ये वो जूलियट थी, जो गुंडे-मवालियों के साथ रहती थी
एक कहानी रोज़ में आज पढ़िए गौरव आसरी की कहानी 'एक थी जूलियट'
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फोटो - thelallantop
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आज आप गौरव आसरी से मिलें. रहने वाले हरियाणा के एक कस्बे कैथल के. पढ़ाई पहले चंडीगढ़ और फिर दिल्ली में. यहीं पत्रकार बनने के सबक सीखे. मगर बन गए आरजे. और जब आवाज की दुनिया से देह छुड़ाई तो पहुंच गए रील की दुनिया में. पुणे के एफटीआईआई से स्क्रीनप्ले राइटिंग सीखी. और उसके बाद गंगा पहुंची सागर में. तो गौरव मुंबई में हैं. फिलवक्त टीवी इंडस्ट्री से जुड़े हैं. भगवान राम की जिंदगी पर ट्रैवल शो बना रहे हैं. हर उस जगह जा रहे हैं जहां राम गए थे वनवास और लंका विजय के दौरान. गौरव इसे लिख भी रहे हैं और डायरेक्ट भी कर रहे हैं. जल्द ही इस अनुभव पर भी आपको कुछ पढ़वाएंगे. फिलहाल के लिए ये कहानी. एक थी जूलियट.
सुमन की एक दोस्त थी. प्रिया. सांवला रंग. नॉर्मल कद. दिखने में साधारण. ऐसी कि कोई लड़का उसे देखे, तो उसकी ओर आकर्षित न हो. धारणा यही है कि आमतौर पर ऐसी लड़कियां हीन भावना का शिकार होती हैं. लेकिन प्रिया के साथ ऐसा कुछ नहीं था. वो दुनिया को अपने ठेंगे पर रखती थी. ऐसा भी नहीं है कि वो सिर्फ़ दिखने में 19 थी और बाकी हर चीज़ में 21. सच ये है कि वो हर काम में 19 ही थी. खेलकूद में साधारण. पढ़ाई में साधारण. नौवीं क्लास में फेल भी हो गई थी. लेकिन उसे कोई अफसोस नहीं था, अपने फेल होने का. सबसे गज़ब था, उसका कॉन्फिडेंस. वो अपने सामने किसी को कुछ नहीं समझती थी. घर में उसके मां-बाप और दो भाई भी थे. एक भाई बड़ा और एक छोटा. लेकिन घर में उसकी ही चलती थी. हर मामले में उसकी बात मानी जाती थी. उसके शब्द अंतिम फैसला होते थे. दोस्तों के बीच भी उसका यही रुतबा था. उसे इसी रुतबे-रुआब के साथ रहना अच्छा लगता था. सुमन अक्सर सोचती थी कि कभी तो यह लड़की, किसी कमज़ोर पल में, अपने दर्द भी बांटेगी. कहेगी कि वो कभी दुःखी भी होती है. अकेलापन भी महसूस करती है. लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ. प्रिया इन सब बातों को अपनी जूती पर रखती थी. उल्टा, जब भी मिलती थी, अपने नए कपड़े दिखाती. अपना मेक-अप का कुछ नया सामान दिखाती. सुमन से पूछती कि कैसी लग रही हूं. सुमन तारीफ़ कर देती. हर किसी से तारीफ़ बटोरना प्रिया को अच्छा लगता था. कॉलेज शुरू हुआ तो नईं दोस्त बनी. दोस्तों के बॉयफ्रेंड्स भी थे. जो लड़की बहुत सुन्दर होती, उसके 3–4 बॉयफ्रेंड्स भी होते. लेकिन प्रिया के किसी अफेयर के बारे कभी कुछ सुनने में नहीं आया.' सुमन कभी-कभी प्रिया के घर चली जाती थी. प्रिया के पिताजी सुमन को बहुत अच्छी लड़की मानते थे. अकसर उससे बात करते थे. उनकी बातों से पता चलता था कि उन्हें इस बात का मलाल है कि उनके अपने बच्चे पढ़ाई में कुछ बहुत ख़ास नहीं कर पाए. सुमन अपने लिए कमरा किराए पर ढूंढ़ रही थी. प्रिया ने उसकी मदद की और अपनी जान पहचान के एक अंकल के घर में, कमरा किराए पर दिलवा दिया. इसी दौरान प्रिया के अन्दर कुछ छोटे-छोटे बदलाव नज़र आने लगे थे. एक दिन प्रिया एक नाटक देख कर आई. रोमियो-जूलियट. उसे बहुत अच्छा लगा था. देर तक उस नाटक के बारे में बात करती रही. उसकी बातों से लग रहा था कि वो भी किसी की जूलियट बनना चाहती थी. वो चाहती थी कि कोई उस से टूटकर प्यार करे... रोमियो की तरह. और वो भी किसी से प्यार करे ... जूलियट की तरह... किसी के लिए मर जाए... फिर पता चला कि प्रिया को उसका रोमियो मिल गया है . और यहीं से प्रॉब्लम शुरु हो गई. प्रॉब्लम यह नहीं थी कि उसका बॉयफ्रेंड बन गया था. बल्कि मुश्किल यह थी कि उसका रोमियो, सुमन का दूर के रिश्ते में चाचा था. सुमन ने भांप लिया कि वो इस रिश्ते के बीच में कहीं फंस सकती है. कहीं ऐसा न हो कि प्रिया उसे सन्देशवाहक की तरह इस्तेमाल करने लगे. उसने प्रिया से दूरी बनाना शुरू कर दिया. प्रिया एक दिन अपने अंकल से मिलने आई. वही अंकल, जो सुमन के मकान मालिक भी थे. प्रिया ने अपने अंकल से रिक्वेस्ट की, कि अपनी कंपनी में एक लड़के को नौकरी दे दो. रिक्वेस्ट मान ली गई. सुमन जान गई थी कि ये लड़का कौन है. वो चुप रही. ये जानते हुए भी कि उसके चुप रहने से कुछ होगा नहीं, ये बात बाहर आ ही जाएगी. सुमन सही थी. एक दिन अंकल ने प्रिया को उसी लड़के के साथ घूमते हुए देख लिया. सारा मामला समझ में आ गया. अंकल घर आए और आकर अपनी घरवाली को बताया. अब तो ये बात इश्यू बन गई थी. आंटी को लगा कि प्रिया की मम्मी को सब कुछ बता देना उनकी सामाजिक ज़िम्मेदारी है. आंटी जिस डेयरी में दूध लेने जाती थी, वहीं प्रिया की मम्मी भी आती थी. उस दिन आंटी सोचकर गईं कि शाम को मिलेंगी तो बता देंगी. लेकिन शाम को जब मिलीं, तो प्रिया की मम्मी पहले ही कुछ परेशान लग रही थी. आंटी ने पूछा तो बताया. “ये मिसेज गुप्ता अपने आप को समझती क्या हैं? ख़ुद की बेटी संभाली नहीं जाती और मुझसे कहती हैं कि मैं अपनी बेटी का ध्यान रखूं” आंटी ने चुपचाप अपना दूध लिया और वापस आ गई. प्रिया, सुमन के रूम पर कभी-कभी आ जाती थी. अपने बॉयफ्रेंड की बातें करती. सुमन और उसकी रूममेट अक्सर उसे अवॉइड करने लगी. लेकिन प्रिया फिर भी आ जाती थी. फिर सुमन को महसूस होने लगा कि उसके रुपए गायब हो रहे हैं. कुछ दिन बाद कंफर्म भी हो गया. अब प्रिया घर आती थी तो सुमन और उसकी रूममेट्स अपने रुपए संभालकर रख लेती थीं. प्रिया ने धीरे-धीरे आना बंद कर दिया. एक दफ़ा जब सुमन ट्रेन से दिल्ली जा रही थी, तो उसने स्टेशन पर प्रिया और उसके बॉयफ्रेंड को देखा. शायद प्रिया बॉयफ्रेंड को छोड़ने आई थी, स्टेशन पर. सुमन ने उन्हें नज़रअन्दाज़ किया और ट्रेन में बैठ गई. लेकिन इत्तेफ़ाक की बात, बॉयफ्रेंड की सीट सुमन के सामने ही थी. कुछ देर बाद वो भी आकर बैठ गया. दोनों ने एक दूसरे को पहचान लिया था. सुमन बात करना नहीं चाहती थी लेकिन लड़के ने बात शुरू कर दी. “कहां जा रही हो?” “दिल्ली” “मुझे पहचानती हो?” “हां, तुम मेरे चाचा लगते हो” लड़के ने उम्मीद नहीं की थी कि सुमन उसे पहचानती होगी. क्योंकि उन दोनों का रिश्ता बहुत दूर का था और उन्होंने शायद ही कभी बात की होगी. लेकिन उस दिन बातें होने लगीं तो लम्बी चल निकलीं. दिल्ली के 6 घंटे के सफ़र में सुमन को कहानी का एक और पहलू नज़र आया. उसे नज़र आया कि लड़का प्रिया से प्यार करता ही नहीं था. लड़के ने टाइमपास के लिए प्रिया को गर्लफ्रेंड बनाया था, लेकिन प्रिया के कॉन्टैक्ट्स बहुत अच्छे हैं. उसने लड़के को नौकरी दिलवा दी. रहने के लिए कम किराए पर कमरा दिलवा दिया. जब-तब पैसे भी देती थी और मंहगे गिफ़्टस भी. अब प्रिया से प्यार करना लड़के की मजबूरी हो गई थी. या कह लीजिए, लालच. प्रिया लड़के के साथ शारीरिक संबंध भी बना चुकी थी. लड़के ने सुमन को यहां तक कहा कि “तुम अच्छी लड़की हो, प्रिया जैसी मत बनना” शायद आप सोचें कि सिर्फ़ 6 घंटे के सफ़र में कोई इस तरह की बातें कैसे बोल सकता है. तो साहेबान, फिल्मी दुनिया से बाहर निकल कर देखिए. यह जिंदगी है इसमें बहुत सी ऐसी बातें होती हैं जिनका कोई जवाब नहीं होता. बहरहाल... सुमन इस रिश्ते का भविष्य देख चुकी थी. प्रिया से मिलना वह ऐसे ही बंद कर चुकी थी. लेकिन बहुत दिनों बाद फिर एक बार प्रिया उसे मिल गई और फिर से उसी तरह अपने बॉयफ्रेंड की बातें बताने लगी. सुमन ने ख़ुद को बहुत रोका लेकिन उससे रहा नहीं गया. उसने कुछ घुमा फिरा कर प्रिया से कह ही दिया कि तू ग़लत लड़के से प्यार कर रही है. ये रिश्ता लंबा नहीं चलेगा. प्रिया को गुस्सा आ गया. अपने प्यार के बारे में एक शब्द उल्टा सीधा सुनना उसे गवारा नहीं था. प्रिया उठकर चली गई. सुमन को उस पर बहुत दया आ रही थी. क्योंकि जिस शिद्दत से प्रिया प्यार कर रही थी, उसे देख कर सुमन को अंदाजा हो चला था कि प्रिया पर क्या गुज़रने वाली है. फिर वो कई दिनों तक सुमन को नहीं दिखी. कहीं से पता चला कि प्रिया के पिताजी ने उसकी नौकरी लगवा दी है और वो किसी कंपनी में बहुत अच्छी तनख़्वाह पर काम कर रही है. सैलेरी अच्छी थी तो बॉयफ्रेंड पर ख़ूब खर्च भी कर रही थी. बॉयफ्रेंड भी बहुत प्यार जता रहा था. प्रिया ने फैसला कर लिया था कि शादी उसी लड़के से करेगी. अब प्रिया उसे बॉयफ्रेंड नहीं, पति मानती थी. लड़के की नौकरी दिल्ली में लग गई. प्रिया तो उसे अपना सब कुछ मान ही चुकी थी तो उससे अकेले रहा नहीं गया. अगर शादी इसी लड़के से करनी है तो कल क्या और परसों क्या... आज ही क्यों नहीं. प्रिया ने समान उठाया और लड़के के पास आ गई. अब कहानी घूम गई. लड़के को इसकी उम्मीद नहीं थी. वो डर गया. लड़के के घर वाले भी डर गए. वो अनुसूचित जाति का था और प्रिया पंडित. मज़ेदार बात ये है कि प्यार करते हुए जाति नहीं देखी. अब आकर जातियां याद आ रही थीं. लड़के के घर वाले डर रहे थे कि प्रिया के घर वाले कहीं लड़की को बहला-फुसला कर ले जाने या अगवा करने का केस न कर दें. कर भी दिया. पुलिस आई और प्रिया और लड़के को पकड़ कर थाने ले गई. प्रिया तो निडर थी. उसने कह दिया “मर्ज़ी से गई हूं और अब उसी के साथ रहूंगी”. लेकिन लड़के ने कहा, “मैं इस लड़की से शादी नहीं करना चाहता, ये ख़ुद ब ख़ुद मेरे पास आई थी, मैने इसे नहीं बुलाया था. ले जाइए इसे वापस.” प्रिया लड़के को देखती रह गई. जैसे किसी ने बीच बाज़ार उसे नंगा कर दिया हो. कुछ बोल भी नहीं पाई. बोलना तो दूर की बात, कुछ सोच भी नहीं पाई. घर वाले उसे वापस ले गए. चली गई. बंद हो गई एक कमरे में. रोती रही. देर तक. बस रोती रही. फिर चुप हो गई. नॉर्मल हो गई. कम से कम बाहर से तो नॉर्मल ही दिख रही थी. उसने कभी अपने घरवालों से माफ़ी नहीं मांगी. कभी नहीं कहा कि घर की इज़्ज़त सड़कों पर आ गई और लोग बात बना रहे हैं, मुझसे ग़लती हो गई, मैं शर्मिंदा हूं, वगैरा-वगैरा. वो थी भी नहीं. वो बस चुप थी. कोई नहीं जानता था कि उसके अंदर क्या चल रहा था. हर कोई बस डर रहा था. क्योंकि उसका नॉर्मल होना, नॉर्मल नहीं था. सब का डर सही निकला. कुछ महीने बाद वो फिर से घर छोड़कर चली गई. इस बार वो कुछ गुण्डेनुमा लड़कों के साथ जाकर रहने लगी. किसी को नहीं पता कि वो कैसे उन गुंडों को जानती थी. वहां से उसने अपने पिता को फोन किया, “मुझे किसी से बदला लेना है. मैं वापस नहीं आऊंगी. मुझे ढूंढने की कोशिश मत कीजिएगा, नहीं तो अच्छा नहीं होगा.” जिस तरह प्रिया ने बोला, पिता सच में डर गए. उन्होने प्रिया को ढूंढने की कोशिश नहीं की. बिरादरी वालों ने समझाया, ऐसा नहीं होता है. आखिर है तो बेटी. गुंडे मवालियों के साथ रह रही है. हम सब मिलकर वापस लाते हैं. समझाएंगे उसे. ऐसा ही हुआ. बिरादरी वालों ने प्रिया को ढूंढ लिया और वापस ले आए. समझा बुझा दिया गया. लगा कि अब सब ठीक हो जाएगा. लेकिन प्रिया अंदर से टूटी हुई थी. ऐसा लग रहा था कि उसका ख़ुद पर कंट्रोल ही नहीं है. जैसे वो ख़ुद अपने बस से बाहर है. वो कैसे एक नॉर्मल खुशमिजाज़ इंसान की तरह जिए. कैसे एक घर में रहे और सब ठीक होने का नाटक करे, जबकि सब ठीक नहीं था. वो नहीं भूल पा रही थी उस लड़के को. उसके शब्दों को जो उस पुलिस थाने में सबके सामने बोले थे. “मैं इस से शादी नहीं करना चाहता, ये ख़ुद ब ख़ुद मेरे पास आ गई. ले जाइए इसे वापस” कोई फर्क नहीं पड़ता कि वो घर में रहे या कहीं और, उसे बर्बाद होना था, हो चुकी थी. वो डिप्रेशन में थी. और फिर वो बेबस लड़की कुछ महीने बाद एक बार फिर घर से भाग गई. इस बार उसे किसी ने ढूंढने की कोशिश नहीं की. जाने दिया. बर्बादी की राह पर. फिर उसके बारे में कभी किसी ने कुछ नहीं सुना. सुमन को भी ख़बर नहीं लगी. वो कहां गई, क्या किया, उस लड़के से बदला लिया या नहीं लिया, कुछ पता नहीं चला. तकरीबन दो साल बाद सुमन एक बार बस से कहीं जा रही थी. उसके पास एक बहुत मोटी औरत बैठी थी. इतनी मोटी कि दुबली-पतली सुमन का बैठना मुश्किल हो गया. लेकिन ये तो सरासर अन्याय था. सुमन ने भी टिकट के पैसे दिए थे और उसे अपने हिस्से की सीट पाने का पूरा हक़ था. इस अन्याय का विरोध करते हुए हुए वो कुछ देर तक सीट पर बैठी रही. उसका सीट में हिस्सा पाने का संघर्ष किसी मज़दूर और फैक्टरी मालिक के संघर्ष जैसा लग रहा था. और आखिरकार वही हुआ जो इस तरह के संघर्ष में हमेशा होता आया है. मज़दूर हार गया. सुमन खड़ी हो गई. ऐसी सीट से तो खड़ा होना बेहतर था. पीछे से आवाज़ आई, यहां आकर बैठ जाओ. पीछे मुड़कर देखा तो एक औरत सीट पर अपने पास बुला रही थी. औरत ने पूरा चेहरा कपड़े से ढंका हुआ था और उसकी गोद में एक बहुत छोटा सा बच्चा था. वो प्रिया थी. सुमन पास जाकर बैठ गई. समझ नहीं आ रहा था क्या बात करे, कैसे करे. प्रिया बहुत ख़राब हालत में दिख रही थी. सूखकर कांटा हो गई थी. रंग बहुत काला हो गया था. आंखें अंदर धंस गईं थी. उसके साथ एक लड़का बैठा था. गोरा रंग था और कद कादी ठीक ठाक थी. लड़का प्रिया का पति था. कुछ देर बाद प्रिया ने ही बात छेड़ी. “सुना है उसने शादी कर ली.” सुमन समझ तो गई थी कि प्रिया किसकी बात कर रही है, लेकिन वो हैरान थी कि पति के सामने अपने एक्स बॉयफ्रेंड की बात कैसे कर सकती है. प्रिया ने सुमन की हैरानी पहचान ली. “इन्हें मेरे बारे में सब कुछ पता है.” प्रिया ने अपने पति की ओर इशारा करके बताया. बस का सफ़र छोटा सा था. टाइम कम था और जिस तरह से प्रिया ने अपने बारे में बताना शुरू किया, ऐसा लग रहा था जैसे बरसों से किसी को ढूंढ रही थी अपने मन की बात बताने को. अपने दर्द बताने को. “ मैं इस रूट से पहले कभी बस में नहीं आई. हमेशा गाड़ी से आई. पहले पापा की गाड़ी से आती थी. फिर इनकी गाड़ी से.” "इनकी गाड़ी" से प्रिया का मतलब था - ट्रक. उसका पति ट्रक ड्राइवर था. पति चुपचाप सब कुछ सुन रहा था. बोला कुछ नहीं. प्रिया बोल रही थी. “ मैं पहली बार बस से आई हूं. डर था, कोई मिल ना जाए. पर शुक्र है तुम मिली.” “घर में किसी से बात होती है?” सुमन ने पूछा. “हां, कभी-कभी मां से” प्रिया की आंखों में आंसू भर आए थे. वो सब कुछ ऐसे बता रही थी जैसे इस थोड़े से वक़्त में सब कुछ बता देना चाहती हो. कहीं बाहर मिलती तो शायद सुमन के गले लग जाती और घंटों रोती. सुमन को याद आया कि कभी इस लड़की के कॉन्फिडेंस की मिसाल दी जाती थी. इसके बारे में सुमन सोचती थी कि क्या कभी ये किसी के भी सामने अपना दर्द कहती होगी? क्या इसे कभी कोई दर्द महसूस भी होता होगा. आज वही प्रिया इस हाल में उसके सामने थी. उसकी गोद में जो बच्चा था, वो सिर्फ़ 7 दिन का था. उसे निमोनिया हो गया था. प्रिया अपने पति के साथ शहर जा रही थी, अपने बच्चे का इलाज करवाने. सरकारी अस्पताल में डिलीवरी हुई थी और जितना पैसा था, डिलीवरी में खर्च हो गया था. डॉक्टर ने डिस्चार्ज कर दिया. अब उनके पास बिल्कुल पैसा नहीं था. यहां तक कि बस स्टैंड पर उतरकर अस्पताल जाने के भी पैसे नहीं थे. “मैं ख़ुद बीमार हूं. दो दिन से कुछ नहीं खाया है मैंने. मेरे स्तनों से दूध भी कैसे आए. बच्चा भी भूखा है. शहर के अस्पताल ले जा रही हूं, शायद मेरे बच्चे की जिंदगी बच जाए” सुमन ने एक नज़र बच्चे को देखा. सिर्फ़ 7 दिन का छोटा सा बच्चा.नन्हे नन्हे हाथ पांव. कपड़े में पोटली की तरह लिपटा हुआ था. छोटी छोटी आंखों से हर चीज़ को हैरानी से देख रहा था. नॉर्मल हालात होते तो शायद सुमन और प्रिया हंसते हुए अनुमान लगा रहे होते कि बाप पर गया है या मां पर. प्यार से सुमन ने उसके चेहरे पर हाथ रखा. उसकी नाक को छुआ. बच्चा सुमन की उंगली चूसने लगा. उंगली से भला दूध कैसे आए? सुमन का दिल भर आया. समझ नहीं आ रहा था क्या बोले... पर्स से एक सेब निकाल कर दे दिया. प्रिया ने ले लिया और रो पड़ी. रोते-रोते उसने सुमन के सामने हाथ जोड़ लिए. सुमन ने पर्स से निकाल कर 500 रुपए दे दिए. उस वक़्त उसके पास उतने ही पैसे थे. सुमन का स्टॉप आ गया. उसने एक बार उस 7 दिन की नन्ही सी जिंदगी की ओर देखा और बस से उतर गई. उसका फोन नंबर प्रिया ने लिया था. बाद में पता चला. सुमन ने उस बच्चे को आखिरी बार देखा था. बस से उतरने के 5 मिनट बाद ही वो बच्चा मर गया था. उसका कोई नाम भी अभी नहीं रखा गया था. फिर उसके बाद जो हुआ बस फोन से ही पता चलता था. दो महीने बाद प्रिया के पति की नौकरी चली गई . वो लोग पति के गांव चले गए. पति के भाई ने घर में जगह देने से इंकार कर दिया. लेकिन बहुत गिड़गिड़ाने के बाद घर के पीछे एक टूटा फूटा कमरा जहां गाय बांधी जाती थी, रहने के लिए दे दिया गया. पति मज़दूरी करने लगा. प्रिया अपने पति से कहती कि बाप से अपना हिस्सा मांगो. पति मांग नहीं पाता. दोनों में लड़ाई होती. प्रिया रोते हुए सुमन को फोन करके सब कुछ बताती. सुमन सुन तो सकती थी लेकिन कुछ कर नहीं सकती थी. ये सिलसिला कुछ वक़्त चला. फिर फोन आने बंद हो गए. लेकिन पिछले साल ख़बर आई, प्रिया ने ख़ुद को आग लगाकर आत्महत्या कर ली है.

