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'ददुआ से बतासो और वेदू का संबंध हानि-लाभ से बढ़कर कहीं था'

पढ़िए मैत्रेयी पुष्पा की कहानी 'छांह'.

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15 जून 2018 (अपडेटेड: 15 जून 2018, 01:33 PM IST)
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एक कहानी रोज़ में आज पढ़िए मैत्रेयी पुष्पा को-

छांह

  मेरे गांव के जमींदार रहे हैं ददुआ. रियासतों का जमाना देखा है. शीशेदार झूल से सजे ऊंट पर बैठकर चला करते थे कभी. भव्य तेजस्वी व्यक्तित्व के स्वामी, दूधिया गौर वर्ण. बड़ी-बड़ी काली मूंछें. झक्क सपफेद लिबास पर लहरियादार पगड़ी. वैश्य होकर भी क्षत्रियों की-सी आन-बान. वैसी ही गरिमा. जिधर निकलते, लोग राह छोड़कर अलग खड़े निरखते रह जाते. पूरे पांच गांवों की जमींदारी थी. ऐसा तुर्रेदार रूप-स्वरूप, पर मन नारियल की गिरी-सा कोमल. जल्लादी जमींदारों की पांत से अलग. गरीब किसानों के लगान को मापफी देते-देते अंग्रेजी सरकार के कोपभाजन बनते रहे. आसपास उपहास होता, संत हो जाओ विश्वनाथ, राजपाट चलाना तुम्हारे बस का नहीं. जमींदारी टूट गई. छाती से लोहे के कवच की जकड़ हटी. ददुआ ऐसे मुक्त हुए, जैसे आकाशचारी खग धरती पर विचरते पंछियों में जा मिला हो. गांव- पुरवा में हिल-मिल गए. घर-परिवार की तरेरी हुई निगाह से निष्प्रभाव! अपने नाम चढ़ी जमीन के काश्तकार हो गए. उम्र का मोड़ मुड़ चुके हैं ददुआ. वृद्धावस्था की परछाईं तेजी से तरुणाई की धूप को ढंकती चली आ रही है. कुटुंबियों ने जितनी बार पत्रा डाला, बड़े-छोटे दोनों ही भागते चले आए हैं. अब खानदानी भी क्या करें, ददुआ के करतबों से तंग हो चुके हैं. हारकर उनके पुत्रों को ही लिखना पड़ता है कि आकर पिता को समझा जाओ या साथ ले जाओ. जब से रेशम मरी है, ददुआ पगला गए हैं. पत्नी के मरने पर फिर भी संभले रहे किंतु बेटी की मौत के बाद तो... गांववासी चकित हैं, ददुआ ने उचित-अनुचित, नियम-कायदे ताक पर धर दिए. बतासो सक्किन के घर में घर, चौके में चौका मिला दिया. वही कर रही हैं रोटी-पानी, टहल-चाकरी. चिट्ठी मिलते ही चंद्रभान भागता-भागता आया था. पिता को धिक्कारने लगा, कोई बात हुई यह भी! बच्चे हो क्या? बनिया की जात और बसेरा बतासो के घर! ठाकुर-जाट, लोधी-अहीर कोई नहीं मिला? पल्ले घर वाले भी क्या करें? खानदानी जो ठहरे, नाक तो उन्हीं की कटती है न! मगर तुम तो सठिया नहीं, बौरा गए हो. ददुआ का मुख खुला रह गया! निरीह भाव से पुत्रा को देखने लगे. वे तो समझ रहे थे चंद्रभान उनकी कुशलक्षेम पूछने आया है. उन्होंने भी तो पत्रा लिखवाया था. मगर पुत्रा की बातें तो विपरीत हवा में बह रही हैं, तुम मानते क्यों नहीं? क्यों हमें हर बार परेशान करवाते हो? किराया-भाड़ा खर्च करके, अपना काम छोड़कर आना पड़ता है हमें! ददुआ के माथे पर झुर्रियां गहरा गईं. कोटरों में चमकती पुतलियां कठोर हो उठीं. हलक की कड़वाहट पीते हुए बोले, काहे को परेशान होंत हौ भइया? मेरे कारन तुम मत आऔ करौ. गांव में रहने का इतना ही शौक है तो अपने भरोसे रहो! मुसल्ले सक्कों की थाली तो मत चाटते फिरो. अरे, व्यर्थ ही दकदका रहा है. ददुआ को इतनी तीक्ष्ण भाषा की उम्मीद नहीं थी. वे तिलमिला उठे, तुम पढ़े लिखे है के ऐसी बात कर रहे हो? लल्लू, विरथा है तुमारी सिच्छा! सहर में ऐसी छुआछूत है का? तो फिर रहो शहर में! हमारे संग रहते तो तुम्हें बिच्छू लगते हैं. उस कटल्लिया को छोड़कर जाओगे कैसे? ददुआ की आंखां में चिनगारियां उतर आईं. गले की नसें ऐंठने लगीं. हुक्का एक ओर को सरकाते हुए खाट पर संभलकर बैठ गए, रह के खूब देख आए हैं! रहे नांय का तुमारे घर? अपनी अकेले की तौ भोगिलें लाला! पर हमारे संग में वेदू है, अवस जीउ! बहुएं नौकर की तरह खटाएं, दुभांत करें तौ तुम देखि सकत हौ, हमारे बस की नांय भइया. जा पोआ भरे बालक पै गठरियन कपड़ा धुवावति हैं तुम्हारी बहू! पढ़िबे नांय जान देत! सगरे दिन काम! पहरबे फटे-पुराने उतारन और अबेर-सबेर भूख लगै तौ हजार बातें! तुम रह सकत हौ ऐसे काऊ के घर? चंद्रभान पिता को देखता रहा. फिर जूतों के तसमें बांधकर मूढ़े से उठ खड़ा हुआ, अब देख लो तुम! बार-बार भागना हमारे बस का नहीं. गांव में रहना है तो यहीं की तरह रहो. न हमारी आंखें नीची कराओ, न खानदान की नाक... को ससुर बुलाय रहयौ है तुम्हें? मेरे कारन इज्जित घट रही है तौ रहौ अपने घर. तकरार सुनकर गांव के बड़े-बुजुर्ग जुड़ आए, और भी कुछ दाने-सायने. बाप-बेटे की तू-तड़ाक को निबटाने लगे, बाबरे है गये हौ विश्वनाथ! इतनौ लायक बेटा और तुम गारी-गरौज पै उतरि आये. चंदरभान, तुम ही चुप्प है जाऔ लल्लू! गम खाऔ, बीमारी में दिमाक चिड़चिड़ौ है गयौ है इनको. चंद्रभान ओसारे से बाहर चला गया. ददुआ मन में उठते ज्वार को दबाए बैठे रहे. मगर खिसियानपट झुर्रियों में गहराने लगा, किसके भरोसे रहते हैं वे? किसी का आसरा लिया है कभी? सदा अपने बलबूते ही तो रहे हैं. उन्होंने किसी से आशा नहीं बांधी. रेशम के ब्याह को इतने दिन हो गए तब से आज तलक, अपने आप ही बनाते-खाते रहे हैं. हारी-बीमारी बासन-भांड़े नहीं धो सके तो कुम्हार के यहां से कुल्हड़-भोलुए मंगा लिए. चाय, दूध भी नहीं जुटा तो एक लोटा पानी पीकर सो रहे. शहर कसबा तो है नहीं, जो होटल-ढाबे चलते हों. गांव की बात ठहरी. बहन-भानिज भी कहां तक आती रहें? उनकी अपनी-अपनी गृहस्थी है? कौन फालतू बैठा है, उनकी घरदारी के लिए. विधवा लोंगश्री से रोटी बनाने की बात कह बैठे तो उसका भतीजा सीधा पड़ गया, ददुआ, अपनेन पै तो कछु बस नांय तुम्हारौ! हमारी बुआ रांड विधवा है तो का तुम्हारा चूल्हा-चौका करैगी? कम खाय लिंगे पर... जैसे-तैसे हरप्रसाद नाई तैयार हुआ, ददुआ चूल्हे पै मेरे बस की नांय, स्टोप पै पराठे बनाय दियौ करूंगौ. ...पर कहां, एक-डेढ़ महीने भी नहीं कर पाया कि पड़ोस के काशी का लड़का उसे अपने साथ शहर ले गया. वहां वह उनके घर का काम करेगा और सरकारी नौकरी भी रहेगी. उसे रोकने का क्या उपाय था ददुआ के पास? अकेले होते हो आज भी ऐसा कुछ कठिन नहीं था, पहली तरह चलता रहता. पर क्या करे, विवश हैं, वेदू साथ बंधा है. अबोध बालक को भूखे भी तो नहीं सुला सकते. स्वयं तो वक्त-बेवक्त चना-चबैना, खिचड़ी, दलिया खाकर चार-छह दिन काट लेते थे, मगर उसे बहलाना कठिन है. रोटी की जिद कर बैठता है. अब रोज-रोज थाली में आटा धरे किसके दरवाजे जायं? रेशम नहीं रही, बस तभी से उनकी जान से गृहस्थ जुड़ गया. अपनी औलाद और गृह-माया से जैसे-तैसे छूटे थे. पत्नी की मृत्यु के बाद कच्ची किलवाड़ को ठिकाने लगाना क्या आसान था? मगर तब उन्हें आसरा था. बेटी ढहती गृहस्थी की बैसाखी बन बैठी. रेशम बड़े भाइयों की मां बन गई, वैसी ही सेवा, उसी तरह की चिंता-फिकर. ददुआ अचंभित रह जाते, बारह-तेरह साल की रेशम कैसी सद्गृहस्थिन बन बैठी. चूल्हा-चौका सहेज लिया. दूध-बूंद संभालती! वे प्रौढ़ पुरुष होकर भी टूटते-बिखरते रहे. कभी संन्यासी होने की बात सोचकर हरिद्वार चल देते तो कभी वृंदावन में हरता काट आते. रेशम के सहारे ही तो उठ खड़े हुए. धीरे-धीरे बेटे की नौकरी-चाकरी के चलते शहर के वाशिंदा हो गए और रेशम ब्याहकर ससुराल चली गई. जब से वह नहीं रही, ददुआ फिर टुकड़ों-टुकड़ों में बिखर गए. सिर के सूत-से बालों पर हाथ फेरते, भीतर उठती हिलोर पर काबू नहीं रख सके. घनी धुंध फैल गई आंखों में. उस समय वेदू के विषय में ही सोचकर घुलते रहते थे, दामाद तो खुद ही भारी दमे के रोगी! ऊपर से नन्ही-सी जान का पालन-पोषण. मन नहीं माना, देखने जा पहुंचे. जैसा सोचा था उससे भी बुरी हालत! सांसों की हंफयाती धौंकनी से लस्त-पस्त मुट्ठी भर हड्डियों का ढांचा जामाता और मैले-चीकट कपड़ों में रें-रें करता डोलता वेदू. अपने आप को नहीं रोक पाए ददुआ, तुम्हारे बस कौ नांय कुंवर जी, जा बालक कौ लालन-पालन! और उठा लाये दो साल के वेदू को. समवयस्कों ने बहुतेरा समझाया कि विश्वनाथ, आगे बुढ़ापा ही बुढ़ापा है, कैसे पालोगे? अपनी रोटी का तो ठौर-ठिकाना नहीं, ऊपर से यह जिम्मेदारी! ऐसा करो बहुओं से पूछ देखो, संभव है दोनों में से कोई राजी हो जाए. अपने बाल-बच्चों के साथ इसके दो निवाले उनके लिए क्या कठिन हैं. उन्होंने कुछ दिन देखा कि कोई कहे, पिता जी, वेदू को यहां भेज दो, इन बच्चों के साथ खाता-खेलता रहेगा! चंद्रभान और सूरज अपनी पत्नियों के साथ गांव आए, तब भी उन्होंने इसी आकांक्षा से कई बार वेदू की बात उठाई, मगर सब व्यर्थ रहा. खुद पछताते रहे, अपने ऊपर झल्लाहट भी कम नहीं हुई, क्यों लगाते हैं किसी से आशा? बच्चे को लाए हैं तो अपने बलबूते? बहुओं ने आड़ में सुना तो दिया, अपनी रोटियों के तो लाले हैं मगर हेज प्रीत फटी पड़ती है. मन में उमेठ और कड़ी पड़ गई, क्या शौक में लाए हैं? विवशता क्यों नहीं समझता कोई? अनाथ की तरह भटकने दें बच्चे को? कुटुंबियों के तो क्या कहने. अब तो रोज चिट्ठी डलवा रहे हैं, मगर जब पड़ोस में राधेश्याम के घर में रोटी बन जाती तब नहीं देखी गई. बड़ी भाभी बूढ़ी तो हो गईं, मगर घर-घर कहती डोलीं, हथेली पै चून लैकें डोल रहे हैं, पर बेटा-बहुओं के संग नांय निभत! काऊ के हैंके रहें तब न! बतासो ऐ छोड़ कें कैसे जांय? मन नांय लगत कहूं! रात-दिन खाट से लगी बैठी रहत है! उन्हें अचरज होता है और गहरी पीर भी. उमर नहीं देखते लोग! कहां बे...और कहां बतासो, उनकी बेटी की उम्र की. या फिर बेटे-बहुओं के दुर्व्यवहार की कथा पूरे मोहल्ले में बखानते फिरें? ऐसी ओछी बात! उनका हलक कड़वा गया. किसी के मरम की पीर जानेगा भी कैसे? बतासो से उनका ऐसा लगाव, इतनी निकटता आज की तो नहीं...कई बरस पीछे मुड़ पड़े विश्वनाथ : अलीगढ़ ही तो जा रहे थे उस दिन. बतासो और सन्नू रास्ते में मिल गए. भोर का समय. उदय होते सूरज की तनिक तीखी-सी धूप. मूंज की लंबी कटखनी पत्तियों से आच्छादित, दगड़े में पति-पत्नी चले जा रहे थे. उन्होंने विघ्न नहीं डालना चाहा. बतासो ने पैछर पहचान ली. वसंती धोती की लाज ओढ़ ली. हाथ भर लंबे घूंघट में से सन्नू को बता दिया, ददुआ आय रहे हैं पीछें. वे तेज कदमों से आगे हो लिए. आड़-परदा कहां तक करेगी बहू. सन्नू बतासो को पीछे छोड़कर ददुआ के साथ हो लिया, तेज-तेज पग धरता हुआ. चोंरे सन्नू, आज कैसे? मुसक छिड़काव नांय का आज? पंडित जी के यहां सगाई तौ कल्ल है ददुआ! तब ही छिड़काव होयगौ. कैसी आमदनी चलि रही है आजु कल्ल? तिहारी किरपा है ददुआ, मेहरमानी! बातों ही बातों में दोनों दूर निकल आए. बीच में एक गांव पड़ा, उसको भी नाख आए. सड़क पर खड़े हुए तो ददुआ को अचानक खयाल आया, सन्नू, ब्याहुली कहां है रे? सन्नू के होंठ खुल आए. उजबक-सा देखता रहा. अरे भाजि पीछे कूं! गैल में रह गई, लिबाय या मूरख! वह विहंस उठे. वे प्याऊ के पास नीम की छांह में खड़े थे कि मोटर उनके ठीक सामने आकर रुक गई. बस-कंडक्टर अपने गांव का मनोहर ही था, बोला, ददुआ, अलीगढ़ चल रहे हौ का? जानौ तौ है भइया, पर तू अपनी मोटर हांक लैजा. सन्नू और बहू आय रहे हैं, देर लगैगी. लगन देउ देर! दो-चार मिलट की कोई बात नांय! ठाड़ी रहैगी मोटर! चलौ...चलौ, आ जाऔ. आ जाऔ. आ जाऔ. अलीगढ़! अलीगढ़! अलीगढ़...तेज आवाज आसपास फैल गई. दो-चार सवारियां इधर-उधर से दौड़ आईं. बस ठसाठस भरी थी. जगह के हिसाब से तीन गुनी सवारियां. बतासो बीच में पिसकर चूरन हुई जा रही थी. ददुआ के कहने पर कंडक्टर ने सवारियों को डांट-पफटकार इधर-उधर सरकाया, जनानी सवारी ठाड़ी है, बैठि जान देउ भले आदमी. टिकिट कटवाते समय सन्नू अपनी लाल साफी के छोर से रेजगारी खोल ही रहा था कि उन्होंने वरज दिया, रहन दै तू! मैंने दै दयौ किरायौ! अगले स्टॉप पर सवारी उतरने पर अंगुल भर जगह खाली हुई. सन्नू ने तुरंत ददुआ को ढकेलकर सीट पर बिठा दिया. बतासो सिकुड़कर पोटली-सी बन गई. असहज स्थिति में सकुचाते हुए वे धड़ की इंच भर हड्डी पर पूरी देह का भार टिकाए किसी तरह बैठे रहे. वे दशहरे के आसपास के दिन थे. जगह-जगह रामलीला. काली की सवारी! हनुमान की सवारी! चहल-पहल! बतासो घूंघट में से माथा नचाती रही. कुतूहल भरी आंखें घुमा-घुमाकर देखती. झांकियों को सराहती. अलीगढ़! ऊपरकोट का फूल-चौराहा! दुकानें ही दुकानें! वे चीजें खरीदने लगे. बूरा-बतासे खरीद लिए. महाबीरगंज की ओर जाकर एक लोटा तथा वेदू के लिए छोटी सी डोलची ले आए. सन्नू और बतासो भी बाजार में उलझ गए. वह बच्चे की तरह किलक रही थी, जि देखौ चमकनी चप्पल! रंग-बिरंगौ चुटीला! दुकान पर टंगे बुरके को छू-छूकर देखने लगी. सन्नू आंखें चमकाकर शरारत से बोला, लैनों है का? रैहन देउ! गंवई-गांव में कहां के बुरका और कहां की नकाब! जे तौ सहर के चौंचले ठहरे! हां, जेठ जी के घर कनवरीगंज लै जाउगे तौ जरूल जैठोत हंसिंगी, चच्ची, तुम तो हिंदू लगती हो! शलवार-कुर्ता, गगरा-पजामी कभी नहीं पहनतीं तुम? बुरका भी नहीं ओढ़तीं? लाली, गांव में को हिंदू और को मुसलमान! सब एक से ही ठहरे. तुमारे पजामी-पजम्मा पहरैं तौ सबरौ गांव हंसैगौ! गली के कुत्ता भौंकिंगे. कहो, काटि खांय! लड़कियां हंसती हैं, चच्ची सचमुच! कुत्ते काट लेंगे? औरु का! वे का जानें कै बतासो सिलवार पहन आई है. सन्नू हंसकर दुहरा होने लगा, खूब समझाई तैने! ददुआ भी हंस उठे. आगे बढ़कर सन्नू के हाथ पर रुपया-पावली धरने लगे, लैरे सन्नू, ब्याहुली ते कहदै, अपने लंये कछू चीज खरीद ले. बतासो ने चूड़ी, पिन, ऐरन, चुटीला सब चीजें खरीद लीं. अपनी ननद शहजादी और कुम्हार की रामसिरी के लिए नाखूनी की शीशी ले ली. घर में घुसने से पहले ही गली में पकड़ लेगी, भाभी हमारे लंय का लाई? सांझ घिरने लगी. लौटने की वेला हो चली. ददुआ मुसक तौ मिली नांय. तेज है यहां कौ भाउ! जा ते अच्छी तौ हातरस में मिल जांत है. सन्नू ने अपनी दुविधा सुना दी. चलि, हातरस ते लै लइयौ. मैं थोरी देर में आयौ ददुआ! मसजिद में नमाज पढ़ि आऊं! जाय देखत रहियों, निरीह बाबरी ठहरी, कहूं खो जाएगी. बतासो को उनके पास ही बैठा गया, यहां बैठि, सहर ठहरौ, उठियो मति! शहरी चहल-पहल में देखने को बहुत कुछ था. वे देखते रहे खरीदारों को, दुकानदारों को. बतासो ने उनकी ओर से पीठ कर ली. घूंघट ऊंचा किए बाजार की सजी दुकानें देख रही थी, ऊंचे मकानों की जालीदार गौखों में सूखते कपड़े, उझकती मलूक-मलूक औरतें! सब कुछ रंग-बिरंगा, अद्भुत! अचानक एक ओर से बवंडर की तरह शोर मचा, फिर हाहाकार...चीखें, चिंघाड़...देखते ही देखते तूफान वहां तक बढ़ आया जहां वे दोनों बैठे थे, ये सारे लोग भाग क्यों रहे हैं? कौन चीख रहा है? समवेत स्वर में किसकी चिंघाड़ें? झटपट दुकानें बंद होने लगीं, खटाखट दुकानों के शटर गिरने लगे, जल्दी करो, भागो! भागो! लोग बदहवास हुए दौड़ने लगे. कौन कुचल गया? कौन पिच रहा है, किसी को खबर नहीं! अंतहीन बे-लक्ष्य दौड़. वे दोनों उजबक-से देखते रहे. दुकानदार चीखा, देख नहीं रहे? भागो जल्दी! दंगा हो गया. कित कूं जांय...? ददुआ का याचना भरा मुख खुल आया. कहीं भी... कहकर दुकानदार न जाने किधर विलीन हो गया. पल-छिन में बाजार वीरान हो गया. बतासो की पोर-पोर कांपने लगी. होंठों के भीतर बुदबुदाहट उपज आई, अल्ला, आज जि का गजब? जि कहां चले गए...इत्ती देर? ब्याहुली! ओ ब्याहुली! अरी सन्नू कितकू गयौ? मैं लिबाय लाऊं. जाने कहां चलौ गयौ सुसुर! ददुआ पीछे खड़े एकालाप में डूबे थे. चीख-पुकार! दूर कहीं बंदूकों की धमाकेदार आवाज. अनायास ही ददुआ ने बतासो को दुकान के थड़े के नीचे, बहती नाली के पास खींच लिया, ओट में दोनों छिपे रहे! वह हौल खाई चिरइया-सी ददुआ की उठती-गिरती सांसों भरी छाती से लगी स्तब्ध बैठी थी, ज्यों झपट्टा मारते गिद्धों से बचकर किसी महफूज घोंसले में आ छिपी हो. सन्नू वापस नहीं आ सका! उनकी निगाहें पथरा गईं!! बतासो की आंखें कौड़ी की तरह अपलक! उस भयावह रात में अपनी धोती ओढ़ाकर उन्हें छिपाए रही. हिंदू-मुसलमान की पड़ताल में फुसफुसाते मुसलमान बधिकों से जूझती रही. रात बीत गई, पर सन्नू नहीं लौटा. कभी भी नहीं लौटा. मार-काट के उन क्षणों की आक्रांत स्मृति...दहल उठे ददुआ. तब से आज तक... न जाने वे बतासो के लिए वट-वृक्ष बनकर खड़े रहे या वह उनके बीहड़ जीवन के एकांत में निर्मल निर्झरणी बनकर बहती ही...या कि दोनों ही निर्गुण-ब्रह्म सरीखे एक ही प्रभु की उपासना करते रहे...ज्ञात नहीं उन्हें... तो फिर...ये पुत्रा! ये पौत्रा! ये पूरा कुटुंब...समूचा गांव कैसे समझ सकेगा उस मरम को? उस तप को जो उन्होंने बतासो के संग उस नरमेध की रात को किया था. उस नाते को...उस संबंध को, जो उन भयावह क्षणों में उसके साथ जुड़ा था. उस दिन वेदू को ही तो नहीं संभाल पा रहे थे. दोपहर ढलने को थी. बच्चा भूख से बिलखने लगा. क्या करें वे? स्वयं तो बुखार में तप रहे हैं. जब किसी तरह न बहला तो कहने लगे, जो, राधेश्याम के घर, कह दइयो कि हमारे ददुआ बीमार हैं. मांई हम भूखे हैं. मगर लड़का टस से मस न हुआ, वहीं बैठा रोता रहा. वे असहाय आंखें मूंदे पड़े रहे. ददुआ! तुम्हें तो बुखार...कछु चाह, पानी...और जि वेदू! चों रोय रहयौ है? भूखौ है का? वे चुप पड़े रहे. ददुआ, तुम मति खाऔ, परि जि बच्चा! जि का जाने जाति-पांति? ऊंच-नीच? जाकी आवाज सुनिकें ही, ददुआ, मैं रोटी ले आई हूं! उसने आंचल के नीचे से रोटी निकालकर वेदू के सामने रख दी. ददुआ, तुम्हारे ही नाज की रोटी है. सब तुम्हारी ही दुआ-असीस.... वेदू कोने में बैठा रोटी खाने में लगा था, जैसे लंबे समय तक तरसने के बाद कोई मिठाई मिली हो. उसके गालों पर आंसुओं के लंबे-लंबे पनियाए बतासो ने अपनी धोती के छोर से पोंछ डाले. उस पल उन्हें वेदू की निरीह, खिलती पुतलियां देखकर लगा जैसे उनकी अपनी आंखों से चांदनी झर रही हो. क्षण भर पहले के करुण रोदन से पफूटता प्रेम-संगीत का अनहद नाद... और फिर दूसरे ही दिन : ददुआ! ओ ददुआ! उठौ, बेहोस हैंके परे हौ. कछु अन्न गिरास मुंह में गयौ? जि दूध, दो घूंट! बतासो आंचल के छोर में गिलास लपेटे खड़ी थी. उसके बाद दाल के पानी का पथ्य, खाट पीढ़ी की उठावन, बिछावन. फिर तो वे उस नन्हे बच्चे की भांति हो उठे, जो मचलता है, हठ करता है. और वह, उन्हें मनुहारों से बहलाती, संभालती. एक युग के पश्चात् ऐसी आत्मीयता! ऐसा लगाव. घर-गृहस्थी, चूल्हा-चौका कब गह लिया उन्हें पता ही नहीं चला. वे तो अनाम रिश्ते से बंधे खिलकता आंगन, चलता घर, मुग्ध भाव से देखते रहे. नित रोज पड़ने वाले नुकीले आक्षेपों से दंशित किंतु प्रेम विह्नल. जाति-बिरादरी के बंधन, आशंका और आडंबरों से मुक्त! इसी तरह निरापद अलौकिक जगत् में विहार करते हुए समय उड़ने लगा. जब कभी विचलित हुए हैं तो वेदू के लिए ही. स्वयं तो सह गए लेकिन इस बालक की जान को बनिया-मुसलमान का जंजाल लगा ही रहेगा! वेदू को अकसर समझाते, तू डरत चौं है? कोई कछू कहै तो कर्रै परि कें कह दौ करि कि तेरी अम्मां बतासो है तो है. बालकन से कहे से रोबैगौ तो आगे कैसे करैगौ? तू तो विद्या पढ़तु है, भेदभाउ लिखौ है किताबन में? कबहू मति घबड़इयों, हां! धूप ओसारे के छप्पर से उतर चुकी, यानी कि आधा दिन बीत गया. आज बतासो अभी तक नहीं आई. शायद आएगी भी नहीं. कैसे आए? राकेश जो आ गया है, उनका बड़ा पौत्रा. अबकी बार चंद्रभान नहीं आ सका तो बेटे को भेज दिया. फसल उठने के दिनों में अब ऐसा ही होने लगा है. बेटों ने मुकम्मल पहरेदारी की योजना बना ली है. अपने हिस्से की जमीन तो उसी समय बेच गए. अब उनके हिस्से पर गिद्धदृष्टि जमी है. विरासत का हक उनके जीते-जी? मर जाने तक की प्रतीक्षा नहीं? पिछले महीने छोटा पौत्रा रहा था, फिर चंद्रभान, कभी सूरज, बस इसी तरह! खाने-पीने की तंगी तो इन लोगों को भी होती है, मगर ये लोग पल्ले घर वालों के चूल्हे से पटरी भिड़ा लेते हैं. बहू ने कुछ शहरी चीजें भेज दी होंगी, उन्हीं की एवज में खाने का जुगाड़. ज्यों-ज्यों शरीर अशक्त होता जा रहा है, बेटे अधिक सतर्कता बरतने लगे हैं. संतान को डर है कि बूढ़े का क्या भरोसा, बतासो को कितना कुछ दे दें. इसीलिए अनाज को कोठे में डालकर ताला लगा दिया है. केवल उनकी सांसें चलती रहें, बस इतना सा अन्न बरामदे के कोने में पड़ा रहता है. छोटी सी ढेरी को देखकर उनकी आंखों में क्रोध दहकने लगा. गांव के लोग जानते हैं. पास-पड़ोसी कहते हैं, अरे चंदरभान! बेटा सूरज भी ऐसौ मति करौ लल्लू, बुढ़ियांत में अन्न के दानेन कं मत तरसाओ! सब तुम्हारे बाप की माया है. इनही के पुन्न-धरम पलि रहे हैं सो तुम खूब उन्नति-तरक्की कर रहे हौ भइया! तुम बड़ी मुसिकिल से पाले हौ! ददुआ जानते हैं कोई असर नहीं होगा, बेटों के खून में बड़े शहर का पानी मिला हुआ है, जो अपने प्रति हर समय शंकित रहता है. व्यक्तिगत हानि-लाभ से बढ़कर उनके लिए कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं. पहरेदारी की विशेष व्यवस्था के तहत मिलने-जुलने वालों पर भी कड़ी नजर है, अब अंतिम सांसें उन्हें पुत्रों के बंदीगृह में काटनी होंगी. ये आज के नौजवान ऐसे कमजोर, इतने भयभीत कि पिता की क्षीण होती देह के लिए ऐसी पाषाणी कारा. हसनपुर वाले वकील साहब आए तो चंद्रभान छाया की तरह उनके साथ ही मंडराता रहा. एकांत में बचपन के यार से सुख-दुःख कहने-सुनाने के लिए भी कुछ पलों की मोहलत नहीं. चलते-चलते गहरे निःश्वास भरकर वे ही बोले, विश्वनाथ, अब यह सोचना तो सपना-सा लगता है कि जमींदारी के समय तुम खत्ती खोलकर गरीबों को अन्न लुटाया करते थे. हमेशा परमारथ किया फिर भी...ऐसी कठिन घड़ी. सुनकर ददुआ के पपड़ाए होंठों पर महीन-सी वक्र हंसी उभर आई, नादान लोग! नाहक ही परेशान हैं ये. इनका हिस्सा इसीलिए तभी दे दिया था, जब बतासो से संबंध जोड़कर उन पर लांछन लगाए थे. उनकी मर्यादा में बेटों के कुबोल बोले, तब वे आहत पक्षी की तरह छटपटाते रहे. इतनी पीड़ा...इतना दुःख तो पत्नी की मृत्यु और बेटी के न रहने पर भी नहीं हुआ. क्षोभ-कोप के ज्वार को मसोसते इतना ही कह पाए, मैं ऐसौ ही अधम नीच ठहरौ, तौ तुमारौ बाप काहे कौ? बाप-बेटा कौ संबंध तौ दरक गयौ चंदरभान! विरासत की धरती है सो बांट लेउ लल्लू! बाद में हमारौ-तुमारौ कोई रिस्तौ, न नातौ. खून-पानी बराबर समझौ. गले से निकला स्वर कनपटियों में झनझनाने लगा. गरदन की नसें रह-रहकर ऐंठ रही थीं. पिता के ज्वालामुखी-कोप को लड़कों ने निशि्ंचत भाव से झेला. ऐसे देखते रहे जैसे कड़वे सच को सुनकर ददुआ व्यर्थ ही उबाल खा रहे हों. वे फिर तड़क उठे, कान खोल के इतनी सुन लेउ बेटा कि जमीन के चार हिस्सा होंगे. दो तुम्हारे और एक-एक मेरौ और वेदू कौ. बोलों की इन दो पांतों को सुनकर लड़के दहल गए. ठंडा दिमाग दहकते लाल लोहे में परिवर्तित हो गया. हक्के-बक्के से बोले, क्या कहा...? दिमाग तो नहीं चल गया तुम्हारा. करके देखो, कैसे करते हौ चार हिस्से? चलकर तो देखो कचहरी. गांव में भी हड़कंप मचा, सब बातें सह ले आदमी, पर हद्द करते हैं ददुआ! अकल मारी गई है का? पराए छोरा कौ का हिस्सा-बांट? वा कौ हिस्सा वा की देहरी पै. मगर तब इस अनकहनी के उत्तर में उनके हाथ-पांव बलिष्ठ थे. प्रौढ़ता से बुढ़ापे की ओर अग्रसर होती हड्डियों में पुराने बरगद की-सी अकड़ थी, अपनी जुबान पै काबू राखौ लाला चंदरभान! जि जिस्सा रेसम कौ है. जिंदी नांय तौ वा कौ हक्क मार लऊं? उनका ऐलान खारिज नहीं हो सका. गांव की गली-गली बुदबुदाने लगी, ददुआ भी एक ही ठहरे! अब छोरिन कौ हू हिस्सा बांट करनो परैगो? जमाई लड़िंगे आयकें! जीजा में सालों में मुकदमे बजेंगे! जि नई रिवाज और.... उनकी तबीयत अच्छी नहीं रहती. रोग का लंबा सिलसिला चल निकला है. वेदू को बतासो ने अपनी गोद में डाल लिया, तब से वे उसकी ओर से तो चिंतामुक्त हैं. उस पर पूरा भरोसा है. कितनी बार उन्हीं की खातिर उसने चंद्रभान और सूरज की गाली-गलौज सही हैं, मारपीट भी. वे विवश-से देखते रहे हैं. मन में तो बहुत कुछ जलता है, मगर जहरीले घूंटों को उगलने की कोई शक्ति नहीं है उनके पास. वह कभी नहीं डगमगाई. अब संसार से उठ भी जाएं तो चिंता नहीं. बतासो के रहते वेदू अनाथ नहीं होगा. अपने कमजोर हाथों को उलटते-पलटते औसारे के पार देखने लगे, अबकी बार रोग ने स्थायी रूप से भींच लिया है. डेढ़ महीना बीतने को आया, लेकिन मुक्ति नहीं. सहसा दृष्टि वेदू की ओर मुड़ गई, वह कच्चे चौकोर खंभे की आड़ में खड़ा सतर्क भाव से दाएं-बाएं ताक रहा है. हाथ में छोटी सी पोटली जैसा कुछ टांग रखा है. उन्होंने राकेश की खाट की ओर तनिक गरदन उठाकर देखा, सो रहा है. फिर अपना कमजोर हाथ तीव्र वेग से हिलाया, आ आ जा... आ जा. बच्चे के पांवों में हरकत हुई, मुख पर आगे की ओर बढ़ जाने का भाव जागा, मगर सोच में डूबा वहीं के वहीं ठिठककर रह गया. राकेश को गहरी निगाहों से ताकने लगा. उन्होंने फिर हाथ का झाला दिया, आ जा...तू! वेदू स्थिति को भांपता-सूंघता आगे बढ़ आया और उनके पास पोटली पटककर चटपट लौटने लगा. उन्होंने हाथ पकड़ लिया, का है जा पोटरी में? गुड़ बहेरे कौ चूरौ. चूरौ? लड्डू नांय? वेदू के दूधिया दांत मुस्कराहट में खिल पड़े, बतासो अम्मां कै रही कि तेरे नाना के दांत नांय, लडुआ कैसे खाय सकिंगे. अम्मां ने लोढ़ा से फोरि कें चूरन कर दियौ. वे भीतर तक भीग उठे, जैसे ठूंठ वन में नरम दूब पर ओस बिखर गई हो. पथराए होंठों पर फूलों की-सी कोमल मुस्कराहट दौड़ने लगी. भावातिरेक में बोले, कहां है तेरी अम्मां? प्रेमचंद की भेंसनवारी कुठरिया में ठाड़ी है. गुड़-बहेरे की पोटली को जतनपूर्वक नस भरे हड़ीले हाथ से सहलाते रहे. आंखों की कोरों में अनचाहे ही तरलता छलक आई, कहां से जुटाया होगा गुड़? कहां से लाई होगी बहेरा? गरीब को रोटियों तक की तो तंगी होगी. पर क्या करें वे, यहां तो ये राक्षस पहरा दिए बैठे हैं और वे जर्जर काया-से विवश.... वेदू, उठा मोय! पकरि हाथ! बच्चे ने भरपूर प्रयत्न किया पर लंबी मरदानी देह का अस्थिपंजर ही क्या कम भारी था. ददुआ, अम्मां को बुला लाऊं? ना, ना रे ना! लेकिन उसी पल सूनी बेनूर आंखों में द्युतिमान उजियारे की क्षणिक आभा अलौकिक लौ-सी झिलमिलाने लगी...बतासो. वे चमत्कृत हुए बोल पड़े, अच्छा, बुलाय ला. वेदू के संग मिलकर बतासो ने उन्हें उठाकर बैठा दिया और स्वयं उनकी पीठ को सहारा देकर पीछे बैठ गई. वे पोटली को निरखकर हरषाते हुए खोलने लगे. बतासो तृप्त भाव से आगे को उझक रही थी और वेदू मुंह में स्वाद का अंदाजा बांधता ठीक उनके ऊपर झुक आया. बहेरे की पंजीरी का स्पर्श ही किया होगा कि राकेश भेड़िए की तरह कूदा. बतासो हड़बड़ा गई. वेदू डरकर चीखने को हो आया और वे कंचे-सी आक्रांत आंखें खोले अपलक देखते रह गए, स्तब्ध! राकेश दनकार उठा, नहीं मानती तू! कैसे आई यहां? निरुत्तर, तीनों कसूरवार-से अवाक् जड़...जहां की तहां बैठे रह गए. उठ, अभी! मैं कहता हूं चल! आइंदा देखी तो...टांग तोड़कर रख दूंगा... समझी! बाल झिंझोड़कर खींचने लगा और चटाचट चार-छह थप्पड़ जड़ दिए. उठ रही हूं लल्लू...! उसने धीरे से पीठ के पीछे लगा सहारा खींचा और उन्हें सहेजकर लिटा दिया. चूरे की पोटली गिरकर बिखर गई. कण-कण धरती पर छितरकर बिछ गया. वह बतासो को खदेड़ता बाहर तक पिछियाता रहा. दो पल तक बाहर खड़ी बहेरे को देखती रही, बटोरने का समय भी नहीं... खड़ी है अभी! जाती नहीं! फिर लगाऊं? मटमैली झीनी धोती के छोर से आंखें पोंछती जल्दी-जल्दी अपनी राह चलने लगी जैसे किसी ने खेत चरती गाय को डंडों से पीटकर खदेड़ा हो. वेदू पीछे-पीछे भागने लगा. अपने तिरस्कार का क्षोभ तो जो था सो...किंतु ददुआ के मुख से छिने बहेरे का अवसाद मन पर घने कुहासे-सा छा गया, जिसके पार कुछ भी नहीं...केवल धुंधला अंधेरा. दो कौर भी नहीं खा सके. चख ही पाते. ददुआ उसी तरह पड़े रहे, जैसे सुन्न चेतनाविहीन पंजर पड़ा हो. अंतर-पीड़ा की टीसन...सोच का अंतहीन सिलसिला! सिर को हिलाते भी तो घुमेर ही घुमेर! देह का खोखल पिंजड़ा...न जाने कितने दिन का दाना-पानी? उनके बाद ये कसाई, उसे रहने देंगे चैन से? किस तरह जिएगी? किसके सहारे? उनकी आंखें मूंदते ही वे जमीन के नोट बना ले जाएंगे. कैसे पालेगी वेदू को? किसी का गोबर-कूड़ा डालकर? पीछे मुड़कर देखने वाला कोई नहीं. वेदू को धधकती रेत पर घिसटते छोड़ जाएं कि उसके कोमल तलुओं की खाल उधड़ती रहे? नहीं वे उठकर बैठ गए. कई दिनों तक दुशि्ंचताओं के बीहड़ अरण्य में भटकते रहे ददुआ. भूख न प्यास, चैन न शांति, लगता है कि वे संकरी गुफा में प्रवेश कर गए हैं, जहां अंधकार ही अंधकार. निस्तार की कोई राह नहीं, न कोई महीन-सी किरण. मेरे परभू, तू ही निकाल मुझे, तेरे सिवा और कौन...यह उचित-अनुचित का पछियाता फेर. मोह-माया का जंजाल. अपने-पराए की परिभाषा. इस भवसागर के झूठे बंधनों से एक बार फिर मुक्त कर मेरे परमात्मा! ददुआ के दोनों हाथ खुले आसमान की ओर उठ गए. फसल की बिक्री होने के साथ निगरानी का शिकंजा ढीला हुआ. बेटों का पहरा उठते ही ददुआ ने हसनपुर वाले वकील साहब को बुला भेजा, समय का क्या भरोसा, एक बार आकर देख जाएं वकील साहब. वे आए. देखते ही ददुआ के भीतर की हिलोर आंखों में उमड़ने लगी. आगे-पीछे की सारी व्यथा उड़ेल डाली, मेरे पास ज्यादा बखत नांय. अब मेरौ काम, तुम्हारी जिम्मेदारी. उनके लाख समझाने-बुझाने पर भी नहीं माने. अटल बने रहे ददुआ. एक बार ठंडे दिमाग से सोचकर देखो विश्वनाथ, मैं तो फिर आ जाऊंगा. फिर... फिर कौने देखी है? और का सोचूं? का बचौ है सोचिवे कूं? वकील साहब ने पढ़कर सुना दिया, मैं विश्वनाथ प्रसाद वल्द सालिगराम, अपनी सही मानसिक स्थिति में, पूरे होशो-हवास में अपने हिस्से की धरती की वारिस बतासो बेगम बेवा सन्नू खां को करार दस्तखत करते समय हाथ कंपकंपा रहा था किंतु आंखों में स्थायी दृढ़ता लिए वे देर तक बैठे रहे. जि मेरे प्रानन से ज्यादा कीमती मेरी अमानत, अपने पास धरौ संभारिकै! नहीं माने. वकील साहब को पहुंचाने बाहर गांव तक गए. लोगों ने देखा, ठीक होने लगे हैं ददुआ, चलने-फिरने लगे अब तो ...मगर बहुत थक गए हैं वे. धौंकनी की तरह फूलती-पिचकती छाती. हंफहंफी की तेज रफ्तार. पसीने से नहा उठे... जैसे झुलसते जंगल की बीहड़ यात्रा से लौटे हों. वेदू भागकर पानी ले आया. बतासो ने सहारा लेकर खाट पर बिठा दिए, ऐसौ का काम आय गयौ ददुआ, जो तुम इतने परेसान... उन्होंने बिस्तर पर लेटकर आंखें मूंद लीं. धीरे-धीरे मन में मचा महाभारत विराम पर आ पहुंचा. आत्मा विश्रांति में उतरती जा रही है. लगता है, आज अपने ही रोपे बिरवे तले सुस्ता रहे हैं वे.
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