा में निमग्न थी, उसीके अगल-बगल दो कुर्सियों में केरल-निवासिनी दो नर्सें भी ऊंघ रही थीं. एक की श्वेतकलफ की गई टोपी का किरीट कांटे से उलझकर उसके गोलाकार जूड़े पर अटक गया था, दूसरीदोनों हाथ छाती पर धरे ऐसी लग रही थी जैसे किसी प्रार्थना में डूबी हो. मेरी पदचापसे वही पहले जगी. "क्या है?" उसने कुछ रूखे स्वर में पूछा. दूसरी उसका प्रश्न सुनकरनींद ही में बड़बड़ाने लगी ‘‘कौन है म्यूरियल? अरी वही चार नम्बरवाली होगी, रोज फोनके लिए परेशान करती है." "चाबी दीजिए," मैंने भी कुछ रूखे स्वर में कहा "मैं चारनम्बरवाली नहीं हूं, मुझे जरूरी फोन करना है." "फोन खराब है, इमरजेन्सी से करलीजिए!" जगी नर्स ने फिर अपनी कछुए-सी गर्दन अपने विराट वक्षस्थल में समेट ली औरअपने केरल के सपनों में खो गई. मैं झुंझलाकर बाहर निकल आई. इमरजेन्सी से फोन करनेके लिए डेढ़गजी कॉरीडोर पार करनी होगी, यह मैं जानती थी. चतुर्दशी की चन्द्रिका गहनअमराई से फिसलती अस्पताल के गुलाबों पर थिरक रही थी. शाल को कानों से लपेटकर मैंआगे बढ़ी और मुझे लगा मैं अकेली नहीं हूं. रेशमी सरसराहट से मैं चौंककर मुड़ी. एकलम्बी, पतली युवती बुर्के का नकाब पलट मेरी ओर देखकर ऐसे मुस्करा रही थी जैसे मुझेवर्षों से जानती हो. पर कैसा आश्चर्य! मैंने तो इसे पहले कभी नहीं देखा था! वह फिरहंसी और मैं कह नहीं सकती कि मध्य रात्रि की नीरवता ने ही उस चेहरे को उतना सफेदबना दिया था या उसका रंग ही वैसा दूधिया था. जो भी हो, ऐसी सौन्दर्य रूपरेखा, जोकभी केवल असित हाल्दार या अवनीन्द्रनाथ की तूलिका ही अंकित कर सकती थी, मेरे सम्मुखसाकार खड़ी मुस्करा रही थी. उस नख-शिख का वर्णन करना मेरे लिए सम्भव नहीं है, यदिकिसी ने अवनीन्द्रनाथ अंकित ‘जेबुन्निसा’ देखी है, तो सम्भव है, वे उस रूपशिखा कोकुछ अंश में कल्पना द्वारा ग्राह्य कर सकते हैं. ऐसी तीखी नाक और ऐसे नुकीले तेवरविधाता शायद मूड आने पर ही गढ़ता है. पान की लालिमा से रंजित ओष्ठाधरों की जर्दासुवासित लपट मेरे पास सरसराकर चली आई. "अजीब हालत है इस अस्पताल की!" वह बीड़ागुलगुलाती भरे-भरे स्वर में कहने लगी "न जाने ये फोन गुलदस्ते-सा क्यों सजा-धरारहता है! जब देखो तब खराब! मुआ बीस-बीस पैसे डकार हमेशा गूंगा बना रहता है!" बातउसने ठीक ही कही थी. मेरे भी न जाने कितने बीस पैसे वह आज तक डकार, गूंगा ही बना,मुझे अंगूठा दिखाता रहा था. हिना की मीठी खुशबू से मेरी स्मृति के नथुने फड़कने लगे.वर्षों पूर्व रामपुर के ऐसे कितने ही खुशबूदार रेशमी बुर्कों की स्मृति मुझे विह्नलकर उठी. मुहम्मद अली पेशकार साहब की सुन्दरी बेगम के काले रेशमी बुर्के की ऐसी हीसुवास, फिर नवाब साहब की राजमाता हुजूरे आला के रेशमी बुर्के की ऐसी ही परिचितसुगन्ध और भी न जाने कितने ही परिचित सुवासित रेशमी बुर्के एक-एक कर अदृश्य पैराशूटमें बंधे मेरे स्मृति-प्रांगण में उतरने लगे. इमरजेन्सी की बंेंच पर ऊंघता चौकीदारहमें देखकर सतर हो गया. "पहले मैं फोन कर लूं," मेरी संगिनी ने हंसकर पूछा मैं एकबार फिर उसके भुवनमोहिनी स्मितजाल में उलझकर प्रश्न का उत्तर देना भूल गई. मेरेउत्तर की प्रतीक्षा किए बिना ही उसने फोन उठा लिया था. "हैला-हैलो, मैं हूं मुमताज,हैलो, रजाअली बोल रहे हैं?’’ ‘‘कहिए..." और वह हंसी. कैसी मीठी खनक थी जैसे किसी नेचांदी का झुनझुना बजाया हो. "जी हां, मैं हूं मुमताज, हैलो-हैलो..." फिर क्षण-भरपूर्व किसी परिचित कंठस्वर को सुनकर खिला चेहरा मेरे देखते ही देखते उलझन कीझुर्रियों से भर गया. "कौन शमी? क्या कहा, साहब सो रहे हैं? अभी-अभी तो बातें कररहे थे अजी कोई बोलते क्यों नहीं?" दस मिनट तक वह फोन के निःशब्द आले में निरन्तरबोलती, फटकारती चली गई थी. मेरे जी में आया, कहूं, आपका फोन नहीं मिल रहा है तोमेहरबानी से क्या मुझे करने देंगी? मेरे पति की कैप्सूल का समय हो गया है. पर वहबन्दी फोन से चिपकी बड़बड़ाती चली जा रही थी "रोज परेशान करते हैं, नमकहराम दो-दोनौकरों की ड्यूटी फोन पर लगी है, पर मुए मुफ्त की तनख्वाह डकार खर्राटे भरते हैं.घंटी बराबर जा रही है पर कोई फोन उठाता ही नहीं." "मेम साहब!" मैं चौंककर मुड़ी.बेंच पर बैठा चौकीदार अब मुझे अचरज से घूरता खड़ा हो गया था. "आप तब से खड़ी हैं, फोनक्यों नहीं करतीं नम्बर भूल गई हैं क्या?" इस बार मैंने उसे अचरज से देखा."तुम्हारे इस फोन में एक साथ दो जनी फोन कर सकती हैं क्या?" मैंने व्यंग्यपूर्णझुंझलाहट से कहा और मेरी संगिनी फिर से हंस पड़ी. चौकीदार मुझे ऐसे देखने लगा जैसेमैं नशे में हूं. "कभी एक से एक सिरफिरे नमूने चले आते हैं फोन करने." वह स्वयं हीबड़ी अशिष्टता से बड़बड़ाता बाहर चला गया. मुमताज ने झंुझलाकर फोन पटका और मैंने चट सेउठा लिया. फोन कर मैं बाहर निकली तो वह भी साथ चलने लगी. बुर्के का नकाब उसने फिरगिरा लिया, वह बिना कुछ बोले मेरे साथ चुपचाप चली जा रही थी, पर मुझे लगा वहनिःशब्द रो रही है. कॉरीडोर के पास पहुंचकर उसने बुर्का उठा लिया और मैंने देखा,उसके कंठ से लेकर छाती तक सफेद पट्टियों का जिरहबख्तर-सा कसा है. तब क्या वहसर्जिकल वार्ड से ही सीधी उठकर फोन करने चली आई है? पट्टियां भी कभी किसी कोआभूषणों की भांति मंडित कर सकती हैं, मैंने उसी दिन जाना. कर्णमूल से लेकर उसकीसुराहीदार ग्रीवा तक लिपटी उन पट्टियों में वह मुझे क्लियोपेट्रा बनी लिज टेलर-सीही गरिमामयी लगी. प्रखर ललाट पर पलटा गया रेशमी काला बुर्का उसे अपने मसिवर्णीकंट्रास्ट से स्फटिक-सा चमका रहा था. पतली नाक पर बहुत बड़े नग की हीरे की लौंग उसअन्धकार में किरणें-सी छोड़ रही थी. क्रोध और अपमान से उसके अधर कांप रहे थे. "बहन,"उसने सहसा आम्रकुंज की घनी अमराई के बीच मुझे हाथ पकड़कर रोक लिया. गोरी कलाइयों परपड़ी धानी ऊदी रेशमी चूड़ियां कुहनियों तक सरक गईं. उन लम्बी अंगुलियों का स्पर्शनिश्चय ही अमानवीय रूप से हिमशीतल था. मुझे लगा कि किसी ने मेरे हाथ पर कोईहिम-शिलाखंड तोड़कर चिपका दिया है. "देख रही हो न दुनिया कैसी है" वह डूबी आवाज मेंकहने लगी "कभी हम जिनकी आवाज सुनकर थर्राती थीं, आज वही हमारी आवाज सुनकर थर्रातेहैं, दिन-रात हमें छाती से चिपकाकर भी जिनकी साध नहीं मिटती थी, वे ही आज हमारीपसलियों की खनक सुनते ही बेहोश हो जाते हैं. तुम भी तो अपने बीमार शौहर के साथ यहांआई हो, क्यों?" मैं चौंकी. इसे कैसे पता हो गया कि मैं अपने बीमार पति के साथ यहांआई हूं!" "ठीक है, ठीक है," वह अब हंस-हंसकर कहने लगी "रात-रात-भर जगी रही पर खुदान करे अगर कभी पहले तुम चली गईं तो इसी शौहर की बेरुखी से हमारी तरह तड़पती रहोगी.हम गईं तो तीसरे ही महीने, हमारी चचाजाद बहन आ गईं." फिर उसकी मृगमद में सनी लम्बीसांस मेरा कपोल स्पर्श कर उठी "यह हमारा ही बचपना है बहन, जो आधी रात को फोन करनेचली आती हैं. वह तो भला हो उस गद्दे का जिसने आज तुमसे मिला दिया." मैं फिर चौंकी,किस गद्दे की बात कर रही थी वह. उसने शायद मेरी आश्चर्यचकित दृष्टि देख ली. "जिसगद्दे में तुम सोती हो, वह हमारा है बिन्नी, हम भी उसी में सोई थीं. क्यों? रजाअलीकी तरह तुम्हें भी डरा दिया ना हमने?" इस बार उसकी हंसी पहाड़ की बर्फीली चट्टानोंका स्पर्श कर बहती हवा की ही भांति सीटी-सी बजाकर विलीन हो गई. "खुदा हाफिज!" कहतीवह सरसराती तेरह नम्बर वार्ड के भीतर धंसती अदृश्य हो गई. तेरह नम्बर में तो वहहिन्दू रोगिणी थी, यह मुस्लिम युवती उसकी कौन हो सकती थी? रात-भर मैं सो नहीं पाई.सुबह उठते ही मैंने वार्डब्वाय को बुलाकर वह मनहूस गद्दा बाहर फिकवाया, घर जाकरअपना गद्दा लाई, फिर भी छाती के भीतर कहीं गहरी धंस गई उस ‘खुदा हाफिज’ की चिलकमुझे कई रातों तक सालती रही. कहती भी किससे? विज्ञान के इस युग में भला ऐसी घटना काकोई विश्वास करता? फिर कई रातों के रतजगे की थकान दूर करने मैं एक दिन घर लौटी. आधीरात को उसी परिचित सुगन्ध ने सहसा मेरे हाथ-पैर ठंडे कर दिए. "जरा खिसको बिन्नो,हमें भी जगह दो बड़ी दूर रहती हो तुम, अल्ला- अल्ला कर पहुंच पाई हैं हम!" और फिर वहमुझे ज़ोर से धकेलने लगी. फिर मैं अपनी चीख नहीं रोक पाई. मेरी चीख सुनकर ही शायदमेरा पूरा परिवार कमरे में आ गया. बत्ती जलते ही मेरी चेतना जाग्रत हुई और मैंलज्जित-सी होकर बैठ गई. उस ठंड में भी मेरे कपड़े पसीने से तर थे. "बुरा सपना देखाथा," मैंने खिसियाए स्वर में कहा. बत्ती फिर बुझा दी गई, सोनेवाले फिर सो गए, परमैं नहीं सो पाई. इतना मैं उसी दिन जान गई थी कि मैं कहीं भी रहूं, वह मुझे ढूंढ़लेगी. सोचा था, शायद इन दुर्गम पर्वतश्रेणियों के व्यवधान को चीरकर वह मुझे यहांनहीं ढूंढ़ पाएगी. किन्तु उस चतुरा नटिनी की सर्वव्यापी सन्धानी दृष्टि के घेरे नेमुझे यहां भी बांध लिया है. इस बार उसकी ‘खुदा हाफिज’ एक तीखा खंजर बन मेरे कलेजेमें धंसकर रह गई है. "तुमसे अजीब लगाव हो गया है बिन्नो!" वह हंस-हंसकर कह गई है."भला हो उस गद्दे का जिसने तुमसे मिला दिया, यहां अकेले में बड़ी तबीयत घबराती है.सोचती हूं, तुम्हें भी साथ ले चलूं, क्यों?" उस प्रश्न के उत्तर देने में मैंने एकक्षण का भी विलम्ब नहीं किया था. "नहीं-नहीं, मैं कैसे आ सकती हूं? मेरे बच्चे,मेरी गृहस्थी, मेरा अधूरा उपन्यास, मेरे बीमार..." मैं अपना वाक्य पूरा भी नहीं करपाई थी कि वह अपना चेहरा एकदम मेरे निकट ले आई "तुम्हारे बीमार शौहर? यही कहना चाहरही थीं न? मैं भी अपने बीमार शौहर को ही छोड़कर आई थी बिन्नो! मेरे जाते ही उनकीबीमारी भी चली गई. किसी के चले जाने से दुनिया नहीं रुकती, अच्छा, खुदा हाफिज!" वहहमेशा निरभ्र आकाश में चमकती-बुझती मेहताब की ही भांति अदृश्य हो जाती हैनक्षत्राखचित गगनमंडल में उसके अस्तित्व का कोई भी चिन्ह मुझे दृष्टिगोचर नहींहोता. खिली चन्द्रिका को आकाश में छिपी किसी अज्ञात मेघवाहिनी के मेघखंडों नेगुरिल्ला सैनिकों की ही फुर्ती से दबोच लिया है. गहन अन्धकार भेदती, देवद्रुमोंकी-सी सीटी बजाती बयार, सुदूर पाषाण-देवी के डोरी में बंधे घंटों को हिलाती बही चलीजा रही है. ताल के स्थिर रजत-दर्पण को भंग करती एक मछली छपाक से फिर पानी में दुबकगई. मैं जानती हूं, किसी दिन इस निस्सीम शून्यता को भेदती मेरी रहस्यमयी संगिनी कीआह्नान-ध्वनि फिर गूंज उठेगी. सोचती हूं, उस आह्नान को स्वीकार कर क्या सचमुच हीमुझे जाना पड़ेगा? किताब खरीदने के लिए यहां क्लिक करें. - https://goo.gl/E8SFbR-------------------------------------------------------------------------------- शिवानी का हफ्ता में आज पढ़िए ‘गंगा बाबू कौन’शिवानी का हफ्ता में पढ़िए पहली कहानी ‘लाल हवेली’'शिवानी का हफ्ता' में तीसरे दिन पढ़िए कहानी 'गूंगा'