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सुबह बुआ के पूजाघर में ढेर सारा धुआं मिला, बुआ नहीं मिलीं

एक कहानी रोज़ में आज पढ़िए दुर्गेश सिंह की कहानी 'बुआ, मैं, नीलकंठ और रिमांड होम'

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22 दिसंबर 2016 (अपडेटेड: 22 दिसंबर 2016, 12:27 PM IST)
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दुर्गेश सिंह हिंदी में 'जहाज' उड़ा कर चर्चा में आए. बोले तो 'जहाज' कहानी से मशहूर हुए. लेकिन इन दिनों कहानी नहीं लिख रहे हैं, या कहें नहीं छपवा रहे हैं. इसकी वजह पूछो तो कहते हैं कि हिंदी में मन नहीं लग रहा. मुंबई में रहते हैं. सिनेमा बनाना चाहते हैं. आज एक कहानी रोज़ में हम इनकी एक कहानी निकाल लाए हैं. और ज्यादा परिचय और ज्यादा प्रशंसा से बचते हुए पढ़िए यह कहानी...

मैं रोज सुबह उठ कर किरन बुआ के घर जाता था. वह मुझे आंवले का मुरब्बा देतीं और मैं उनके पीछे-पीछे घूमता रहता. उनकी आवाज गौरैया जैसी पतली थी. हालांकि मैंने उन्हें दाना चुगते नहीं देखा था. कुएं के चबूतरे पर बने, बिना मूर्ति वाले मंदिर में वह पीले कनैल के फूल चढ़ातीं. पेड फूलों से लदा रहता था. जब वह फूल तोड़तीं तो मैं नीचे गिरे फूल उठाता. वह हल्के-से कहतीं कि तुम चबूतरे के नीचे मत जाया करो, वहां सांप रहते हैं. उनका मुझ पर हक जताना मुझे बहुत अच्छा लगता था. वह मुझे छोड़ किसी और पर हक भी नहीं जताती थीं. बुआ कभी नीली साड़ी पहनतीं तो कभी पीली और कभी-कभी सफेद भी पहन लेतीं. मन का रंग अच्छा हो तो कपड़े का रंग फीका भी हो तो चलता है. मैं जब सात साल का था तो किरन बुआ ने मुझसे कहा था कि तुम्हारे फूफा अच्छे आदमी नहीं हैं. उस समय मुझे कुछ समझ में नहीं आया था, क्योंकि फूफा मुझे रोज चार आने वाली टॉफी देते थे. किरन बुआ मेरी सगी नहीं थीं, पिता ने उनकी शादी करवाई थी, तब से वह उन्हें भैया कहने लगी थीं और मैं उन्हें बुआ. फूफा बहुत कम घर पर रहते. मैं दिन भर बुआ के साथ घूमता रहता, मंदिर, रसोई और आंगन में. दोपहर के वक्त बुआ जब खाना बनाकर आंगन में पड़ी मसहरी पर लेट जातीं तो मैं धीरे से मसहरी के पाटे तक जाता. दोनों पाटों में दो फोटो-फ्रेम लगे थे. एक में मिथुन दा और दूसरे में हेमा मालिनी हंसते रहते थे. मैं अक्सर बुआ से पूछता कि ये हमेशा हंसते क्यों हैं? तब बुआ भी हंस देतीं. बुआ नींद में परी जैसी लगतीं और मैं जब उन्हें देखने जाता तो चप्पल को पैरों से पीछे छोड़ देता. दोपहर की हवा में बुलबुले दिखते और मानो मैं सपने में तितली पकडना चाह रहा हूं. जब धूप आंगन से ट्रेकिंग कर छत की तरफ जाती तो बुआ उठ जातीं. वह सोहर गुनगुनातीं. शायद : ‘‘जुग-जुग जिया तू ललनवा, भवनवा के भाग जागल बा...’’ शाम होने के साथ ही बुआ की आवाज मद्धम हो जाती. सूरज नदी के किनारे डूबता और वहीं से आटा चक्की के चलने की आवाज आती. एक झुंड पक्षी चहचहाते हुए निकल जाते और थोड़ी ही देर बाद एक अकेला पक्षी क्री-क्री करता मंडराने लगता. ‘‘उसके पास न नाम, न पता... कैसे खोजेगा अपने ठिकाने को.’’ बुआ कहतीं कि पक्षी अपना घोंसला खोज ही लेते हैं. उनके पास आदमी की तर्ज पर विकल्प नहीं होते. बुआ बीए पास थीं. फूफा जमींदार थे और इस काम के लिए किसी डिग्री की दरकार नहीं थी. वक्त की उम्र का बुआ पर कोई असर नहीं हुआ था. वह अनार के फूल जितनी ताजी दिखतीं. बुआ की यही तस्वीर मेरे जेहन के फोटाफ्रेम में मढ़ गई. शाम में मुझे खाना देने के बाद बुआ रसोई की सफाई करने लगतीं. मैं सो जाता और रात को घर में हल्ला होता. फूफा शराब पीकर आते और बुआ की रात सिसकते हुए बीतती. शादी की पहली रात से फूफा में बुआ अपने पति को नहीं खोज पाई थीं. रात जो भी करती है दबे-पांव क्यों करती है?
ओह, मेरी प्यारी रात! आज मैं जब चिल्ड्रेन रिमांड होम में अपनी रिहाई के आखिरी साल और बालिग होने का इंतजार कर रहा हूं तो तुम मुझे बुरी यादों की ओर फिर से ढकेल रही हो. रिमांड होम मेरा दूसरा घर बन गया है मैं फिर से बुआ के आस-पास क्यों उलझ गया हूं. उस दिन भी तो मैंने बुआ से कहा था, ‘‘आज तुम इतनी गुमसुम क्यों हो?’’ बुआ फूल तोड़तीं और गुनगुनाती रहीं, मेरी तरफ देखा भी नहीं. मैंने फिर कहा, ‘‘मुझे भूख लगी है और बुआ मुस्कुरा दीं.’’ बुआ ने पूजाघर में जाने से पहले शहतूत की फलियां दीं – लाल और पकी हुईं. मैंने गप से मुंह में डाल लीं. मुझे अपनी जीभ सिकोड़नी पड़ी क्योंकि शहतूत खट्टे थे. मैं पूजाघर के बाहर बैठा नीलकंठ पक्षी को देखता रहा. नीले रंग के पंख वाला नीलकंठ पूजाघर के मुंहाने तक जाता और बुआ को देखकर फुर्र से उड़ जाता. मैंने एक दो बार उसके पास जाकर पूछना भी चाहा, ‘‘क्या माजरा है, बुआ अच्छी लग रही हैं या बुआ से बात करनी है? लेकिन मेरे मुड़ने से पहले वह उड़ने लगता. उड़ते हुए वह खुश दिखाई देता. बुआ ने मुझे पक्षियों से बात करना सिखाया था. पूजाघर से जब बुआ प्रसाद लेकर निकलतीं तो पक्षियों को खिलातीं. कौआ सबके हिस्से खाने की सोचता. मैं उस पर नजर रखता. दिन भर में इसी समय बुआ गुस्सा होतीं और कहतीं, ‘‘तेरे फूफा जी के पुरखे हैं ये कौए. दिमाग तो खाते ही हैं, सबके हिस्से का भी खाना भी चाहते हैं. शाम को मैंने खाना खाया और सुबह बुआ के पूजाघर में ढेर सारा धुआं मिला. बुआ नहीं मिलीं. मेरी मां मेरे पास बैठी थी. मैंने कहा, ‘‘बुआ कहां हैं?’’ मां बोली, ‘‘बीमार है.’’ मैं रोने लगा, ‘‘मुझे बुआ के पास जाना है.’’ अपने तख्ते पर बैठे फूफा ने कहा, ‘‘छोरे को बुआ के पास ले जाओ भई. आखिर वही तो है सबसे करीब बुआ के.’’ इसके बाद फूफा ने पुलिसवाले से पूछा था कि अब आगे क्या करना है? मेरा दिल बैठने लगा था. मैं अपनी मां के साथ रिक्शे पर बैठकर जे डी मेमोरियल अस्पताल पहुंचा. बुआ को कांच के एक कमरे में बंद किया गया था. उनकी साड़ी का रंग रात में हवाओं के रंग से मिल रहा था. सुबह वह इतना चुभने वाला कैसे हो गया! बुआ मेरी तरफ नहीं देख रही थीं. मैंने मां से पूछा कि बुआ को क्या हुआ? मां ने कहा, ‘‘खाना बनाते हुए जल गई.’’ बुआ ने खाना मुझे खिलाने से पहले ही बना लिया था. फिर क्यों बनाने लगीं. क्या रात का कोई भटका पक्षी फिर से आ गया था. मैंने मां से कहा कि मुझे बुआ से बात करनी है. बुआ ने इतना कहने का मौका कभी नहीं दिया. मां एक डॉक्टर से बात करने लगी. मैं कांच वाला दरवाजा खोलकर बुआ के बिस्तर पर चला गया. न जाने कैसी गंध थी पूरी कमरे में, दवा की नहीं थी. ऐसा लगा कि जैसे दु:ख के पानी से कमरे में पोछा मारा गया हो. मैंने हौले से कहा, ‘‘बुआ, तूने फिर से खाना क्यों बनाया, नीलकंठ, गौरया सब तो खा चुके थे और कौए भी तो रात में नहीं आते.’’ बुआ मेरी ओर पलटीं. बुआ की सिर्फ आंखें दिख रही थीं. उन आंखों से एक आंसू निकला और चेहरे पर लगी पट्टी पर जाकर रुक गया. कहने को जब बहुत कुछ होता है तो आंसू कम निकलते हैं. मैंने बुआ के माथे पर हाथ रख उस आंसू को उंगली के पोरों पर लेने की कोशिश की. आंसू सवाल की तरह फिसल गया. डॉक्टर आया और उसने कहा कि बच्चे को ले जाइए. इंफेक्शन हो जाएगा. अब कौन समझाए इन्हें कि प्यार से बड़ा इंफेक्शन क्या हो सकता है. मां मुझे कांच वाले घर से हाथ पकड़कर ले आई थी. बुआ की आंखों को मैं और पढ़ना चाहता था. बुआ नहीं रही. उनकी आंखों में कई अधूरी कहानियां रह गईं और मेरे मन में कई अनगढ़े किरदार. उनका अंतिम संस्कार बनारस के जिस घाट पर किया गया वहां कुछ अंग्रेज लाशों की तसवीरें निकाल कर कह रहे थे : ‘‘नाइस क्लिक.’’ मुझे बस इसी बात की दरकार थी कि बुआ को आखिरी बार कुछ कहना था जो वह नहीं कह पाईं. उनके पक्षी, बिना भगवान वाला मंदिर और कनैल के पेड़ अपना अफसाना किससे कहेंगे. फूफा ने मेरे सोने के बाद उस रात बुआ से मारपीट की थी. इसके जिम्मेदार फूफा थे जो जब तेरहवीं में आने वाले खर्चे का हिसाब लगा रहे थे तब मैंने कटहल काटने वाले हंसिए से उनके पेट में तीन वार किए. फूफा गिर गए, हंसिए की धार के लिए मैंने अच्छे लोहार का शुक्रिया अदा किया. मैं बुआ को याद करते हुए रिमांड होम में आरामतलब जिंदगी बिताता हूं. यहां नीलकंठ और कौए आते हैं. बुआ भी कभी-कभी दाना लेकर आती हैं. मैं बुआ से कहता हूं कि मैं जल्द ही रिमांड होम से रिहा होने वाला हूं.

छात्रसंघ का चुनाव जीते थे तो 'मंटू’ का बनारस में डंका बजता था

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