बात बीते सप्ताहांत की है. सब कुछ काफी सामान्य था. लंदन का मौसम 2 दिन की धूप दिखाबांग्ला आर्ट फिल्मों की हद तक उदास हो चला था. संध्या का खाना-पीना समय पर हो गयाथा, बर्तन-भांडे धुल गए थे. समविद् (हमारा साल भर का बेटा) ने सूसू-पॉटी इत्यादि सेएक आध घंटे की निवृत्ति ले ली थी और अपने एक पायजामे को वो स्कार्फ़ की तरह गर्दनमें लपेटे 'हो...हो...' का उद्घोष करता लिविंग रूम में अलमस्त घूम रहा था. मैं औरपत्नी डिनर के बाद बैठे विचार में थे कि बालक के इस मूड का फायदा उठा कर कुछ सेनुमावेनुमा स्ट्रीम कर देख लें. इसी सिलसिले में बात निकली फ़िल्म 'पिंजर' की. डॉचंद्रप्रकाश द्विवेदी ने बनाई थी और मनोज वाजपेयी ने जबर अभिनय किया था. यहां सेबात होती चंद्रप्रकाश द्विवेदी जी के अन्य प्रोजेक्ट्स पर गई और ध्यान आया कि उनकाएक सीरियल 'मृत्यंजय' भी कुछ दिन आया था दूरदर्शन पर. कुछेक एपिसोड्स के बाद उसेबंद करना पड़ा था. इसका ध्यान आते ही मैं हमेशा उबल पड़ता हूं कि हमारे लोगों को हवामें उड़ते तीर, तीरों को गिरता देख स्तब्ध धनुर्धर, चालू तकनीक से निर्मित स्पेशलइफेक्ट्स छाप कार्यक्रम ही पसंद आते हैं. वैचारिक स्तर पर अथवा मानस पर जो छाप छोड़ेउसे नकार देते हैं. चंद्रकांता जैसी बेहूदगी का इतने समय चलना इस बात का द्योतक है.खैर, मेरे इस गुस्से पर पत्नी श्री ने सख्त टिप्पणी दर्ज की. तुम ही लगे रहते होवैचारिक स्तर की बात करने. आम जीवन में इस सब का क्या महत्व है. आदमी अपनी दाल-रोटीमें व्यस्त रहता है और भगवान से उसे चमत्कार की उम्मीद होती है. कि भगवान हो तो कुछजादू मंतर दिखाओ, बकैती तो सब कर ही लेते हैं. आम आदमी को कृष्ण की गीता से अधिकउनका रौद्ररूप चाहिए, रथ का पहिया ले कर सबको हौंक देने वाला. शूर्पणखा, पूतना,कालिया मर्दन इत्यादि दृश्यों से रामानंद सागर ने उन्हें वही दिया. तुम ले के घूमतेरहो अपनी विचार क्रांति और अध्यात्म. ‘हम्म’. मैं प्रत्युत्तर में इतना ही कह पाया.मैं अपनी पत्नी के यथार्थवाद को पसंद करता हूं. पर यथार्थवादियों से मेरी एक समस्याभी रही है. उन्हें सेंस ऑफ टाइमिंग नहीं होता. जब एक आदमी भावों से भरा शिवाजीसावन्त और द्विवेदी के माध्यम से समाज में क्रांति ले आना चाहता है तो उसे लाने दो.उसे उसी वक़्त ये बताने की क्या जरुरत है कि दुनिया ऐसे नहीं चलती, कॉमर्स और इकॉनमीपर चलती है या विचार को कोई नहीं पूछ्ता या तुम बाथरूम का बल्ब बदलना फिर भूल गए होया अभी घर में हूवर भी करना है. यथार्थवादियों को हम स्वप्नवादियों की आत्मा कोटाइमिंग के साथ कुचलने में वैसा ही मज़ा आता है जैसा जॉफ्री बायकाट को सौरव गांगुलीके स्क्वायर ड्राइव देख कर आता था. पर आज मैं पत्नी के यथार्थवाद के सामने हार नहींमानने वाला था. डिनर में लपेटे आलू परांठे और मक्खन से मिली समूची मानसिक शक्ति कोइकठ्ठा कर मैंने कहा “धर्म,चरित्र,विचार वगैरह भी उतने ही स्वाभाविक और ज़रूरी हैं.जितने भूख, गुस्सा और वाई-फाई! तुम्हारी समस्या ये है कि तुमने अपने आस-पास कीदुनिया को उन चश्मों से देखा नहीं है. तुमने ऐसे लोग नहीं देखे हैं जो इन बातों कोआम ज़िन्दगी में जीते हैं." इतना कह कर मैं अपने मोनोलॉग के आगे की लाइनें सोच हीरहा था कि बालक ने साइड स्टूल को गिरा लिया और उस पर घुड़सवार की तरह चढ़ने की कोशिशकरने लगा. उधर ध्यान ले जा कर मैं वापस अपनी बात पर लाऊं उस के पहले बीवी ने सवालदागा. तुमने देखे हैं ऐसे लोग? मैंने असमंजस में बच्चे को देखा. नालायक अच्छा भलामोनोलॉग दिमाग में था तेरे चक्कर में सब भूल गया. काउंटर कोशचेन और आ गया. खैरमैंने बात संभालते हुए कहा, हां देखे हैं. पत्नी ने अटैक जारी रखते हुए कहा, तोबताओ कुछ ऐसा. ऐसे मौको पर मैं अमूमन बात बदल कर फ़ोन में झांकने लगता हूं पर आजईश्वर स्वप्नवादियों के पक्ष में था. एक आईइसआई मार्का किस्सा मुझे याद आया. मैंउसी अंदाज़ में बीवी की तरफ मुखातिब हुआ जैसे द्वापर युग में युधिष्ठिर यक्ष से हुएहोंगे प्रश्नोत्तर काल में. और कहा. अब पूछ ही रही हो तो सुनो. बात होगी कोई सन्2004 की (बात बहुत पुरानी न भी हो तो इस तरह कहने से बात का वज़न बढ़ता है और सुनानेवाला काफी अनुभवी मालूम देता है). मैं कॉलेज में पढता था. पढता था मतलब दाखिला थाऔर 2 साल में डिग्री की उम्मीद थी. इंजीनियरिंग कॉलेज के लड़कों की जवानी दूसरेपारंपरिक उद्गमों के अभाव में कई अलग-अलग मूर्खतापूर्ण रास्तो से निकलती रहती है.लड़ाई-झगड़ा मार-पीट उन्हीं में से एक है. हैं तो चार पर आम तौर पर साथ ही होते हैंसो एक लिख दिया. सो 2004 के साल में भी जर, भावी जोरू और जमीन के लिए कॉलेज में कईलड़ाइयां लड़ी गईं. इन लड़ाइयो की ख़ास बात ये होती है की कुछेक शर्ट फ़ट जाती हैं, कुछमुक्के बरस जाते हैं कुछ जूते चल जाते हैं. माने ज़्यादा खून-खराबा नहीं होता.शुरुआती मारपीट के बाद कॉलेज के दादा भाई लोग ‘कोम्प्रोमाईज़’ करवा देते है और लड़केफिर अपनी चाय सुट्टा दारू जीवनचर्या में लग जाते हैं. पर एक लड़ाई थोड़ी ज़्यादा बड़ीक्योंक़ि उसमें जूनी इंदौर के किसी छुटभैये पेलवान (पहलवान का इंदौरी संस्करण) काछोटा भाई भी शामिल हो गया. कहानी के तकाज़े से उसका नाम हम यहां छिपलू रख लेते हैं.तो छिपलू साहब वैसे बड़े ही मस्तमौला, चाय-सुट्टा-दारू-गांजा किस्म के लड़के थे. वोभी 2 पेग के पश्चात ‘तू मेरा भाई है’ और 4 के बाद ‘यार बड़ी याद आ रही है उसकी’ पर आजाते थे. हंसने बात करने में कोई कमी नहीं, वसुधैव कुटुम्बकम् टाइप. छिपलू की एकहॉबी थी जो यदा-कदा उलटी पड़ती थी. हॉबी थी कॉलेज की लड़ाइयों में सुलह कराने उतरपड़ना. छिपलू की लोकल प्रेजेंस और यारी व्यवहारी के चलते उनका सुलह प्रतिशत काफीअच्छा था और योद्धा महकमों में उनको हलके से नहीं लिया जाता था. पर इस झगडे मेंजिसकी सत्यनारायण व्रत कथा मैं आपको सुना रहा हूं. छिपलू का सुलहकौशल अपना काम नहींकर पाया. अब झगडे का कारण तो मुझे ठीक से याद नहीं पर बाहर बिहार से आए कुछ लड़के एकतरफ थे और कुछ लोकल बाशिंदे एक तरफ. वजह शायद कोई लड़की ही थी और स्वाभाविक है कि वोलड़की ये नहीं जानती थी कि वो युद्ध का कारण बन बैठी थी. वैसे भी इस तरह के झगड़े कईसारी बातों का संग्रहण होते है लड़कियां उनका तात्कालिक कारण. ठीक वैसे ड्यूकफर्डिनेंड की हत्या प्रथम विश्वयुद्ध का तात्कालिक कारण थी . खैर दोनों गुटों मेंजूतमफांक चल रही थी और अपने छिपलू कूद पड़े बीच में. दोनों गुटों में उनके दोस्त थेऔर सोचा कि मुझे सामने देख कर रुक ही जाएंगे. साहिर लुधियानवी के शब्दों में कहेंतो, मग़र ये हो न सका! उल्टा एक, दो या कई मुक्के छिपलू को खाने पड़ गए. बस छिपलू नेवहीं महाभारत के कृष्ण वाला रौद्र रूप धारण किया और प्रचंड मालवी एक्सेंट में और भीप्रचंड गालियों का उच्चारण करते हुए युद्ध में शामिल हो गए. लोकल लड़कों के गुट नेउनकी उत्तेजना को भुनाया और ललकार कर, हौंक कर मारने लगे. इसी बीच कुछ जांबाज़लेक्चरर जो अपने ज़माने में इस तरह के कई गुल खिला चुके थे बीच में आए और लड़कों कोअलग किया. अब साहब झगड़ा तो होकर ख़त्म हो गया पर सुलह के पैरोकार स्वयं साक्षातछिपलू इस बार पार्टी थे. चूंकि घुटना पेट की ही तरफ मुड़ता है, वो लोकल गुट के मानलिए गए थे, वो और बात थी कि रौद्र रूप में उनकी लात ने लोकल-बाहरी नहीं देखा था औरसब पर सामान रूप से बरसी थी. छिपलू भिया भी काफी क्रोध में थे और अगली मार की योजनाबनाई जाने लगी. छिपलू के बड़े भाई ने अपनी अक्षौहिणी सेना भेजने का वादा भी किया औरयोजना में इनपुट्स भी दिए. जैसे कि जहां मार की योजना है वहां के लोकल थाने पे एकआदमी पहले बिठा दो रिपोर्ट पहले अपन कर देंगे टाइप समझदारी की बातें. सामने के गुटके उस लड़के को चुना गया जो लड़ाई में सबसे आगे दिखा था और छिपलू को ऐसा आभास था कीउसे पहला मुक्का उसी ने मारा था. इस पिटने वाले लड़के को हम शुक्ला कह लेते हैं. इसबैकग्राउंड और कॉन्टेक्स्ट के साथ अब एंट्री होती है हमारे उस किरदार की जिसके कारणइस पूरे प्रसंग को लिखा जा रहा है. उस लड़के को मैं बाबा कह लेता हूं. जैसा कि मैंनेपहले बताया था कि छिपलू गांजा इत्यादि के शौक़ीन थे और वहीं से बाबा और छिपलू कीगाढ़ी दोस्ती थी. बाबा के घर के बारे में कहा जाता था कि वहां चायपत्ती, शक्कर औरगांजा तीन अलग-अलग प्लास्टिक के पारदर्शी डिब्बों में रखे जाते थे. बाबा की आंखेपरपेचुअल चढ़ी रहती थीं. छिपलू और बाबा का रोज़ का साथ उठना-बैठना-फूंकना था. यहां तकबात सब ठीक थी. अब इस तरह की वारदातों में होता यूं है कि घुस के मारने कीप्रक्रिया में जो सामने पड़ता है, धो दिया जाता है. कुछ मिनिट्स में कार्य संपन्न करहो-हल्ला कर निकल लो. छत्रपति शिवाजी से चे गुएवेरा तक सभी इन छापामार युद्धशैलियों के पायनियर रहे हैं. पडोसी आ जाते हैं, और पिटे हुए लड़को को सोसाइटी सेनिकाल फेंकने की कवायद शुरू हो जाती है कि पहले ही कहा था कि लड़को को मत रखो. यहीहोना है अब रोज़. फ्लैट में घुस के मारने की पारंपरिक युद्ध शैली में छिपलू एंड को.को अच्छा अनुभव था और काम आसान था. बात फंसी जाकर वहां जब मारकर्मियों ने शुक्ला(जिसकी सामूहिक कुटाई छिपलू एवं को. द्वारा तयशुदा थी) के रहन-ठिकाने की मालूमात कीऔर पाया कि वो और बाबा एक ही फ्लैट में रहते हैं. अब छिपलू के सामने महान धर्मसंकट.एक तरफ वो दोस्त जिसके साथ वो नियमित रूप से गांजा औषधि का सेवन कर अध्यात्म की चरमसीढ़ियां चढ़ता था तो दूसरी तरफ वो व्यक्ति जिसने उनका सुलह प्रतिशत खराब किया था.बाबा पर तो हाथ उठाने का सवाल नहीं था पर उनके रूममेट पर हाथ डालने में भी बाबा कोइनवॉल्व करना आवश्यक हो जाता था. क्या किया जाए? युद्ध को लेकर अर्जुन के मन में जोकोल्ड फ़ीट बन आए थे. छिपलू के भी आ गए. पर छिपलू के कृष्ण कहां हैं? कहां हैं भगवनजो एक दम से 15x साइज़ कर के विश्वजयी मुस्कान के साथ प्रवचन देवें? उनके गुट में तोसिर्फ गुटखा खाकर एक-दूसरे को गंडिया कह संबोधित करने वाले योद्धा ही थे. अध्यात्मऔर धर्मसंकटो से उनका उतना ही वास्ता था जितना बनारस के पंडों का व्हे प्रोटीनपाउडर से. एक तरफ मार की तैयारियां ज़ोरों पर थीं, चाय की दुकानों पर लड़के आपस मेंछोटी गोल्ड फ्लैक बांटते हुए दबी ज़बान में संभावनाओं पर विचार कर रहे थे तो दूसरीतरफ छिपलू के मन में माया उत्पन्न हो रही थी. बड़ा धर्मसंकट था. बड़ी महाभारतीयस्थिति थी. अंत में छिपलू ने महाभारत महाकथा से आईडिया लिया और जिस तरह पांडव भीष्मपितामह से उन्हीं को परास्त करने का तरीका मालूम करने गए थे, छिपलू ने बाबा से हीपूछ लेना जायज़ समझा. बातचीत से लड़ाइयां सुलझती कई बार देखीं गयी थीं, पर ऐसाइंजीनियरिंग कॉलेज युद्ध इतिहास में ये शायद पहली ही बार था कि ठन्डे दिमाग से बातकर युद्ध का प्रोटोकॉल तैयार किया जाना था. एक शाम को मैं बाबा के साथ चाय पी रहाथा, रेडियो पर गुलाम अली की ग़ज़ल 'किया है प्यार जिसे...' चल रही थी. पीछे के पीपलवृक्ष के पत्ते अपनी मस्ती में झूमते थे जैसे रेशमिया का कोई गाना उनके दिमाग मेंचढ़ गया हो. शहर के बाहर स्थित कॉलेज के पास वाली चाय की गुमटी के बैकग्राउंड से अग़रकॉलेज की बिल्डिंग हटा दी जाए तो बस गुमटी, चाय, लड़के, चायवाला, अजीब बातें, खेतइत्यादि बच जाते थे. मसलन एकदम ऐसा माहौल था जैसे आप फणीश्वरनाथ रेणु के किसी नावेलको जी रहे हो. खैर चाय की दुकान पर मैं, बाबा और चाय की दुकान वाला जीतू जो यदा-कदालोगों का सर फ़ोड़ देने के कारण तड़ीपारी काटता रहता था/थे. इतने में छिपलू भाई आए औरआकर प्लास्टिक के स्टूल पर संभलकर बैठ गए. उस स्टूल में 3 ही टांगे थीं और जीतू कीदुकान के फ्रीक्वेंटर लड़के 3 टांगो के स्टूल पर जम कर बैठने की विधा में पारंगत थे.बाबा ने मुट्ठी में दबे सिगरेट के फिल्टर वाले कोने को हल्का सा उसकी एक्सिस परघुमाया. एक लंबा कश खेंचा और सिगरेट को छिपलू की ओर बढ़ा दिया. छिपलू ने विनम्रता सेसिगरेट ली और अभिवादन में सर हिलाया. मेरी तरफ छिपलू ने दूसरा हाथ मिलाने के लिएबढ़ा दिया और मुस्कुराकर बोला. ओर भिया... मैंने भी मुस्कुराकर बस सेठ कह दिया. मैंस्वयं सिगरेट-बीड़ी इत्यादि नहीं पीता था पर सिगरेट वालो के यूनिवर्सल ब्रदरहुड सेकतई ईर्ष्या रखता हूं. जैसा कि हमने अभी देखा, साथ में सिगरेट पीने वालों को स्मालटॉक की आवश्यकता नहीं . सिगरेट हाज़िर की और अभिवादन हो गया. मुझसे हाथ मिलाना पड़ा.मसलन उनकी दोस्ती में सिगरेट का फासला था और हमारी में कम अज कम एक हाथ का. कितनेही सुट्टेबाज मैंने देखे हैं जो सड़क किनारे खड़े कितनी ही ज़रूरी बात बता रहे हों, ग़रकिसी अंजान ने भी आकर माचिस मांग ली तो सब छोड़ माचिस तलाश करने लगते हैं. माचिसलाइटर की अनुपस्थिति में अपनी जली हुई सिगरेट पेश करते हैं. ज्योत से ज्योत जलातेचलो का इस से अच्छा लिटरल नमूना कम देखने को मिलता है. इस ब्रदरहुड के लोग एक-दूसरेकी तलब समझते हैं और किसी भी किस्म की देर सिगरेट और होठों के बीच बर्दाश्त नहींकरते. खैर ये सब बाद में. छिपलू स्टूल पर बैठा दूर शून्य में ताकता रहा. फिर बाबासे मुखातिब हो कर बोला, वो मारा कुट्टी हो गई, सुनी तूने? बाबा जो इस किस्म केफसादों से दूर रहते थे कुछ असमंजस में बोले, हमें लगा तुम रुकवा दिए मार. क्या हुआ?छिपलू : अरे नी. पड़ी लकड़ी डालने की आदत है न तेरे भई की. अपन तो ओर पार्टी बन गए.मेने मना की थी इन छोरो को, भापड़े मुझे ही तपा गए. अपन को भी जवाब देना पड़ा. बाबाजो अब भी असमंजस में था: तो क्या फ़िर तुम भी कूद पड़े? अब क्या है आगे? खत्म नहींहुआ क्या? बाबा ने इस तरह पूछा जैसे छिपलू को सूसू लगी थी और अब तक उसे खत्म करलेना था. छिपलू ने पलट कर जीतू की तरफ चाय के लिए हाथ बढ़ा दिया. जीतू इस वार्तालापको उसी तरह मन ही मन एनालाइज कर रहा था जैसे विनोद दुआ चुनाव परिणामों को करते थे.वो वार्तालाप में आए अल्पविराम से थोड़ा निराश हुआ और चाय का गिलास छिपलू की ओर बढ़ादिया. छिपलू चुस्की मारते हुए बोला, अब बराबर तो करना होगा भिया. छिपलू के स्वर मेंएक विश्वास था जिसे सुनकर समझा जा सकता था कि वो अपना मन बना चुका था. बाबा नेदूसरी विल्स नेवी कट निकाली और आदतन उसके फ़िल्टर को पैकेट के गत्ते पर हल्का साठोंका. बाबा का रहन-सहन बहुत साधारण था, कपड़े-लत्ते पुराने चलाता था पर अपने सिगरेटलाइटर को ले कर दिलदार था. ज़िप्पो का ब्रांडेड इस्तेमाल करता था. लाइटर से धीमीनीली फ्लेम निकली और सिगरेट का अगला सिरा निगल गई. कश खेंच कर बाबा ने छिपलू कोदेखा और कहा, तो करो फिर जो करना है, इतना विचार क्या. किसका जुलूस निकालोगे? छिपलूने हलके से संकोच के साथ कहा, शुक्ला का. बाबा जो अब तक नीचे मिट्टी में पड़े एककांच के टुकड़े को अंगूठे से दबा रहा था. आहिस्ते से अपने चश्मे को ठीक करता हुआमुस्कुराया. उसकी समझ में पूरा माजरा आ गया था. छिपलू का संकोच, शुक्ल का 2 दिन सेडरा हुआ रहना सब समझ आया. उसने छिपलू को मुस्कुराकर हुए देखा और कहा तो फिर आ रहेहो हमारे यहां तुम? छिपलू इस मज़ाक से थोड़ा तमतमा गया और बोला, “आना तो हे ही सेठ,इसकी बारा की ढेर मेरे पे हाथ केसे डाला. तू ऐसा कर घर मत जा आज और कल. हम सुलझलेंगे फ़िर देख लेना." बाबा इंदौर उज्जैन स्टेट हाईवे पर जाती बस को देखता रहा फ़िरबोला, “अब गुरु कह के घर में मारने आओगे तो हम भागेंगे नहीं. हम वहीं मिलेंगेतुम्हें. जिसके साथ उठ-बैठ-खा रहे हैं उसके लिए लड़ना तो पड़ेगा. वही धर्म है. तुम आजाओ, मार में जो होगा वो हमारे तुम्हारे बीच नहीं. हम अपना-अपना काम कर रहे हैं.तुम अपना बदला लो, हम अपने रूममेट के लिए लड़ेंगे”. मैं जीतू और छिपलू तीनों भौंचकरह गए. इस तरह के जवाब की उम्मीद किसी को नहीं थी. तड़ीपार जीतू को तो बात बिलकुल हीसमझ नहीं आई. छिपलू ने दोहराया कि भिया वहां अच्छे से मरम्मत होगी, बाबा ने समझायाकि “देखो तुमसे दुश्मनी नहीं, पर जिसके साथ रह रहे हैं उसके लिए लड़ना तो होगा. वरनाबाद में क्या मुंह दिखाएंगे. तुम हमारी फिकर में आए हो और बेफिक्र रहो हम किसी सेजाकर नहीं कहेंगे के तुम आ रहे हो. हम हमारा धर्म पालन करेंगे तुम अपना करो. मारहोगी, हाथ छूटेगा पर हम-तुम कल यहां फिर होंगे”. कॉलेज में हो रही लौंडो की मारपीटमें इतना कमिटमेंट, इतना विश्लेषण होगा, मैंने कभी न सोचा था. मैंने जीतू को एक औरचाय के लिए इशारा भर किया और वो मौके की इंटेंसिटी को समझते हुए. दबे पांव चाय लेआया. थोड़ी देर तक ख़ामोशी रही. मैंने मन ही मन स्थिति को टटोला. ये अर्जुन का मोह,कृष्ण का उपदेश, भीष्म का कौरवों के साथ होना पर पांडवों के प्रति भी प्रेम रखनाजैसी सारी बातों का रैप्ड इन वन कॉलेजी संस्करण था. बाबा अपनी घिसी हुई टी-शर्टपहना अपने पैर के अंगूठे से ज़मीन खुरचता बैठा था और मुझे उसमें भीष्म और कृष्ण एकसाथ दिखाई दे रहे थे. बस बाबा की मूंछ नहीं आती थी तो मुकेश खन्ना का चेहरा ठीक सेस्थापित नहीं हो पा रहा था. मुझे लगा कि छिपलू इस बात से अभिभूत हो कर अर्जुनस्टाइल बैठ जाएगा जैसा गीतोपदेश के अधिकांश सस्ते पोस्टरों में होता है. कृष्ण कीशक्ल पर वो समझदारी के भाव होते हैं कि जैसे वो जानते हों कि सूरज ही डोगा है औरअर्जुन नतमस्तक उनके समीप बैठा होता है. पर ऐसा कुछ न हुआ. छिपलू मेरी तरफ मुखातिबहो कर बोला, “समझा इसको भिया यार. में पड़ी लकड़ी डाल के फंस गिया और ये अलग नी मानरिया. अपना वाला है”. मैं जो अब तक फ्लाई ऑन द वाल की भूमिका में था , थोडा सकपकाया. मैंने कहा. “वैसे बात बाबा की भी गलत नहीं. तुमसे बड़ी समस्या उसकी है. न तुमसेबैर न शुक्ला से. बस धर्म की खातिर लड़ रहा है. तुम भी मन बना चुके हो तो मारो अब”.मैं भावातिरेक में वासांसि जीर्णानि पर उतरने ही वाला था कि बाबा ने टोका. “हमेंकोई समस्या नहीं. हम क्लियर हैं. छिपलू तुम भी क्लियर रहो. आ जाओ. देखा जाएगा.टर्म्स एंड कंडीशन्स नहीं है कोई. सीधा हिसाब." छिपलू विचाराधीन उठा , और बोला “ठीकहै भिया, अपन ने तो बता दिया था. देख ले अब”. कह कर छिपलू चलने को हुआ. जीतू जो अभीतक भागवत कथा में आए श्रद्धालु की मानिंद मग्न बैठा था, हरकत में आया और चिंतित होउठा कि छिपलू की चाय के पैसे कौन देगा. अध्यात्म अपनी जगह धंधा अपनी जगह. छिपलू कीमन:स्थिति ऐसी नहीं थी कि उस से 2 रुपये का तकाज़ा किया जाए. बात हाथ से निकलती देखउसने मुझे देखा, मैंने हाथ उठा कर जीतू को मेरे खाते में लिखने का इशारा किया औरउसकी बैचेनी कम हुई. जाते हुए छिपलू से बाबा ने कहा कि “माल है वैसे, आ जाओ”. सुनकर छिपलू रुक गया और फ़िर दोनों दोस्त गांजे के औषधीय गुणों की विवेचना करते हुए बैठगए. ये कहानी कह मैंने पत्नी श्री की ओर देखा और कहा, “मैं जानता हूं अब तुम सोचरही हो कि क्या छिपलू ने अपना काम पूरा किया, क्या द्रोणाचार्य और अर्जुन की तरह वोआमने-सामने हुए इत्यादि. पर वो सब कहानी का सार नहीं है. महाभारत का सार इसमें नहींकि युद्ध में कितनी मारकूट हुई. सार इसमें है कि युद्ध भी कार्मिक चक्र का छोटाहिस्सा है. हम सब अपना पार्ट प्ले कर रहे हैं." बीवी ने कहा, हे भगवान! इतना सब येक्लीशे बात कहने के लिए बताया. हुआ यही होगा कि छिपलू ने कुछ नहीं किया होगा. बातवहीं दब गई होगी. मैं बिना कुछ कहे मुस्कुराकर खिड़की से बाहर देखने लगा. समविद् बगलमें खड़ा टेबल पर धीरे-धीरे अपनी खिलौने की कार पटक रहा था जैसे बाबा नेवी कट केपैकेट पर फ़िल्टर पटकता था.--------------------------------------------------------------------------------हिंदुओं ने उसे दौड़ाया, मुसलमानों ने भी भगा दिया