शराब का दरोग़ा शैलकमरे के बाहर नेम प्लेट पर लिखा था- PC JHA, माने प्रेमचंद झा. नाम से ही मिडिलक्लास लगता है. जैसे कभी राही मासूम रज़ा ने कहा था कि ऐसे नाम का आदमी तो पैदाहोते ही बुड्ढा हो जाता है. झा जी के ऐसे ही बुड्डे संस्कार भी थे. प्राइमरी स्कूलका टीचर बाप और क्या संस्कार दे सकता था . “बेटा, हराम की कमाई में बरकत नहीं होती.हराम का पैसा हराम में ही जाता है . ऐसा पैसा, जब निकलता है, बड़ी मुश्किल सेनिकलता है.” यही संस्कार ले के बड़े हुए थे झा जी. जब स्टेट पब्लिक सर्विस कमिशनमें भर्ती हुए तो पहली बार दुनियादारी से वास्ता पड़ा. हिंदुस्तान में कुछ तो बातअभी भी बाक़ी है, की जनरल कैटेगरी का पढ़ाकूतेल चुपोड़ने वाला बच्चा, बिना किसीपाऊये के सर्विस कमिशन में नौकरी पा गया. जिसने नौकरी दी होगी, वो भी अपने मिड्डिलक्लास के वैल्यू सिस्टम से बाहर नहीं निकल पाया होगा. अभी तक ख़ुद के बनाए कुएँ मेंहीं मेंढक बना रहा. जब ट्रेनिंग कम्प्लीट हुई तो पता चला कि लगभग सभी पौउआ वालेलोगथे. सबके बाप किसी ना किसी सरकारी ओहदे पर थे. सबने वर्तमान सरकार, पिछली सरकार, याआने वाली सरकार के माननीय नेताओं के साथ जुगाड़ बिठा रखा थे. सब हिसाब किताब पक्काथा. किस को कौन सा विभाग और कहां पोस्टिंग मिलेगी, उनको सोचना नहीं था, मुश्किल तोPC झा जैसे लोगों की थी. पिछले बीसेक सालों में गांव के नक़्शे में वो बदलाव आए हैंकि पहचानना मुश्किल है. पिताजी उस ज़माने के थे, तो प्राइमरी में अध्यापकी मिल गयीथी. पूरी ईमानदारी से पढ़ाते थे. प्राचार्या बनने के पहले ही रिटायर हो गए.बाक़ियां गांव से पढ़े लिखे लड़के ज़्यादा से ज़्यादा चपरासी बन जाना चाहते थे याफिर नलकूप विभाग में. बहुत पढ़ लिए तो लेखपाल हो गए . प्राईवेट नौकरी की मंजिल किसीफार्मा कपनी में MR बन जाना. जब प्रेमचंद पढ़ाई करने शहर निकले तो मौसी ने कहा थाकि पढ़ाई छोड़ो, नौकरी कर लो, बम्बई चले जाओ, अच्छी नौकरी है, दरबानी की, 8000 रुपएमिल जाएंगे. आख़िर एक गांव वाला इससे दूर और अलग सोच भी क्या सकता था? प्रेमचंद भाईको रेवेन्यू डिपार्टमेंट मिला था. शुद्ध हिंदी में आबकारी विभाग.जब पता चला कीसरकारी नौकरी मिल गयी है, बीडीओ वाली, तो गांव भर में ख़ुशी फैल गयी. कहीं कहींमातम भी छा गया. ऐसा क्यों हुआ, यह वही समझ सकता है जो गंवाई राजनीति से वाक़िफ़हो. बीडीओ बड़ी बात थी. लोगों को विभाग समझ नहीं आया. आबकारी विभाग क्या होता है?मोटा मोटी समझ आया. “शराब का दरोग़ा” देशी ठेकों पर झापा मारना है, शराबी कबाबी कोदौड़ा दौड़ा के पकड़ना है. गांव के नौजवान जो बड़े बुज़ुर्गों से छिप छिपा के पीतेथे, दौड़े दौड़े मिलने आए. “भैया, कोई सहयोग चाहिए तो बताइएगा” भैया से ज़्यादा,उन्हें ख़ुद सहयोगचाहिए था . और हमारे संस्कारी PC भैया ऐसे कि शराब की गंध से भीऊबकायी आ जाए, पीना तो दूर. पुराने ज़माने में इसे ही संस्कार कहते थे. आज केज़माने में भी कुछ लोग अंडमान निकोबार की ज़ार्वा जनजाति की तरह प्रागैतिहासिक कालमें ही टिके रह गए है . झा जी वैसे ही एक डाय़नोसर थे. ख़ैर, ट्रेनिंग के बादपोस्टिंग हुई, किशन गंज में. आबकारी विभाग के अपने टारगेट होते है. किशन गंजमुस्लिम बहुल इलाक़ा है. ईमान से शराब हराम है. सो पहली दफ़ा तो लगा की टारगेट बड़ामुश्किल है. जब कोई पीता ही नहीं होगा तो खपत कैसी और टारगेट कैसे मीट हो. हुसैनजाफ़री उनके ड्राइवर थे. पहले झा जी की मासूमियत पे बहुत देर तक हँसे. फिर कहा, “सिर, फ़िक्र ना करें. धीरे धीरे सब समझ जाएंगे.” जाफ़री साहब समझ गए की बालक नादानहै. उम्र में छोटा भी तो है. जाफ़री ज़हीन और ज़मींदारी ख़ानदान से थे. आधेबुज़ुर्ग पाकिस्तान बना, उधर ही निकल गए. बाक़ियों ने बाक़ी रियासत इसी हराम मेंनीलाम कर दी थी. जाफ़री साहब भी odd man out थे. धीरे धीरे दोनों में बनने लगी. कुछलोगों को ईमानदारी का कीड़ा होता है. कीड़ों के कई ग्रेड होते है. झा जी को भी ऐसेही बड़ेग्रेड वाले कीड़े ने काटा था. ईमानदारी का यह कीड़ा बड़ी दूर तक घुसा हुआथा. जाफ़री साहब ने बहुत समझाया पर माने नहीं. रात रात भर गश्त लगाते, टाइम से ठेकेबंद हुए या नहीं, कहीं ग़ैर क़ानूनी शराब तो नहीं बन रही. कोई hooch ट्रैजडी नहींचाहिए थी. लोगों में सुगबग़ाहट मची. थोड़ी बहुत परेशानी भी होने लगी. ऊपर से नीचेतक बात होने लगी. जाफ़री ने कहा भी कि सर थोड़ा धीरे चले, स्लो-स्लो. पर नयी नौकरीका नया जोश. और ऊपर से समाज बदल देने का जज्बा. ना सुनना था तो ना सुनना था. तभीअचानक कुछ बदला. नयी सरकार ने शराबबंदी की घोषणा कर दी. पहली एप्रिल से सारे राज्यमें शराब की बिक्री बंद. जैसे गाज गिर गयी. माने शाम होने का मतलब ही ख़त्म हो गया.अब शाम को करेंगे तो क्या करेंगे. महीने दस दिन गुज़रे. शराब बंदी का असर दिखनेलगा. सड़क पर पी के टुन्न पाए जाने वालों की संख्या कम हो गयी. Drunken drive केकारण होने वाले ऐक्सिडेंट्स भी कम होने लगे. झा जी को लगा भाई बात में दम है. गांधीविनोवा बाबा ने ऐसे ही इसके ख़िलाफ़ मोर्चा नहीं खोला था. कहा ना झा जी पुरानेविचार धारा के थे. नया नया जागा देश प्रेम नहीं था. सामाजिक बदलाव का हिस्सा होनेकि ख़ुशी हो रही थी. अच्छा अच्छा से लग रहा था. एक रात जब झा जी सो रहे थे, लाईटचली गई. मारे गर्मी के आंख खुल गयी. कई सारी बैलगाड़ियों के साथ साथ चलने की आवाज़आयी. अब कहां सुनाई पड़ती है बैलों के गले की घंटिया. पूरी तरह जाग गए. बाहर टहलनेआ गए. देखा बग़ल की नदी के पीपापुल पर कई सारी बैलगाड़ियां जा रही थी. कुछ सामान्यनहीं लगा. कुछ तो खटका. “जाफ़री जी, क्या हो सकता है? एक साथ इतनी गाड़ियां?”“सामान जा रहा है सर. सो जाइए” “ सामान मतलब? कैसा सामान? ट्रक, टेम्पो में क्योंनहीं जा रहा है?” “ सर उसको मेन रोड से ले जाना पड़ेगा. चुंगी देना पड़ेगा और हरनाके पे पुलिस को भी चारा डालना पड़ेगा?” “मतलब कुछ गड़बड़ सामान है?” “सर जानेदीजिए, सिराजद्दीन का सामान है” “पर सामानहै क्या?” “दारू ही है सर, शराब है. भूसागाड़ी में छुपा के” प्रेमचंद झा जी बमक गए. इलाक़े के इन-चार्ज जैसे फ़ील होने लगा.भुजाएं फड़कने लगी. सारे देश में चल रहे टॉलरन्स, इन-टॉलरन्स में देश काप्रतिनिधित्व करने का बोझ इ्न्ही की कंधे पे आ गया. रेस्पॉन्सिबिलिटी भाव से दुहरेहो कर तुरंत गाड़ी निकालने का आदेश दिया. “सर, सिराजुद्दीन के आदमी है, टंटा ठीकनहीं. समझदारी से काम लीजिए ” सिराजुद्दीन को कौन नहीं जानता. इस इलाक़े में रह कर,बिना जाने रह नहीं सकते. पता ना हो तो, क़दम क़दम पर बता दिया जाता है. इसलिएज़्यादा विस्तार में यहां रायता फैलाने की ज़रूरत नहीं है. ईमानदारी के सूलेमानीकीड़े ने ज़ोर से काटा. “मैंने कहा ना गाड़ी निकलो” रास्ते में लोकल पुलिस थाने कोफ़ोन कर दिया की एक गाड़ी भर के लोग भेज दे, रेड मारना है. हुकुम के ग़ुलाम जाफ़रीने बिलकुल अजय देवगन की तरह सबसे आगे जा कर चर्र से गाड़ी रोकी. झा जी गाड़ी रुकनेके पहले ही एक पैर के बल पर उतर गए थे. बिलकुल सिंघम स्टाइल में. बैलगाड़ियों काकारवां थम गया. कुलबुलाहट मच गयी. “ क्या जा रहा है? कहां जा रहा है?” “ हुज़ूरभूसा है. ग़रीब आदमी है, मवेशी के लिए भूसा ले जा रहे है” “खोल के दिखाओ” “नहींखुलेगा.” जैसे लगा आकाशवाणी हुई. देखा तो सामने आसमान तक लंबा एक कसाई नुमा आदमीखड़ा था. आंखों में काजल, पान खाए दांत, गाल में मस्सा.मेक-अप पूरा फिल्मीथा. कसाईके बाई-शेप्स, झा जी के दोनो जांघों के बराबर थे. अगर आमने सामने का दांव होता तोझा जी एक झटके में पिद -पिदा जाते. जो चीज़ प्रेमचंद बंधु को हौसला देती थी वो थी,सच्चाई की ताक़त.गाड़ी पर लहराता तिरंगा, जोश दुगना कर देता था. ऊपर से क़ानून कासाथ कि अब तो शराब बंदी हो गयी है. अगर मौक़े पे पकड़ लिया तो, बहुत मज़बूत केसबनेगा. वैसे भी आज तक सिराजुद्दीन के ख़िलाफ़ कोई गवाह, सबूत मिला नहीं था. अंधेरेमें बटेर हाथ लग गया था. “ज़ब्त कर लो, सारा सामान.“ एन्फ़ॉर्स्मेंट देखते ही झाजीऔर चौड़े हो गए थे. जत्था अब थाने की ओर चला. थाने के असली वाले दरोग़ा जी को जबपता चला की, सिराजुद्दीन भाई का सामान है, तो सिट्टी-पिट्टी गुम हो गयी. घर परिवारवाले थे. पिछले 3-4 साल से इसी थाने में थे. सबको जानते थे. आबकारी साहेब, हिसाब सेबड़े लगते है, कुछ कह भी नहीं सकते. ऊपर से आधी रात का समय, अपने सीनियर को जगानाभी ठीक नहीं. ख़ुद ही हैंडल करना चाहिए. प्रेमचंद बाबू, कीड़े के काटे, बमके बमकेफिर रहे थे. पहली बार इतनी भारी मात्रा में सामान क़ब्ज़े में किया था. असली दरोग़ाजी ने, बड़े प्यार से बुला के बिठाया, चाय पानी का इंतज़ाम कराया. फिर धीरे से कसाईसे मामला पूछा. पता चला सिराजुद्दीन भाई तो आउट आफ स्टेशन है. वैसे भी उनको पता चलातो थाना मिट्टी में मिल जाएगा. दरोग़ा जीझा जी को भी जानते थे, इसलिए इनकी सनक काभी अंदाजा था. प्रेमचंद बाबू कह रहे थे, की ज़ब्ती दिखाई जाए. दरोग़ा बाबू टाल-मटोलकर रहे थे. जितना मना करते, झा जी उतना कूदने लगते. कसाई भाई और दरोग़ा जी दोनो,फ़ोन पे फ़ोन घनघना रहे थे. कोई बीच का रास्ता निकल जाए. पर झा जी, तो टस से मसनहीं हो रहे थे. जैसे की भवानी चढ गयी हो. 2 घंटे बात, शास्त्री जी ने थाने मेंप्रवेश किया. शास्त्री जी, सिराजुद्दीन के दाहिने हाथ माने जाते है. बड़ी भारी क़दकाठी, गोरा बदन, ललाट पर तिलक चंदन, गले में कंठि माला.शास्त्री जी सिर्फ़ दो रंगके कपड़े पहनते थे, सफ़ेद या गेरुआ. अपने हाव भाव, व्यवहार से बड़े ही शांत-चित्तपुरुष थे. किसी ने उन्हें बमकते हुए देखा नहीं था. इस शांत चरित्र चेहरे के पीछे,एक बड़ा ही शातिर दिमाग़ था. आते ही शास्त्री जी ने झा जी को गले से लगाया. उम्रमें छोटे थे, नहीं तो पैर भी छू लेते. धंधे में सु्अर को भी बाप का दर्जा हासिल है.“पंडितजी, पंडितजी, लगता है, बच्चा लोग से ग़लती हो गया है. आप का कौशल समझ नहीं पारहे है. महराज, तनिक बैठिये. ज़रा मस्तिष्क शांत रखिये. कपाल पर चंदन मंदन लगाइए.”“ सुनिए सर, अभी हम बोल रहे है ना, बीच में कहे टोक रहे है. जिव्हा को शांति दीजिए.राउया , सुना जाए. देखिए, सिराजुद्दीन , आप के उम्र का था जब हम से मिला था. आप्पेके जैसा तेवर. बहुत जान होती है, हौसले में. हम बड़ी इज़्ज़त करते है इसकी. ' “झाजी, सिराजुद्दीन पांच बखत का नमाज़ी है, किसी के फटे में पैर नहीं डालता है. अपनेकाम से काम रखता है . सरकार, कसाई का काम भी धंधा करना ही होता है ना. अच्छा बुराक्या होता है उसमें. रविदास को तो भैया उसी कठौती में गंगा दिख गयी थी,जहाँ वो जूताधोते है” शास्त्री जी बोले जा रहे थे. “देखिए, हम को ज्ञान मत दीजिए. हम भी अपनाकाम कर रहे है. जो काम ग़ैर क़ानूनी है, तो ग़ैर क़ानूनी है. हमको भी कोई मतलब नहींहै की सिराजुद्दीन क्या धंधा करता है, या क्या नहीं करता. हमें क्या? “ अबकी बारीझा जी की थी. “कौन गांव पंडितजी” शास्त्री जी ने दांत कुरेदते हुए पूछा. प्रेमचंदबाबू चुप. “दरभंगा के दामाद का बहुत सेवा किया जाता है. जानते है ना. कहे दामाद बनेहुए है, सर. देखिए हम दोनों मिल के सलटा लेते है. आप के ऊपर जाएगा तो आपके लिएअच्छा नहीं होगा और मेरे ऊपर जाएगा तो मेरे लिए अच्छा नहीं होगा. लगेगा की हमकोअपना काम नहीं आता है.” “क्या बात करेंगे, आप को पता नहीं है क्या कि शराब बंदी है.लाइसेंस राज में बात अलग है. जुर्माना दे के छोड़ देते. यहां तो आप क़ानून काखुल्लम -खुल्ला उल्लंघन कर रहे है” “अब समझा आया. सरकार यह तो चरणामृत है. चढ़ावासबको चढ़ेगा. ऊपर से नीचे तक कोई भी छूटेगा नहीं. सिराजुद्दीन भाई ईमान के पक्केहै. कोई भी ग़ैर-इमानी काम नहीं करते. मैं भी कंठाधारी पंडित हूं, झूठ नहीं बोलता.”“ कसाई रे, ज़रा डब्बा तो उठा ला भाई सुरती वाला.” “दरोग़ा जी, इधर आईये” प्रेमचंदजी बिफ़रे, “ आप क्या कर रहे है? ऐसे लोग आप के थाने में आके ऑर्डर छांट रहे है औरआप उधर क्या कर रहे है?” “अरे सर, गांव में एक कांड हो गया है, उधर ही बिज़ी है. एकमुसलमान लौंडा, किसी यादव जी के घर में घुस गया है, मार मार के हलुवा टाइट कर दियाहै, लौंडे का. डर है, की लव जिहाद के चक्कर में कहीं सम्प्रदायिक दंगा ना हो जाया.हम ज़रा गस्त मार के आते है. आप शास्त्री जी से सलट लीजिए ना. हमरा भी कपारछूटेगा.” दरोग़ा जी जाते जाते बांच गए. “दारोगाजी, मैं आपके ख़िलाफ़ कम्प्लेन करदूंगा. आप समझते क्या है? ऐसा लग रहा है, की हम ही कोई ग़लती कर के बैठे है. जैसेआप ही हुकुम चला रहा है” प्रेमचंद जी बोलते रहे, सुनने वाला कोई नहीं था. “झा जी,इसको दुनियादारी कहते है. आपका गांव घर हम को मालूम है. पहला आदमी है ना, अपने गाँवके जो इधर आ गया है, तो जोश आ रहा है, लगता है. मत्स्य न्याय सुने हैं कभी? Law ofthe jungle. होगा तो वही जो हमेशा होता आया है. बड़ा मछली, छोटा मछली को खा जाएगा.पर आज कल परजातंत्र है ना. छोटों मछलियों भी तो मत का अधिकार है ना? उसका भीइज़्ज़त करना पड़ेगा ना. कुछ लोगों को ऊंगली करने में मज़ा आता है, जैसे आप को आरहा है. पूरे ज़माने का ठेका आप ही लिए हुए है क्या? कबीरपंथी है क्या? - जग सोताहै, तो आप भी सोयिये ना, कहे जाग कर टेसुआ बहा रहे है” शाश्त्री जी बोले जा रहे थे.“सर देखिए, बमकिए मत, शांत रहिए. कोई नहीं सुनेगा, कोई नहीं आएगा. मैं जानता हूंआपके ख़ानदान को, कोई साइकल से आगे नहीं गया है. ईमान धर्म का झंडा कब तक पकड़ेरहिएगा. दुनिया आगे बढ गया है. इसकी को पकड़े रहेंगे तो फ़ालतू में पीछे रह जाएँगे.शास्त्री जी ने शांत मान से कहा और एक नोटो की गड्डी आगे कर दी. प्रेमचंद ने जबनोटों की गड्डी देखी तो आपे से बाहर हो गया. मार ग़ुस्से के हाथ फड़फड़ाने लगे. एकझटके में टेबल पलट दिया. सारा सामान फैल गया. आवाज़ सुन के दरोग़ा जी अंदर आ गए.अंदर का माहौल देख के दंग रह गए. प्रेमचंद थर थर काँप रहे थे. लगता था जैसे, प्रेशरसे जिस्म का सारा ख़ून नाक से निकल जाएगा. “आप मुझे रिश्वत देने की कोशिश कर रहेहै? आपने समझ क्या लिया है?” शास्त्री जी ग़ज़ब के शांत आदमी थे. चेहरे का भाव भीनहीं बदला. तभी सिराजुद्दीन का काम संभाल लेते है. “दारोगाजी, यह आदमी रिश्वत देनेकी कोशिश कर रहा है. गिरफ़्तार कर लीजिए” झाजी बोले. दरोग़ा जी हैरान खड़े थे. उनकीज़िंदगी में आज तक ऐसा कोई मौक़ा नहीं आया था. पता नहीं था कैसे रीऐक्ट करना है.शास्त्रीजी धीरे से उठे, प्रेमचंद का हाथ पकड़ा, “ देखो झाजी, तुमको झंडा उठाने काबड़ा शौक़ है, तो उठाओ झंडा. तुमको लगता है, कोई इंक़लाब उनक़लाब ले आओगे, आज़ादीवाजादी आ जाएगी.” शास्त्रीजी ने धोती में खोसी हुई बंदूक झा जी के हाथ में रख दी.“इसको बंदूक कहते है, छू के देख लो. जब यह ठंडा ठंडा गरम हो जाता है ना, तो सबज़िंदाबाद ज़िंदाबाद पिछवाड़े में घुस जाता है.” प्रेमचंद सकते में आ गए. दरोग़ा नेबोला “शास्त्री जी हमको कोई बवाल नहीं चाहिए, जो सलटना है, बाहर जा के सलटिए. “शास्त्री जी ने शांत मान से कहा “झा जी बहुत मुश्किल नहीं है, वैसे भी बहुत सारेआतंकवादी घुसे आते है, गाड़ी वाड़ी भी अगवा कर लेते है, गोली वोली भी चलिए जाता है.जान जोखिम हो जाता है. ख़ून ख़राब आम है.” दरोग़ा जी घबराए हुए, बाहर भागे. किसी भीघटना के गवाह बनना नहीं चाहते थे. कमरे के अंदर बड़ी देर तक ख़ामोशी बनी रही. जैसेकोई बोल ही नहीं रहा था. फिर थोड़ी थोड़ी सुगबग़ाहट हुई. थोड़ी देर बात प्रेमचंद झाजी कमरे से बाहर निकले. जाफ़री से गाड़ी निकालने को बोला और घर की तरफ़ रवाना होगए. शास्त्री जी भी निकले. कसाई ने इशारे से पूछा, क्या हुआ? “ज़रा ज़्यादा जोश था.सोच रहा था कोई बड़ा दांव खेलने को मिला है. तौल रहा था कि कहां तक जाएगा. इसलिएबमक रहा था. बंदूक़ देख के पैंट गीली हो गयी. पहले मान जाता तो, कुछ फ़ायदा भी होतागरीब आदमी का.आदमी को पता होना चाहिए कि पतंग को कब ढील देना है, कब टाइट करना है.छोटा आदमी, छोटा ही सोच सकता है. मध्यमवर्गी जो ठहरा.” झाजी की गाड़ी अंधेरे मेंचली जा रही थी. हेड्लाईट की रोशनी में एक कहानी याद आ रही थी. बचपन में पढ़ी थी.“नौकरी में ओहदे की ओर ध्यान मत देना. यह तो पीर का मज़ार है. निगाह चढ़ावे और चादरपर रखनी चाहिए. ऐसा काम ढूंढना, जहां कुछ ऊपरी कमाई हो. मासिक वेतन तो पूरनमासी काचांद है जो एक दिन दिखता है, और घटते घटते ग़ायब हो जाता है. ऊपरी आय बहता स्रोतहै, जिससे सदैव प्यास बुझती है. वेतन तो मनुष्य देता है, इसी से इसमें कोई बढ़तनहीं होती. ऊपरी आमदनी खुदा देता है, इसलिए उसमें बरकत होती है.” झाजी सोच रहे थे,पतंग उड़ना भी एक कला है, काश के बचपन में सीखा होता.--------------------------------------------------------------------------------कहानी – बारिश तो हर वक़्त कहीं न कहीं होती है, पर भीगता कोई-कोई है कहानी- खिड़कीपर एक लड़की रहती थी