कोटा के वो दिन याद आ गए, जब महावीर नगर 3 की सब्ज़ी मंडी में लड़कियां ताड़ने जाते थे
एक कहानी रोज़ में आज पढ़िए सौभाग्य खरे की कहानी 'फेसबुक'
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फोटो - thelallantop
ठंड के दिन थे. कड़ाके की सर्दी में स्वेटर टोपी दस्ताने पहन के लड़के ऐसे निकलते हैं जैसे मानो केल्वर वेस्ट और आर्मर पहन लिया हो. लड़कों की बात तो छोड़िए कहीं गलतफहमी हो गई तो लेने के देने पड़ जाते हैं. लड़कियां तो हर मौसम में खूबसूरत ही लगतीं हैं. सुबह की ओस से भीगी हुई वादियों में आज भी उसे देखकर सनराइज की ख़ुशी मिलती है. फर्क इतना है की स्कूल में नहीं रहे हम. वो हमारे छोटे से स्कूल की सबसे सुंदर लड़की थी. उसे देखने के लिए दूसरी स्कूलों से लड़के अक्सर आ जाया करते थे.
कई बार वैलेन्टाइन्स डे आया और चला गया. लोग चिल्ड्रेन्स डे मना बैठे और मैं बस उसको प्रपोज करने का सोचता रहा. आज इतने साल हो गए हैं पर सच मानिए आज भी लड़कों के लिए प्रपोज करना वाइवा देने से कम नहीं है.
एक दिन गलती से फेसबुक पे फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजने की सोची. स्कूल पास हुए तो अरसा हो गया था और मन में ये सवाल था किक मैं उसे याद रहूंगा कि नहीं. खैर हिम्मत-ए-मर्दा मदद-ए-खुदा सोच के फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज ही दी. टाटा डोकोमो के टू-जी में एक पेज खोलने में उतना ही समय लगता है जितना इन्फ्लूएंजा के एंटीजेनिक शिफ्ट होने में.
आख़िरकार मैंने फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज ही दी. फेसबुक महाशय ने एक पुलिस वाले की तरह सवाल किया कि 'Do you know her personally' अजी सच बोलने के तो कई मौके मिलेंगे, फेसबुक से क्या सच बोलना. मैंने फ़ौरन ही हां पे क्लिक कर दिया और मेरी फ्रेंड रिक्वेस्ट मोदी की आकांक्षाओं की रफ़्तार से भी तेज़ रवाना हो गई. कई लोग रवाना को खाना पढ़ते हैं, ऐसे लोगों के साथ मेरी हमदर्दी है. और फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजते ही 175 और लोगों के साथ मैं भी उसका फॉलोअर हो गया.
स्कूल में सब एक रंग की यूनिफ़ॉर्म पहनते थे. एक ही क्लास में बैठते थे. एक ही टीचर से पढ़ते थे. पर आज कितना अंतर था हम में. एक एक्जाम इंसान को कितना अलग कर देता है. सिर्फ चन्द किताबें इंसान को कितना बड़ा बना देती हैं.
कोटा के वो दिन आंखों के सामने आ गए जब महावीर नगर 3 की सब्ज़ी मंडी में लड़कियां ताड़ने क्लास बंक कर के जाया करते थे. वो Spice और keventers पे जहां party मनाने जाया करते थे. वो Om Multiplex जहां 'कमीने' का फर्स्ट डे फर्स्ट शो देखा था. वो प्याज़ कचोड़ी आज कितनी कड़वी नज़र आ रही थी.
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चकोर झाड़ियों से निकल आई, बटेर दौड़ भागे और तीतर ने 'तीन तौला छप' कहा

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