मार्बल का काम करते करते उसका दिल भी पत्थर का हो गया
एक कहानी रोज़ में आज पढ़िए इरा टाक की कहानी 'रात पहेली'
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ये कहानी है, इरा टाक की, जितना अच्छा लिखती हैं, चित्रकारी भी उतनी ही बेहतर करती हैं. ये लिखकर बताने की जरूरत नहीं थी, ये पेंटिंग सबूत है.
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आज आप इरा को पढ़िए. तीन औरतों सी. एक जो रंग बांचती है. एक जो कविता उकेरती है. और एक, जो लय और रंगों को आवाज के आरोह अवरोह पर बांध कहानी गाती है.
तीनों एक ही हैं. इरा टाक के गोदने संग सामने आती. हाथ पकड़ हुलस के साथ एक जंगल में ले चलतीं. जहां की एक एक पत्ती, पानी, पखेरू, हवा, रौशनी और माटी को उन्होंने रचा है.
आज आप इरा से मिलिए. बदायूं में पली-बढ़ी. फिर पत्रकारिता सीखी. हाल मुकाम जयपुर. और जैसा कि मैंने ऊपर कहा. काम, कविता, कहानियां और तस्वीरें बनाना. और इस दौरान खुद कुछ कुछ बनते जाना.
- सौरभ द्विवेदी
रात पहेली इरा टाक
बहुत मुश्किल था रिया के लिए उस रात खुद को संभाल पाना, दिल में सैकड़ों परतों में जमा दर्द थोड़ी सी ऊष्मा पाते ही पिघलने लगा था , ये लावा बन के कहीं फूट न जाए और वो विशाल के सामने कमज़ोर न पड़ जाए. कितनी उदास रुत थी वो, जब सर्द हवाएं उसके दर्द को और जमा देती थीं और वो ठीक से सांस भी न ले पाती थी. वो अपनी तकलीफें ज़ाहिर नहीं करती थी, पर उन दिनों एक गहरी उदासी उसकी आंखों में डेरा डाल के बैठ गयी थी , इस बार विशाल ने मिलते ही पूछा था. “ सब ठीक तो चल रहा है न ...तुम्हारी लाइफ में ?” “हां सब बढ़िया.” “तो तुम्हारी आंखें इतनी खामोश क्यों हैं ...पता है रिया मैं तुम्हे कम समय से जानता हूं पर समझता बहुत अच्छी तरह हूं ...हमेशा खिला रहने वाला चेहरा आज इतना सपाट क्यों हैं ?”
रिया और विशाल से मुलाकात दो साल पहले करीबी दोस्त की शादी में हुई थी , वहीं से वो दोनों अच्छे दोस्त बन गए, रिया जब भी लखनऊ से दिल्ली आती विशाल से ज़रूर मिलती थी, विशाल दिल्ली में नामी आर्किटेक्ट था, रिया एक आर्टिस्ट थी इसलिए दोनों की बहुत रुचियां मिलती थीं.
रिया रेहान को बेपनाह मुहब्बत करती थी, रेहान लखनऊ में मार्बल के बड़े कारोबारी का एकलौता लड़का था, वैसे वो बहुत शरीफ और मेहनती था पर मुहब्बत में रिया को कोई ख़ास तवज्जो नहीं देता था , रेहान का मन पढ़ पाना रिया के लिए अब तक संभव नहीं हो पाया था. रेहान न उसे छोड़ता था और न ही अपनाता था , तीन साल से अधर में लटका रखा था.
रिया के पापा के अचानक देहांत के बाद घर की सारी ज़िम्मेदारी रिया पर आ गयी , मां और एक छोटी बहन. पापा सरकारी नौकरी में थे तो उनकी जगह सरकारी अनुकम्पा पर रिया की नौकरी लग गयी थी पर वो अपना कलाकार बनने का सपना जिंदा रखना चाहती थी और इसके लिए उसे बहुत जूझना पड़ रहा था ..पूरे दिन की नौकरी के बाद पेंटिंग करने का वक़्त बड़ी मुश्किल से निकल पाता था.
रिया चाहती थी कि इस तकलीफ के दौर में रेहान उसका सहारा बने पर रेहान शादी को लेकर मन नहीं बना पाया था और फिर दोनों के धर्म भी अलग थे. रिया तो बगावत को तैयार थी पर अकेले कैसे ? जिसके लिए बगावत करे जब वो ही तैयार नहीं हो.
इन सब बातों से रिया बेहद परेशान थी, उसका दिल्ली में सोलो शो भी करीब आ रहा था ,ये शो उसका सपना था जो उसने पिता की मृत्यु से पहले प्लान किया था पर अब हालात और उसकी मानसिक स्तिथि उसे कुछ काम करने की इजाजत नहीं दे रहे थे. फिर भी उसने किसी तरह खुद को संभाला और जैसे तैसे करके शो के लिए कुछ और नयी पेंटिंग्स बनाई . ऑफिस से भी बड़ी मुश्किल से नौ दिन की छुट्टियां मिल पाई थीं.
रिया की आर्ट एक्स्हिबिशन मे विशाल ने बहुत सपोर्ट कर रहा था, उद्घाटन वाले दिन तो वो सुबह से ही उसके साथ था . पूरे दिन कलाप्रेमियों और दोस्तों की आवाजाही रिया के थके मन को और थका देती थी , और खुश रहने का दिखावा करना अपने आप में बेहद तकलीफदेह होता है , वो बार बार फ़ोन की स्क्रीन देखती ... शायद रेहान का कोई फ़ोन या मैसेज आया हो. और हर बार निराश होती.
जब पिछली बार उसने अपना मन पक्का कर लिया था रेहान से अलग होने को तो यही रेहान फूट फूट कर रोया था उससे माफ़ी मांगने लगा था ... और फिर वापस वही लापरवाही.
“शायद मार्बल का काम करते करते उसका दिल भी पत्थर का हो गया.” रिया अपने आप से कहतीहर शाम किसी न किसी मित्र का न्योता होता तो शाम आसानी से कट जाती. क्रिसमस के दिन कोई नही आया, उस शाम रिया जल्दी ही अपने होटल लौट आई , कमरे में अकेलापन उसे कचोटने लगा! चाय पीकर उसने रेहान को फ़ोन लगाया. “ कहो कैसा चल रहा है तुम्हारा शो ?” “ रेहान तुमको एक बार भी फुर्सत नहीं मिली परसों से... कि फ़ोन करके मेरा हाल पूछो ? कायदे से तो तुम्हे मेरे साथ होना चाहिए था” रिया ने उसकी बात को अनसुना करते हुए रुखाई से कहा “अरे यार ..बार बार फ़ोन करने से क्या होता है ..मुझे पता है तुम वहां बिजी हो ... तुम कोई बच्ची हो जो मैं तुम्हारी ऊंगली पकड़ के हर जगह साथ जाऊ. अपने काम तो खुद ही करने होते हैं ...काम पर ध्यान दो ..अभी मैं एक मीटिंग के लिए निकल रहा हूं ..फिर बात करते हैं” रिया के जवाब का इंतज़ार किये बिना ही रेहान ने फ़ोन काट दिया. रिया के कान उसके तीखे शब्दों से कसैले हो गए , तकिये में मुंह दबाये वो ज़ोर ज़ोर से रोने लगी. रोते रोते आंख लग गयी , फ़ोन की रिंगटोन से उसकी नीद खुली ..घडी देखी तो आठ बज चुके थे विशाल का कॉल था. “क्या हुआ तुम्हारी आवाज़ को ...तबियत ठीक है न ?” “हां... बस थोडा सर दर्द है” “और दर्द बढ़ाने को मैंने फ़ोन कर दिया ...कहां घूम रही हो सर्दी में ?” विशाल ने हंसते हुए पूछा “कहीं नहीं... रूम में हूं “ “अरे. आज क्रिसमस सेलिब्रेट करने नहीं गयी ? तुम्हारी दोस्त पार्टी देने वाली थी न.” “नहीं ...वो तो गोवा गयी है इस बार.” “ओह अच्छा ...चलो फिर मैं आता हूं ऑफिस से ...साथ मे डिनर करते हैं” “ठीक है” रिया इतना ही बोल पाई उसने उठ कर अपना हुलिया सही किया , रोने से उसके आंखें फूल के कुप्पा हो जाती हैं, तौलिये को फूंक मार गरम कर उसने थोड़ी देर आंखों पर सेक कर नार्मल करने की कोशिश की , फिर काजल लगाया तो रोने के निशान थोड़े कम हो गए थे. लगभग एक घंटे बाद विशाल उसे लेने आ गया. “बोलिए कहां चलना है...पेंटर साहिबा.” “चलो किसी चर्च में चलते हैं” “तबियत कैसी है ...?” “ठीक है ..मैंने दवाई ले ली थी” विशाल ने गाड़ी कैनौट प्लेस की तरफ दौड़ा दी , थोड़ी देर में विशाल की मंगेतर दीपा का फ़ोन आ गया ..वो देर तक उससे स्पीकर पर बातें करता रहा और रिया कार के शीशे से बाहर भागती गाड़ियों को देखती रही, मगर कान उनकी बातों पर ही थे. पता नहीं क्यों आज उसे दीपा से ईर्ष्या महसूस हो रही थी! “बहुत प्यार करते हो उससे ?” विशाल के फ़ोन रखने के बाद रिया ने धीमे से पूछा “अरे नहीं यार ...अब शादी करनी है तो ख्याल तो रखना होगा न. बड़ी प्यारी और सीधी लड़की है ..मुझे बहुत चाहती है ” “ह्म्म्म...” “प्यार तो मैं ....” “क्या..?” “कुछ नहीं” विशाल ने बात अधूरी छोड़ रेडियो चालू कर दिया. रेडियो पर पुराने सदाबाहर गीतों का कार्यक्रम चल रहा था... “ये हवा ये रात ये चांदनी तेरी एक अदा पे निसार हैं...मुझे क्यों न हो तेरी आरजू ...” तलत महमूद की मखमली आवाज़ के साथ विशाल ने अपनी भारी आवाज़ मिलाने की असफल कोशिश की. “बहुत लकी है वो, जो तुम जैसा हस्बैंड मिल रहा है.” थोड़ी देर बाद रिया ने बात आगे बढाई “वाकई ...? अगर मैं इतना अच्छा हूं तो तुमने कभी गौर क्यों नहीं किया ?” विशाल ने गाने की आवाज़ थोड़ी धीमी कर उसकी तरफ देखा “तुमने कभी कहा ही नहीं.” वो थोड़ी नर्वस हो गयी “कैसे कहता ...मैं तुम्हारी “न” नही सुन पाता ...!!! जानता था , तुम्हारी ज़िन्दगी में रेहान है. ” रिया के मन में फिर से कोहराम सा मच गया .. “रेहान के इंतज़ार में उसने तीन साल लगा दिये और आज भी उनके रिश्ते का कोई भविष्य नहीं दिखता.” “ खैर अब तो मैं खुश हूं मेरी शादी तय हो गयी ..लेकिन तुम मिलती तो कोई और बात होती. ” विशाल ने हंसते हुए माहौल को थोडा हल्का करने की कोशिश की . “ मेरी मानो.. अब तुम भी रेहान मियां से शादी कर लो...मैं तो बुक हो चुका हूं. ” “ जैसे मैं शादी को मना कर रही हूं ...! ” रिया ने मन ही मन सोचा लेकिन वो रेहान की बुराई नहीं करना चाहती थी और न ही उसे विशाल की सहानुभूति चाहिए थी. “ हां कर लेंगे अभी पापा को गए एक साल भी नहीं हुआ और घर में भी सब सेटल करना है न. ” “ अरे यार चीज़ें तो उम्र भर सेटल होती रहती हैं... वो साथ होगा तो जिम्मेदारियां भी बंट जाएगी. ” उसके बाद कुछ देर तक कार में चुप्पी धुंध बन कर छा गयी. चर्च आ गया था ..बड़ी मुश्किल से पार्किंग की जगह मिल पाई , पूरी सड़क गाड़ियों से अटी पड़ी थी . कार से उतरते ही मोमबत्ती और माला बेचने वालों ने घेर लिया.. एक बच्ची तो उनके पीछे ही लग गई “ एक ले लो साहब ...जोड़ी बनी रहेगी...केवल ट्वेंटी रुपीस. ” “ मैडम ...आपकी फैमिली को गॉड ब्लेस करेगा. ” विशाल ने पचास रुपये निकाल के माला और मोमबत्ती के दो बंडल खरीद लिए और बाकी दस रुपये बच्ची को रखने का इशारा किया. “ काश रेहान होता और हम दोनों हाथ थामे चर्च जाते ..दुआ करते. ” रिया अपने में ही ख़ोई थी विशाल तेज़ चाल से आगे निकल गया था , थोड़ी आगे जाकर उसने पीछे देखा तो रिया भीड़ में कहीं नज़र नहीं आई ...वो वापस आया ..बड़ी मशक्कत के बाद दोनों मिल पाए . “चलो अब वरना फिर खो जाओगी.” उसने रिया का हाथ थाम लिया .. विशाल ने पहली बार यूं रिया का हाथ थामा था और वो उसके स्पर्श में रेहान को तलाशने लगी थी. नाचते –गाते, मस्ती करते लोगो को देखते हुए रिया का मन कुछ हल्का होने लगा, विशाल के हाथ की ऊष्मा से मायूसी की जमी बूंदें भाप बनने लगी थीं. अब वो जान बूझ कर बार बार विशाल का हाथ थाम लेती. आधा पौन घंटा क्रिसमस कार्निवल में बिता कर वो वापस गाडी में बैठ गए .... फिर एक जगह डिनर करने रुक गए ... क्रिसमस का माहौल था तो रेस्तरां भरा हुआ था , एक कोने में बड़ी मुश्किल से जगह मिल पाई, विशाल अपनी मंगेतर की बातें किये जा रहा था और रिया को अच्छा नहीं लग रहा था. अक्सर दुखी इंसान दूसरे के सुख से और दुखी हो जाता है. “चाहे कुछ पल ही सही पर अभी विशाल मेरा है.” और कुछ देर पहले हुई बातों से उसे पता चल चुका था कि विशाल के मन में उसके लिए कोमल भावनाएं थीं. उसने खुद को विशाल की तरफ खिचता हुआ महसूस किया. खाना टेबल पर आ चुका था, न जाने रिया के मन में क्या आया कि उसने पहला कौर विशाल की तरफ बढ़ा दिया , वो ये देख अचानक चौंक तो गया था, पर उसने मुंह खोल दिया और रिया को भी उसने एक कौर खिलाया. फिर दोनों बगैर एक शब्द बोले एक दूसरे को देखते हुए खाना खाते रहे. वापसी में सारे रास्ते वो सोचती रही कि विशाल को कह दूं . “मैं तैयार हूं तुम्हारे साथ ज़िन्दगी बिताने को ... तुम मुझे बहुत अपने से लगते हो. तुम अपनी इंगेजमेंट तोड़ दो.” वो रोना चाहती थी , चिल्लाना चाहती थी... “मैं अकेली हूं ...बेहद अकेली और टूटी हुई. मुझे भी कोई संभालने वाला चाहिए... मैं थक गयी हूं मजबूत होने का ढोंग करते करते.” विशाल बातें किये जा रहा था पर रिया के कानों तक वो आवाजें नहीं जा रही थीं , वो इसी उधेड़बुन में थी ... कि सब ख़त्म कर एक नयी शुरुआत कर दूं. छोड़ दूं उस पत्थर दिल रेहान को. उसके दिल में एक भरोसा था कि विशाल उसे कभी न नहीं बोलेगा. वो प्रेम की सुरक्षा और ऊष्मा चाहती थी... जिससे उसके अन्दर जमी बर्फ पिघल सके. “हेल्लो मैडम ..कहां खोई हुई हैं ? आपका ठिकाना आ गया.” विशाल ने होटल के पोर्च में कार रोक दी रिया का मन किया कि उसे कह दें.
“मुझे तुम्हारे साथ ही रहना है, सारी रात इस सर्द शहर की सड़कों पर लॉन्ग ड्राइव करते हुए ....”उसने धीरे से पिछली सीट पर पड़ा अपना पर्स उठाया और कार से बाहर निकली... उसका मन विशाल के गले लगने को छटपटा रहा था .. वो अब फैसला करना चाहती थी ... उसने खुद पर बड़ी मुश्किल से नियंत्रण करते हुए विशाल के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए... “बहुत अच्छा लगा तुम्हारे साथ ... आज बहुत कुछ मिल गया और खो भी गया... शायद. शादी में ज़रूर बुलाना...खुश रहो मेरे दोस्त.” कहते हुए रिया की आंखें भर आई और वो होटल की तरफ बढ़ गयी. विशाल देर तक वहां खड़ा रहा ...खाली सा. उसकी आंखे भी गीली थीं.

