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पल्स के 100 करोड़ के बिज़नेस में हमारे इश्क का भी 20 रुपये का योगदान रहा है

एक कहानी रोज़ में आज सुधा शुक्ल की लिखी दो रचनाएं पढ़िए.

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28 नवंबर 2016 (Updated: 28 नवंबर 2016, 03:29 PM IST)
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एक लड़का होता है, एक लड़की होती है. दोनों में प्रेम होता है पर मजबूरियां होती हैं, साथ रहना मुमकिन नहीं होता. लड़की जब भी उसके शहर जाती है, उससे बचना चाहती है. मिलना भी चाहती है, देखना भी चाहती है, पर बचना भी चाहती है. लड़के की भी यही कोशिशें होती हैं. जाने का दिन आता है, बेचैनी बढ़ जाती है, फिर भी दिमाग काबू में है, मिलने पर पाबंदी का व्रत बरकरार है.
पर साला दिल कमीना होता है, फोन कॉल करवा ही देता है, मिलने बुला भी लेता है. बहाना भी रहता है एक, लड़की की किताब रह गई है, लड़का स्टेशन पहुंचा सकता है.
वेन्यू- राजीव चौक मेट्रो स्टेशन. लड़का आता है, लड़की भी अपना सारा लगेज लेकर पहुंचती है. लड़का चुप सा है, पास आकर खड़ा हो जाता है, लड़की नज़रें बचाती है, और भी दोस्त हैं, उनसे बतियाती है. बातें खतम होतीं हैं, दोस्त अपने घरों को निकल जाते हैं. रह जाते हैं लड़का और लड़की. लड़की अब भी नज़रें चुरा रही है.
लड़का : "चलें? ट्रेन का टाइम हो रहा है"लड़की : (धीमी आवाज़ में) "हां" (नज़रें अब तक नीचे हैं).लड़का सूटकेस उठाने लगता है...लड़की : "अरे रहने दो, मैं उठा लूंगी, भारी है"लड़का : " हां, भारी होगा पर किसी की उम्मीदों से भारी तो न होगा, ये उठा लेने दो"
लड़की नज़रें उठाती है, लड़के की आंखों में झांकती है. दर्द है. लाज़िम है. लड़की की आंखों में भी वैसा ही कुछ देखा जाता है. पर फिर कुछ यूं होता है कि पल भर को मिली नज़रों में दर्द बांट लिया जाता है, शिकायतें कर ली जातीं हैं, मजबूरियां फिर से दोहराई जाती हैं, एक-दूसरे को दिलासे दिए जाते हैं और फिर. सब ठीक हो जाता है. हवा में जो भारीपन था, घुलता सा जाता है. आराम आ जाता है.

सारी प्रेम कहानियां ही कितनी क्लीशे सी होतीं हैं न?


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सच है कि एक बहुत लंबा और खूबसूरत वक्त हमने साथ गुज़ारा है. लंबा यूं के इससे ज्यादा वक्त चाहिए ही नहीं था, तुम्हें जानने या तुम्हारे संग तमाम उम्र की खुशियां समेट लेने के लिए और खूबसूरत यूं के जब तुम साथ थे तो उससे खूबसूरत कोई और समय नहीं रहा. और वाकई कोई अफसोस होना नहीं चाहिए क्योंकि कुछ भी नहीं है जो हमने न कह दिया हो एक दूसरे से, कोई गाना तो नहीं बचा जो तुमने नहीं गा दिया मेरे लिए, कोई लम्हा तो नहीं था के जब तुम्हारे साथ चलना चाहा हो और तुम न आ गए हो वहां मेरा हाथ थाम कर चलने के लिए.
पल्स के 100 करोड़ के बिज़नेस में हमारे इश्क का भी 20 रुपये का योगदान रहा है. मोमोज़ से लेकर सिज़लर तक की, नोएडा से लेकर करोलबाग तक की, CP के अनगिनत फेरों की, इंडिया गेट की सड़कों पर बेवजह भटकने की. और फिर रेलवे स्टेशनों पर बिछड़ने की. (सब कुछ तो जी लिया साल भर में.) यादें बेइंतहा हैं, समेट के अपने ससुराल ले जाऊं तो वहां प्यार न भी मिले तो भी खुश रहने के हज़ारों बहाने हैं. बस दिल लालची है और कुछ नहीं.
और ये भी कि आदतें बदलना मुश्किल होता है. तुम जैसी कोई आदत हो तो खासकर.

राजेंद्र ससुराल भी जाता तो हाथ में प्लास-पेचकस रहता था

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