दीपक मशाल युवा कवि-कहानीकार हैं. कुछ बहुत सुंदर और सरोकारी लघुकथाएं प्रकाशित औरचर्चित हो चुकी हैं. फिलहाल कोलंबस, ओहियो में रहते हैं. वहीं से जिला जालौन, उत्तरप्रदेश के अपने गांव की एक शादी को याद कर रहे हैं. यह याद कहानी की शक्ल में है तोआज एक कहानी रोज़ में यही याद... वो क्या है कि एक तो मैं छोटे से कस्बे से हूं और उसपे मेरे यहां पिछले 55-60 सालोंसे फोटोग्राफी का व्यवसाय हो रहा है. इसलिए ऐसा कई बार हुआ कि मुझे ठेठ गांव कीशादियों में शामिल होने का रिस्क उठाना पड़ा. अब एक बात जो मेरी बेहद निजी समझ हैवो ये कि एक कस्बाई व्यक्ति न सिर्फ शहर और गांव के बीच की कड़ी होता है बल्किदोनों संस्कृतियों को अपेक्षाकृत बेहतर तरीके से समझ सकता है. खासकर जब उसके कुछरिश्तेदार गांव में हों और कुछ शहर में. वो एक ऐसे वृक्ष की तरह होता है जिसका तनातो कस्बे में होता है जड़ें गांव में और शाखाएं, पत्ते शहर में. तो है क्या कि मेराननिहाल भी गांव में ही पड़ता है. इसलिए बचपन से ही गांव की शादियां देखने कासौभाग्य मिलता रहा. अभी तक सिर पर गत्ते की चमकीली टोपी पहने. सीने से क्रास आकारमें सफेद साफा बांधे और गले में 1-2 या 5 के नोटों की माला डाले. माथे पर भौहों केकिनारे से लाल सफेद टिकलियां रचवाए, अपने एक हाथ में सींकों में पूड़ी फंसाए औरदूसरे में दोने में कुछ बतासे वगैरह लिए दूल्हों की तस्वीर नहीं भूल पाया हूं. औरअच्छे से याद है कि पहले जब निमंत्रण पत्र छपवाना हर किसी की पहुंच में नहीं था तोनाई कुछ इस तरह लोगों को आमंत्रित कर आता था कि जिसके घर से एक लोग को बुलाना होउसके घर के बाहर एक ईंट और जिसके घर से सपरिवार (चूल या चूल्ह) बुलाना हो उसके घरके बाहर दो ईंटे रख देते थे और शादी वाले घर के सगे लोगों को बुलाने के लिए नाई चूल(चूल्ह का अर्थ ही यह है कि जिसको निमंत्रण पहुंचा है उसके घर आज चूल्हा न जले औरसारा परिवार शादी वाले घर में खाना खावे) का न्योता देने जाता था. खाने की पत्तल कीबात की जाए तो वो देखने में लाल रंग की और खुशबू से ही भूखदेव को निद्रा से जगानेवालीं आलू-टमाटर या कभी मटर की तरी वाली सब्जी, आलू-गोभी बैंगन (भटे-टमाटर) की याकद्दू की वो स्वादिष्ट सब्जियां. बूंदी का रायता. दही-बड़ा, नमकीन (दालमोंठ), पिसीहुई चीनी, रसगुल्ले, बालूशाही, बर्फी के दोने, कुल्हड़ में परोसा गया बर्फ कीसिल्ली से ठंडा किया गया वो पानी और सबसे खास वो गरमागरम पूड़ियां. मुंह में पानी आगया लिखते हुए ही. बन्ने या बन्नी (बुंदेलखंड में प्रचलित शादी के लोकगीत) जब ढोलककी थाप पर गाए जाते थे तो क्या आनंद आता था, ‘‘आहहा आ... क्या कहने.’’ ‘‘महंगाई काजमाना. मेहमान न भुलाना. बन्ना (दूल्हे राजा) याद रखोगे या भूल जाओगे…’’ पंडित जीऔर नाइयों के झगड़े, नखरे. दूल्हे के बाप-चाचा के मनौए. जूता चुराई. कुंवर-कलेऊ(हमारे क्षेत्र में गांव में दोपहर के भोजन को कलेऊ और रात के को ब्यारू कहतेहैं.), बाती-मिलाई में लड़के के अंदाज़. सब एक से बढ़कर एक. अब आगे की बात बतातेहैं कि ऐसे ऐसे हुआ क्या कि एक दिन मैं शाम के वक्त खेल के जैसे ही घर लौटा किकानों में एक फरमान सुनाई दिया, ‘‘आज की शादी में वीडिओग्राफी के लिए जाने वालेदोनों लड़के कहीं अपने रिश्तेदार के यहां शादी में गए हैं इसलिए आज की साई पर मुझेखुद जाना पड़ेगा और मदद के लिए तुम भी चलो साथ में.’’ सुनकर मेरी जैसे जान निकल गई.अगले दिन जरूरी क्लास, कपड़े न धुले होने, जूते न पॉलिश होने जैसे कितने बहानेगिनाए, लेकिन आखिरकार मन मार कर बस में बैठना ही पड़ा उस बारात में जाने के लिए. अबबस में बैठने पर पता चला कि हमारे यहां से करीब 100 किलोमीटर दूर बारात जानी थी एकऐसे गांव में जहां सुनते हैं कि डाकुओं का आना-जाना लगा रहता है और वो गांव मुख्यसड़क से 10-12 किलोमीटर अंदर जाकर था. सुन कर और भी दिमाग भन्ना गया कि पिताश्री नेकहां फंसा दिया. ‘‘बोल कालका माई की जय. शेरावाली मैया की जय. वृंदावन बिहारी लालकी जय… के नारों के साथ बस स्टार्ट हो कर चली और रास्ते में एक-दो जगह रुककर नमकीनऔर बूंदी के नाश्ते के साथ गाते-ऊंघते. बस आखिरकार उस जगह पहुंच जहां से मुख्य सड़कख़त्म और कच्चा रास्ता शुरू होता था. तो अब भईया शुरू हुआ असली खेल-तमाशा. पता नहींदूल्हे-दुल्हिन ने कड़ाही हाथ में लेकर चाटी थी या कड़ाही में बैठ कर ही चाट माराथा कि अचानक ही बारिश शुरू हो गई. ऐसा अंधविश्वास है कि जो प्लेट में सब्जी लेने केबजाए सीधे कड़ाही में से लेकर ही व्यंजन खाते हैं उनकी शादी में बारिश होती है. अबजिस रस्ते से जाना था वो इस तरह था कि दाईं तरफ काफी बड़ी नहर थी और बाईं तरफ खेत,लेकिन खेत करीब एक-डेढ़ मीटर नीचे था और कच्चा रास्ता जो सिर्फ एक ट्रैक्टर निकलनेभर की इज़ाजत देता था और बारिश से वो भी रपटीला हो गया था. ड्राइवर साहब ने समझानेकी कोशिश की, ‘‘देखिये भाई लोग कोई ट्रैक्टर मंगवा लीजिए क्योंकि ऐसे रास्ते पर बसनहीं जा पाएगी. पलटने का खतरा है.” लेकिन बाराती तो एक दिन के नवाब होते हैं सरकार.वो कहां मानने वाले थे ट्रैक्टर जैसे घटिया खेतिहर वाहन में बैठने को! झक मार के बसड्राइवर ने बस को इस तरह उस रास्ते पर उतारा कि बस के पीछे वाले बाएं तरफ अर्थातनहर के उल्टी तरफ या कहें कि खेत की तरफ वाले दो पहियों में से एक हवा में था औरबाकी सब उस रपटीली-चिकनी कच्ची सड़क पर. तीन-चार किलोमीटर तो वो बस-चालक बेचाराचालाकी से अपने स्किल्स का कामयाबी से यूज करते हुए बस को आगे ढरका ले गया, लेकिनएक जगह वो रपटीली सड़क बेवफाई कर गई और बस खेत की तरफ को करीब 30-35 डिग्री के कोणपर झुक गई, लेकिन पीछे से ‘‘भवानी मैया की जय’’ के नारों के बीच मजबूरन बस ‘वीर तुमबढ़े चलो-धीर तुम बढ़े चलो’ करती हुई आगे बढ़ती रही. पता नहीं कि औरों के क्या हालथे, लेकिन मेरे जरूर अंडे सटक रहे थे क्योंकि मैं खेत वाली साइड में खिड़की पर जोफंसा बैठा था. फंसा इसलिए माई-बाप कि मैं आपको यह बताना भूल गया कि हमारे यहां कीए.सी. (खिड़की में शीशे नाम के तत्व नहीं पाए जाते और बस के चलने पर बस के अंग-अंगमें लगे सारे पेंचों के हिलने से निरंतर एक सुरम्य संगीतमय आर्केस्ट्रा चलता रहताहै.) बसें जो कि दिल्ली में 10-12 साल चल चुकने के बाद हमारी सड़कों पर एकपेंशनयाफ्ता कर्मचारी की तरह अपना बचा हुआ दम-खम आजमाती हैं और उनमें 55-60 सीटोंपर 90 के आस-पास सवारियां बहुत आसानी से फंसाई जाती हैं, दूसरे शब्दों में कहें तोबुढ़ापे में बस को बस नहीं बल्कि पुष्पक विमान समझ लिया जाता है, जिसमें जितने चाहेलोग भर लो या लटका लो जगह कम न पड़ेगी… अब चाहे वो बारात का सफर हो या पिकनिक का याफिर किसी अन्य शहर जाने का. और एक जगह वही हुआ जिसके न होने देने के लिए मैं बराबरहनुमान चालीसा गा-गाकर पवनपुत्र को पटाने की कोशिश कर रहा था, यानी बस एक पवित्रस्थान पर ऐसी लटकी कि जरा से झटके में फिल्मी स्टाइल में स्पिनाती हुई खेत में जागिरती. लेकिन वो तो चालक जी ने बड़ी चालाकी से सबको फटाफट नीचे उतरने को बोला एक-एककरके पहले खेत वाली तरफ की सीटें खाली हुईं फिर नहर की तरफ वालीं. मैं भी अपनेकैमरे का झोला समेटे राम-राम करता नीचे उतर गया. जान बची तो लाखों पाए. उसके बादड्राइवर महोदय ने बड़ी कुशलता मगर कुछ मुश्किल से बस को संभाला और रास्ते पर लाया.लेकिन भाईलोग बारातियों की हिम्मत और बारात-सुख पाने का जज्बा देखिए कि ड्राइवर सेफिर से आगे चलने को कहने लगे. फिर आगे जाने की बात सुनते ही इस बार वो भड़क गया औरहाथ खड़े कर दिए. तभी हल्की बारिश भी चालू हो गई. किसी तरह भींजते-भांजते हम लोगकरीब छह-सात किलोमीटर पैदल चलते उस गांव पहुंचे. पहुंचने पर हाजिर हुआ ‘रूह-अफजा’और जिसे पीने के बाद हम फिर से अनारकली की तरह नृत्य करने को उठ बैठे. गांव मेंबिजली सिर्फ तभी नज़र आती जब बारिश होती और बादल गरजते या फिर जब कोई शादी होती.यहां भी सिर्फ कुछ बल्ब और ट्यूबलाइट जगमगाने के लिए जेनरेटर को मंगाया गया था.धर्मशाला में कुछ देर आराम फरमाने के बाद जब नाश्ते-खाने के वक्त वीडियो कैमरे कीहैलोजन लाइट के लिए जनवासे के जेनरेटर मालिक से कनेक्शन देने के लिए कहा तो वो नखरेदिखाने लगा. किसी तरह दुल्हन के भाई को समझाया कि बिना लाइट के शादी की रिकॉर्डिंगनहीं हो पाएगी, तब जाके कहीं थोड़ी-सी उधार की बिजली नसीब हुई. उसके बाद हमारातहलका डॉट कॉम चालू हुआ कि किसने कितनी कचौड़ी और कितने रसगुल्ले उड़ाए. इस बीच मैंएक सच्चाई से वाकिफ हुआ कि चाहे गांव हो, कस्बा हो या शहर हो चाट के चटोरे हर जगहपाए जाते हैं. सो यहां भी कोई अपवाद न मिला और चाट के लगाए गए छोटे से ठेले पर सबएक दूसरे को ऐसे ठेले जा रहे थे जैसे कि किसी ने कह दिया हो, ‘‘कल क़यामत का दिन हैजितनी चाट खानी हो आज ही खा लो.’’ अब बारात को लगाने का वक्त आया तो पता चला किगांव में घोड़ा-घोड़ी तो थे नहीं, अलबत्ता ट्रैक्टर को ही हंस का रूप दे दिया गया औरबड़ी शान के साथ दूल्हेराजा ‘‘ये देश है वीर जवानों का...’’ के उत्साहवर्धक संगीतके साथ (बैंडबाजे वाले मिल गए थे ये गनीमत रही) वधूपक्ष के घर की तरफ चले. हमेंशूटिंग करने में बहुत मुश्किलें हुईं. एक तो रात में जागने की आदत नहीं थी तो आंखोंमें नींद भरी थी. ऊपर से हर मवाली अपनी बत्तीसी को कैमरे को ड़ेंटोव्हाइट के एड कीतरह पेश कर रहा था. लगता था कि अभी उसी में घुस जाएगा. ऊपर से बाराती बार-बार कैमरेऔर हैलोजन की वायर पर चढ़ जाते और पूरी दम से लगते उसे कुचलने. कभी मन करता कि जोरसे खींच दूं तो अभी एकाध गिरेगा, लेकिन अगर डोरी टूट जाती तो कोई झटका खाता इसलिएमन मसोस कर रह गया. थोड़े से धूम-धड़ाके और सुर-असुरों (शराबी-गैरशराबी) को ढोतीहुई वो बारात लड़की वालों के दरवाजे पर पहुंची जहां लाइट की सिर्फ एक-दो झालर लटकीथीं, दो-चार बल्ब, चार ट्यूब लाइट और चिलकनी वाली झालरें. लेकिन ऐसा कुछ नहीं किवधूपक्ष वाले ऊर्जा का अपव्यय न करने के पक्ष में थे. असल में ये मजबूरी थी क्योंकिबस एक ही जेनरेटर जो था. तिरपाल खिंची हुई थी और चार तख्तों को मिला कर बनाए गए मंचपर दो लाल रंग की महाराजा कुर्सियां सजाई गई थीं, जिसके सामने एक चाय-टेबल परगुलदान भी रख दिया गया. उस समय लोहे की कुर्सियां बहुत चलती थीं जिन पर टेंटहॉउस कानाम बुना रहता था, सो वही सभी बारातियों के लिए लगाई गई थीं. गले में गेंदे की मालाडाल और चंदन का तिलक लगा हर बाराती का स्वागत हुआ तो आप ही बताइए हर कोई अपने कोनवाब क्यों न समझता भला. एक बार फिर शरबत आया केवड़े का. उधर चमकीली पगड़ी पहने,मुंह में पान दबाए और सफेद सफारी सूट में सजे बन्ने को हंस से लड़की के मामा नेउतारा और कइयां में ले के द्वारचार के लिए ले गए. वहीं पर अपने सिरों पर तीन-चारकलश सजाए खड़ीं और ब्याह गीत गा रही महिलाएं थीं. दो-तीन मुच्छड़ दुनालीधारी लोगोंने जब फायरिंग की तो मुझे लगा कि अब कोई दस्यु-सम्राट आ गया. लेकिन पता चला कीदूल्हे के दोस्त महाशय थे और ये बंदूकबाजी बड़ी शान समझी जाती है ब्याह-बारातोंमें. टीका-जयमाल के लिए लड़की भी आ गई अपने हाथों में गेंदे और गुलाब की माला लिए,जिसे देवी-देवताओं के जयकारों के बीच वर-वधु ने एक दूसरे को पहिनाया. अभिनंदन पत्रपढ़ा गया जिसमें सभी रिश्तेदारों के नाम सहेजे गए थे. अब एक बार फिर सब खाने परमक्खियों कि तरह उमड़े, लेकिन गांव में बफे जैसा कुछ नहीं था इसलिए सबको शराफत सेजमीन पर ही आसन लगाना पड़ा. खाना परोसा गया – महकती पत्तलों पर. सब ठीक था, लेकिनमोटी-मोटी पूड़ियों ने जरा-सा मजा खराब कर दिया था. हां मगर बैगन-टमाटर की सब्जीलाजवाब थी. पर मुझे क्या पता था कि ये बैगन-टमाटर कि सब्जी ही अभी मेरे लिए दुश्मनबन जाएगी. (अरे बात को सुबह तक मत ले जाइए. डर्टी माइंड. अभी थोड़ी देर बाद ही कुछहोने वाला है.) खाने-पीने के बाद मंडप – तेल चढ़ाने, पांव-पखारने की रस्म चालू हुई.पीछे से गालियों के स्वर सुनाई दे रहे थे. लड़के के मामा-पापा-चाचा पर जम कर अश्लीलशब्दों का प्रहार हो रहा था. उस समय मुझे ऐसी चीजों से बड़ी नफरत थी. लगता था कि येभी कोई बात होती है भला शादी जैसे मौके पर इतनी गंदी बातें बोली जा रही हैं. अचानकवहां कि कुछ मसखरी लड़कियों और औरतों को क्या सूझा कि उन्होंने मुझे निशाना बनायाऔर एक बाल्टी में बची-खुची बैगन-टमाटर और आलू की सब्जी को एक बाल्टी में लेकर पानीमें घोला और जोर की छपाक की आवाज के साथ मेरे ऊपर फेंक दिया. दो मिनट को मेरी समझमें ही नहीं आया कि यह हुआ क्या. नाक में, आंखों में बैगन (भाटे) के बीज और नमक सेतिलमिलाहट हो रही थी. पर मुझे सबसे ज्यादा तकलीफ थी कि मेरे कपड़ों का सत्यानाश होगया था. जाने वो सब मेरे कपड़ों पर रीझी थीं या मेरे चौखटे पर या भगवान जाने कि महजकोई खुन्नस निकाल रही थीं. सभी मेरी दशा पर हंसे जा रहे थे और वे औरतें और लड़कियांहर दूसरे सेकेंड दांत निपोरे जा रही थीं. बस पापा ने आव देखा न ताव और बोले अब कोईरिकॉर्डिंग नहीं होगी. सब परेशान हो गए कि ठाकुर साब को क्या हो गया? (असल मेंऊंची-पूरी कद-काठी के कारण कई लोग पापा को ठाकुर ही समझते/कहते थे.) पर उन्होंनेसाफ़ कह दिया, ‘‘ये किस तरह की औरतें हैं आपके यहां की! इन्हें जरा भी तमीज नहीं.अगर कोई शार्ट-सर्किट हो जाता. हैलोजन पकड़े जो मेरा बेटा खड़ा है उसको करेंट लगजाता तो उसका कौन जिम्मेवार होता? एक तो काम वाले लड़के न होने पर भी मैं खुदशूटिंग करने आया कि बारात न खराब हो और उसका ये नतीजा मिला?’’ अब यहां पासा उल्टापड़ते देख वे औरतें भी माफी मांगते सामने आईं और लंबे से घूंघट के पीछे से ही क्षमायाचना करने लगीं. मुझे लगा कि बेचारे दूल्हे को भी फील हो रहा होगा कि मेरी शादीमें किसी और के मनौए लिए जा रहे हैं. आखिरकार पिताश्री मान गए पर इस शर्त पर कि अबलाइट पकड़ने के लिए लड़की पक्ष का ही कोई व्यक्ति मदद करेगा क्योंकि मैं बुरी तरहभीग चुका था और शायद बारिश की वजह से कांप भी रहा था. मैं वापस धर्मशाला आकर कपड़ेबदलकर सो गया और बाकी शादी न देख पाया. पर उस समय मुझे उसका कोई मलाल भी न हुआ थाक्योंकि आंखों में नींद जो भरी थी और खुद ही निद्रादेवी की गोद की तरफ भागना चाहरहा था, वो तो भला हो उन महिलाओं का जिन्होंने मुझे बहाना दे दिया. दूसरे दिन सुबहजब आंख खुली तो पिताश्री की आंखें नींद की वजह से लाल थीं. विदाई होने वाली थी.मैंने चाय के साथ वो देहाती क्षेत्रों का टिपिकल जलेबी-पकौड़ियों और हलवे कास्वादिष्ट नाश्ता किया और महिलाओं के रुदन के बीच में से निकलता हुआ ट्रैक्टर मेंजा बैठा क्योंकि बसवाले भाईसाब ने इस बार अंदर आने से साफ इनकार कर दिया था औरमुख्य सड़क तक ट्रैक्टर से ही जाना था, और फिर हिचकोले खाता बस की तरफ चल दिया.वैसे आप लोग अगर कभी ट्रैक्टर की सवारी करेंगे तो मेरी तरह मानने लगेंगे कि शकीराके डांस को ट्रैक्टर सवारी डांस भी कह सकते हैं. ऐसे ही एक बार एक और गांव गया थाजहां धर्मशाला के नाम पर एक खलिहान था और वो गांव बिच्छुओं के लिए कुख्यात था. जबरात में खलिहान में, खुले में खटिया पर सोने को कहा गया तो सारे बाराती भाग कर बसमें चढ़ कर सो गए. अच्छा था कि उस गांव में बस जा सकती थी. और तो और सुबह नहाने केलिए सबको एक पक्के तालाब का रास्ता दिखा गया था. वो तो अच्छा था कि उसमे मैं भी ठेठबाराती बन कर गया था तो जल्दी ही बिना पूरी शादी किए विपक्षी सांसदों की तरह उसशादी-संसद से वापस खिसक लिया था. पर घबराइए नहीं अब और शादी के किस्से सुनाकर आपकोपकाऊंगा नहीं.