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'नाम वहीं लिखे जाते हैं, जहां आदमी टिक कर रहे, जैसे घर और कब्र'

'एक कहानी रोज' में आज पढ़िए निर्मल वर्मा की धूप का टुकड़ा.

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विकास टिनटिन
20 मार्च 2016 (अपडेटेड: 3 अप्रैल 2018, 05:32 AM IST)
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धूप का एक टुकड़ा

निर्मल वर्मा


क्या मैं इस बेंच पर बैठ सकती हूं? नहीं, आप उठिए नहीं - मेरे लिए यह कोना ही काफी है. आप शायद हैरान होंगे कि मैं दूसरी बेंच पर क्यों नहीं जाती? इतना बड़ा पार्क - चारों तरफ खाली बेंचें - मैं आपके पास ही क्यों धंसना चाहती हूं? आप बुरा न मानें, तो एक बात कहूं - जिस बेंच पर आप बैठे हैं, वह मेरी है. जी हां, मैं यहां रोज बैठती हूं. नहीं, आप गलत न समझें. इस बेंच पर मेरा कोई नाम नहीं लिखा है. भला म्यूनिसिपैलिटी की बेंचों पर नाम कैसा? लोग आते हैं, घड़ी-दो घड़ी बैठते हैं, और फिर चले जाते हैं. किसी को याद भी नहीं रहता कि फलां दिन फलां आदमी यहां बैठा था. उसके जाने के बाद बेंच पहले की तरह ही खाली हो जाती है. जब कुछ देर बाद कोई नया आगंतुक आ कर उस पर बैठता है, तो उसे पता भी नहीं चलता कि उससे पहले वहां कोई स्कूल की बच्ची या अकेली बुढ़िया या नशे में धुत्त जिप्सी बैठा होगा. नहीं जी, नाम वहीं लिखे जाते हैं, जहां आदमी टिक कर रहे - तभी घरों के नाम होते हैं, या फिर कब्रों के - हालांकि कभी-कभी मैं सोचती हूं कि कब्रों पर नाम भी न रहें, तो भी खास अंतर नहीं पड़ता. कोई जीता-जागता आदमी जान-बूझ कर दूसरे की कब्र में घुसना पसंद नहीं करेगा! आप उधर देख रहे हैं - घोड़ा-गाड़ी की तरफ? नहीं, इसमें हैरानी की कोई बात नहीं. शादी-ब्याह के मौकों पर लोग अब भी घोड़ा-गाड़ी इस्तेमाल करते हैं. मैं तो हर रोज देखती हूं. इसीलिए मैंने यह बेंच अपने लिए चुनी है. यहां बैठ कर आंखें सीधी गिरजे पर जाती हैं - आपको अपनी गर्दन टेढ़ी नहीं करनी पड़ती. बहुत पुराना गिरजा है. इस गिरजे में शादी करवाना बहुत बड़ा गौरव माना जाता है. लोग आठ-दस महीने पहले से अपना नाम दर्ज करवा लेते हैं. वैसे सगाई और शादी के बीच इतना लंबा अंतराल ठीक नहीं. कभी-कभी बीच में मन-मुटाव हो जाता है, और ऐन विवाह के मुहूर्त पर वर-वधू में से कोई भी दिखाई नहीं देता. उन दिनों यह जगह सुनसान पड़ी रहती है. न कोई भीड़ न कोई घोड़ा-गाड़ी. भिखारी भी खाली हाथ लौट जाते हैं. ऐसे ही एक दिन मैंने सामनेवाली बेंच पर एक लड़की को देखा था. अकेली बैठी थी और सूनी आंखों से गिरजे को देख रही थी. पार्क में यही एक मुश्किल है. इतने खुले में सब अपने-अपने में बंद बैठे रहते हैं. आप किसी के पास जा कर सांत्वना के दो शब्द भी नहीं कह सकते. आप दूसरों को देखते हैं, दूसरे आपको. शायद इससे भी कोई तसल्ली मिलती होगी. यही कारण है, अकेले कमरे में जब तकलीफ दुश्वार हो जाती है, तो अक्सर लोग बाहर चले आते हैं. सड़कों पर. पब्लिक पार्क में. किसी पब में. वहां आपको कोई तसल्ली न भी दे, तो भी आपका दुख एक जगह से मुड़ कर दूसरी तरफ करवट ले लेता है. इससे तकलीफ का बोझ कम नहीं होता; लेकिन आप उसे कुली के सामान की तरह एक कंधे से उठा कर दूसरे कंधे पर रख देते हैं. यह क्या कम राहत है?
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आप सचमुच सौभाग्यशाली हैं. पहले दिन यहां आए - और सामने घोड़ा-गाड़ी! आप देखते रहिए - कुछ ही देर में गिरजे के सामने छोटी-सी भीड़ जमा हो जाएगी. उनमें से ज्यादातर लोग ऐसे होते हैं, जो न वर को जानते हैं, न वधु को. लेकिन एक झलक पाने के लिए घंटों बाहर खड़े रहते हैं. आपके बारे में मुझे मालूम नहीं, लेकिन कुछ चीजों को देखने की उत्सुकता जीवन-भर खत्म नहीं होती. अब देखिए, आप इस पेरेंबुलेटर के आगे बैठे थे. पहली इच्छा यह हुई, झांक कर भीतर देखूं, जैसे आपका बच्चा औरों से अलग होगा. अलग होता नहीं. इस उम्र में सारे बच्चे एक जैसे ही होते हैं. मुंह में चूसनी दबाए लेटे रहते हैं. फिर भी जब मैं किसी पेरेंबुलेटर के सामने से गुजरती हूं, तो एक बार भीतर झांकने की जबर्दस्त इच्छा होती है. मुझे यह सोच कर काफी हैरानी होती है कि जो चीजें हमेशा एक जैसी रहती हैं, उनसे ऊबने के बजाय आदमी सबसे ज्यादा उन्हीं को देखना चाहता है, जैसे प्रैम में लेटे बच्चे या नव-विवाहित जोड़े की घोड़ा-गाड़ी या मुर्दों की अर्थी. आपने देखा होगा, ऐसी चीजों के इर्द-गिर्द हमेशा भीड़ जमा हो जाती है. अपना बस हो या न हो, पांव खुद-ब-खुद उनके पास खिंचे चले आते हैं. मुझे कभी-कभी यह सोच कर बड़ा अचरज होता है कि जो चीजें हमें अपनी जिंदगी को पकड़ने में मदद देती हैं, वे चीजें हमारी पकड़ के बाहर हैं. हम न उनके बारे में कुछ सोच सकते हैं, न किसी दूसरे को बता सकते हैं. मैं आपसे पूछती हूं - क्या आप अपनी जन्म की घड़ी के बारे में कुछ याद कर सकते हैं, या अपनी मौत के बारे में किसी को कुछ बता सकते हैं, या अपने विवाह के अनुभव को हू-ब-हू अपने भीतर दुहरा सकते हैं? आप हंस रहे हैं... नहीं, मेरा मतलब कुछ और था. कौन ऐसा आदमी है, जो अपने विवाह के अनुभव को याद नहीं कर सकता! मैंने सुना है, कुछ ऐसे देश हैं, जहां जब तक लोग नशे में धुत्त नहीं हो जाते, तब तक विवाह करने का फैसला नहीं लेते. और बाद में उन्हें उसके बारे में कुछ याद नहीं रहता.
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लीजिए, अब दो-चार सिपाही भी गिरजे के सामने खड़े हो गए. अगर इसी तरह भीड़ जमा होती गई, तो आने-जाने का रास्ता भी रुक जाएगा. आज तो खैर धूप निकली है, लेकिन सर्दी के दिनों में भी लोग ठिठुरते हुए खड़े रहते हैं. मैं तो बरसों से यह देखती आ रही हूं. कभी-कभी तो यह भ्रम होता है कि पंद्रह साल पहले मेरे विवाह के मौके पर जो लोग जमा हुए थे, वही लोग आज भी हैं, वही घोड़ा-गाड़ी, वही इधर-उधर घूमते हुए सिपाही, जैसे इस दौरान कुछ भी नहीं बदला है! जी हां - मेरा विवाह भी इसी गिरजे में हुआ था. लेकिन यह मुद्दत पहले की बात है. तब सड़क इतनी चौड़ी नहीं थी कि घोड़ा-गाड़ी सीधे गिरजे के दरवाजे पर आ कर ठहर सके. हमें उसे गली के पिछवाड़े रोक देना पड़ा था. और मैं अपने पिता के साथ पैदल चल कर यहां तक आई थी. सड़क के दोनों तरफ लोग खड़े थे और मेरा दिल धुक-धुक कर रहा था कि कहीं सबके सामने मेरा पांव न फिसल पड़े. पता नहीं, वे लोग अब कहां होंगे, जो उस रोज भीड़ में खड़े मुझे देख रहे थे! आप क्या सोचते हैं. अगर उनमें से कोई आज मुझे देखे, तो क्या पहचान सकेगा कि बेंच पर बैठी यह अकेली औरत वही लड़की है, जो सफेद पोशाक में पंद्रह साल पहले गिरजे की तरफ जा रही थी? सच बताइए, क्या पहचान सकेगा? आदमियों की तो बात मैं नहीं जानती, लेकिन मुझे लगता है कि वह घोड़ा मुझे जरूर पहचान लेगा, जो उस दिन हमें खींच कर लाया था. जी हां, घोड़ों को देख कर मैं हमेशा हैरान रह जाती हूं. कभी आपने उनकी आंखों में झांक कर देखा है?
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क्या कहा आपने? नहीं, आपने शायद मुझे गलत समझ लिया. मेरे कोई बच्चा नहीं -यह मेरा सौभाग्य है. बच्चा होता, तो शायद मैं कभी अलग नहीं हो पाती. आपने देखा होगा, आदमी और औरत में प्यार न भी रहे, तो भी बच्चे की खातिर एक-दूसरे के साथ जुड़े रहते हैं. मेरे साथ कभी ऐसी रुकावट नहीं रही. इस लिहाज से मैं बहुत सुखी हूं -अगर सुख का मतलब है कि हम अपने अकेलेपन को खुद चुन सकें. लेकिन चुनना एक बात है, आदी हो सकना बिल्कुल दूसरी बात. जब शाम को धूप मिटने लगती है, तो मैं अपने कमरे में चली जाती हूं. लेकिन जाने से पहले मैं कुछ देर उस पब में जरूर बैठती हूं, जहां वह मेरी प्रतीक्षा करता था. जानते हैं, उस पब का नाम? बोनापार्ट - जी हां, कहते हैं, जब नेपोलियन पहली बार इस शहर में आया, तो उस पब में बैठा था - लेकिन उन दिनों मुझे इसका कुछ पता नहीं था. जब पहली बार उसने मुझसे कहा कि हम बोनापार्ट के सामने मिलेंगे, तो मैं सारी शाम शहर के दूसरे सिरे पर खड़ी रही, जहां नेपोलियन घोड़े पर बैठा है. आपने कभी अपनी पहली डेट इस तरह गुजारी है कि आप सारी शाम पब के सामने खड़े रहें और आपकी मंगेतर पब्लिक-स्टेचू के नीचे! बाद में जो उसका शौक था, वह मेरी आदत बन गई. हम दोनों हर शाम कभी उस जगह जाते, जहां मुझे मिलने से पहले वह बैठता था, या उस शहर के उन इलाकों में घूमने निकल जाते, जहाँ मैंने बचपन गुजारा था. यह आपको कुछ अजीब नहीं लगता कि जब हम किसी व्यक्ति को बहुत चाहने लगते हैं, तो न केवल वर्तमान में उसके साथ रहना चाहते हैं, बल्कि उसके अतीत को भी निगलना चाहते हैं, जब वह हमारे साथ नहीं था!
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देखिए, कभी-कभी मैं सोचती हूं कि मरने से पहले हममें से हर एक को यह छूट मिलनी चाहिए कि हम अपनी चीर-फाड़ खुद कर सकें. अपने अतीत की तहों को प्याज के छिलकों की तरह एक-एक करके उतारते जाएं. आपको हैरानी होगी कि सब लोग अपना-अपना हिस्सा लेने आ पहुंचेंगे, मां-बाप, दोस्त, पति. सारे छिलके दूसरों के, आखिर की सूखी डंठल आपके हाथ में रह जाएगी, जो किसी काम की नहीं, जिसे मृत्यु के बाद जला दिया जाता है, या मिट्टी के नीचे दबा दिया जाता है. देखिए, अक्सर कहा जाता है कि हर आदमी अकेला मरता है. मैं यह नहीं मानती. वह उन सब लोगों के साथ मरता है, जो उसके भीतर थे, जिनसे वह लड़ता था या प्रेम करता था. वह अपने भीतर पूरी एक दुनिया ले कर जाता है. इसीलिए हमें दूसरों के मरने पर जो दुख होता है, वह थोड़ा-बहुत स्वार्थी किस्म का दुख है, क्योंकि हमें लगता है कि इसके साथ हमारा एक हिस्सा भी हमेशा के लिए खत्म हो गया है. अरे देखिए - वह जाग गया. जरा पेरेंबुलेटर हिलाइए, धीरे-धीरे हिलाते जाइए. अपने आप चुप हो जाएगा. मुंह में चूसनी इस तरह दबा कर लेटा है, जैसे छोटा-मोटा सिगार हो! देखिए-कैसे ऊपर बादलों की तरफ टुकुर-टुकुर ताक रहा है! मैं जब छोटी थी, तब लकड़ी ले कर बादलों की तरफ इस तरह घुमाती थी, जैसे वे मेरे इशारों पर ही आकाश में चल रहे हों... आप क्या सोचते हैं? बच्चे इस उम्र में जो कुछ देखते हैं या सुनते हैं, वह क्या बाद में उन्हें याद रहता है? रहता जरूर होगा. कोई आवाज, कोई झलक, या कोई आहट, जिसे बड़े हो कर हम उम्र के जाले में खो देते हैं. लेकिन किसी अनजाने मौके पर, जरा-सा इशारा पाते ही हमें लगता है कि इस आवाज को कहीं हमने सुना है, यह घटना या ऐसी ही कोई घटना पहले कभी हुई है... और फिर उसके साथ-साथ बहुत-सी चीजें अपने आप खुलने लगती हैं, जो हमारे भीतर अरसे से जमा थीं, लेकिन रोजमर्रा की दौड़-धूप में जिनकी तरफ हमारा ध्यान जाता नहीं, लेकिन वे वहाँ हैं, घात लगाए कोने में खड़ी रहती हैं - मौके की तलाश में - और फिर किसी घड़ी सड़क पर चलते हुए या ट्राम की प्रतीक्षा करते हुए या रात को सोने और जागने के बीच वे अचानक आपको पकड़ लेती हैं और तब आप कितना ही हाथ-पाँव क्यों न मारें, कितना ही क्यों न छटपटाएँ, वे आपको छोड़ती नहीं. मेरे साथ एक रात ऐसे ही हुआ था. हम दोनों सो रहे थे और तब मुझे एक अजीब-सा खटका सुनाई दिया - बिल्कुल वैसे ही, जैसे बचपन में मैं अपने अकेले कमरे में हड़बड़ा कर जाग उठती थी और सहसा यह भ्रम होता था कि दूसरे कमरे में मां और बाबू नहीं हैं - और मुझे लगता था कि अब मैं उन्हें कभी नहीं देख सकूंगी और तब मैं चीखने लगती थी. लेकिन उस रात मैं चीखी-चिल्लाई नहीं. मैं बिस्तर से उठ कर देहरी तक आई, दरवाजा खोल कर बाहर झांका, बाहर कोई न था. वापस लौट कर उसकी तरफ देखा. वह दीवार की तरफ मुंह मोड़ कर सो रहा था, जैसे वह हर रात सोता था. उसे कुछ भी सुनाई नहीं दिया था.
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मैं उसी तरह उसकी देह को टोह रही थी, जैसे कुछ लोग पुराने खंडहरों पर अपने नाम खोजते हैं, जो मुद्दत पहले उन्होंने दीवारों पर लिखे थे. लेकिन मेरा नाम वहां कहीं न था. कुछ और निशान थे, जिन्हें मैंने पहले कभी नहीं देखा था; जिनका मुझसे दूर का भी वास्ता न था. मैं रात-भर उसके सिरहाने बैठी रही और मेरे हाथ मुर्दा हो कर उसकी देह पर पड़े रहे... मुझे यह भयानक-सा लगा कि हम दोनों के बीच जो खालीपन आ गया था, वह मैं किसी से नहीं कह सकती. जी हां-अपने वकील से भी नहीं, जिन्हें मैं अरसे से जानती थी. वे समझे, मैं सठिया गई हूं. कैसा खटका! क्या मेरा पति किसी दूसरी औरत के साथ जाता था? क्या वह मेरे प्रति क्रूर था? जी हां... उसने प्रश्नों की झड़ी लगा दी और मैं थी कि एक ईडियट की तरह उनका मुंह ताकती रही. और तब मुझे पहली बार पता चला कि अलग होने के लिए कोर्ट, कचहरी जाना जरूरी नहीं है. अक्सर लोग कहते हैं कि अपना दुख दूसरों के साथ बांट कर हम हल्के हो जाते हैं. मैं कभी हल्की नहीं होती. नहीं जी, लोग दुख नहीं बांटते, सिर्फ फैसला करते हैं - कौन दोषी है और कौन निर्दोष... मुश्किल यह है, जो एक व्यक्ति आपकी दुखती रग को सही-सही पहचान सकता है, उसी से हम अलग हो जाते हैं.
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लेकिन एक बात मुझे अभी तक समझ में नहीं आती. भूचाल या बमबारी की खबरें अखबारों में छपती हैं. दूसरे दिन सबको पता चल जाता है कि जहां बच्चों का स्कूल था, वहां खंडहर हैं; जहां खंडहर थे, वहां उड़ती धूल. लेकिन जब लोगों के साथ ऐसा होता है, तो किसी को कोई खबर नहीं होती. उस रात के बाद दूसरे दिन मैं सारे शहर में अकेली घूमती रही और किसी ने मेरी तरफ देखा भी नहीं. जब मैं पहली बार इस पार्क में आई थी, इसी बेंच पर बैठी थी, जिस पर आप बैठे हैं. और जी हां, उस दिन मुझे बहुत आश्चर्य हुआ कि मैं उसी गिरजे के सामने बैठी हूं, जहां मेरा विवाह हुआ था. तब सड़क इतनी चौड़ी नहीं थी कि हमारी घोड़ा-गाड़ी सीधे गिरजे के सामने आ सके. हम दोनों पैदल चल कर यहां आए थे. आप सुन रहे हैं, ओर्गन पर संगीत? देखिए, उन्होंने दरवाजे खोल दिए हैं. संगीत की आवाज यहां तक आती है. इसे सुनते ही मुझे पता चल जाता है कि उन्होंने एक-दूसरे को चूमा है, अंगूठियों की अदला-बदली की है. बस, अब थोड़ी-सी देर और है - वे अब बाहर आनेवाले हैं. लोगों में अब इतना चैन कहां कि शांति से खड़े रहें, अगर आप जा कर देखना चाहें, तो निश्चिंत हो कर चले जाएं. मैं तो यहां बैठी ही हूं. आपके बच्चे को देखती रहूंगी.
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