"बहुत थका जाती है ये दिवाली की सफाई", कुछ यूं ही शर्मा आंटी रोज़ बड़बड़ाती रहती थी.बड़े ही अनमने मन से उन्होंने "सबीरा" को रखा था काम पर. उन्हें यही लगता था की धर्मअलग हैं, कैसे करेगी ये काम पंडित के घर. "ये मीट मछली खाने वाले मेरे बर्तनों कोहाथ लगाएंगे" कुछ ऐसे ही विचारों की अधीन थी शर्मा आंटी की सोच. पर बेटे-बहू केसमझाने पर आखिर अपने विचारों को दरकिनार रखते हुए सबीरा को रख लिया काम पर. शर्माआंटी के बहू बेटे साथ नहीं रहते थे,नौकरी जहां उनका घर भी वहां. अबकी बार मुम्बईमें अच्छे बैंक में मैनेजर बन गया था शर्मा आंटी का बेटा. अगले महीने बहू खुशखबरीभी सुनाने वाली थी. बेटे ने पहले ही अगले महीने की टिकेट्स करवाई हुई थी,होने वालेदादा-दादी के लिए. शर्मा अंकल को जात पात का भेदभाव करना कतई पसंद नहीं था. सबीराको एजेंसी के द्वारा रखा गया था. पैंतीस से चालीस के बीच होगी उम्र, पति ने छोड़दिया था. एक लड़का और एक लड़की थे जो मिशनरी स्कूल में पढ़ते थे और वही हॉस्टल मेंरहते थे. बड़ी मुश्किल से हुआ था दाखिला वहां, धर्म परिवर्तन के बिना मुमकिन नहींथा. गरीब का कोई धर्म नहीं, उसकी जरुरत हर धर्म से बड़ी होती हैं. सबीरा की ज़रूरतबड़ी थी और शर्मा आंटी को भी ज़रूरत थी तो उन्होंने भी धर्म को दरकिनार किया था. बड़ीसीधी सी थी सबीरा , शर्मा आंटी कोई मौका नहीं छोड़ती थी अपने को ऊंची जात, धर्म कादर्शाने में. मंदिर को हाथ नहीं लगाने दिया सबीरा को दिवाली की सफ़ाई में. सबीराअपने धर्म के कम फ़र्ज़ के ज्यादा अधीन थी. उसका फ़र्ज़ था एक मां का अपने बच्चों केप्रति ज़िम्मेदारी. उनकी ज़रूरत पूरा करना ही मक़सद था उसका. शर्मा आंटी को सहारा मिलासबीरा का, दिवाली की सफाई अबकी बार बहुत जल्दी पूरी हो गई. शर्मा आंटी इस बारदिवाली बाजार भी जल्दी ही हो आई. दिवाली की खरीदारी इस बार उन्हें बोझ भी नहीं लगी.सब कुछ दिवाली से इतनी पहले हो गया. सुंदर सजाने वाली झालर, मूर्तियां लक्ष्मी गणेशकी, दिवाली के शुभ लाभ, लक्ष्मी चरण, और मिट्टी के खूबसूरत दिए. सब ले लिया अबकीबार, कुछ भी भूली नहीं. सबीरा का साथ जो था, सब कुछ आसानी से हो रहा था. इस बारशर्मा अंकल 'मेड इन चाइना' के सामान का बहिष्कार कर रहे थे, उनके लिए देश सर्वोपरिहैं. शुक्र तो इस बात का था कि शर्मा आंटी ने दिए बनाने वालो से जात, धर्म नहींपूछा. एक की जंग दूसरे देश के सामान से थी, और एक अपने ही देशवासी के धर्म में उलझाहुआ था. अब दिवाली की मिठाई बनानी थी, सबीरा को हाथ नहीं लगाना था. रसोई घर पर तोअभी भी शर्मा आंटी राज़ करती थी. मिठाई तो भगवान को भोग लगाई जायेगी, धर्म अलग तोभगवान भी तो अलग हैं. दिवाली में 2 दिन बाकी थे. धनतेरस के दिन शर्मा आंटी ने सबीराको दिए नहीं जलाने दिए. घर के फ़ोन पर घंटी बजी, शर्मा अंकल के बेटे का फ़ोन था. बहूको प्रसव का दर्द एक महीने पहले ही उठ गया था. बेटे ने बुलाया था, अकेले जो थावहां. बच्चों को मां-बाप की ज़रूरत ज़िन्दगी भर रहती हैं, पर मां-बाप बच्चों के लिएतरसते रहते हैं. अगर ये फ़ोन नहीं आता तो हर साल की तरह 'शर्मा सदन' में दिवाली घरके बच्चों को तरसती. बेटा चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो गया हो, रुआंसी आवाज़मां-बाप को विचलित कर गई. शर्मा आंटी ने जल्दी से जाने का बैग तैयार किया, सोचा थादिवाली की तैयारी से फ़ारिग होकर आने वाले नन्हे मेहमान की तैयारी में लग जाएंगी. परवक़्त कहां किसकी मुट्ठी में बंद हुआ है. अब ममता और फ़र्ज़ की पकड़ में थी शर्मा आंटी.सुबह की फ्लाइट थी. छोटी दिवाली की सुबह ही जाना पड़ रहा था. अब सबीरा को जिम्मेदारीसौंपने की रात थी. धर्म जात-पात सब दरकिनार हो चुके थे. "सुन सबीरा, अच्छे से घर कीसफाई कर लेना. मंदिर में कुबेर की जो मूर्ति हैं उसका तिलक कर देना. रात को दिए जलालेना दोनों दिन. मिश्री और मावे का भोग भी लगा देना. ये बंदनवार जो हैं हर दरवाज़ेपर लगानी है. दिवाली वाली रात को लक्ष्मी गणेश की मूर्ति भी रख दियो मंदिर में. समझगई हैं न सब अच्छे से, जिम्मेदारी से सब तुझे ही करना हैं. फ़ोन कर लियो जो कुछ नसमझ में आएं" ज़रूरत और फ़र्ज़ से बढ़कर धर्म हो ही नहीं सकता!--------------------------------------------------------------------------------उस रोज़ लड़के ने सुमन को कूड़ेदान से खाना निकालते देख लिया