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चिंटू जी सिर्फ वॉकमैन में कुमार सानू सुनने की लालच से शादी में आए थे

एक कहानी रोज़ में आज पढ़िए वर्षा ठाकुर की कहानी 'चिंटू जी का वॉकमैन'

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23 नवंबर 2016 (अपडेटेड: 23 नवंबर 2016, 12:08 PM IST)
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चिंटू जी का वाॅकमैन चिंटू जी को गाना सुनने का बहुत शौक था. उन दिनों आइपॉड नहीं हुआ करता था, और न ही मोबाइल. गाना सुनना हो तो या फिर रेडियो साथ लेके चलना पड़ता था या फिर पसंदीदा गाने सुनने हों तो एक छोटा सा वॉकमैन रखना पड़ता था. वॉकमैन भी अलग अलग साइज़के आते थे. अच्छी कंपनी के स्लीक वॉकमैन महंगे आते थे और मध्यम वर्ग के बजट के बाहर होते थे. वही मध्यम वर्ग जिसे छोटे बड़े खर्चों के लिए बजट बनाना पड़ता था और अधिक ज़रुरत की चीज़ों के लिए कम ज़रुरत की चीज़ों पर कटौती करनी पड़ती थी. अब गाने सुनना तो कोई ज़रुरत की चीज़ होती नहीं, वो तो बस एक शौक होता था, वो भी खासकर युवा वर्ग का, जिसके पीछे पूरा खानदान पढाई करने और नौकरी ढूंढने के लिए पड़ा रहता था, और इसलिए उन्हें वॉकमैन जैसी चीज़ देना इन लोगों के लिए एक भयावह सपना जैसा होता था. सिर्फ वही युवा जो बचपन से ही अपनी उद्दंड प्रवृति के कारण जाने जाते थे, अपनी जिद के बल पर वॉकमैन खरीदने का दम रखते थे. और बाकी लोग इनसे वॉकमैन उधार लेकर अपने शौक पूरा किया करते थे.
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और इस तरह चिंटू जी को मनपसंद गाने सुनने के लिए यहां-वहां हाथ फैलाना पड़ता था. उस पर भी दुनिया भर के नियम कायदे. पड़ोस के मिक्की के पास एक वॉकमैन था, सस्ता वाला पर कामचलाऊ, वहीं से बीच-बीच में उठा लेते थे चिंटू जी. लेकिन मिक्कीजी भी कम नहीं थे, एक बार ब्लैंक कैसेट पकड़ा दी थी मनपसंद गानों की लिस्ट के साथ, भरवाने के लिए. भरवाने का खर्चा चिंटू जी का. एक गाना डलवाने के डेढ़ रुपये लगते थे. बीस रुपये की चपत. इतने में तो ''साजन'' की नई कैसेट आ जाती, चिंटू जी सोच रहे थे. खैर, उस बहाने तीन दिन तक मिक्की का वॉकमैन दबाके रखा चिंटू जी ने, या यूं कहें कि निचोड़ डाला. जब लौटाने गया तो मिक्की ने चला के देखी, खर्रखर्र कर रहा था. चिंटू जी भाग लिए थे. मिक्की ने चुपचाप नेलपॉलिश रिमूवर निकाला और रुई में डुबाया. इस तरह दिन कट रहे थे, कि एक दिन दूर के चाचाजी का फ़ोन आया. उनकी इकलौती बेटी नीलम की शादी थी. शादी-वादी में जाना चिंटू जी को कुछ समय से पसंद नहीं आता था, जब से थोड़े बड़े हुए थे. घरवालों के बजट के कारण चिंटू जी को नए कपड़े खरीदने के लिए पैसे नहीं मिलते थे. दुल्हन की सहेलियों पर इम्प्रैशन भी नहीं जमा पाते थे चिंटू जी. इससे अच्छा तो न जाना बेहतर था. और नीलम दीदी से भी उनका कोई ख़ास लगाव नहीं था. बचपन में खेलते थे, पर काफी वक़्त से मिले ही नहीं थे. चिंटू जी ने पापा को बोल दिया कि उन्हें पढ़ाई करनी है. बोर्ड सर पर हैं, और इसलिए वो शादी में नहीं जा पाएंगे. मन ही मन सोच रहे थे कि थोडा खाली वक़्त और खाली घर मिलेगा तो ऐश करेंगे, पर इतने खुशकिस्मत कहां थे चिंटू जी. चाचाजी ने बोल के रखा था कि और कोई आए न आए चिंटू जी को तो ज़रूर आना है, अरे भाई दुल्हन के इकलौते भाई हैं वो. सारी भाइयों वाली रस्में उन्हें ही तो पूरी करनी हैं. अब तो कुछ नहीं हो सकता था.
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और चिंटू जी शादी में जाने के लिए राज़ी हो गए, एक छोटी सी शर्त के साथ कि कम से कम शर्ट तो नई खरीदवा दो, लड़की का इकलौता भाई अच्छा भी तो दिखना चाहिए. चिंटू जी को अंदेशा भी नहीं था कि उन्होंने किस दलदल में ख़ुशी-ख़ुशी पांव रख दिए हैं. दुल्हन के इकलौते भाई को सिर्फ रस्में थोड़ी निभानी होती थी , छगन हलवाई से हर दो-दो घंटे में मिठाइयां लाना, फूलवाले से ताज़ा फूल लाना, बेसन नहीं है, घी ख़त्म हो गया, दिन में पचासों चक्कर चिंटूजी के नीलम दी की स्कूटी में लग जाते थे. लड़की वाले थे, काम कभी ख़त्म ही नहीं होता था. ऊपर से मेहमानों की आवभगत. उफ्फ़, थक जाते थे चिंटू जी. नन्ही सी जान थे. लेकिन दिल में जो अरमान लिए इतनी दूर चले आए थे , उसके बारे में सोचते ही रिफ्रेश हो जाते थे और स्कूटी लेके उड़ने लगते थे. और फिर रस्में शुरू हुईं. चिंटू जी को नीलम दीदी को गोद में लेके यहां से वहां रखना पड़ता था. चालीस किलो के चिंटू जी और पैंसठ किलो की नीलम दीदी. फिर पंडितजी ने हालात की गंभीरता को समझते हुए चिंटू जी को बोला कि आप बस दुल्हन को पकड़के रखिए, उठाने की ज़रुरत नहीं, भाई का हाथ लगना ही काफी है. लंबी सांस छोड़ी चिंटू जी ने. नई शर्ट पहन के चिंटू जी पांव ज़मीन पर नहीं रख पा रहे थे. ऐसा लग रहा था मानो पूरी शादी चिंटूजी के कंधों से होके गुज़र रही है. दूल्हा दुल्हन हों न हों , वीडियो कैमरे के सामने चिंटूजी ज़रूर दिखते थे, पसीना पोंछते हुए, गंभीर मुद्रा में. और फिर चिंटू जी की नज़र दूल्हे की बहन रुचिका पर ठहर गयी. चिंटू जी का मानना था कि बाकी लोग तो नीलम दी की ससुराल से आए होंगे पर रुचिका सीधी जन्नत से आई है. अब तो बिना वॉकमैन के चिंटू जी के कानों में कुमार सानू के गाने बजने लगे थे.
मैं दुनिया भुला दूंगा आ आआ तेरी चाहत में. तेरे दर पर सनम, चले आए एएएएए .
लेकिन चिंटू जी ने इन सबके बीच अपना लक्ष्य नहीं भुलाया था. उनकी नज़रें लगातार वॉकमैन को ढूंढती रहती थीं, जो किसी कारणवश दिख नहीं रहा था. अब चिंटू जी चिंतित हो गए थे. सोच रहे थे किसी न किसी तरह से तो मुद्दा उठाना पड़ेगा वॉकमैन के अगले वारिस का. और फिर जब नीलम दीदी की विदाई का वक़्त हुआ तो चिंटू जी को पता चला कि उन्हें भी दीदी के साथ ससुराल लखनऊ जाना है. लड़की का भाई शादी के वक़्त लड़की के साथ जाता है और बहन को ठीकठाक ससुराल में जमाके वापस आता है. चिंटू जी की जिम्मेदारियां ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही थीं , लेकिन वे मन ही मन खुश थे, एक तो रुचिका को और देखने का मौका मिलेगा, और दूसरा वॉकमैन के बारे में बात करने का बहाना मिलेगा. नीलम दी को थोडा देर अकेला देखकर चुपके से उनके पास पहुंचे. ''दीदी मुझे तो आपके साथ लखनऊ आना है न?" ''हां चिंटू , तू मेरा भाई है न इसलिए. वैसे मैंने मना किया था कि ज़रुरत नहीं है तेरे स्कूल चल रहे होंगे तुझे लेट हो लाएगा पर कोई मेरी सुनता ही नहीं !'' ''अरे दीदी कैसी बात करती हो आपका भाई हूं मैं, इतना हक़ भी नहीं मेरा आप पर!'' ''थैंक्स चिंटू.'' दी खुश हो गई थी. ''वैसे दीदी, मैं सोच रहा था, मैं तो वहां बोर हो जाउंगा, किसी को जानता भी नहीं न, और आप तो बिजी रहोगी, तो इसलिए आपका वो वॉकमैन था न , वो कुछ समय के लिए मैं ले सकता हूं?" '' अरे ये भी कोई पूछने की बात है , बिलकुल रख लेना. वहां अलमारी में रखा है, कैसेट भी रख लेना अपनी पसंद की. '' पहला पड़ाव पार हो चुका था. लेकिन वहां जाकर तो दी को वापस करना पड़ेगा. शायद उनका दिल पिघल जाए. कम से कम वॉकमैन की बात तो छिड़ ही गई थी.
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''चिंटू भइया, ये वॉकमैन कितना प्यारा है, आपका है क्या? मैं थोड़ी देर के लिए ले सकती हूं?'' चिंटू जी का दिल टूट चूका था. ''रुचिका जी ये वॉकमैन हमारा नहीं, आपकी भाभी का है.'' सच तो बोलना ही था. ''अरे वाह! भाभीजी का मतलब हमारा! मैं भी भाभीजी को बोलके आती हूं कि चिंटू भइया के जाने के बाद ये हम ले लेंगे. आखिर इतना हक़ तो बनता है हमारा!'' चिंटू जी निराश से खड़े थे, वॉकमैन भी हाथ से निकल चुका था और जन्नत की परी भी उन्हें भइया बना चुकी थी. और चिंटू जी नीलम दीदी के साथ दो दिन बिताके वापस निकलने लगे. ट्रेन आयी और वो अपनी बर्थ में बैठ गए. ट्रेन चल पड़ी थी. चिंटू जी सोच रहे थे, खाली हाथ आए थे खाली हाथ जा रहे हैं. अगली बार इन सब चक्करों में नहीं पड़ेंगे. अरे, बोर्ड की परीक्षा आ रही है भाई, मज़ाक है क्या?
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''चिंटू भइया , हमारी प्यारी भाभीजी ने हमें एक नया वॉकमैन दिया है तोहफे में , शायद उन्हें हमारी पसंद पहले से पता थी. अब ये वॉकमैन आपका हुआ.'' चिंटू जी की आंखें भर आई थीं. उन्होंने इयरफोन कान में लगाया और यलगार की कैसेट डाल दी.

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