संकठा प्रसाद खुद के ही शरीर को जलते हुए देख रहे थे
एक कहानी रोज़ में आज पढ़िए गौरव राय की कहानी 'थोड़ा सा और जी लें'

मिसिर जी के परिवार में एक मात्र पत्नी के अलावा दो बच्चे पाए जाते हैं, एक पुत्र जो बी.ए. कर चुका है और वर्तमान में बेरोज़गारों की श्रेणी में आता है. दूसरी पुत्री, गृहस्थी-सिलाई-कढ़ाई जैसे पूर्णतया मनोरंजक और रुचिकर क्षेत्रों में प्रशिक्षण प्राप्त कर रही है. विवाह योग्य हो चुकी है. ऐसा नहीं है कि दो बच्चे मिसिर जी के मानसिक विकास एवं बौद्धिक सम्पन्नता का परिचय देते हों, बल्कि ये तो उनके क्षणिक वैवाहिक सुख का फल हैं. वैवाहिक जीवन के वो स्वर्णिम दो वर्ष यानी पूरे 24 महीने. और उस पे मितरों-सहकर्मियों का ये कटाक्ष, "पंडित जी, आपकी 28 वर्षीय सफल वैवाहिक जीवन का रहस्य तो बताइए."मिसिर जी के प्रतिदिन का कार्यक्रम बहुत ही संयमित था, स्वयं की अपेक्षा पत्नी और बच्चों द्वारा अधिक. कभी कोई शिकायत, कभी कोई फ़रमाईश. ख़ैर ये सब अब उनके जीवन का हिस्सा बन चुके थे, इनसे अब उन्हें कोई ख़ास परेशानी होती भी नहीं थी. परेशानी का कारण अगर कोई था तो सिर्फ उनका नाम 'पं. संकठा प्रसाद मिश्र' जहां मित्रों और सहकर्मियों में मिसिर जी के लिए 'संकठा' और 'मिसरा' जैसे सम्बोधन प्रयुक्त होते थे, मिसिर जी खुद को 'पंडित जी' 'मिस्टर एस पी मिश्रा' कहलाना पसंद करते थे, मगर उनका यह प्रयास निरंतर असफल होता रहा. लोग वही, ढाक के तीन पात'. वैसे मिसिर जी का व्यक्तित्व हमेशा उनके जानने वालों में चर्चा का विषय बना रहता था, चर्चा से अधिक हास्य का. दुबला-पतला शरीर, मोटे फ्रेम का चश्मा, गाल पिचके हुए, सब कुछ जैसे किसी अकालग्रस्त क्षेत्र का विवरण प्रस्तुत कर रहे हों. इतने सब के बावजूद भी मिसिरजी का एक गुण प्रशंसा योग्य था. उनका धैर्य-उनका संयम. वही एक था जो अब तक उनके साथ जुड़ा रहा, बाकी सब कुछ... सब कुछ उनके लिए क्षणिक ही था, परन्तु आज उसी धैर्य, उसी संयम की दीवार पे मानो हथौड़े बज रहे थे. कुछ ही क्षण पहले की बात है, पत्नी पुत्र को कोस रही थी, "बी.ए. कर लिया, अब भी क्या छाती पे बैठा रहेगा? तेरे बाप से तो कुछ होने वाला है नहीं.. अब क्या इन महारानी को घर में ही बिठा के रखना है? पास-पड़ोस में कहीं नज़र लड़ गई, तो गई घर की बची-खुची मान-मर्यादा भी" संकेत पुत्री की तरफ था, जो शीशे के सामने खुद में खोई हुई थी. मिसिर जी अभी अभी बाज़ार से आए थे, बातचीत सुनकर चुपचाप बिना बताए अपने कमरे की तरफ बढ़ चले. कुरता निकाल कर खूंटी पे टांगने ही वाले थे कि पुत्र की आवाज़ कानों से टकराई, "नौकरी पेड़ पे नहीं लगती. पैसा है नहीं रिश्वत देने को, सिफारिश की तो उम्मीद ही मत करो. अब तो एक ही आस है, पंडितजी साठ से पहले पहले निकल लें और नौकरी मुझे मिले. उनके जीते जी तो ये होने से रहा." मिसिरजी के कानों में जैसे किसी ने पिघलता लोहा डाल दिया हो, उनके धैर्य की ये चरम सीमा थी. पुत्र के इस वक्तव्य पे उन्हें दुःख से अधिक अफ़सोस था," आखिर किस उम्मीद पर अभी तक वो जीवन-संघर्ष में लीन रहे? जीवन में और बचा ही क्या था जो उन्हें आगे जीने के लिए मज़बूर करे?" विचारों की आंधियों के साथ स-थ आज वो सब व्यंग्य, सब ताने एक साथ मिसिर जी को चोट पहुंचा रहे थे, जो उन्हें जीवनपर्यन्त अपनों से मिलते रहे. अंततः उनका धैर्य, उनका संयम हार गया. टूट गई वो दीवार जिसके सहारे मिसिर जी आज तक कठोर जीवन सहजता से जीते रहे, उनके लिए जीवन का अब कोई ख़ास महत्व नहीं रह गया था, मगर परिवार को सबक सिखाना भी ज़रूरी था.
छल-कपट-क्रोध जैसी मानवीय बुराईयों से आजीवन दूर रहने वाले मिसिर जी के मन में अंततः प्रतिशोध की भावना ने जन्म ले ही लिया. जहां एक स्वाभाविक मृत्यु सब कुछ ठीक कर सकती थी, उनकी अस्वाभाविक मृत्यु साधन बन सकती थी, पूरे परिवार के लिए दंड का.मिसिर जी के लिए अब अब केवल एक ही मार्ग शेष था. आत्महत्या. और फिर उनका यह विश्वास कि मृत्यु पश्चात का जीवन इस जीवन में घुट घुटकर जीने से अच्छा ही होगा, उनके आत्महत्या के निर्णय को और सम्बल दे गया. वेदों में लिखा है, "आत्मा अमर है, आत्मा मृत्यु के बाद किसी और शरीर का वरण करती है." एक नया शरीर, एक नया जीवन कितना रोमांचक, कितना सुखद होगा सब. परन्तु, इतना आसान भी नहीं है. ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध जाकर स्वयं-निर्णीत कार्य की सिद्धि? कठिन है पर प्रयास करना ही हमारा धर्म है. "हां, बोलिए" सेल्समैन की आवाज़ सुनकर मिसिर जी की तन्द्रा टूटी. विचारों में उलझे कब वो मेडिकल स्टोर तक आ पहुंचे, पता ही नहीं चला. "जी. जी वो" उनकी झिझक को समझे बिना ही युवा सेल्समैन ने कंडोम का एक पैकेट उनके सामने धर दिया, स्टोर पर बैठा मालिक चिल्ला पड़ा, "अरे, आदमी देखकर दे. उन्हें इसकी नहीं, इसकी जरूरत है." संकेत वियाग्रा की गोलियों की तरफ था. मिसिर जी झुंझला उठे, "मुझे ज़हर चाहिए ज़हर, मिलेगा?" स्टोर-मालिक झेंपते हुए बोला, "साहब को नींद की गोली दे, छोटू" मिसिर जी पूरी शीशी लेकर चल दिए. आज का दिन मिसिर जी का धरती पे आखिरी दिन था, और आज की रात उनके दुखो की आखिरी रात. "ऑफिस जाऊं या नहीं ? छुट्टी मार लेता हूं, कौन सा कल डांट सुननी पड़ेगी?. आराम से पूरा शहर घूमूंगा, कराचीवाले के यहां हलवा खाए बड़े दिन हुए. सिनेमा भी देख लेता हूं, बचपन में भाग के 'मेरे मेहबूब' देखी थी. तब से... " पचास-बावन साल के जीवन की दबी इच्छाएं पुनः जन्म लेने लगी थीं. इतना सब कुछ और सिर्फ एक दिन? खैर, सूर्यास्त के बाद अपने कमरे तक सीमित पाए जाने वाले मिसिर जी आज साढ़े नौ बजे रात में पार्क में चने-चुरमुरे खा रहे थे. शायद ही किसी को इस बात पे विश्वास हो. घर पर ऑटो से उतरते ही पत्नी-बच्चे एक साथ उन पर पिल पड़े, प्रश्नों की जैसे झड़ी लग गई, "यह कोई वक़्त है घर आने का? सब्जी मंगाई थी, कहां है? खाना क्या आधी रात को बनाऊंगी?" "मैं खाना खा के आया हूं." मिसिर जी का उत्तर सुन सब अवाक रह गए .और मिसिर जी हलके से मुस्कुरा कर अपने कमरे में घुस गए, दरवाजा बंद किया. स्नान किया, शाम की आरती की. फिर सारी गोलियां ली और एक बार में ही पानी के साथ गटक लीं, सोचा इहलीला खत्म हुई ही समझो. पर जब दस-एक मिनट तक कुछ नहीं हुआ तो चुपचाप खाट पर लेट गए. मृत्यु का इंतज़ार करते करते कब आंख लग गई, पता ही नहीं चला.
रात को अचानक मिसिर जी के पेट में भयंकर दर्द उठा. दर्द के बीचोंबीच मिसिर जी की प्रसन्नता भी साफ़ झलक रही थी. बस थोड़ा सा दर्द और, फिर मुक्ति सारे दुखों से, सारे दर्द से. अचानक जैसे मिसिर जी के कंठ से प्राण निकलने ही वाले हों, एक तीव्र तूफ़ान अंदर हिलोरें ले रहा था. और फिर अगले ही पल, सब कुछ शांत. कमरे में नीरवता फैल गई, परन्तु सांसों का शोर अभी भी जारी है. और मिसिर जी? मिसिर जी एक जबरदस्त उलटी के बाद काफी अच्छा महसूस कर रहे हैं.पूरे एक हफ्ते बीत चुके हैं, मिसिर जी के आत्महत्या के विचार को मगर कार्यान्वयन अभी भी शेष है. पांच-छह असफल प्रयासों के बावजूद मिसिर जी का निर्णय अटल है, निश्चित है. अब उन्हें किसी सटीक, शत-प्रतिशत सफल युक्ति का प्रयोग करना होगा. परन्तु क्या? कैसे? इसी उधेड़बुन में मिसिर जी की आंखें बोझिल होती चली गईं और वो घोर निद्रा में लीन हो गए. मृत्युलोक से मुक्ति और परलोक गमन की उत्सुकता उन्हें स्वप्न-लोक की ओर ले चली. मिसिर जी का देहांत हो चुका है. यमदूत उनकी तरफ बढ़ रहे हैं. उन्हें रथ पे बिठाया जा रहा है, रथ अपने गंतव्य की ओर प्रस्थान कर रहा है, भूलोक पर पत्नी दहाड़ें मार रही है. रिश्तेदार-मित्र उनके पुत्र-पुत्री को उनके महान व्यक्तित्व की विशेषताएं स्मरण करा रहे हैं. रथ स्वर्ग के मुख्यद्धार पर पहुंच चुका है. चित्रगुप्त अपने बही-खाते के साथ प्रस्तुत हैं, हिसाब बराबर हो प्रवेश तभी मिलेगा. पर देर क्यों हो रही है? शायद कुछ गड़बड़ है. "नहीं, इस मानव को प्रवेश नहीं मिल सकता. मृत्युलोक पर इसकी कार्यावधि अभी सम्पूर्ण नहीं हुई है." चित्रगुप्त अटल थे. यमदूत खीजकर मिसिर जी को वापस ले जा रहे हैं. मिसिर जी बिलख पड़े, "नहीं, नहीं. मुझे उस नरक में पुनः मत भेजिए, मैं यहीं प्रवेश-द्धार पर अपनी बारी की प्रतीक्षा कर लूंगा". अचानक उनकी आंख खुल गयी, वो ज़मीन पर लेटे हुए हैं, एक सफ़ेद चादर सी ओढ़ रखी है. पत्नी ज़ोर ज़ोर से रो रही है, किसी अनजान आशंका से मिसिर जी उठ खड़े होते हैं. पीछे मुड़ कर देखते हैं, भयभीत हो जाते हैं. उनका निष्प्राण शरीर पृथ्वी पर ही पड़ा है, कुछ सज्जन पुत्र-पुत्री को सांत्वना दे रहे हैं तो कुछ सन्नारियां पत्नी को धैर्य धारण करने की सलाह कुछ क्षण असमंजस में रहने के बाद मिसिर जी को वास्तविकता का भान होता है, अंततः उन्ही मुक्ति मिल ही गई. "मिसिर जी गुजर गए" "मिसिर जी ईश्वर को प्यारे हो गए" " मिस्टर मिश्रा इज़ नो मोर" जैसे वाक्य आज उनके लिए हर्ष का कारण बन रहे थे. ऐसे में अगर कुछ उन्हें चुभ रहा था तो वो थी दूसरों के मुंह से अपनी प्रशंसा, पत्नी-पुत्र ने तो उन्हें 'ईश्वर का दूसरा रूप' ही बता दिया. सब कुछ वैसा ही हो रहा था जैसा मिसिर जी ने सोच रखा था, पर अभी तक वो नहीं हुआ जिसकी प्रतीक्षा उन्हें सबसे अधिक थी. उनकी तथा-कथित मृत्यु को करीब एक घंटे बीत चुके थे, परन्तु अभी तक रथ तो क्या, यमदूतों तक के दर्शन नहीं हुए थे. मिसिर जी को लगा संभवतः वो स्वर्णिम क्षण अंतिम संस्कार के बाद ही आता हो, सो वो निष्काम भाव से अपनी ही अंतिम यात्रा में शामिल होकर उस घड़ी की प्रतीक्षा करने लगे. विद्युत शवदाह-गृह में स्वयं के शरीर को भस्मीभूत होते देखे हुए मिसिर जी को घंटों बीत चुके थे, मगर संशय की स्थिति यथावत बनी हुई है. "आखिर यमदूत क्यों नहीं आये? क्या किसी अन्य संस्कार, किन्ही अन्य दायित्वों की पूर्ति अभी बाकी है? कहीं यमदूत उनकी प्रतीक्षा घर पर तो नहीं कर रहे?" यही सब सोच कर वो घर की तरफ निकल पड़े. बस-स्टॉप पे खड़े सोच ही रहे थे कि अच्छा है उन्हें कोई देख नहीं पा रहा, इतने में अचानक एक व्यक्ति उनके पास आकर बोले, " महोदय, समय क्या हुआ है?" मिसिर जी चौंक पड़े, " तो क्या आप मुझे देख सकते हैं?" "क्यों? आप मुझे नहीं देख पा रहे? "तो क्या मैं जीवित हूं?" मिसिर जी ने अगला प्रश्न किया."
जी, बिलकुल नहीं. आप मृत हैं. मैं मृत हूं, और आप जिन्हे भी देख पा रहे हैं उनमें से अधिकांश मृत हैं. कुछ तन से, कुछ मन से. बस्स, आप उनमें अंतर नहीं कर सकते". "आपकी भी मृत्यु अभी अभी हुई है?" मिसिर जी की उत्सुकता बढ़ती ही जा रही थी. "तन से या मन से? मन से तो अभी भी जीवित हूं, हां शरीर से मुक्त हुए एक साल चार महीने आठ दिन बीत चुके हैं. गणना पूर्णतः सत्य नहीं है पर अवधि इससे अधिक ही होगी, कम नहीं." "तो क्या कोई यमदूत नहीं आया, आपको लेने?""अभी तक तो नहीं, हां कभी कभी उड़ती-उड़ती खबर सुनाई पड़ती है. कहीं कोई आया था, पता नहीं कितनी सच्चाई होती है इन ख़बरों में?". "आप वेदों-पुराणों की मान्यताओं-धारणाओं पे प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं?" "महाशय, समय तेज़ी से बदल रहा है. क्या पता, ईश्वर की कार्यप्रणाली भी किसी तीव्र परिवर्तन का शिकार हो गयी हो? खैर, जीवित रहे तो. मेरा मतलब है मृत रहे तो फिर मिलेंगे. मेरी बस आ गयी, कम से कम छुट्टे पैसों और भीड़-भाड़ की चिंता तो अब नहीं रहती" .बस जा चुकी है, साथ ही वो व्यक्ति भी. मिसिर जी बस-स्टॉप पर जड़वत खड़े रहे. मन में हज़ारों सवाल कुलबुला रहे थे. विचारों के झंझावात उनके दिमाग को झकझोरने में लगे हुए थे, अचानक उनके कानों में किसी गीत के बोल सुनाई पड़े, शायद कोई युवक अपना रेडियो सुन रहा था, "मर जाएंगे, मिट जायेंगे. मर के भी चैन न मिला तो जाएंगे यारों कहां?". एक ही पल में मिसिर जी को जैसे सारी स्थिति समझ में आ गई, उन्होंने दौड़ कर बस पकड़ ली. सूर्यास्त होने को है, घर पहुंच कर संध्या-वंदन भी करना है.
तीन महीने इक्कीस दिन बाद, मिसिर जी मृत्यु-पश्चात अपना जीवन उसी तरह व्यतीत कर रहे हैं, जैसे पूर्व में करते थे. हां, अब उन्हें किसी के कटाक्षों-व्यंग्यों को सहन नहीं करना पड़ता. कभी कभी उनकी मुलाक़ात अन्य मृत व्यक्तियों से भी हो जाती है, कुछ तो उनके मित्रों की श्रेणी में भी आते हैं. सब प्रसन्न हैं, संतुष्ट हैं पर उस स्वर्णिम क्षण की प्रतीक्षा सभी को है, जब यमदूत आएगा और उन्हें ईश्वर के पास ले जाएगा. ऐसे में, कभी कभी किसी यमदूत के दिखाई देने की अफवाह उनके इस विश्वास को और प्रबल बना जाती है. और मिसिर जी? मिसिर जी को एक ही शेर बार बार याद आता है.
"अब तो घबरा के ये कहते हैं के मर जाएंगे और मर के भी गर चैन न मिला तो किधर जाएंगे."
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