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राजेंद्र ससुराल भी जाता तो हाथ में प्लास-पेचकस रहता था

एक कहानी रोज़ में आज पढ़िए धर्मेन्द्र राजमंगल की कहानी बिजली मिस्त्री

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27 नवंबर 2016 (अपडेटेड: 27 नवंबर 2016, 06:08 AM IST)
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किसी के भी घर की बिजली खराब होती तो एक ही आदमी ध्यान आता, वो था बस्ती में रहने वाला राजेंद्र. राजेंद्र के साथ बिजली की दोस्ती थी या दुश्मनी ये तो पता नहीं लेकिन बिजली ने कई बार राजेंद्र को पटखनी लगा दी थी. किन्तु इतनी पटखनी लगने के बाद भी राजेंद्र ने बिजली का काम करना न छोड़ा था. बिजली खम्भों पर लटक रहे तारों में दौड़ रही होती थी और राजेंद्र तारों के नीचे, ऐसा लगता था मानो राजेंद्र और बिजली में दिन भर भागने का कम्पटीशन होता हो.
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राजेंद्र की जेब में एक भी रुपया न हो लेकिन उसके पास बिजली ठीक करने का प्लास, पेचकस और बिजली के तारों से लपेटने का काला टेप अवश्य होता था. लोग तो ये तक कहते थे कि राजेंद्र के पास जो बिजली ठीक करने का औजार है वो किसी के पास नहीं मिलता, सरकारी बिजली मिस्त्री के पास भी नहीं. राजेंद्र को घर की उतनी फिकर नहीं रहती थी जितनी अपने औजारों की रहती थी, समय समय पर प्लास और पेचकस को चेक करते रहना जैसे राजेंद्र का दैनिक कर्म था.
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बेचारी माला, क्या कहती, चुपचाप राजेंद्र की बात मान गयी. लेकिन राजेंद्र को अपनी बीबी से प्यार तो था, बीबी भी राजेंद्र को उतना ही प्यार करती थी, वो बात अलग थी कि बिजली के बीच में आने से दोनों में हल्का सा झगड़ा हो जाया करता था. राजेंद्र न तो अपनी बीबी से अलग रह सकता था और न ही बिजली से, माला भी राजेंद्र से अलग न रहा सकती थी, यही सब सोच कर दोनों एक-दूसरे की इच्छाओं को मानते चले जाते. राजेंद्र की बीबी माला भी धीरे धीरे बिजली से अपना रिश्ता जोड़ बैठी, मानो बिजली राजेंद्र की दूसरी बीबी हो और माला ने न चाहते हुए भी उसे अपने घर में जगह दे दी हो. दिन यूं ही कट रहे थे, बिजली बिभाग के एक अफसर ने राजेंद्र से सरकारी नौकरी करने के लिए भी कहा था लेकिन राजेंद्र ने साफ़ मना कर दिया. कहता था, “भला सरकारी मुलाजिम बनकर बिजली ठीक करना कहां की होशियारी, वहां तो लोग पैसा कमाने के लिए जाते हैं, बिजली ठीक करने का काम तो उनसे होता ही नहीं, दिन भर दफ्तर में बैठे रहें और बस्तियों की बिजली खराब पड़ी रहे, मजबूर हो लोग राजेंद्र जैसे लोगों को ढूंढ बिजली ठीक करा लेते हैं.” कुछ लोगों को राजेंद्र की बात बहुत बेबकूफाना लगी लेकिन राजेंद्र का बिजली प्रेम उसे सरकारी नौकरी करने से रोकता था, घरों के लिए प्राईवेट काम करके उसे जो भी पैसा मिलता वो उसे से अपना गुजरा चलाता. लोग राजेंद्र के बिजली ठीक करने के तरीके के मुरीद थे. किसी से भी राजेंद्र ने काम से ज्यादा पैसा नहीं मांगा था, किसी किसी के घर से तो काम का पैसा भी नहीं लेता था, जबकि गरीबों के घर की बिजली फ्री में ठीक कर देता. राजेंद्र को लेकर लोगों में तरह तरह की बातें होती थीं, राजेंद्र को चाहने वाले लोग तो यह तक कहते थे कि राजेंद्र जिस घर में खड़ा हो जाए उस घर की बिजली खराब होने की हिम्मत नहीं कर सकती, मानो बिजली राजेंद्र के डर से थर-थर कांपती हो. लोग तो यह भी कहते थे कि राजेंद्र के हाथ से ठीक की गयी लाइन सालों तक खराब होने का नाम नहीं लेती, जबकि अन्य मिस्त्रियों की ठीक की हुई बिजली चार दिन में ही अपना दम तोड़ देती है. राजेंद्र कभी पैसा कमाने के लिए बिजली ठीक नहीं करता था, वो तो अपना शौक पूरा करने के लिए बिजली ठीक करता था. वहीं बाहर के मिस्त्री चाहते थे कि घरों की बिजली रोज खराब हो तो उन्हें रोज पैसा कमाने का मौका मिले लेकिन राजेंद्र की भावना इस से मेल नहीं खाती थी. यही कारण था कि राजेंद्र के न होने पर लोगों के घरों की बिजली दो दिन तक खराब पड़ी रहती लेकिन किसी अन्य मिस्त्री से ठीक कराने की कोशिश न की जाती. जब राजेंद्र आता तब बो बिजली ठीक होती थी. लोगों में राजेंद्र का बिश्वास बिजली के भगवान की तरह था, मानो दुनिया में राजेंद्र के अलावा कोई इतनी अच्छी बिजली ठीक करता ही न हो.
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माला ने घर से निकलते हुए राजेंद्र को फिर से टोका, बोली, “सुनो, मेरी दाईं आंख फड़क रही है, जरा सम्हल कर काम करना”. राजेंद्र थोडा ठिठका, बोला, “बावली दाईं आंख तो शुभ होती है”. माला समझाने के लहजे में बोली, “तीन बच्चों के बाप हो गये लेकिन ये नहीं जानते कि औरत की दायीं आंख फडकना अशुभ होती है और मर्द की शुभ”. राजेंद्र मुस्कुराया और दरवाजे से यह कहता हुआ निकल गया, “ठीक है, सम्हल कर काम करूंगा”. माला भगवान का नाम ले रोटियां सेंकने में लग गयी. राजेंद्र सडक पर खड़े मुख्य बिजली के मुख्य खंभे पर जा पहुंचा, बस्ती को आने वाली लाइन का एक तार टूट कर गिर पड़ा था. फटाफट से राजेंद्र बगल के बिजली घर में फोन पर बात की और थोड़ी देर में ही लाइन से बिजली कटवा दी. लाइन से बिजली कटते ही राजेंद्र अपने औजारों के साथ बिजली के खम्भे पर जा चढ़ा. उसका खम्भे पर चढना देख लोगों को अचरज होता था, राजेंद्र बन्दर की तरह फुर्ती से खम्भे पर चढ़ जाता था, जबकि लोग खंभे को पकड़ने में भी डरते थे. राजेंद्र ने फटाफट से लाइन को जोड़ना शुरू कर दिया, बस्ती के तार को मुख्य खम्भे वाली लाइन से जोड़ते समय अचानक से जोरदार चिंगारी उठी और देखते ही देखते राजेंद्र बिजली के तारों से चिपक गया, उसके मुंह से केवल घुटी हुई आवाज आ रही थी. नीचे खड़े लोगों में खलबली मच गयी, इतने में राजेंद्र धडाम से खम्भे से धरती पर आ गिरा. जिस वक्त राजेंद्र लाइन को जोड़ रहा था उस समय लाइन में अचानक से बिजली आ गयी थी, राजेन्द्र को जितनी जगह बिजली के तारों ने पकड़ा था उतनी जगह की खाल आग जैसी जल गयी थी, बेहोशी की हालत में ही लोग राजेंद्र को हॉस्पिटल ले पहुंचे.
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दो तीन दिन में राजेंद्र को घर भेज दिया गया लेकिन अभी राजेंद्र ठीक से चलने फिरने के काबिल भी नहीं था. बिजली घर का इंचार्ज आकर राजेंद्र से माफी मांग गया, राजेंद्र के फोन करने के बावजूद भी उसे ध्यान न रहा कि लाइन में बिजली नहीं देनी है. इंचार्ज की छोटी सी गलती ने राजेंद्र को तहस-नहस कर डाला था. राजेंद्र की बीबी का तो रोना रुकता ही नहीं था. बच्चे भी अपने पिता की हालत को देख रो रहे थे. बस्ती का हर आदमी राजेंद्र के साथ हुई घटना से स्तब्ध था. माला रो रो कर कहती थी, “आज के बाद मरे मारे भी तुमको बिजली से हाथ न लगाने दूंगी, मुझे पता था कि ये बिजली मेरी सौतन है, तुमको कितना समझाया लेकिन मानते ही न थे”. आराम से चारपाई पर पडा राजेंद्र माला की बात से आज भी सहमत नहीं था, राजेंद्र को आज भी अपनी बिजली से कोई शिकायत नहीं थी, उसे ऐसा महसूस होता था मानो उसकी महबूबा ने उसे जमकर झाडा हो. मतवाले बिजली मिस्त्री की आज भी तमन्ना थी कि वो फिर से बिजली ठीक करने का काम किया करेगा.

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