अब सुधांश घोष, सानिया तलवार की फूल-पत्ती पर भी आह-वाह करने लगे
एक कहानी रोज़ में आज पढ़िए भगवंत अनमोल की कहानी 'फेसबुक पर हिंदी लेखक'
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फोटो - thelallantop
भगवंत अनमोल कहते हैं, ज़िंदगी कोई अस्पताल के बेड पर पड़े मरीज की तरह नहीं है, जो सीरियस ही रहा जाए. उनके नाम का किस्सा सुनिए, जन्माष्टमी के रोज़ पैदा हुए घरवालों ने नाम दिया भगवंत. रही सही कसर प्रेमिका ने पूरी कर दी. नाम दे बैठी 'अनमोल' बोली तुम बहुत अनमोल हो. नाम तो दिया खुद छोड़कर चली गई. भगवंत अब तक तीन किताबें लिख चुके हैं. द परफेक्ट लव, एक रिश्ता बेनाम सा, ज़िंदगी 50-50. एक मोटिवेशनल किताब भी लिख चुके हैं. कामयाबी के अनमोल रहस्य. ये कहानी पढ़िए है, नाम है फेसबुक पर हिंदी लेखक.
अगर आप फेसबुक पर है तो हो सकता है. यह कहानी आपको अपनी कहानी लगे, या फिर किसी आपके मित्र की लगे या फिर आप मेरी समझ बैठे. मैं साफ़ कर दूं कि इस कहानी का किसी विशेष व्यक्ति से कोई लेना देना नहीं है. हिंदी के एक सुप्रसिद्ध, चिर परिचित, नामचीन लेखक है 'सुधांशू कुमार घोषला'. पर यह नाम कूल नहीं लगता न? आजकल कूल का ही तो जमाना है. ठीक वैसे ही जैसे योग का नाम योगा हो गया और यह योग जो भारत की प्राचीन संस्कृति का हिस्सा था तथा गुम होता जा रहा था. वह योगा नाम से सभी लोगो के बीच कूल बन गया. वैसे ही सुधांशू थोड़ा बच्चो टाइप का नाम नहीं लगता? ज़रा जोर से पुकारो 'सुधांशू' ऐसा नहीं लगता कि किसी की मम्मी में जोर से चिल्ला रही हो अपने बेटे को, बाजार से हल्दी, धनिया या मिर्च लाने के लिए. ऊपर से कुमार ऐसा लगता है जैसे प्राचीन काल में कोई ऋषि मुनि अपने किसी शिष्य को पुकार रहे हो 'हे कुमार! ' रही सही कसर बॉलीवुड फिल्म 'खोसला का घोसला' ने पूरी कर दी. प्राचीन काल के नाम 'कुमार' को जड़ से हटा फेंका और घोषला की जगह ले ली उसके शार्ट फॉर्म ने. आखिर आजकल शार्ट फॉर्म का ज़माना है. विक्रम बन जाता है विक्की, अनिल बन जाता है अन्नू ठीक वैसे ही घोषला हो गया घोष. अब पूरा नाम हो गया 'सुधांश घोष' अब यह नाम कूल लग रहा है न? उन्हें भी ठीक ऐसा महसूस होने लगा था जैसा नाम है चेतन भगत, जैसा नाम है दुर्जोय दत्ता, जैसा नाम है रस्किन बांड. वे अपने आपको न ही नाम में और न ही काम में उनसे कम समझते थे. अभी हाल ही में उन्होंने एक समाचार पत्र में एक स्टोरी पढ़ी कि सोशल मीडिया के जरिये कई नए लेखको ने प्रसिद्धि के नए नए आयाम तय कर लिए है, जैसे शुभ रंजन, नितिन सचान, सच व्यास, पंकज त्रिवेदी, सुदीप नैय्यर, रहील समर इत्यादि. अब इनके मन में भी यह विचार कौंधा मेरी प्रसिद्धि भी शायद सोशल मीडिया में जाने से दिन दूनी रात चौगुनी गति से बढ़ने लगे. जैसे-तैसे आखिर उन्होंने भी फेसबुक पर अपना अकाउंट बना लिया. प्रोफाइल पिक और कवर सब मेन्टेन करने के बाद एक दिन उन्होंने एक लघु कथा पोस्ट कर ही दी. उसमें दो-तीन लोगो को टैग भी कर दिया. यहीं से आगाज़ हुआ उनके फेसबुक साहित्यिक सफर का. जिससे उन्हें उम्मीद थी कि पॉपुलैरिटी की सारी हदों को पार करके वे सबसे आगे होंगे. आखिर उस पोस्ट में लाइक्स मिलने लगे, कमेंट होने लगे और उनका उत्साह बढ़ने लगा. धीरे-धीरे वे किताबो के बजाय फेसबुक पर ही अपना सर्वश्रेष्ठ लिखने लगे. अब उनका मन दो दिशा में चलने लगा था. वे खाते -पीते, चलते-फिरते, सोते-जागते हुए भी सोचते थे कि अमुक पोस्ट पर किसका लाइक आया होगा. किसने कमेंट किया होगा. किसी आलोचक के कमेंट करने के बाद, यहां तक की खाते समय उनका मन इसी बात पर चलता कि उस आलोचक को रिप्लाई क्या करना है ताकि उसका मुंह बंद हो जाए. मन ही मन सोचते यह काल काल का आलोचक, जिसने मुझे सिर्फ फेसबुक पर पढ़ा है वह मेरे बारे में ऐसी राय कैसे बना सकता है? अब धीरे-धीरे उनकी पूरी दिनचर्या फेसबुक फोबिया से प्रभावित हो गयी थी. सुबह जगकर 'कराग्रे वसते' की जगह फेसबुक ने ले लिया था. इसके बाद वे अपनी खुशियों को बाटने के लिए सभी को जन्म दिन विश करते फिर नहा-धोकर ऑफिस जाने से पहले स्टेटस अपडेट करते. और दिन भर काम करते हुए उसी स्टेटस पर कमेंट का रिप्लाई करते. रात को किताब पढ़ने की जगह भी फेसबुक ने ही ले ली थी. कुल मिलाकर अंतर्मन में एक बड़ी जगह फेसबुक की हो गई थी. जब उनकी बीवी भी फेसबुक देख देख के बोर हो जाती तो वह भी उन्हें खरी-खोटी सुना देती 'सारा दिन फेसबुक ही चलाते रहते हो. किताबें भी पढ़नी बंद कर दी है आपने. आपको फेसबुक फोबिया हो गया है. टीनएजर की तरह चैट करते रहते हो.' इसका जवाब वे अपनी बीवी का मुंह बंद करने के बजाय अपनी तसल्ली के लिए ज्यादा देते थे. 'तुम्हे कुछ पता भी है, फेसबुक में मैं किसी से चैट नहीं करता. मैं सारा दिन पोस्ट पढता रहता हूं. जानती हो फेसबुक पे गिरिराज पंकज, तेज शर्मा, राधिका मोहिनी, अरुणेंद्र जी और भी कई बड़े बड़े लेखक है. वे सारा दिन पोस्ट करते है. उनके पोस्ट पढता रहता हूं. जितना मैं रोज पढ़ लेता हूं, उतना शायद किताबो में कभी न पढ़ पाता.' यह जवाब कभी उनकी बीवी को संतुष्ट नहीं कर पाया पर उन्हें जरूर तसल्ली मिल जाती थी कि वे सही दिशा में है. यह तसल्ली ठीक उसी तरह थी बिल्ली को आता देख अपने आंख बंद कर लेना और कहना. बिल्ली तो आ ही नहीं रही. फेसबुक उनकी दिनचर्या का ऐसा अभिन्न अंग बन चुका था जैसे सोने के लिए नींद, पीने के लिए पानी, सांस लेने के लिए वायु. ठीक वैसे ही हर पांच मिनट में फेसबुक के नोटिफिकेशन देखना उतना ही जरुरी हो गया था. ऑफिस में भी सारा दिन एक तरफ फेसबुक चलता और दूसरी तरफ उनका काम. कभी-कभी उनके दोस्तों को भी नहीं समझ आता था कि घोष साहब फेसबुक में काम करते है या हमारी कंपनी में ? पर पिछले कुछ दिनों से 'सुधांशू कुमार घोषला', अरे माफ़ी चाहूंगा. 'सुधांश घोष' साहब थोड़ा दुखी दुखी रहने लगे थे. उनके पोस्ट पर आने वाली लाइक की संख्या कम होने लगी थी. वे इस विषय को लेकर काफी चिंतिंत रहते थे. तभी उन्हें वह लड़की 'सानिया तलवार' याद आयी, जो पहले दिन फ्रेंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट भेजते ही इनबॉक्स में यह कहते हुए पाई गई थी 'सर, आप बहुत अच्छा लिखते है. आपके पोस्ट से मैं बहुत प्रभावित हूं' यह सुनते ही उस दिन घोष साहब का सीना छप्पन इंच का हो गया था और वह खुद को फेसबुक का सबसे बढ़िया लेखक समझने लगे थे. तभी उन्हें याद आया वह लड़का, जिसने उनके इनबॉक्स में आकर पहले ही दिन काफी तारीफ की थी. 'उसका नाम भी उन्हें याद नहीं आरहा था. आए भी क्यों ? पांच हज़ार की फ्रेंडलिस्ट जो हो गई थी. थोड़ा जोर डाला भौहें सिकोड़ी, माथे पर हाथ रखा और ध्यान भूतकाल में ले गए. जैसे ही इतना किया, नाम याद आ गया. कुछ भी याद करने की यह पोजीशन होती है. सुना है इस पोजीशन में भूली हुई चीज़े बड़ी जल्दी याद आता है. आज भी घोष साहब पर यह पोजीशन कारगर साबित हो गयी. अरे हां 'उमा द्विवेदी ' नाम था उसका. वह भी तो आजकल इनकी पोस्ट पर लाइक नहीं करता . इस पर घोष साहब को याद आया कि उनका सीना छप्पन की बजाये छयानवे हो गया था पर उन्होंने अपनी गदगद होती छाती को किसी तरह रोका था और सामने वाले को ऐसा एहसास ही न होने पाए इसलिए सिर्फ एक स्माइली देकर दफा हो लिए थे . फिर उसी इनबॉक्स में उन्होंने पाया कि शोभित ने कोई पेज बनाया हुआ है. जिसे लाइक करने के लिए उसने लिंक भेजा हुआ है. पर उन्होंने इसे नजरअंदाज कर दिया था. अब उन्हें समझ आया था कि आखिर शोभित ने उनकी तारीफ क्यों की थी? और अब आलोचना क्यों कर रहा है? अब उन्हें फेसबुक का पूरा खेला समझ आ गया था. यहां अच्छा लिखना या बुरा लिखना से कोई मतलब नहीं है, फेसबुक लेन देन की एक बेहतरीन मंडी है. आयात-निर्यात का अच्छा स्कोप है यहां पर. न्यूटन का तीसरा नियम यहां भी पूरी तरह से लागू होता है. जहां आप जितने लोगो के पोस्ट में जाओगे, उतने ही लोग आपके पास आएंगे. वे तुरंत उसके पेज पर गए, लाइक मारा और एक बेहतरीन सा रिव्यू लिखकर छोड़ दिया. फिर तुरंत वे उस लड़की 'सानिया तलवार' के प्रोफाइल में गए, उस लड़की ने अभी फूल पत्ती वाली कविताएं लिखना शुरू ही किया था. उन्होंने एक दो कविताएं पढ़ी पर पसंद नहीं आयी. वे उनमे से किसी पोस्ट को लाइक करने के काबिल नहीं समझ रहे थे पर फिर भी वे उसकी सारी पोस्ट लाइक करके और आह वाह करके चले आये. ये सब वे क्रमशः कर ही रहे थे कि उनके नजर इनबॉक्स में पहुची. जैसे ही उस लेखक ने ऐसा बोला घोष साहब को एक वाकया याद आ गया. ऐसे ही एक और लड़का तो आया था उनके पास, काफी तारीफ की थी. फिर अपनी किताब का लिंक भी दिया था पर उन्होंने यह जवाब दिया था ' आप अपनी किताब भिजवा दीजिये, अगर पसंद आई तो लिखूंगा ' इसके बाद वह लड़का कभी उनके पोस्ट पर दिखाई नहीं दिया. उन्होंने तुरंत अपनी गलती सुधारते हुए इस बार इस ग्राहक को हमेशा हमेशा के लिए पकड़ लिया.' जरूर आप लिंक दीजिये, मैं मंगाता हूं और जल्द ही इस पर लिखूंगा. ' अब घोष साहब के पास फिर से लाइक और कमेंट्स की बहार आने लगी है. यह लाइक की बहार सिर्फ लाइक नहीं थी बल्कि उनके चेहरे की खुशियां थी. वे फिर से लौट आई और उन्हें फिर से ऐसा लगने लगा सुबह-सुबह हाथ देखने से बेहतर है इस मोबाइल स्क्रीन पर फेसबुक के नोटिफिकेशन देखना.
अगर आप फेसबुक पर है तो हो सकता है. यह कहानी आपको अपनी कहानी लगे, या फिर किसी आपके मित्र की लगे या फिर आप मेरी समझ बैठे. मैं साफ़ कर दूं कि इस कहानी का किसी विशेष व्यक्ति से कोई लेना देना नहीं है. हिंदी के एक सुप्रसिद्ध, चिर परिचित, नामचीन लेखक है 'सुधांशू कुमार घोषला'. पर यह नाम कूल नहीं लगता न? आजकल कूल का ही तो जमाना है. ठीक वैसे ही जैसे योग का नाम योगा हो गया और यह योग जो भारत की प्राचीन संस्कृति का हिस्सा था तथा गुम होता जा रहा था. वह योगा नाम से सभी लोगो के बीच कूल बन गया. वैसे ही सुधांशू थोड़ा बच्चो टाइप का नाम नहीं लगता? ज़रा जोर से पुकारो 'सुधांशू' ऐसा नहीं लगता कि किसी की मम्मी में जोर से चिल्ला रही हो अपने बेटे को, बाजार से हल्दी, धनिया या मिर्च लाने के लिए. ऊपर से कुमार ऐसा लगता है जैसे प्राचीन काल में कोई ऋषि मुनि अपने किसी शिष्य को पुकार रहे हो 'हे कुमार! ' रही सही कसर बॉलीवुड फिल्म 'खोसला का घोसला' ने पूरी कर दी. प्राचीन काल के नाम 'कुमार' को जड़ से हटा फेंका और घोषला की जगह ले ली उसके शार्ट फॉर्म ने. आखिर आजकल शार्ट फॉर्म का ज़माना है. विक्रम बन जाता है विक्की, अनिल बन जाता है अन्नू ठीक वैसे ही घोषला हो गया घोष. अब पूरा नाम हो गया 'सुधांश घोष' अब यह नाम कूल लग रहा है न? उन्हें भी ठीक ऐसा महसूस होने लगा था जैसा नाम है चेतन भगत, जैसा नाम है दुर्जोय दत्ता, जैसा नाम है रस्किन बांड. वे अपने आपको न ही नाम में और न ही काम में उनसे कम समझते थे. अभी हाल ही में उन्होंने एक समाचार पत्र में एक स्टोरी पढ़ी कि सोशल मीडिया के जरिये कई नए लेखको ने प्रसिद्धि के नए नए आयाम तय कर लिए है, जैसे शुभ रंजन, नितिन सचान, सच व्यास, पंकज त्रिवेदी, सुदीप नैय्यर, रहील समर इत्यादि. अब इनके मन में भी यह विचार कौंधा मेरी प्रसिद्धि भी शायद सोशल मीडिया में जाने से दिन दूनी रात चौगुनी गति से बढ़ने लगे. जैसे-तैसे आखिर उन्होंने भी फेसबुक पर अपना अकाउंट बना लिया. प्रोफाइल पिक और कवर सब मेन्टेन करने के बाद एक दिन उन्होंने एक लघु कथा पोस्ट कर ही दी. उसमें दो-तीन लोगो को टैग भी कर दिया. यहीं से आगाज़ हुआ उनके फेसबुक साहित्यिक सफर का. जिससे उन्हें उम्मीद थी कि पॉपुलैरिटी की सारी हदों को पार करके वे सबसे आगे होंगे. आखिर उस पोस्ट में लाइक्स मिलने लगे, कमेंट होने लगे और उनका उत्साह बढ़ने लगा. धीरे-धीरे वे किताबो के बजाय फेसबुक पर ही अपना सर्वश्रेष्ठ लिखने लगे. अब उनका मन दो दिशा में चलने लगा था. वे खाते -पीते, चलते-फिरते, सोते-जागते हुए भी सोचते थे कि अमुक पोस्ट पर किसका लाइक आया होगा. किसने कमेंट किया होगा. किसी आलोचक के कमेंट करने के बाद, यहां तक की खाते समय उनका मन इसी बात पर चलता कि उस आलोचक को रिप्लाई क्या करना है ताकि उसका मुंह बंद हो जाए. मन ही मन सोचते यह काल काल का आलोचक, जिसने मुझे सिर्फ फेसबुक पर पढ़ा है वह मेरे बारे में ऐसी राय कैसे बना सकता है? अब धीरे-धीरे उनकी पूरी दिनचर्या फेसबुक फोबिया से प्रभावित हो गयी थी. सुबह जगकर 'कराग्रे वसते' की जगह फेसबुक ने ले लिया था. इसके बाद वे अपनी खुशियों को बाटने के लिए सभी को जन्म दिन विश करते फिर नहा-धोकर ऑफिस जाने से पहले स्टेटस अपडेट करते. और दिन भर काम करते हुए उसी स्टेटस पर कमेंट का रिप्लाई करते. रात को किताब पढ़ने की जगह भी फेसबुक ने ही ले ली थी. कुल मिलाकर अंतर्मन में एक बड़ी जगह फेसबुक की हो गई थी. जब उनकी बीवी भी फेसबुक देख देख के बोर हो जाती तो वह भी उन्हें खरी-खोटी सुना देती 'सारा दिन फेसबुक ही चलाते रहते हो. किताबें भी पढ़नी बंद कर दी है आपने. आपको फेसबुक फोबिया हो गया है. टीनएजर की तरह चैट करते रहते हो.' इसका जवाब वे अपनी बीवी का मुंह बंद करने के बजाय अपनी तसल्ली के लिए ज्यादा देते थे. 'तुम्हे कुछ पता भी है, फेसबुक में मैं किसी से चैट नहीं करता. मैं सारा दिन पोस्ट पढता रहता हूं. जानती हो फेसबुक पे गिरिराज पंकज, तेज शर्मा, राधिका मोहिनी, अरुणेंद्र जी और भी कई बड़े बड़े लेखक है. वे सारा दिन पोस्ट करते है. उनके पोस्ट पढता रहता हूं. जितना मैं रोज पढ़ लेता हूं, उतना शायद किताबो में कभी न पढ़ पाता.' यह जवाब कभी उनकी बीवी को संतुष्ट नहीं कर पाया पर उन्हें जरूर तसल्ली मिल जाती थी कि वे सही दिशा में है. यह तसल्ली ठीक उसी तरह थी बिल्ली को आता देख अपने आंख बंद कर लेना और कहना. बिल्ली तो आ ही नहीं रही. फेसबुक उनकी दिनचर्या का ऐसा अभिन्न अंग बन चुका था जैसे सोने के लिए नींद, पीने के लिए पानी, सांस लेने के लिए वायु. ठीक वैसे ही हर पांच मिनट में फेसबुक के नोटिफिकेशन देखना उतना ही जरुरी हो गया था. ऑफिस में भी सारा दिन एक तरफ फेसबुक चलता और दूसरी तरफ उनका काम. कभी-कभी उनके दोस्तों को भी नहीं समझ आता था कि घोष साहब फेसबुक में काम करते है या हमारी कंपनी में ? पर पिछले कुछ दिनों से 'सुधांशू कुमार घोषला', अरे माफ़ी चाहूंगा. 'सुधांश घोष' साहब थोड़ा दुखी दुखी रहने लगे थे. उनके पोस्ट पर आने वाली लाइक की संख्या कम होने लगी थी. वे इस विषय को लेकर काफी चिंतिंत रहते थे. तभी उन्हें वह लड़की 'सानिया तलवार' याद आयी, जो पहले दिन फ्रेंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट भेजते ही इनबॉक्स में यह कहते हुए पाई गई थी 'सर, आप बहुत अच्छा लिखते है. आपके पोस्ट से मैं बहुत प्रभावित हूं' यह सुनते ही उस दिन घोष साहब का सीना छप्पन इंच का हो गया था और वह खुद को फेसबुक का सबसे बढ़िया लेखक समझने लगे थे. तभी उन्हें याद आया वह लड़का, जिसने उनके इनबॉक्स में आकर पहले ही दिन काफी तारीफ की थी. 'उसका नाम भी उन्हें याद नहीं आरहा था. आए भी क्यों ? पांच हज़ार की फ्रेंडलिस्ट जो हो गई थी. थोड़ा जोर डाला भौहें सिकोड़ी, माथे पर हाथ रखा और ध्यान भूतकाल में ले गए. जैसे ही इतना किया, नाम याद आ गया. कुछ भी याद करने की यह पोजीशन होती है. सुना है इस पोजीशन में भूली हुई चीज़े बड़ी जल्दी याद आता है. आज भी घोष साहब पर यह पोजीशन कारगर साबित हो गयी. अरे हां 'उमा द्विवेदी ' नाम था उसका. वह भी तो आजकल इनकी पोस्ट पर लाइक नहीं करता . इस पर घोष साहब को याद आया कि उनका सीना छप्पन की बजाये छयानवे हो गया था पर उन्होंने अपनी गदगद होती छाती को किसी तरह रोका था और सामने वाले को ऐसा एहसास ही न होने पाए इसलिए सिर्फ एक स्माइली देकर दफा हो लिए थे . फिर उसी इनबॉक्स में उन्होंने पाया कि शोभित ने कोई पेज बनाया हुआ है. जिसे लाइक करने के लिए उसने लिंक भेजा हुआ है. पर उन्होंने इसे नजरअंदाज कर दिया था. अब उन्हें समझ आया था कि आखिर शोभित ने उनकी तारीफ क्यों की थी? और अब आलोचना क्यों कर रहा है? अब उन्हें फेसबुक का पूरा खेला समझ आ गया था. यहां अच्छा लिखना या बुरा लिखना से कोई मतलब नहीं है, फेसबुक लेन देन की एक बेहतरीन मंडी है. आयात-निर्यात का अच्छा स्कोप है यहां पर. न्यूटन का तीसरा नियम यहां भी पूरी तरह से लागू होता है. जहां आप जितने लोगो के पोस्ट में जाओगे, उतने ही लोग आपके पास आएंगे. वे तुरंत उसके पेज पर गए, लाइक मारा और एक बेहतरीन सा रिव्यू लिखकर छोड़ दिया. फिर तुरंत वे उस लड़की 'सानिया तलवार' के प्रोफाइल में गए, उस लड़की ने अभी फूल पत्ती वाली कविताएं लिखना शुरू ही किया था. उन्होंने एक दो कविताएं पढ़ी पर पसंद नहीं आयी. वे उनमे से किसी पोस्ट को लाइक करने के काबिल नहीं समझ रहे थे पर फिर भी वे उसकी सारी पोस्ट लाइक करके और आह वाह करके चले आये. ये सब वे क्रमशः कर ही रहे थे कि उनके नजर इनबॉक्स में पहुची. जैसे ही उस लेखक ने ऐसा बोला घोष साहब को एक वाकया याद आ गया. ऐसे ही एक और लड़का तो आया था उनके पास, काफी तारीफ की थी. फिर अपनी किताब का लिंक भी दिया था पर उन्होंने यह जवाब दिया था ' आप अपनी किताब भिजवा दीजिये, अगर पसंद आई तो लिखूंगा ' इसके बाद वह लड़का कभी उनके पोस्ट पर दिखाई नहीं दिया. उन्होंने तुरंत अपनी गलती सुधारते हुए इस बार इस ग्राहक को हमेशा हमेशा के लिए पकड़ लिया.' जरूर आप लिंक दीजिये, मैं मंगाता हूं और जल्द ही इस पर लिखूंगा. ' अब घोष साहब के पास फिर से लाइक और कमेंट्स की बहार आने लगी है. यह लाइक की बहार सिर्फ लाइक नहीं थी बल्कि उनके चेहरे की खुशियां थी. वे फिर से लौट आई और उन्हें फिर से ऐसा लगने लगा सुबह-सुबह हाथ देखने से बेहतर है इस मोबाइल स्क्रीन पर फेसबुक के नोटिफिकेशन देखना.

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