धूप का एक टुकड़ानिर्मल वर्मा--------------------------------------------------------------------------------क्या मैं इस बेंच पर बैठ सकती हूं? नहीं, आप उठिए नहीं - मेरे लिए यह कोना ही काफीहै. आप शायद हैरान होंगे कि मैं दूसरी बेंच पर क्यों नहीं जाती? इतना बड़ा पार्क -चारों तरफ खाली बेंचें - मैं आपके पास ही क्यों धंसना चाहती हूं? आप बुरा न मानें,तो एक बात कहूं - जिस बेंच पर आप बैठे हैं, वह मेरी है. जी हां, मैं यहां रोज बैठतीहूं. नहीं, आप गलत न समझें. इस बेंच पर मेरा कोई नाम नहीं लिखा है. भलाम्यूनिसिपैलिटी की बेंचों पर नाम कैसा? लोग आते हैं, घड़ी-दो घड़ी बैठते हैं, औरफिर चले जाते हैं. किसी को याद भी नहीं रहता कि फलां दिन फलां आदमी यहां बैठा था.उसके जाने के बाद बेंच पहले की तरह ही खाली हो जाती है. जब कुछ देर बाद कोई नयाआगंतुक आ कर उस पर बैठता है, तो उसे पता भी नहीं चलता कि उससे पहले वहां कोई स्कूलकी बच्ची या अकेली बुढ़िया या नशे में धुत्त जिप्सी बैठा होगा. नहीं जी, नाम वहींलिखे जाते हैं, जहां आदमी टिक कर रहे - तभी घरों के नाम होते हैं, या फिर कब्रों के- हालांकि कभी-कभी मैं सोचती हूं कि कब्रों पर नाम भी न रहें, तो भी खास अंतर नहींपड़ता. कोई जीता-जागता आदमी जान-बूझ कर दूसरे की कब्र में घुसना पसंद नहीं करेगा!आप उधर देख रहे हैं - घोड़ा-गाड़ी की तरफ? नहीं, इसमें हैरानी की कोई बात नहीं.शादी-ब्याह के मौकों पर लोग अब भी घोड़ा-गाड़ी इस्तेमाल करते हैं. मैं तो हर रोजदेखती हूं. इसीलिए मैंने यह बेंच अपने लिए चुनी है. यहां बैठ कर आंखें सीधी गिरजेपर जाती हैं - आपको अपनी गर्दन टेढ़ी नहीं करनी पड़ती. बहुत पुराना गिरजा है. इसगिरजे में शादी करवाना बहुत बड़ा गौरव माना जाता है. लोग आठ-दस महीने पहले से अपनानाम दर्ज करवा लेते हैं. वैसे सगाई और शादी के बीच इतना लंबा अंतराल ठीक नहीं.कभी-कभी बीच में मन-मुटाव हो जाता है, और ऐन विवाह के मुहूर्त पर वर-वधू में से कोईभी दिखाई नहीं देता. उन दिनों यह जगह सुनसान पड़ी रहती है. न कोई भीड़ न कोईघोड़ा-गाड़ी. भिखारी भी खाली हाथ लौट जाते हैं. ऐसे ही एक दिन मैंने सामनेवाली बेंचपर एक लड़की को देखा था. अकेली बैठी थी और सूनी आंखों से गिरजे को देख रही थी.पार्क में यही एक मुश्किल है. इतने खुले में सब अपने-अपने में बंद बैठे रहते हैं.आप किसी के पास जा कर सांत्वना के दो शब्द भी नहीं कह सकते. आप दूसरों को देखतेहैं, दूसरे आपको. शायद इससे भी कोई तसल्ली मिलती होगी. यही कारण है, अकेले कमरे मेंजब तकलीफ दुश्वार हो जाती है, तो अक्सर लोग बाहर चले आते हैं. सड़कों पर. पब्लिकपार्क में. किसी पब में. वहां आपको कोई तसल्ली न भी दे, तो भी आपका दुख एक जगह सेमुड़ कर दूसरी तरफ करवट ले लेता है. इससे तकलीफ का बोझ कम नहीं होता; लेकिन आप उसेकुली के सामान की तरह एक कंधे से उठा कर दूसरे कंधे पर रख देते हैं. यह क्या कमराहत है? मैं तो ऐसा ही करती हूं - सुबह से ही अपने कमरे से बाहर निकल आती हूं.नहीं, नहीं - आप गलत न समझें - मुझे कोई तकलीफ नहीं. मैं धूप की खातिर यहां आती हूं- आपने देखा होगा, सारे पार्क में सिर्फ यही एक बेंच है, जो पेड़ के नीचे नहीं है.इस बेंच पर एक पत्ता भी नहीं झरता - फिर इसका एक बड़ा फायदा यह भी है कि यहां सेमैं सीधे गिरजे की तरफ देख सकती हूं -लेकिन यह शायद मैं आपसे पहले ही कह चुकी हूं.आप सचमुच सौभाग्यशाली हैं. पहले दिन यहां आए - और सामने घोड़ा-गाड़ी! आप देखते रहिए- कुछ ही देर में गिरजे के सामने छोटी-सी भीड़ जमा हो जाएगी. उनमें से ज्यादातर लोगऐसे होते हैं, जो न वर को जानते हैं, न वधु को. लेकिन एक झलक पाने के लिए घंटोंबाहर खड़े रहते हैं. आपके बारे में मुझे मालूम नहीं, लेकिन कुछ चीजों को देखने कीउत्सुकता जीवन-भर खत्म नहीं होती. अब देखिए, आप इस पेरेंबुलेटर के आगे बैठे थे.पहली इच्छा यह हुई, झांक कर भीतर देखूं, जैसे आपका बच्चा औरों से अलग होगा. अलगहोता नहीं. इस उम्र में सारे बच्चे एक जैसे ही होते हैं. मुंह में चूसनी दबाए लेटेरहते हैं. फिर भी जब मैं किसी पेरेंबुलेटर के सामने से गुजरती हूं, तो एक बार भीतरझांकने की जबर्दस्त इच्छा होती है. मुझे यह सोच कर काफी हैरानी होती है कि जो चीजेंहमेशा एक जैसी रहती हैं, उनसे ऊबने के बजाय आदमी सबसे ज्यादा उन्हीं को देखना चाहताहै, जैसे प्रैम में लेटे बच्चे या नव-विवाहित जोड़े की घोड़ा-गाड़ी या मुर्दों कीअर्थी. आपने देखा होगा, ऐसी चीजों के इर्द-गिर्द हमेशा भीड़ जमा हो जाती है. अपनाबस हो या न हो, पांव खुद-ब-खुद उनके पास खिंचे चले आते हैं. मुझे कभी-कभी यह सोच करबड़ा अचरज होता है कि जो चीजें हमें अपनी जिंदगी को पकड़ने में मदद देती हैं, वेचीजें हमारी पकड़ के बाहर हैं. हम न उनके बारे में कुछ सोच सकते हैं, न किसी दूसरेको बता सकते हैं. मैं आपसे पूछती हूं - क्या आप अपनी जन्म की घड़ी के बारे में कुछयाद कर सकते हैं, या अपनी मौत के बारे में किसी को कुछ बता सकते हैं, या अपने विवाहके अनुभव को हू-ब-हू अपने भीतर दुहरा सकते हैं? आप हंस रहे हैं... नहीं, मेरा मतलबकुछ और था. कौन ऐसा आदमी है, जो अपने विवाह के अनुभव को याद नहीं कर सकता! मैंनेसुना है, कुछ ऐसे देश हैं, जहां जब तक लोग नशे में धुत्त नहीं हो जाते, तब तक विवाहकरने का फैसला नहीं लेते. और बाद में उन्हें उसके बारे में कुछ याद नहीं रहता. नहींजी, मेरा मतलब ऐसे अनुभव से नहीं था. मेरा मतलब था, क्या आप उस क्षण को याद कर सकतेहैं, जब आप एकाएक यह फैसला कर लेते हैं कि आप अलग न रह कर किसी दूसरे के साथरहेंगे. जिंदगी-भर? मेरा मतलब है, क्या आप सही-सही उस बिंदु पर अंगुली रख सकते हैं,जब आप अपने भीतर के अकेलेपन को थोड़ा-सा सरका कर किसी दूसरे को वहां आने देतेहैं?... जी हां, उसी तरह जैसे कुछ देर पहले आपने थोड़ा-सा सरक कर मुझे बेंच पर आनेदिया था और अब मैं आपसे ऐसे बातें कर रही हूं, मानो आपको बरसों से जानती हूं.लीजिए, अब दो-चार सिपाही भी गिरजे के सामने खड़े हो गए. अगर इसी तरह भीड़ जमा होतीगई, तो आने-जाने का रास्ता भी रुक जाएगा. आज तो खैर धूप निकली है, लेकिन सर्दी केदिनों में भी लोग ठिठुरते हुए खड़े रहते हैं. मैं तो बरसों से यह देखती आ रही हूं.कभी-कभी तो यह भ्रम होता है कि पंद्रह साल पहले मेरे विवाह के मौके पर जो लोग जमाहुए थे, वही लोग आज भी हैं, वही घोड़ा-गाड़ी, वही इधर-उधर घूमते हुए सिपाही, जैसेइस दौरान कुछ भी नहीं बदला है! जी हां - मेरा विवाह भी इसी गिरजे में हुआ था. लेकिनयह मुद्दत पहले की बात है. तब सड़क इतनी चौड़ी नहीं थी कि घोड़ा-गाड़ी सीधे गिरजेके दरवाजे पर आ कर ठहर सके. हमें उसे गली के पिछवाड़े रोक देना पड़ा था. और मैंअपने पिता के साथ पैदल चल कर यहां तक आई थी. सड़क के दोनों तरफ लोग खड़े थे और मेरादिल धुक-धुक कर रहा था कि कहीं सबके सामने मेरा पांव न फिसल पड़े. पता नहीं, वे लोगअब कहां होंगे, जो उस रोज भीड़ में खड़े मुझे देख रहे थे! आप क्या सोचते हैं. अगरउनमें से कोई आज मुझे देखे, तो क्या पहचान सकेगा कि बेंच पर बैठी यह अकेली औरत वहीलड़की है, जो सफेद पोशाक में पंद्रह साल पहले गिरजे की तरफ जा रही थी? सच बताइए,क्या पहचान सकेगा? आदमियों की तो बात मैं नहीं जानती, लेकिन मुझे लगता है कि वहघोड़ा मुझे जरूर पहचान लेगा, जो उस दिन हमें खींच कर लाया था. जी हां, घोड़ों कोदेख कर मैं हमेशा हैरान रह जाती हूं. कभी आपने उनकी आंखों में झांक कर देखा है?लगता है, जैसे वे किसी बहुत ही आत्मीय चीज से अलग हो गए हैं, लेकिन अभी तक अपनेअलगाव के आदी नहीं हो सके हैं. इसीलिए वे आदमियों की दुनिया में सबसे अधिक उदासरहते हैं. किसी चीज का आदी न हो पाना, इससे बड़ा और कोई दुर्भाग्य नहीं. वे लोग जोआखिर तक आदी नहीं हो पाते या तो घोड़ों की तरह उदासीन हो जाते हैं, या मेरी तरह धूपके एक टुकड़े की खोज में एक बेंच से दूसरी बेंच का चक्कर लगाते रहते हैं. क्या कहाआपने? नहीं, आपने शायद मुझे गलत समझ लिया. मेरे कोई बच्चा नहीं -यह मेरा सौभाग्यहै. बच्चा होता, तो शायद मैं कभी अलग नहीं हो पाती. आपने देखा होगा, आदमी और औरतमें प्यार न भी रहे, तो भी बच्चे की खातिर एक-दूसरे के साथ जुड़े रहते हैं. मेरेसाथ कभी ऐसी रुकावट नहीं रही. इस लिहाज से मैं बहुत सुखी हूं -अगर सुख का मतलब हैकि हम अपने अकेलेपन को खुद चुन सकें. लेकिन चुनना एक बात है, आदी हो सकना बिल्कुलदूसरी बात. जब शाम को धूप मिटने लगती है, तो मैं अपने कमरे में चली जाती हूं. लेकिनजाने से पहले मैं कुछ देर उस पब में जरूर बैठती हूं, जहां वह मेरी प्रतीक्षा करताथा. जानते हैं, उस पब का नाम? बोनापार्ट - जी हां, कहते हैं, जब नेपोलियन पहली बारइस शहर में आया, तो उस पब में बैठा था - लेकिन उन दिनों मुझे इसका कुछ पता नहीं था.जब पहली बार उसने मुझसे कहा कि हम बोनापार्ट के सामने मिलेंगे, तो मैं सारी शाम शहरके दूसरे सिरे पर खड़ी रही, जहां नेपोलियन घोड़े पर बैठा है. आपने कभी अपनी पहलीडेट इस तरह गुजारी है कि आप सारी शाम पब के सामने खड़े रहें और आपकी मंगेतरपब्लिक-स्टेचू के नीचे! बाद में जो उसका शौक था, वह मेरी आदत बन गई. हम दोनों हरशाम कभी उस जगह जाते, जहां मुझे मिलने से पहले वह बैठता था, या उस शहर के उन इलाकोंमें घूमने निकल जाते, जहाँ मैंने बचपन गुजारा था. यह आपको कुछ अजीब नहीं लगता कि जबहम किसी व्यक्ति को बहुत चाहने लगते हैं, तो न केवल वर्तमान में उसके साथ रहनाचाहते हैं, बल्कि उसके अतीत को भी निगलना चाहते हैं, जब वह हमारे साथ नहीं था! हमइतने लालची और ईर्ष्यालु हो जाते हैं कि हमें यह सोचना भी असहनीय लगता है कि कभीऐसा समय रहा होगा, जब वह हमारे बगैर जीता था, प्यार करता था, सोता-जागता था. फिरअगर कुछ साल उसी एक आदमी के साथ गुजार दें, तो यह कहना भी असंभव हो जाता है किकौन-सी आदत आपकी अपनी है, कौन-सी आपने दूसरे से चुराई है... जी हां, ताश के पत्तोंकी तरह वे इस तरह आपमें घुल-मिल जाती हैं कि आप किसी एक पत्तों को उठा कर नहीं कहसकते कि यह पत्ता मेरा है, और वह पत्ता उसका. देखिए, कभी-कभी मैं सोचती हूं कि मरनेसे पहले हममें से हर एक को यह छूट मिलनी चाहिए कि हम अपनी चीर-फाड़ खुद कर सकें.अपने अतीत की तहों को प्याज के छिलकों की तरह एक-एक करके उतारते जाएं. आपको हैरानीहोगी कि सब लोग अपना-अपना हिस्सा लेने आ पहुंचेंगे, मां-बाप, दोस्त, पति. सारेछिलके दूसरों के, आखिर की सूखी डंठल आपके हाथ में रह जाएगी, जो किसी काम की नहीं,जिसे मृत्यु के बाद जला दिया जाता है, या मिट्टी के नीचे दबा दिया जाता है. देखिए,अक्सर कहा जाता है कि हर आदमी अकेला मरता है. मैं यह नहीं मानती. वह उन सब लोगों केसाथ मरता है, जो उसके भीतर थे, जिनसे वह लड़ता था या प्रेम करता था. वह अपने भीतरपूरी एक दुनिया ले कर जाता है. इसीलिए हमें दूसरों के मरने पर जो दुख होता है, वहथोड़ा-बहुत स्वार्थी किस्म का दुख है, क्योंकि हमें लगता है कि इसके साथ हमारा एकहिस्सा भी हमेशा के लिए खत्म हो गया है. अरे देखिए - वह जाग गया. जरा पेरेंबुलेटरहिलाइए, धीरे-धीरे हिलाते जाइए. अपने आप चुप हो जाएगा. मुंह में चूसनी इस तरह दबाकर लेटा है, जैसे छोटा-मोटा सिगार हो! देखिए-कैसे ऊपर बादलों की तरफ टुकुर-टुकुरताक रहा है! मैं जब छोटी थी, तब लकड़ी ले कर बादलों की तरफ इस तरह घुमाती थी, जैसेवे मेरे इशारों पर ही आकाश में चल रहे हों... आप क्या सोचते हैं? बच्चे इस उम्र मेंजो कुछ देखते हैं या सुनते हैं, वह क्या बाद में उन्हें याद रहता है? रहता जरूरहोगा. कोई आवाज, कोई झलक, या कोई आहट, जिसे बड़े हो कर हम उम्र के जाले में खो देतेहैं. लेकिन किसी अनजाने मौके पर, जरा-सा इशारा पाते ही हमें लगता है कि इस आवाज कोकहीं हमने सुना है, यह घटना या ऐसी ही कोई घटना पहले कभी हुई है... और फिर उसकेसाथ-साथ बहुत-सी चीजें अपने आप खुलने लगती हैं, जो हमारे भीतर अरसे से जमा थीं,लेकिन रोजमर्रा की दौड़-धूप में जिनकी तरफ हमारा ध्यान जाता नहीं, लेकिन वे वहाँहैं, घात लगाए कोने में खड़ी रहती हैं - मौके की तलाश में - और फिर किसी घड़ी सड़कपर चलते हुए या ट्राम की प्रतीक्षा करते हुए या रात को सोने और जागने के बीच वेअचानक आपको पकड़ लेती हैं और तब आप कितना ही हाथ-पाँव क्यों न मारें, कितना हीक्यों न छटपटाएँ, वे आपको छोड़ती नहीं. मेरे साथ एक रात ऐसे ही हुआ था. हम दोनों सोरहे थे और तब मुझे एक अजीब-सा खटका सुनाई दिया - बिल्कुल वैसे ही, जैसे बचपन मेंमैं अपने अकेले कमरे में हड़बड़ा कर जाग उठती थी और सहसा यह भ्रम होता था कि दूसरेकमरे में मां और बाबू नहीं हैं - और मुझे लगता था कि अब मैं उन्हें कभी नहीं देखसकूंगी और तब मैं चीखने लगती थी. लेकिन उस रात मैं चीखी-चिल्लाई नहीं. मैं बिस्तरसे उठ कर देहरी तक आई, दरवाजा खोल कर बाहर झांका, बाहर कोई न था. वापस लौट कर उसकीतरफ देखा. वह दीवार की तरफ मुंह मोड़ कर सो रहा था, जैसे वह हर रात सोता था. उसेकुछ भी सुनाई नहीं दिया था. तब मुझे पता चला कि वह खटका कहीं बाहर नहीं, मेरे भीतरहुआ था. नहीं, मेरे भीतर भी नहीं, अंधेरे में एक चमगादड़ की तरह वह मुझे छूता हुआनिकल गया था - न बाहर, न भीतर, फिर भी चारों तरफ फड़फड़ाता हुआ. मैं पलंग पर आ करबैठ गई, जहां वह लेटा था और धीरे-धीरे उसकी देह को छूने लगी. उसकी देह के उन सबकोनों को छूने लगी, जो एक जमाने में मुझे तसल्ली देते थे. मुझे यह अजीब-सा लगा किमैं उसे छू रही हूं और मेरे हाथ खाली-के-खाली वापस लौट आते हैं. बरसों पहले कीगूंज, जो उसके अंगों से निकल कर मेरी आत्मा में बस जाती थी, अब कहीं न थी. मैं उसीतरह उसकी देह को टोह रही थी, जैसे कुछ लोग पुराने खंडहरों पर अपने नाम खोजते हैं,जो मुद्दत पहले उन्होंने दीवारों पर लिखे थे. लेकिन मेरा नाम वहां कहीं न था. कुछऔर निशान थे, जिन्हें मैंने पहले कभी नहीं देखा था; जिनका मुझसे दूर का भी वास्ता नथा. मैं रात-भर उसके सिरहाने बैठी रही और मेरे हाथ मुर्दा हो कर उसकी देह पर पड़ेरहे... मुझे यह भयानक-सा लगा कि हम दोनों के बीच जो खालीपन आ गया था, वह मैं किसीसे नहीं कह सकती. जी हां-अपने वकील से भी नहीं, जिन्हें मैं अरसे से जानती थी. वेसमझे, मैं सठिया गई हूं. कैसा खटका! क्या मेरा पति किसी दूसरी औरत के साथ जाता था?क्या वह मेरे प्रति क्रूर था? जी हां... उसने प्रश्नों की झड़ी लगा दी और मैं थी किएक ईडियट की तरह उनका मुंह ताकती रही. और तब मुझे पहली बार पता चला कि अलग होने केलिए कोर्ट, कचहरी जाना जरूरी नहीं है. अक्सर लोग कहते हैं कि अपना दुख दूसरों केसाथ बांट कर हम हल्के हो जाते हैं. मैं कभी हल्की नहीं होती. नहीं जी, लोग दुख नहींबांटते, सिर्फ फैसला करते हैं - कौन दोषी है और कौन निर्दोष... मुश्किल यह है, जोएक व्यक्ति आपकी दुखती रग को सही-सही पहचान सकता है, उसी से हम अलग हो जाते हैं.इसीलिए मैं अपने मुहल्ले को छोड़ कर शहर के इस इलाके में आ गई, यहां मुझे कोई नहींजानता. यहां मुझे देख कर कोई यह नहीं कहता कि देखो, यह औरत अपने पति के साथ आठ वर्षरही और फिर अलग हो गई. पहले जब कोई इस तरह की बात कहता था, तो मैं बीच सड़क पर खड़ीहो जाती थी. इच्छा होती थी, लोगों को पकड़ कर शुरू से आखिर तक सब कुछ बताऊं... कैसेहम पहली शाम अलग-अलग एक-दूसरे की प्रतीक्षा करते रहे थे - वह पब के सामने, मैंमूर्ति के नीचे. कैसे उसने पहली बार मुझे पेड़ के तने से सटा कर चूमा था, कैसेमैंने पहली बार डरते-डरते उसके बालों को छुआ था. जी हां, मुझे यह लगता था कि जब तकमैं उन्हें यह सच नहीं बता दूंगी, तब तक उस रात के बारे में कुछ नहीं कह सकूंगी, जबपहली बार मेरे भीतर खटका हुआ था और बरसों बाद यह इच्छा हुई थी कि मैं दूसरे कमरेमें भाग जाऊं, जहां मेरे मां-बाप सोते थे... लेकिन वह कमरा खाली था. जी, मैंने कहींपढ़ा था कि बड़े होने का मतलब है कि अगर आप आधी रात को जाग जाएं और कितना ही क्योंन चीखें-चिल्लाएं, दूसरे कमरे से कोई नहीं आएगा. वह हमेशा खाली रहेगा. देखिए, उसरात के बाद मैं कितनी बड़ी हो गई हूं! लेकिन एक बात मुझे अभी तक समझ में नहीं आती.भूचाल या बमबारी की खबरें अखबारों में छपती हैं. दूसरे दिन सबको पता चल जाता है किजहां बच्चों का स्कूल था, वहां खंडहर हैं; जहां खंडहर थे, वहां उड़ती धूल. लेकिन जबलोगों के साथ ऐसा होता है, तो किसी को कोई खबर नहीं होती. उस रात के बाद दूसरे दिनमैं सारे शहर में अकेली घूमती रही और किसी ने मेरी तरफ देखा भी नहीं. जब मैं पहलीबार इस पार्क में आई थी, इसी बेंच पर बैठी थी, जिस पर आप बैठे हैं. और जी हां, उसदिन मुझे बहुत आश्चर्य हुआ कि मैं उसी गिरजे के सामने बैठी हूं, जहां मेरा विवाहहुआ था. तब सड़क इतनी चौड़ी नहीं थी कि हमारी घोड़ा-गाड़ी सीधे गिरजे के सामने आसके. हम दोनों पैदल चल कर यहां आए थे. आप सुन रहे हैं, ओर्गन पर संगीत? देखिए,उन्होंने दरवाजे खोल दिए हैं. संगीत की आवाज यहां तक आती है. इसे सुनते ही मुझे पताचल जाता है कि उन्होंने एक-दूसरे को चूमा है, अंगूठियों की अदला-बदली की है. बस, अबथोड़ी-सी देर और है - वे अब बाहर आनेवाले हैं. लोगों में अब इतना चैन कहां कि शांतिसे खड़े रहें, अगर आप जा कर देखना चाहें, तो निश्चिंत हो कर चले जाएं. मैं तो यहांबैठी ही हूं. आपके बच्चे को देखती रहूंगी. क्या कहा आपने? जी हां, शाम होने तक यहींरहती हूं. फिर यहां सर्दी हो जाती है. दिन-भर मैं यह देखती रहती हूं कि धूप काटुकड़ा किस बेंच पर है - उसी बेंच पर जा कर बैठ जाती हूं. पार्क का कोई ऐसा कोनानहीं, जहां मैं घड़ी-आधा घड़ी नहीं बैठती. लेकिन यह बेंच मुझे सबसे अच्छी लगती है.एक तो इस पर पत्ते नहीं झरते और दूसरे... अरे, आप जा रहे हैं?पढ़िए कमलेश्वर की कहानी राजा निरबंसियाचौधराइन ने एक मुसलमान को चिता देनी चाही थी, सारे कस्बे में धुआं हो गयाएक कहानी रोज़: बिस्तर कमाने में उसकी नींद खर्च हो गई