आज जैनेंद्र कुमार का बड्डे है. इस मौके पर एक कहानी रोज में पढ़िए उनकी एक यादगारकहानी.--------------------------------------------------------------------------------बाजार में एक नई तरह की पाजेब चली है. पैरों में पड़कर वे बड़ी अच्छी मालूम होतीहैं. उनकी कड़ियां आपस में लचक के साथ जुड़ी रहती हैं कि पाजेब का मानो निज का आकारकुछ नहीं है, जिस पांव में पड़े उसी के अनुकूल ही रहती हैं. पास-पड़ोस में तो सबनन्हीं-बड़ी के पैरों में आप वही पाजेब देख लीजिए. एक ने पहनी कि फिर दूसरी ने भीपहनी. देखा-देखी में इस तरह उनका न पहनना मुश्किल हो गया है. हमारी मुन्नी ने भीकहा कि बाबूजी, हम पाजेब पहनेंगे. बोलिए भला कठिनाई से चार बरस की उम्र और पाजेबपहनेगी. मैंने कहा, कैसी पाजेब? बोली, वही जैसी रुकमन पहनती है, जैसी शीला पहनतीहै. मैंने कहा, अच्छा-अच्छा. बोली, मैं तो आज ही मंगा लूंगी. मैंने कहा, अच्छा भाईआज सही. उस वक्त तो खैर मुन्नी किसी काम में बहल गई. लेकिन जब दोपहर आई मुन्नी कीबुआ, तब वह मुन्नी सहज मानने वाली न थी. बुआ ने मुन्नी को मिठाई खिलाई और गोद मेंलिया और कहा कि अच्छा, तो तेरी पाजेब अबके इतवार को जरूर लेती आऊंगी. इतवार को बुआआई और पाजेब ले आई. मुन्नी पहनकर खुशी के मारे यहां-से-वहां ठुमकती फिरी. रुकमन केपास गई और कहा- देख रुकमन, मेरी पाजेब. शीला को भी अपनी पाजेब दिखाई. सबने पाजेबपहनी देखकर उसे प्यार किया और तारीफ की. सचमुच वह चांदी की सफेद दो-तीन लड़ियां-सीटखनों के चारों ओर लिपटकर, चुपचाप बिछी हुई, बहुत ही सुघड़ लगती थी, और बच्ची कीखुशी का ठिकाना न था. और हमारे महाशय आशुतोष, जो मुन्नी के बड़े भाई थे, पहले तोमुन्नी को सजी-बजी देखकर बड़े खुश हुए. वह हाथ पकड़कर अपनी बढ़िया मुन्नी कोपाजेब-सहित दिखाने के लिए आस-पास ले गए. मुन्नी की पाजेब का गौरव उन्हें अपना भीमालूम होता था. वह खूब हंसे और ताली पीटी, लेकिन थोड़ी देर बाद वह ठुमकने लगे किमुन्नी को पाजेब दी, सो हम भी बाईसिकिल लेंगे. बुआ ने कहा कि अच्छा बेटा अबकेजन्म-दिन को तुझे बाईसिकिल दिलवाएंगे.आशुतोष बाबू ने कहा कि हम तो अभी लेंगे. बुआने कहा, ‘'छी-छी, तू कोई लड़की है? जिद तो लड़कियां किया करती हैं. और लड़कियांरोती हैं. कहीं बाबू साहब लोग रोते हैं?" आशुतोष बाबू ने कहा कि तो हम बाईसिकिलजरूर लेंगे जन्म-दिन वाले रोज. बुआ ने कहा कि हां, यह बात पक्की रही, जन्म-दिन परतुमको बाईसिकिल मिलेगी. इस तरह वह इतवार का दिन हंसी-खुशी पूरा हुआ. शाम होने परबच्चों की बुआ चली गई. पाजेब का शौक घड़ीभर का था. वह फिर उतारकर रख-रखा दी गई,जिससे कहीं खो न जाए. पाजेब वह बारीक और सुबुक काम की थी और खासे दाम लग गए थे.श्रीमतीजी ने हमसे कहा, क्यों जी, लगती तो अच्छी है, मैं भी अपने लिए बनवा लूंमैंने कहा कि क्यों न बनावाओं! तुम कौन चार बरस की नहीं हो? खैर, यह हुआ. पर मैंरात को अपनी मेज पर था कि श्रीमती ने आकर कहा कि तुमने पाजेब तो नहीं देखी? मैंनेआश्चर्य से कहा कि क्या मतलब? बोली कि देखो, यहां मेज-वेज पर तो नहीं है? एक तो हैपर दूसरे पैर की मिलती नहीं है. जाने कहां गई? मैंने कहा कि जाएगी कहां? यहीं-कहींदेख लो. मिल जाएगी. उन्होंने मेरे मेज के कागज उठाने-धरने शुरू किए और आलमारी कीकिताबें टटोल डालने का भी मंसूबा दिखाया. मैंने कहा कि यह क्या कर रही हो? यहां वहकहां से आएगी? जवाब में वह मुझी से पूछने लगी कि फिर कहां है? मैंने कहा तुम्हीं नेतो रखी थी. कहां रखी थी? बतलाने लगी कि दोपहर के बाद कोई दो बजे उतारकर दोनों कोअच्छी तरह संभालकर उस नीचे वाले बॉक्स में रख दी थीं। अब देखा तो एक है, दूसरी गायबहै. मैंने कहा कि तो चलकर वह इस कमरे में कैसे आ जाएगी? भूल हो गई होगी. एक रखीहोगी, एक वहीं कहीं फर्श पर छूट गई होगी. देखो, मिल जाएगी. कहीं जा नहीं सकती. इसपर श्रीमती कहा-सुनी करने लगीं कि तुम तो ऐसे ही हो. खुद लापरवाह हो, दोष उल्टेमुझे देते हो. कह तो रही हूं कि मैंने दोनों संभालकर रखी थीं. मैंने कहा कि संभालकररखी थीं, तो फिर यहां-वहां क्यों देख रही थी? जहां रखी थीं वहीं से ले लो न. वहांनहीं है तो फिर किसी ने निकाली ही होगी. श्रीमती बोलीं कि मेरा भी यही ख्याल हो रहाहै. हो न हो, बंसी नौकर ने निकाली हो. मैंने रखी, तब वह वहां मौजूद था. मैंने कहा,तो उससे पूछा? बोलीं, वह तो साफ इंकार कर रहा है. मैंने कहा, तो फिर? श्रीमती जोरसे बोली, तो फिर मैं क्या बताऊं? तुम्हें तो किसी बात की फिकर है नहीं. डांटकर कहतेक्यों नहीं हो, उस बंसी को बुलाकर? जरूर पाजेब उसी ने ली है. मैंने कहा कि अच्छा,तो उसे क्या कहना होगा? यह कहूं कि ला भाई पाजेब दे दे! श्रीमती झल्ला कर बोलीं किहो चुका सब कुछ तुमसे. तुम्हीं ने तो उस नौकर की जात को शहजोर बना रखा है. डांट नफटकार, नौकर ऐसे सिर न चढ़ेगा तो क्या होगा? बोलीं कि कह तो रही हूं कि किसी ने उसेबक्से से निकाला ही है. और सोलह में पंद्रह आने यह बंसी है. सुनते हो न, वही है.मैंने कहा कि मैंने बंसी से पूछा था. उसने नहीं ली मालूम होती. इस पर श्रीमती नेकहा कि तुम नौकरों को नहीं जानते. वे बड़े छंटे होते हैं. बंसी चोर जरूर है. नहींतो क्या फरिश्ते लेने आते? मैंने कहा कि तुमने आशुतोष से भी पूछा? बोलीं, पूछा था.वह तो खुद ट्रंक और बक्स के नीचे घुस-घुस कर खोज लगाने में मेरी मदद करता रहा है.वह नहीं ले सकता. मैंने कहा, उसे पतंग का बड़ा शौक है. बोलीं कि तुम तो उसेबताते-बरजते कुछ हो नहीं. उमर होती जा रही है. वह यों ही रह जाएगा. तुम्हीं हो उसेपतंग की शह देने वाले. मैंने कहा कि जो कहीं पाजेब ही पड़ी मिल गई हो तो? बोलीं,नहीं, नहीं! मिलती तो वह बता न देता? खैर, बातों-बातों में मालूम हुआ कि उस शामआशुतोष पतंग और डोर का पिन्ना नया लाया है. श्रीमती ने कहा कि यह तुम्हीं हो जिसनेपतंग की उसे इजाजत दी. बस सारे दिन पतंग-पतंग. यह नहीं कि कभी उसे बिठाकर सबक की भीकोई बात पूछो. मैं सोचती हूं कि एक दिन तोड़-ताड़ दूं उसकी सब डोर और पतंग. मैंनेकहा कि खैर, छोड़ो. कल सवेरे पूछ-ताछ करेंगे. सवेरे बुलाकर मैंने गंभीरता से उससेपूछा कि क्यों बेटा, एक पाजेब नहीं मिल रही है, तुमने तो नहीं देखी? वह गुम हो गयाजैसे नाराज हो. उसने सिर हिलाया कि उसने नहीं ली. पर मुंह नहीं खोला. मैंने कहा किदेखो बेटे, ली हो तो कोई बात नहीं, सच बता देना चाहिए. उसका मुंह और भी फूल आया. औरवह गुम-सुम बैठा रहा. मेरे मन में उस समय तरह-तरह के सिद्धांत आए. मैंने स्थिर कियाकि अपराध के प्रति करुणा ही होनी चाहिए. रोष का अधिकार नहीं है. प्रेम से हीअपराध-वृत्ति को जीता जा सकता है. आतंक से उसे दबाना ठीक नहीं है. बालक का स्वभावकोमल होता है और सदा ही उससे स्नेह से व्यवहार करना चाहिए इत्यादि. मैंने कहा किबेटा आशुतोष, तुम घबराओ नहीं. सच कहने में घबराना नहीं चाहिए. ली हो तो खुल कर कहदो, बेटा! हम कोई सच कहने की सजा थोड़े ही दे सकते हैं, बल्कि बोलने पर तो इनाममिला करता है. आशुतोष तब बैठा सुनता रहा. उसका मुंह सूजा था. वह सामने मेरी आँखोंमें नहीं देख रहा था. रह-रहकर उसके माथे पर बल पड़ते थे. ‘‘क्यों बेटे, तुमने ली तोनहीं?’’ उसने सिर हिलाकर क्रोध से अस्थिर और तेज आवाज में कहा कि मैंने नहीं ली,नहीं ली, नहीं ली. यह कहकर वह रोने को हो आया, पर रोया नहीं. आँखों में आंसू रोकलिए. उस वक्त मुझे प्रतीत हुआ, उग्रता दोष का लक्षण है. मैंने कहा, देखो बेटा, डरोनहीं, अच्छा जाओ, ढूंढ़ो, शायद कहीं पड़ी हुई वह पाजेब मिल जाए. मिल जाएगी तो हमतुम्हें इनाम देंगे. वह चला गया और दूसरे कमरे में जाकर पहले तो एक कोने में खड़ाहो गया. कुछ देर चुपचाप खड़े रहकर वह फिर यहां-वहां पाजेब की तलाश में लग गया.श्रीमती आकर बोलीं, आशू से तुमने पूछ लिया? क्या ख्याल है? मैंने कहा कि संदेह तोमुझे होता है. नौकर का तो काम यह है नहीं! श्रीमती ने कहा, नहीं जी, आशू भला क्योंलेगा? मैं कुछ बोला नहीं. मेरा मन जाने कैसे गंभीर प्रेम के भाव से आशुतोष के प्रतिउमड़ रहा था. मुझे ऐसा मालूम होता था कि ठीक इस समय आशुतोष को हमें अपनी सहानुभूतिसे वंचित नहीं करना चाहिए, बल्कि कुछ अतिरिक्त स्नेह इस समय बालक को मिलना चाहिए.मुझे यह एक भारी दुर्घटना मालूम होती थी. मालूम होता था कि अगर आशुतोष ने चोरी कीहै तो उसका इतना दोष नहीं है, बल्कि यह हमारे ऊपर बड़ा भारी इल्जाम है. बच्चे मेंचोरी की आदत भयावह हो सकती है, लेकिन बच्चे के लिए वैसी लाचारी उपस्थित हो आई, यहऔर भी कहीं भयावह है. यह हमारी आलोचना है. हम उस चोरी से बरी नहीं हो सकते. मैंनेबुलाकर कहा, ‘‘अच्छा सुनो. देखो, मेरी तरफ देखो, यह बताओ कि पाजेब तुमने छुन्नू कोदी है न?" वह कुछ देर कुछ नहीं बोला. उसके चेहरे पर रंग आया और गया. मैं एक-एक छायाताड़ना चाहता था. मैंने आश्वासन देते हुए कहा कि डरने की कोई बात नहीं. हाँ, हाँ,बोलो डरो नहीं. ठीक बताओ, बेटे! कैसा हमारा सच्चा बेटा है. मानो बड़ी कठिनाई के बादउसने अपना सिर हिलाया. मैंने बहुत खुश होकर कहा कि दी है न छुन्नू को? उसने सिरहिला दिया. अत्यंत सांत्वना के स्वर में स्नेहपूर्वक मैंने कहा कि मुंह से बोलो,छुन्नू को दी है? उसने कहा, ‘‘हाँ-हाँ.’’ मैंने अत्यंत हर्ष के साथ दोनों बांहोंमें लेकर उसे उठा लिया. कहा कि ऐसे ही बोल दिया करते हैं अच्छे लड़के. आशू हमाराराजा बेटा है. गर्व के भाव से उसे गोद में लिए-लिए मैं उसकी मां की तरफ गया.उल्लासपूर्वक बोला कि देखो हमारे बेटे ने सच कबूल किया है. पाजेब उसने छुन्नू को दीहै. सुनकर मां उसकी बहुत खुश हो आईं. उन्होंने उसे चूमा. बहुत शाबाशी दी ओर उसकीबलैयां लेने लगी. आशुतोष भी मुस्करा आया, अगरचे एक उदासी भी उसके चेहरे से दूर नहींहुई थी. उसके बाद अलग ले जाकर मैंने बड़े प्रेम से पूछा कि पाजेब छुन्नू के पास हैन? जाओ, मांग ला सकते हो उससे? आशुतोष मेरी ओर देखता हुआ बैठा रहा. मैंने कहा किजाओ बेटे! ले आओ. उसने जवाब में मुंह नहीं खोला. मैंने आग्रह किया तो वह बोला किछुन्नू के पास नहीं हुई तो वह कहां से देगा? मैंने कहा कि तो जिसको उसने दी होगीउसका नाम बता देगा. सुनकर वह चुप हो गया. मेरे बार-बार कहने पर वह यही कहता रहा किपाजेब छुन्नू के पास न हुई तो वह देगा कहां से? अंत में हारकर मैंने कहा कि वह कहींतो होगी. अच्छा, तुमने कहां से उठाई थी? ‘‘पड़ी मिली थी.’’ ‘‘और फिर नीचे जाकर वहतुमने छुन्नू को दिखाई?’’ ‘‘हां!’’ ‘‘फिर उसी ने कहा कि इसे बेचेंगे!’’ ‘‘हाँ!’’‘‘कहाँ बेचने को कहा?’’ ‘‘कहा, मिठाई लाएंगे?’’ ‘‘नहीं, पतंग लाएंगे?’’ ‘‘हाँ!’’‘‘सो पाजेब छुन्नू के पास रह गई?’’ ‘‘हाँ!’’ ‘‘तो उसी के पास होनी चाहिए न! या पतंगवाले के पास होगी! जाओ, बेटा, उससे ले आओ. कहना, हमारे बाबूजी तुम्हें इनाम देंगे.वह जाना नहीं चाहता था. उसने फिर कहा कि छुन्नू के पास नहीं हुई तो कहाँ से देगा!मुझे उसकी जिद बुरी मालूम हुई. मैंने कहा कि तो कहीं तुमने उसे गाड़ दिया है? क्याकिया है? बोलते क्यों नहीं? वह मेरी ओर देखता रहा, और कुछ नहीं बोला. मैंने कहा,कुछ कहते क्यों नहीं? वह गुम-सुम रह गया. और नहीं बोला. मैंने डपटकर कहा कि जाओ,जहां हो वहीं से पाजेब लेकर आओ. जब वह अपनी जगह से नहीं उठा और नहीं गया तो मैंनेउसे कान पकड़कर उठाया. कहा कि सुनते हो? जाओ, पाजेब लेकर आओ. नहीं तो घर मेंतुम्हारा काम नहीं है. उस तरह उठाया जाकर वह उठ गया और कमरे से बाहर निकल गया.निकलकर बरामदे के एक कोने में रूठा मुंह बनाकर खड़ा रह गया. मुझे बड़ा क्षोभ हो रहाथा. यह लड़का सच बोलकर अब किस बात से घबरा रहा है, यह मैं कुछ समझ न सका. मैंने बाहरआकर धीरे से कहा कि जाओ भाई, जाकर छुन्नू से कहते क्यों नहीं हो? पहले तो उसने कोईजवाब नहीं दिया और जवाब दिया तो बार-बार कहने लगा कि छुन्नू के पास नहीं हुई तो वहकहां से देगा? मैंने कहा कि जितने में उसने बेची होगी वह दाम दे देंगे. समझे न जाओ,तुम कहो तो. छुन्नू की माँ तो कह रही है कि उसका लड़का ऐसा काम नहीं कर सकता. उसनेपाजेब नहीं देखी. जिस पर आशुतोष की माँ ने कहा कि नहीं तुम्हारा छुन्नू झूठ बोलताहै. क्यों रे आशुतोष, तैने दी थी न? आशुतोष ने धीरे से कहा, हाँ, दी थी. दूसरे ओरसे छुन्नू बढ़कर आया और हाथ फटकारकर बोला कि मुझे नहीं दी. क्यों रे, मुझे कब दी थी?आशुतोष ने जिद बांधकर कहा कि दी तो थी. कह दो, नहीं दी थी? नतीजा यह हुआ कि छुन्नूकी मां ने छुन्नू को खूब पीटा और खुद भी रोने लगी. कहती जाती कि हाय रे, अब हम चोरहो गए. कुलच्छनी औलाद जाने कब मिटेगी? बात दूर तक फैल चली. पड़ोस की स्त्रियों मेंपवन पड़ने लगी. और श्रीमती ने घर लौटकर कहा कि छुन्नू और उसकी मां दोनों एक-से हैं.मैंने कहा कि तुमने तेजा-तेजी क्यों कर डाली? ऐसे कोई बात भला सुलझती है! बोली किहां, मैं तेज बोलती हूँ. अब जाओ न, तुम्हीं उनके पास से पाजेब निकालकर लाते क्योंनहीं? तब जानूँ जब पाजेब निकलवा दो. मैंने कहा कि पाजेब से बढ़कर शांति है. औरअशांति से तो पाजेब मिल नहीं जाएगी. श्रीमती बुदबुदाती हुई नाराज होकर मेरे सामनेसे चली गईं. थोड़ी देर बाद छुन्नू की माँ हमारे घर आई. श्रीमती उन्हें लाई थी. अबउनके बीच गर्मी नहीं थी, उन्होंने मेरे सामने आकर कहा कि छुन्नू तो पाजेब के लिएइनकार करता है. वह पाजेब कितने की थी, मैं उसके दाम भर सकती हूँ. मैंने कहा, ‘‘यहआप क्या कहती है! बच्चे, बच्चे हैं. आपने छुन्नू से सहूलियत से पूछा भी!’’ उन्होंनेउसी समय छुन्नू को बुलाकर मेरे सामने कर दिया. कहा कि क्यों रे, बता क्यों नहींदेता जो तैने पाजेब देखी हो? छुन्नू ने जोर से सिर हिलाकर इनकार किया. और बताया किपाजेब आशुतोष के हाथ में मैंने देखी थी और वह पतंग वालों को दे आया है. मैंने खूबदेखी थी, वह चांदी की थी. ‘‘तुम्हें ठीक मालूम है?’’ ‘‘हाँ, वह मुझसे कह रहा था कितू भी चल. पतंग लाएंगे.’’ ‘‘पाजेब कितनी बड़ी थी? बताओ तो.’’ छुन्नू ने उसका आकारबताया, जो ठीक ही था. मैंने उसकी माँ की तरफ देख कर कहा, देखिए न, पहले यही कहता थाकि मैंने पाजेब देखी तक नहीं. अब कहता है कि देखी है. माँ ने मेरे सामने छुन्नू कोखींच कर तभी धम्म-धम्म पीटना शुरू कर दिया. कहा कि क्यों रे, झूठ बोलता है? तेरीचमड़ी न उधेड़ी तो मैं नहीं. मैंने बीच-बचाव करके छुन्नू को बचाया. वह शहीद की भांतिपिटता रहा था. रोया बिल्कुल नहीं और एक कोने में खड़े आशुतोष को जाने किस भाव से देखरहा था. खैर, मैंने सबको छुट्टी दी. कहा, जाओ बेटा छुन्नू खेलो. उसकी माँ को कहा,आप उसे मारिएगा नहीं. और पाजेब कोई ऐसी बड़ी चीज़ नहीं है. छुन्नू चला गया. तब, उसकीमां ने पूछा कि आप उसे कसूरवार समझते हैं? मैंने कहा कि मालूम तो होता है कि उसेकुछ पता है. और वह मामले में शामिल है. इस पर छुन्नू की माँ ने पास बैठी हुई मेरीपत्नी से कहा, ‘‘चलो बहनजी, मैं तुम्हें अपना सारा घर दिखाए देती हूं. एक-एक चीजदेख लो. होगी पाजेब तो जाएगी कहाँ?’’ मैंने कहा, ‘‘छोड़िए भी. बेबात को बात बढ़ाने सेक्या फायदा!’’ सो, ज्यों-त्यों मैंने उन्हें दिलासा दिया. नहीं तो वह छुन्नू कोपीट-पाट हाल-बेहाल कर डालने का प्रण ही उठाए ले रही थी. कुलच्छनी, आज उसी धरती मेंनहीं गाड़ दिया तो, मेरा नाम नहीं. खैर, जिस-तिस भांति बखेड़ा टला. मैं इस झंझट मेंदफ्तर भी समय पर नहीं जा सका. जाते वक्त श्रीमती को कह गया कि देखो, आशुतोष कोधमकाना मत. प्यार से सारी बातें पूछना. धमकाने से बच्चे बिगड़ जाते हैं, और हाथ कुछनहीं आता. समझी न? शाम को दफ्तर से लौटा तो श्रीमती ने सूचना दी कि आशुतोष ने सबबतला दिया है. ग्यारह आने पैसे में वह पाजेब पतंग वाले को दे दी है. पैसे उसनेथोड़े-थोड़े करके देने को कहे हैं. पांच आने जो दिए, वह छुन्नू के पास हैं. इस तरहरत्ती-रत्ती बात उसने कह दी है. कहने लगी कि मैंने बड़े प्यार से पूछ-पूछ कर यह सबउसके पेट में से निकाला है. दो-तीन घंटे मैं मगज मारती रही. हाय राम! बच्चे का भीक्या जी होता है. मैं सुनकर खुश हुआ. मैंने कहा कि चलो अच्छा है, अब पांच आने भेजकरपाजेब मंगवा लेंगे. लेकिन यह पतंग वाला भी कितना बदमाश है, बच्चों के हाथ से ऐसीचीजें लेता है. उसे पुलिस में दे देना चाहिए. उचक्का कहीं का! फिर मैंने पूछा किआशुतोष कहां है? उन्होंने बताया कि बाहर ही कहीं खेल-खाल रहा होगा. मैंने कहा किबंसी, जाकर उसे बुला तो लाओ. बंसी गया और उसने आकर कहा कि वे अभी आते हैं. ‘‘क्याकर रहा है?’’ ‘‘छुन्नू के साथ गिल्ली-डंडा खेल रहे हैं.’’ थोड़ी देर में आशुतोष आया.तब मैंने उसे गोद में लेकर प्यार किया. आते-आते उसका चेहरा उदास हो गया और गोद मेंलेने पर भी वह कोई विशेष प्रसन्न मालूम नहीं हुआ. उसकी मां ने खुश होकर कहा किआशुतोष ने सब बातें अपने-आप पूरी-पूरी बता दी है. हमारा आशुतोष बड़ा सच्चा लड़का है.आशुतोष मेरी गोद में टिका रहा. लेकिन अपनी बड़ाई सुनकर भी उसको कुछ हर्ष नहीं हुआ,ऐसा प्रतीत होता था. मैंने कहा कि आओ चलो. अब क्या बात है. क्यों हजरत, तुमको पांचही आने तो मिले हैं न? हम से पांच आने मांग लेते तो क्या हम न देते? सुनो, अब सेऐसा मत करना, बेटे! कमरे में जाकर मैंने उससे फिर पूछताछ की, ‘‘क्यों बेटा, पतंगवाले ने पांच आने तुम्हें दिए न?’’ ‘‘हाँ’’! ‘‘और वह छुन्नू के पास हैं न!’’‘‘हाँ!’’ ‘‘अभी तो उसके पास होंगे न!’’ ‘‘नहीं.’’ ‘‘खर्च कर दिए!’’ ‘‘नहीं.’’‘‘नहीं खर्च किए?’’ ‘‘हां.’’ ‘‘खर्च किए कि नहीं खर्च किए?’’ उस ओर से प्रश्न करनेवह मेरी ओर देखता रहा, उत्तर नहीं दिया. ‘‘बताओ, खर्च कर दिए कि अभी हैं?’’ जवाबमें उसने एक बार ‘हाँ’ कहा तो दूसरी बार ‘नहीं’ कहा. मैंने कहा, तो यह क्यों नहींकहते कि तुम्हें नहीं मालूम है? ‘‘हाँ." ‘‘बेटा, मालूम है न?’’ ‘‘हाँ.’’ पतंग वालेसे पैसे छुन्नू ने लिए हैं न? ‘‘हाँ.’’ ‘‘तुमने क्यों नहीं लिए?’’ वह चुप.‘‘इकन्नियां कितनी थी, बोलो?’’ ‘‘दो.’’ ‘‘बाकी पैसे थे?’’ ‘‘हाँ.’’ ‘‘दुअन्नी थी!’’‘‘हाँ.’’ मुझे क्रोध आने लगा. डपटकर कहा कि सच क्यों नहीं बोलते जी? सच बताओ कितनीइकन्नियाँ थी और कितना क्या था. वह गुमसुम खड़ा रहा, कुछ नहीं बोला. ‘‘बोलते क्योंनहीं?’’ वह नहीं बोला. ‘‘सुनते हो!’’ बोला, ‘‘नहीं तो..." आशुतोष डर गया और कुछनहीं बोला. ‘‘सुनते नहीं, मैं क्या कह रहा हूं?’’ इस बार भी वह नहीं बोला तो मैंनेकान पकड़कर उसके कान खींच लिए. वह बिना आंसू लाए गुमसुम खड़ा रहा. ‘‘अब भी नहींबोलोगे?’’ वह डर के मारे पीला हो आया, लेकिन बोल नहीं सका. मैंने जोर से बुलाया,‘‘बंसी यहां आओ, इनको ले जाकर कोठरी में बंद कर दो.’’ बंसी नौकर उसे उठाकर ले गयाऔर कोठरी में मूँद दिया. दस मिनट बाद फिर उसे पास बुलवाया. उसका मुंह सूजा हुआ था.बिना कुछ बोले उसके ओंठ हिल रहे थे. कोठरी में बंद होकर भी वह रोया नहीं. मैंनेकहा, ‘‘क्यों रे, अब तो अकल आई?’’ वह सुनता हुआ गुमसुम खड़ा रहा. ‘‘अच्छा, पतंग वालाकौन-सा है? दाईं तरफ का चौराहे वाला!’’ उसने कुछ ओठों में ही बड़बड़ा दिया. जिसे मैंकुछ समझ न सका. ‘‘वह चौराहे वाला! बोलो.’’ ‘‘हाँ.’’ ‘‘देखो, अपने चाचा के साथ चलेजाओ. बता देना कि कौन-सा है. फिर उसे स्वयं भुगत लेंगे. समझते हो न?’’ यह कहकरमैंने अपने भाई को बुलवाया. सब बात समझाकर कहा, ‘‘देखो, पांच आने के पैसे ले जाओ.पहले तुम दूर रहना. आशुतोष पैसे ले जाकर उसे देगा और अपनी पाजेब मांगेगा. अव्वल तोयह पाजेब लौटा ही देगा. नहीं तो उसे डांटना और कहना कि तुझे पुलिस के सुपुर्द करदूंगा. बच्चों से माल ठगता है? समझे! नरमी की जरूरत नहीं है.’’ ‘‘और आशुतोष, अबजाओ. अपने चाचा के साथ जाओ.’’ वह अपनी जगह पर खड़ा था. सुनकर भी टस-से-मस होता दिखाईनहीं दिया. ‘‘नहीं जाओगे!’’ उसने सिर हिला दिया कि नहीं जाऊंगा. मैंने तब उसेसमझाकर कहा कि ‘‘भैया, घर की चीज है, दाम लगे हैं. भला पांच आने में रुपयों का मालकिसी के हाथ खो दोगे! जाओ, चाचा के संग जाओ. तुम्हें कुछ नहीं कहना होगा. हाँ, पैसेदे देना और अपनी चीज वापस मांग लेना. दे तो दे, नहीं दे तो नहीं दे. तुम्हारा इससेकोई सरोकार नहीं. सच है न, बेटे! अब जाओ." पर वह जाने को तैयार ही नहीं दिखा. मुझेलड़के की गुस्ताखी पर बड़ा बुरा मालूम हुआ. बोला, ‘‘इसमें बात क्या है? इसमें मुश्किलकहां है? समझाकर बात कर रहे है सो समझता ही नहीं, सुनता ही नहीं.’’ मैंने कहा किक्यों रे नहीं जाएगा? उसने फिर सिर हिला दिया कि नहीं जाऊंगा. मैंने प्रकाश, अपनेछोटे भाई को बुलाया. कहा, ‘‘प्रकाश, इसे पकड़कर ले जाओ.’’ प्रकाश ने उसे पकड़ा औरआशुतोष अपने हाथ-पैरों से उसका प्रतिकार करने लगा. वह साथ जाना नहीं चाहता था.मैंने अपने ऊपर बहुत जब्र करके फिर आशुतोष को पुचकारा कि जाओ भाई! डरो नहीं. अपनीचीज घर में आएगी, इतनी-सी बात समझते नहीं. प्रकाश इसे गोद में उठाकर ले जाओ और जोचीज मांगे उसे बाजार में दिला देना. जाओ भाई आशुतोष! पर उसका मुंह फूला हुआ था.जैसे-तैसे बहुत समझाने पर वह प्रकाश के साथ चला. ऐसे चला मानो पैर उठाना उसे भारीहो रहा हो. आठ बरस का यह लड़का होने को आया फिर भी देखो न कि किसी भी बात की उसमेंसमझ नहीं है. मुझे जो गुस्सा आया कि क्या बतलाऊँ! लेकिन यह याद करके कि गुस्से सेबच्चे संभलने की जगह बिगड़ते हैं, मैं अपने को दबाता चला गया. खैर, वह गया तो मैंनेचैन की सांस ली. लेकिन देखता क्या हूं कि कुछ देर में प्रकाश लौट आया है. मैंनेपूछा, ‘‘क्यों?’’ बोला कि आशुतोष भाग आया है. मैंने कहा कि अब वह कहां है? ‘‘वहरूठा खड़ा है, घर में नहीं आता.’’ ‘‘जाओ पकड़कर तो लाओ.’’ वह पकड़ा हुआ आया. मैंनेकहा, ‘‘क्यों रे, तू शरारत से बाज नहीं आएगा? बोल, जाएगा कि नहीं?’’ वह नहीं बोलातो मैंने कसकर उसके दो चांटे दिए. थप्पड़ लगते ही वह एकदम चीखा, पर फौरन चुप हो गया.वह वैसे ही मेरे सामने खड़ा रहा. मैंने उसे देखकर मारे गुस्से से कहा कि ले जाओ इसेमेरे सामने से. जाकर कोठरी में बंद कर दो. दुष्ट! इस बार वह आध-एक घंटे बंद रहा.मुझे ख्याल आया कि मैं ठीक नहीं कर रहा हूं, लेकिन जैसे कोई दूसरा रास्ता न दिखताथा. मार-पीटकर मन को ठिकाना देने की आदत पड़ गई थी, और कुछ अभ्यास न था. खैर, मैंनेइस बीच प्रकाश को कहा कि तुम दोनों पतंग वाले के पास जाओ. मालूम करना कि किसनेपाजेब ली है. होशियारी से मालूम करना. मालूम होने पर सख्ती करना. मुरव्वत की जरूरतनहीं. समझे. प्रकाश गया और लौटने पर बताया कि उसके पास पाजेब नहीं है. सुनकर मैंझल्ला आया, कहा कि तुमसे कुछ काम नहीं हो सकता. जरा-सी बात नहीं हुई, तुमसे क्याउम्मीद रखी जाए? वह अपनी सफाई देने लगा. मैंने कहा, ‘‘बस, तुम जाओ.’’ प्रकाश मेराबहुत लिहाज मानता था. वह मुंह डालकर चला गया. कोठरी खुलवाने पर आशुतोष को फर्श परसोता पाया. उसके चेहरे पर अब भी आंसू नहीं थे. सच पूछो तो मुझे उस समय बालक परकरुणा हुई. लेकिन आदमी में एक ही साथ जाने क्या-क्या विरोधी भाव उठते हैं! मैंनेउसे जगाया. वह हड़बड़ाकर उठा. मैंने कहा, ‘‘कहो, क्या हालत है?’’ थोड़ी देर तक वह समझाही नहीं. फिर शायद पिछला सिलसिला याद आया! झट उसके चेहरे पर वही जिद, अकड़ ओरप्रतिरोध के भाव दिखाई देने लगे. मैंने कहा कि या तो राजी-राजी चले जाओ नहीं तो इसकोठरी में फिर बंद किए देते हैं. आशुतोष पर इसका विशेष प्रभाव पड़ा हो, ऐसा मालूमनहीं हुआ. खैर, उसे पकड़कर लाया और समझाने लगा. मैंने निकालकर उसे एक रुपया दिया औरकहा, ‘‘बेटा, इसे पतंग वाले को दे देना और पाजेब मांग लेना कोई घबराने की बात नहीं.तुम समझदार लड़के हो.’’ उसने कहा कि जो पाजेब उसके पास नहीं हुई तो वह कहां से देगा?‘‘इसका क्या मतलब, तुमने कहा न कि पांच आने में पाजेब दी है. न हो तो छुन्नू को भीसाथ ले लेना. समझे?’’ वह चुप हो गया. आखिर समझाने पर जाने को तैयार हुआ. मैंनेप्रेमपूर्वक उसे प्रकाश के साथ जाने को कहा. उसका मुंह भारी देखकर डांटने वाला हीथा कि इतने में सामने उसकी बुआ दिखाई दी. बुआ ने आशुतोष के सिर पर हाथ रखकर पूछा किकहाँ जा रहे हो, मैं तो तुम्हारे लिए केले और मिठाई लाई हूँ. आशुतोष का चेहरा रूठाही रहा. मैंने बुआ से कहा कि उसे रोको मत. जाने दो. आशुतोष रुकने को उद्यत था. वहचलने में आनाकानी दिखाने लगा. बुआ ने पूछा, ‘‘क्या बात है?’’ मैंने कहा, ‘‘कोई बातनहीं. जाने दो न उसे.’’ पर आशुतोष मचलने पर आ गया था. मैंने डांटकर कहा, ‘‘प्रकाश,इसे ले क्यों नहीं जाते हो?’’ बुआ ने कहा कि बात क्या है? क्या बात है? मैंनेपुकारा, ‘‘बंसी, तू भी साथ जा. बीच से लौटने न पाए.’’ सो मेरे आदेश पर दोनों आशुतोषको जबरदस्ती उठाकर सामने से ले गए. बुआ ने कहा, ‘‘क्यों उसे सता रहे हो?’’ मैंनेकहा कि कुछ नहीं, जरा यों ही... फिर मैं उनके साथ इधर-उधर की बातें ले बैठा.राजनीति राष्ट्र की ही नहीं होती, मुहल्ले में भी राजनीति होती है. यह भारस्त्रियों पर टिकता है. कहाँ क्या हुआ, क्या होना चाहिए इत्यादि चर्चा, स्त्रियोंको लेकर रंग फैलाती है. इसी प्रकार कुछ बातें हुईं, फिर छोटा-सा बक्सा सरका करबोली, इनमें वह कागज है जो तुमने मांगे थे. और यहां.. यह कहकर उन्होंने अपने बास्कटकी जेब में हाथ डालकर पाजेब निकालकर सामने की, जैसे सामने बिच्छू हों. मैं भयभीतभाव से कह उठा कि यह क्या? बोली कि उस रोज भूल से यह एक पाजेब मेरे साथ चली गई थी.--------------------------------------------------------------------------------एक कहानी रोज़ में पढ़िए दुर्गेश सिंह की कहानी 'बुआ, मैं, नीलकंठ और रिमांड होम'