हिरनी चंद्रकिरण सौनरेक्सा--------------------------------------------------------------------------------काली इटैलियन का बारीक लाल गोटेवाला चूड़ीदार पायजामा और हरे फूलोंवाला गुलाबी लंबाकुर्ता वह पहने हुई थी. गोटलगी कुसुंभी (लाल) रंग की ओढ़नी के दोनों छोर बड़ीलापरवाही से कंधे के पीछे पड़े थे, जिससे कुर्ते के ढीलेपन में उसकी चौड़ी छाती औरउभरे हुए उरोजों की पुष्ट गोलाई झलक रही थी. अपनी लंबी मजबूत मांसल कलाई से मूसलीउठाए वह दबादब हल्दी कूट रही थी. कलाई में फंसी मोटी हरी चूड़ियां और चाँदी के कड़ेऔर पछेलियाँ बार-बार झनक रही थीं. उन्हीं की ताल पर वह गा रही थी .'हुलर-हुलर दूध गेरे मेरी गाय... आज मेरा मुन्नीलाल जीवेगा कि नाय.'बड़ा लोच था उसके स्वर में. इस गवांरू गीत की वह पंक्ति उस तीखी दुपहरी में भीकानों में मिश्री की बूंदों के समान पड़ रही थी. कुछ देर मैं छज्जे की आड़ में खड़ीसुनती रही. न उसने कूटना बंद किया और न वह गीत की पंक्ति 'हुलर-हुलर.' धूप में पैरबहुत जलने लगे, तो मैं लौटने को ही थी कि पीछे से भाभी ने आ कर जोर से कहा,'खुदैजा, अरी देख, यह रही हमारी बीबीजी. चोरी-चोरी तेरा गीत सुन रही थीं.' उसनेतुरंत मूसली छोड़ कर ऊपर नजर उठाई और हंस पड़ी. फिर हाथ माथे पर रख कर बोली - 'सलामबीबीजी! बड़े भाग जो आज तेरे दरसन हो गए.' मैं झेंप गई. पिछवाड़ेवाले मकान में नएपड़ोसियों को आए पंद्रह दिन हो गए होंगे. भाभी से कई बार खुदैजा का जिक्र सुन कर भीऔर यह जान कर भी कि मुझसे मिलना-बोलना चाहती है, मैं कभी उससे परिचय करने न आई थी.मैं सोचती थी, उस ठेठ गंवार छोकरी से मैं किस विषय पर और क्या बातें करूँगी? अपनीझेंप मिटाने को मैं जल्दी से बोली - 'भाभी तुम्हारा गला तो बड़ा मीठा है; अपना गीतजरा फिर तो गाओ!' 'के, बीबी जी, मेरा गला! भला तुम तो बाजे पर गानेवाली ठहरीं, मेरागीत भावेगा?' उसने उत्तर दिया. उसके बोलने में तकल्लुफ नहीं, हार्दिकता थी. 'नहींनहीं, तुम गाओ... पूरा गाओ,' मैंने जोर दिया. बिना दोबारा इसरार कराए वह गाने लगी,उसी धीमी मीठी आवाज में - 'हुलर हुलर दूध गेरे मेरी गाय. आज मेरा मुन्नीलाल जीवेगाकि नाय. इस सासू की नजर बुरी है, मेरी माय. आज मेरा मुन्नीलाल जीवेगा कि नाय.' मुझेलगा, कि वह स्वर दबा कर गा रही है. 'भाभी, पूरा गला खोल कर गाओ,' मैंने अनुरोधकिया. उसने कुटी हल्दी को छलनी में उलट कर नीचे आंगन की ओर उंगली दिखा कर कहा -'फुफ्फी लड़ेगी!' भाभी ने कहा, 'मरने दे फुफ्फी को. बीबीजी, खुदैजा नाचती भी बहुतअच्छा है. ओ खुदैजा, जरा नाच ते सही.' वह थोड़ा शरमा गई. ओढ़नी मुंह में दबा करहंसने लगी. 'अच्छा भाभी! तुम्हें नाचना भी आता है. तब तो जरूर नाच कर दिखाओ,' भाभीकी शह पा कर मैंने भी कहा. परंतु वह नाचेगी, ऐसे मुझे जरा भी आशा नहीं थीं. भलाशहरों में जब हम पढ़ी-लिखी लड़कियों के आगे कोई बार-बार हारमोनियम-तबला रखता है,कई-कई बार इसरार करता है, तब पहले तो हम लोग नजाकत से गाना न आने की दलीलें पेशकरती हैं, इस पर भी जब वे लोग प्रमाण देते हैं कि आपने अमुक के जन्मदिवस पर और फलांकी शादी में अमुक गाना गाया था, तब गला खराब होने का बहाना किया जाता है. जब देखतेहैं कि किसी तरह पीछा नहीं छूटेगा, तब कहीं खांस-खखार कर एक आधी गत बजाई और बाजापरे सरका कर कहा, 'देखिए, कहीं आता भी है. आप फिजूल ही पीछे पड़े हुए हैं.' अरे बसयों हमारा गाना खत्म हो जाता है. 'खुदैजा, नाच दे न. अच्छा बीबीजी की बात भी नहींमाननी?' भाभी ने कहा, 'ले, मैं तो जाती हूं.' वह हड़बड़ा कर उठ बैठी - 'न न, जावेमत. तुझे अल्ला पाक की कसम सरसुती. ले, मैं नाच दूंगी, पर बीबीजी के पसंद आवेगामेरा नाच?' उसके पैर के कड़े-छड़े यद्दपि उसकी मांसल पिंडली और टखनों से चिपटे हुएथे, फिर भी गिनती में कई होने से आपस में खनक कर झनक उठे. ओढ़नी सिर पर ले, तनिक-साघूंघट निकाल कर वह खड़ी हो गई. फिर मुझे देख कर हंस पड़ी, बोली, 'नाचूं?' 'हां,हां!' 'के गाऊं सरसुती.' 'कुछ भी गा ले. वही गीत गा - 'लटक रहती बबुआ'.....' उसनेगाया - 'लटक रहती बबुआ तोरे बंगले में, जो मैं होती बागों की कोयल, कूक रहती, बबुआतोरे बंगले में.' किसी शास्त्र के अंतर्गत उसका नाच नहीं था. न कत्थक, न कथकली, नमनीपुरी, न उड़ीसी और न भरतनाट्यम्! बाहुओं के संचालन में कोई गहराई भी न थी, पर उससीधेपन में एक लय थी, गति थी... तेज और प्रवाहमयी... जीवन से भरपूर. अस्थायी केमोड़ पर नाचती हुई, वह दो फुट ऊपर उछल जाती और फिर धरती पर पांव लगते ही थिरकनेलगता, क्या मजाल, जो जरा पंजा रुकता हो. साढ़े पाँच फुट लंबी भरी देह की उस युवतीका गठन एकदम गिन्नी-गोल्ड की डली जैसा था - लाली लिए हुए रंग का ऐसा सोना, जिसमेंकयामत का लोच हो. गीत पूरा हुआ और वह नाच बंद कर लंबी-लंबी सांस लेने लगी. 'शाबाश,भाभी!' मैंने उत्साह से कहा, 'सचमुच बहुत अच्छा नाचती हो.' 'सच्ची! तुम्हें मेरानाच अच्छा लगा!' उसकी बिल्लौरी शीशे-सी आंखों में उत्साह छलक पड़ा. भोलेपन से उसनेपूछा - 'और नाचूं?' 'हां-हां!' छज्जे की आड़ में भी मेरे पांव जले जा रहे थे, फिरभी नीचे जाने को मन न होता था. उसने दुपट्टे से मुंह का पसीना पोंछा और पैर सेठुमका लिया ही था कि नीचे से किसी ने धीमी पर तीखी क्रोधभरी आवाज में कहा, 'ओघोड़ी! कूदना बंद कर दे! शफीक का अब्बा आ गया है.' खुदैजा के पांव रुक गए, जैसेकिसी तेज चाल से घूमते हुए लट्टू पर कोई अचानक हाथ रख दे. मुंह पर उदासी की छाया-सीआ गई, किन्तु भाभी से दृष्टि मिलते ही वह मुस्करा पड़ी और बोली, 'देखा मचने लगा नशोर! फुफ्फी का बस चले, तो मुझे बकस में बंद करके रक्खे.' फिर होंठों में ही किसीगीत की कड़ी गुनगुनाती हुई वह ओढ़नी के पल्ले से मुंह पर हवा करने लगी. नीचे सेसीढ़ियाँ चढ़ती हुई उसकी सास कहती आ रही थी, 'खुदैजा, तूने ते सारी हया-शरम घोल करपी डाली! अरी, तू क्या नटनी की धी है? कंजरियों की तरह हर वक्त गाती रहती है, बेहयाकहीं की... !' खुदैजा चमक पड़ी. गुस्से से उसके चेहरे का गेंहुआ रंग एकदम गहरासिंदूरी हो उठा. 'बस, फुफ्फी, अपना जबान बंद रख! नटनी होगी तू, तेरी धी!!कंजरी-वंजरी बनाएगी, तो देख ले मैं अपनी-तेरी जान एक कर दूंगी...! 'या परवरदिगार,'फूफी ऊपर आ चुकी थी. आसमान की तरफ दोनों हाथ उठा कर बोली, 'अल्ला का कहर पड़े तेरेऊपर...! खुदा करे, तेरे भाई की मैयत निकले! तूने हमारे खानदान की नाक काट ली. मेरेशफीक के लिए तू ही धरी थी. हाय अल्लाह, कैसी जुबान-दराज है. जी चाहता है जुबान खींचलूं इसकी... ' और फूफी तब नाक के स्वर में रो-रो कर अल्लाह को पुकारने लगी. मैंभाभी का हाथ पकड़ कर उन्हें खींचती हुई नीचे ले आई. तिरस्कार से मैंने कहा, 'यही हैतुम्हारी सहेली!' भाभी ने चिढ़ कर कहा, 'सहेली का क्या कसूर बीबीजी? तुम्हें ही अगरकोई जेलखाने में बंद करके बाप-भाइयों को गालियां दे, तो कहाँ तक सुनोगी? वह तोरोहतक के किसी ठेठ गांव की लड़की है. शहरों के, मुंह में राम बगल में छुरीवालीसभ्यता तो जानती नहीं. उसे तुम 'तू' कहोगी, तो 'तू' सुनोगी भी! वैसे दिल की इतनीअच्छी है कि जरा-सा किसी का दुख नहीं देख सकती. गरूर-मिजाज तो वह जानती तक नहीं.' -और भाभी कुछ अप्रसन्न-सी हो कर बाहर चली गई. दूसरे दिन सिर धो कर बाल सुखाने मैंपिछवाड़े के छज्जे पर गई. खुदैजा को देखने का लोभ भी इसका एक कारण था. वह अपनीदेहरी पर बैठी कुछ सी रही थी, साथ ही कोई गीत भी गुनगुनाती जा रही थी. मैंने हल्केसे खांसा आहट पा कर सिर उसने ऊँचा किया. मुझे देखते ही उसका मुंह प्रसन्नता सेगुलाब की भांति खिल उठा. फौरन हाथ माथे पर रख कर बोली, 'सलाम बीबीजी! राजी तो हो?''सलाम!' मैंने जवाब दे कर पूछा, 'क्या सी रही हो?' 'के बताऊं बीबीजी! बिचारी फुफ्फीके हाथों में तो खुजली हो रही है. अल्लाह मारा ऐसा रोग है कि आदमी अपने हाथ से खाभी न सके. उसका पैजामा फट गया है, उसी में टाँके लगा रही हूं.' मुझे कल की घटना यादहो आई. धीरे से पूछा, 'मेल हो गया सास से?' खुदैजा हंसी, बोली, 'सास-बहू की केलड़ाई बीबीजी! पर मने कोई गाली दे हैं, तो बस म्हैं तो ऊपर से तले तक बल उठूँ हूं.''पर भाभी, इन लोगों से तुम्हारी पटती नहीं. तुम्हारे बाप ने तुम्हें क्यों शहर मेंब्याह दिया?' खुदैजा का स्वर कुछ बोझिल हो गया, बोली, 'बीबीजी, मेरा बाप तो गरीबआदमी है. अब्बा (ससुर) ने मने कहीं गांव में देख ली थी, सो मेरे चाचा से माँगी. वोसीधा आदमी, बातों में आ गया, उसे के खबर थी कि शहरों में घर जेलखानों जैसे होवैहैं.' 'तुम्हारे गांव में क्या परदा नहीं होता था?,' मैंने पूछा. 'बीबीजी, परदावहाँ करे, जहाँ पाप बसता हो. गांव में सब भैन-बेटियाँ समझे हैं. परदा करें तो फिरखेत-क्यार का काम कैसे चले?' 'तभी तुम्हें इतने गीत याद हैं,' मैंने मजाक किया,'घर-घर गाती हुई घूमती होगी.' और यह सुनते ही किसी सुखद स्मृति से पुलक उठी,'बीबीजी, सावन के महीने में हम सब छोरियाँ नीम में झूला डालतीं, आधी रात तक पेंगेंबढ़ातीं और गाती-नाचती. ब्याह-शादी में रात-रात भर चाँदनी में नाच-गाना होता,बहू-बेटी गातीं और बड़े-बूढ़े चौपाल में सुना करते.' 'बहुएँ भी परदा नहीं करतीथीं?' 'अरे के परदा!' उसने ओढ़नी से मुंह ढँक कर कहा, 'ऐसे, बस परदा हो गया... कोईबोल-चाल का परदा होता है? घूंघट मार लिया और गाती रहीं.' 'अच्छा!' मैं चुप हो गई.सच है, हेड कांसटेबिल के बेटे की बहू पर बड़ा तरस आ रहा था. बेचारी बड़ी बुरी फंसीथी. 'बीबीजी, एक गीत गाऊं?' 'गाओ,' मैंने खुश हो कर कहा. और सब कुछ भूल, अपने स्वरको पंचम तक पहुंचा कर उसने गाया - 'कोठे ऊपर कोठरी, जिसमें तपे तनूर, गिन-गिन लाऊँरोटियाँ मेरा खानेवाला दूर री, मेरी बाली का बाला जोबनवा बटवा गूँथन दे... !' 'अरीखुदैजा,' नीचे से उसकी सास ने पुकारा, 'कमबख्त! आने दे तेरे यार को, उसी से तुझेठीक कराऊँगी... कल शफीक दौरे से लौट आवे, तब तेरी मरम्मत कराऊँगी.' और फिर दोनोंसास-बहुओं में ठन गई. दूसरे दिन मैं छत पर न गई. परंतु तीसरे पहर भाभी ने जब नीचे आकर बताया कि खुदैजा छत पर बैठी रो रही है, उसके पति ने रात उसे लकड़ी से मारा था,तो मैं अपने को रोक न सकी. ऊपर जा कर देखा, खुदैजा छत पर खपरैल तले खटोले पर पड़ीरो रही थी. 'भाभी!' मैंने धीरे से उसे पुकारा. वह चमक कर उठ बैठी. मुझे देख कर अपनीआँसू भरी आंखों से ही हंस पड़ी, 'बड़ी उमर बीबीजी, मैं तो तुमे ही याद कर रही थी,सलाम.' सलाम का उत्तर दे, मैंने पूछा, 'रात क्या गुजरी?' 'गुजरी के!' उसने तपे हुएस्वर में कहा, 'तेरा भाई आया था. फूफी ने जाने के सिखा दिया. आते ही उसने लाठी पकड़ली,' कहते-कहते उसका स्वर ठंडा हो गया, हंसी की पुट भी आ गई, 'बीबीजी, बोल्ला नचाल्ला, अल्लाह कसम, दो लकड़ी जमा दी,' और उसने अपनी पीठ दिखाई, जो रीढ़ के पास छिलगई थी. सहानुभूति से मैंने कहा, 'राम-राम, बड़ा कसाई है!' हंस पड़ी खुदैजा. बोली,'बीबीजी, के बताऊँ... मने दुनिया की शरम खा गई कि लोग कहेंगे कि खसम को मारा, नहींतो लकड़ी समेत टाँगों में ऐसे दबा लेती... चूँ करके रह जाता. सारी सिपाहीगीरी लिकड़जाती,' और उसने अपने पुष्ट हाथों से मरोड़ देने का अभिनय किया. खुदैजा की बातेंछोड़ कर जाने की इच्छा न होती थी. जिस निष्कपट सरल भाव से वह बातें कर रही थी, उनकेप्रभाव से मन-मस्तिष्क पर एक नशा-सा छा जाता था. आधी रात के सन्नाटे में भी उसकेगले की मिठास कानों में गूँजती थी. काश, उसे अगर कुछ दिन संगीत सिखाया जाता. अचानकमुझे ध्यान आया कि कहीं मुझसे बातें करने में वह गाना न सुनाने लगे, तो फिर उस परमार पड़े. इसलिए 'अभी आती हूं,' कह कर मैं झटपट नीचे उतर गई. आते-आते सुना कि वहपुकार कर कह रही थी, 'अल्लाह की कसम बीबीजी, जल्दी आइओ! जरा अपना बाजा भी उठालाइयो. मैं भी देखूँ, कैसे बजे हैं.' कई दिनों से मेरी भाभी बीमार थीं. और छोटीभतीजी कुसुम भी अचानक सर्दी खा गई और तेज बुखार हो गया. पास-पड़ोस से स्त्रियाँउन्हें देखने-पूछने आती रहती थीं. घर का काम सब मेरे ऊपर था. इसी से सैर करने जानातो दूर, छत पर जाना भी नहीं हुआ. खुदैजा ने कई बार अपने नन्हें देवर को भेज करबुलवाया कि मैं तनिक देर को छत पर हो जाऊँ, पर इच्छा होने पर भी न जा सकी. चिरागजले उसकी सास बुरका ओढ़ कर छोटे लड़के को साथ ले कर आई. लड़के द्वारा पहले पुछवालिया था कि घर में कोई मर्द तो नहीं, तब बेचारी कमरे में घुसी. 'कैसी तबीयत है,बहू?' 'अब तो जरा ठीक हूं,' भाभी ने कहा, 'आइए - बीबीजी, जरा कुर्सी दे जाना.' 'सचमानो बहू, खुदैजा पर तो तुमने जादू कर दिया है.' फूफी कुर्सी पर बैठ कर बोलीं, 'जबसे सुना है, मछली-सी तड़फ रही है. वह मुर्दो तो बुरका उठाए चली आ रही थी, मुश्किलोंरोका... तुम जानों बहू, हम लोगों में हिंदुओं की तरह चादर बगल में दबाई और घर-घरघूमने चल दिए वाली बात तो होती नहीं. जो ऐसा करती हैं, वे बदनाम हो जाती है, खैर,तुमसे तो अपनों जैसा मेल हो गया है. रात को लाऊँगी उसे भी.' 'फूफीजी, जो बड़े-बड़ेअमीर-उमरा होते हैं, उनकी लड़कियाँ तो हमारी ही तरह बाहर आती-जाती हैं.' - भाभी दबेस्वर में बोलीं. 'तुफ उन लोगों पर! वह मुसलमाननी क्या जिसके पैर का नाखून भी किसीगैर मर्द ने देख लिया? शहरी तहजीब-कायदा तो यही है, नीच कौमों और गंवारों की बातछोड़ दो.' आगे बहस फिजूल थी. भाभी ने दूसरी बातें छेड़ दीं. रात को दस बजे खुदैजाआई. साथ में फूफी, दोनों देवर और ननदें भी थीं. आते ही भाभी के गले से लिपट गई, फिरमेरे से. कुसुम को तो छोड़ती न थी, 'अरे मेरे मुन्नीलाल, तुझे किस सौकण (सौत) कीनजर लग गई! मेरे कुलसुम.... क्यों ऐ सरसुती, तूने छोरी भी बीमार कर दी?' 'अरीखुदैजा! धीरे बोल.' फूफी दबे स्वर में गुर्राई, 'कुलसुम का अब्बा बैठक में सो रहाहै. 'के फूफ्की!' खुदैजा ने झनक कर कहा, 'तेरी धीरे-धीरे ने तो जान खा डाली. अब केहाँड़ी में मुंह करके बोलूँ?' 'तोबा!' फूफी खून का-सा घूँट पी कर रह गईं. खुदैजा कोपढ़ने का शौक सवार हुआ था. उर्दू का कायदा मँगा कर देवर से पढ़ने लगी. छत पर होती,तो मुझे बुलवा कर पूछती. परंतु अक्षर उसे याद न रहते. अलिफ बे की अपेक्षा गाने कीतर्जें उसे जल्दी याद हो जाती थीं. फूफी अगर इत्तफाक से अपने किस रिश्तेदार के यहाँचली जाती, तो फिर छत पर गाने-नाचने का तूफान उठा देती; चाहे शाम को लड़ाई-झगड़े औरमार-पीट की ही नौबत क्यों न आवे. वर्णमाला उसे याद नहीं हुई. इतनी दूर से पढ़ाई होभी न सकती थी. फिर उसे घर का काफी काम भी रहता, क्योंकि उसे मोटी-ताजी देख कर फूफीऔर उनकी नाजुक शहराती लड़कियाँ तो कुछ करके न देती थीं. और मुझे अपनी पढ़ाई-लिखाईऔर गृहस्थी का काम रहता था. फिर मैं तो कुछ सामाजिक और राजनैतिक कार्यों में भीहिस्सा लेती थी. शहर में एक जुलूस निकलनेवाला था. मैं जा रही थी. 'बीबीजी, कहाँचली?' उसने छत से पुकारा. 'जुलूस में!' मैं जल्दी से बोली, 'आज बड़ा भारी जुलूसनिकलेगा.' 'हाय, बीबीजी! मैं क्यों कर निकलूँ इस जेल खाने से.' उसके स्वर में तड़पथी. 'अच्छा सलाम!' मैं हाथ उठा कर चल पड़ी. पर मन में खुदैजा का वह स्वर कचोटें भररहा था, 'मैं क्यों कर निकलूँ इस जेलखाने से... !' दस बजे जुलूस और मीटिंग समाप्तहोने पर मैं घर लौटी, तो सुना पिछवाड़े बड़ा गुलगपाड़ा मच रहा था. भाभी ने द्वारखोल कर कहा, 'बीबीजी, आज न जाने खुदैजा पर क्या बीतेगी. फूफी अपने मामू के यहाँ गईथी. वह मेरे नन्हें को चार पैसों का लालच दे कर उसके साथ चुपके से जुलूस देखने चलीगई.' और भाभी घबराहट में ज्यादा कह न पाई. मैं भी डर गई. हम दोनों छत पर कान लगाएसुनती रहीं. उसके ससुर बार-बार कह रहे थे, 'आज मेरी पगड़ी इसने पैरों तले रौंदडाली... इस पड़ौस में आ कर यह एकदम बिगड़ गई है. कल ही यह मकान छोड़ दूँगा. इस बारतो दोहरी डेवढ़ी का मकान लेना पड़ेगा.' दो दिन बाद पिछवाड़े का मकान खाली हो गया.खुदैजा रो-रो कर बिदा हुई हमसे. पालकी में बैठी भी ऊँचे स्वर में रो रही थी. खुदैजाकी कोई खबर न लगी. चार-पाँच साल निकल गए. अब मेरे भी एक नन्हीं बच्ची थी. मैं मांथी. घूमना-फिरना कम हो गया था. बंधनवश नहीं, यही गृहस्थी और बच्ची की देख-भाल कीवजह से. फिर भी, इस बार थोड़ी फुरसत निकाल कर देहली घूमने आई थी. लाल किले भी गई.शाही हमाम में कुछ बुरकेवालियाँ दिखाई दीं. 'बीबीजी!' अकस्मात् धीरे से उनमें से एकने आ कर मेरा कंधा छुआ. मैंने आश्चर्य से देखा, खुदैजा थी! - लंबी, पीली, गालों कीहड्डियाँ उभरी हुई, आंखों में गड्ढे पड़े हुए - खुदैजा ही थी. 'अरे भाभी तुम,वाह... !' मैंने उसका हाथ पकड़ लिया. 'राजी रहीं बीबीजी! अच्छा, शादी हो गई?मुबारिक.' उसने फुसफुसा कर कहा. और सिर्फ पहचान करने-कराने को उसने जो बुरका उठा.दिया था उसे फिर डाल लिया, हालाँकि उस समय वहाँ कोई मर्द न था. खुदैजा के इसव्यवहार पर मुझे आश्चर्य हुआ. स्वच्छंद हिरनी अब खूंटे से बंधी बकरी थी. 'वाह, अबतुम एकदम बंदगोभी हो गई, भाभी!' 'हमेशा ही बेवकूफ थोड़ी ही बनी रहूंगी,' उसने धीमेसे उत्तर दिया, 'अब तो अक्ल आ गई है.' 'अच्छा, अक्ल आ गई है? अब तो बड़ी उर्दूदांबनगई हो. हमें तो भई नहीं आई अक्ल. उसी तरह बेलगाम घूमती हूं.....' उसने जाली में सेएक बार देखा और पलकें झुका लीं. उसकी साथिनें बाहर पहुँच चुकी थीं. नन्हें ने जो अबबारह-तेरह साल का हो गया था, नकीब की तरह पुकारा - 'भाभी!' और खुदैजा उम्रकैदी कीतरह मुड़-मुड़ कर पीछे देखती हुई चली गई.--------------------------------------------------------------------------------एक कहानी रोज़ः 'उसका चेहरा एस्तेबान से मिलता जुलता है'