जान लेओ 'ग्रेविटेशनल वेव' है किस चिड़िया का नाम!
ग्रेविटेशनल वेव ऐसा बवासीर बन चुका है जिसके बारे में अच्छे अच्छों को नहीं पता. लल्लन समझ चुका है. अब तुमको समझाएगा. आओ.
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फोटो - thelallantop
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आइंस्टीन ने ठीक सौ साल पहले यानी 1916 में अपनी थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी के दम पर ग्रेविटेशनल वेव्स की मौजूदगी के बारे में बताया था. तब किसी ने विश्वास नहीं किया. आज कर रहे हैं. आइंस्टीन फिर से बीस साबित हुए हैं. ज़्यादातर जनता फेसबुक और ट्विटर पे ठोंकने में पड़ी है कि आइंस्टीन सही था. किसी से पूछो कि ग्रेविटेशनल वेव्स आखिर है क्या, तो जवाब ज़ीरो मिलेगा. हम बताते हैं कि आखिर ये ग्रेविटेशनल वेव्स और आइंस्टीन की इस पूरी थ्योरी का मामला है क्या.

रबर की शीट जैसे स्पेस पर किसी प्लैनेट के मास से बना दबाव
ऐसे में अगर कोई और ग्रह इसी शीट पर उस दबाव वाले हिस्से के पास से गुजरेगा तो किसी भी हालत में उसका रास्ता बदल जाएगा. वो बड़े ग्रह के दबाव से बने कर्व (curve) के हिसाब से अपना रास्ता बना लेगा.

प्लैनेट के दबाव से बने कर्व (curve) से नए ग्रहों का बदलता रास्ता.
आइंस्टीन की ये थ्योरी ग्रैविटी को समझाती है.
हांलांकि ये इकलौता तरीका नहीं है जो ग्रैविटी के लिए ज़िम्मेदार है. वही है मुद्दा ग्रेविटेशनल वेव्स का.
मान लीजिए आप तालाब में एक पत्थर फेंकते हैं. जिससे पानी में एक तरंग पैदा होती है. इसे हम वेव्स (waves) कहेंगे. यहीं पर अगर हम दो पत्थरों को एक साथ फेंकें तो दो अलग वेव्स पैदा होंगी जो आगे जाकर आपस में मिल जाएंगी और एक बड़ी वेव (wave) बन जाएगी.

किसी भी वेव की एक wavelength होती है. तालाब में बनी इस बड़ी वेव की भी होगी.
अब हम बात करेंगे तालाब की नहीं बल्कि समूचे स्पेस की जो अपने आप में भारी प्लैनेट्स का तालाब है. इस तालाब में दो पत्थर नहीं दो ब्लैक होल (black hole) होते हैं जो एक दूसरे के आस पास ही घूम रहे होते हैं. और वक़्त ऐसा आता है जब ये इतने करीब आते हैं कि इनके आस पास की वेव्स आपस में मिलती हैं. कुछ समय बाद ये दोनों ब्लैक होल आपस में मिल जाते हैं और एक बड़ी वेव (लहर) पैदा होती है और दो के बजाय एक बड़ा ब्लैक होल बन जाता है.
https://www.youtube.com/watch?v=9W6Sr6Mtsbk&feature=youtu.be
ऐसे ही दो ब्लैक होल 1 करोड़ 30 साल पहले आपस में मिले जिससे ऐसी तरंगें/वेव्स पैदा हुईं जो लाइट की स्पीड से दौड़ती थीं और आज भी स्पेस में दौड़ रही हैं. साइंटिस्ट जमात का कहना है कि ब्लैक होल के आपस में मिलने से ठीक पहले इतनी एनर्जी/ऊर्जा पैदा हुई थी कि अंतरिक्ष में सभी तारों, ग्रहों वगैरह वगैरह को आपस में मिला दें तो भी उसका मुकाबला न कर पाए. इस बात को आइंस्टीन ने सौ साल पहले ही कह चुके थे लेकिन कोई मानता नहीं था. अब प्रूव हो गया. आइंस्टीन फिर सही साबित हुए.
खैर, ये प्रूव हुआ कैसे? ये प्रूव किया LIGO ने. LIGO यानी Laser Inferometer Gravitational Wave Observatory. अब ये बताते हैं कि आखिर इस एक्सपेरिमेंट में हुआ क्या.
आइंस्टीन की एक थ्योरी ये भी थी कि स्पेस हर वक़्त एक डायमेंशन में फैल रहा होता है और एक डायमेंशन में सिकुड़ रहा होता है. LIGO की नींव इसी थ्योरी पर रखी गई.
इस क्रम में 2.5 मील लम्बी L शेप में लगी दो गोल नलियों में लेज़र किरणें फेंकी जाती हैं.

L शेप में लेज़र किरणें
जब ग्रेविटेशनल वेव्स एक डायमेंशन में स्पेस को फैला रही होती हैं और एक में सिकोड़ रही होती हैं, तब लेज़र किरणों के दोनों नलियों के आखिर तक पहुंचने के वक़्त में एक बहुत ही छोटा सा अंतर आता है. इससे ये पता चलता है कि जिस थ्योरी के बेस पे ये Observatory बनाई गई है, वो सच है. इसलिए ये भी प्रूव हुआ कि आइंस्टीन ने जो कहा, सच था. इसलिए ग्रेविटेशनल वेव्स असल में हमारे स्पेस में मौजूद हैं.
शुरुआत के लिए बता दें कि ग्रेविटेशनल वेव्स वो तरंगें/वेव्स हैं जो अंतरिक्ष में बड़ी हलचल मचा देने वाली एक्टिविटी का रिकॉर्ड समेटे रहती हैं.पहले ग्रेविटी को समझो गुरु. स्पेस-टाइम को एक रबर शीट मानो और पृथ्वी जैसे किसी बड़े ग्रह को एक भारी भरकम गोल चीज़ समझ कर उस पर रखा हुआ मान लेते हैं. जब उस भारी चीज को रबर शीट पर रखते हैं तो शीट पर एक दबाव बनेगा जो उसे नीचे धंसा देगा.

रबर की शीट जैसे स्पेस पर किसी प्लैनेट के मास से बना दबाव
ऐसे में अगर कोई और ग्रह इसी शीट पर उस दबाव वाले हिस्से के पास से गुजरेगा तो किसी भी हालत में उसका रास्ता बदल जाएगा. वो बड़े ग्रह के दबाव से बने कर्व (curve) के हिसाब से अपना रास्ता बना लेगा.

प्लैनेट के दबाव से बने कर्व (curve) से नए ग्रहों का बदलता रास्ता.
आइंस्टीन की ये थ्योरी ग्रैविटी को समझाती है.
हांलांकि ये इकलौता तरीका नहीं है जो ग्रैविटी के लिए ज़िम्मेदार है. वही है मुद्दा ग्रेविटेशनल वेव्स का.
मान लीजिए आप तालाब में एक पत्थर फेंकते हैं. जिससे पानी में एक तरंग पैदा होती है. इसे हम वेव्स (waves) कहेंगे. यहीं पर अगर हम दो पत्थरों को एक साथ फेंकें तो दो अलग वेव्स पैदा होंगी जो आगे जाकर आपस में मिल जाएंगी और एक बड़ी वेव (wave) बन जाएगी.

किसी भी वेव की एक wavelength होती है. तालाब में बनी इस बड़ी वेव की भी होगी.
अब हम बात करेंगे तालाब की नहीं बल्कि समूचे स्पेस की जो अपने आप में भारी प्लैनेट्स का तालाब है. इस तालाब में दो पत्थर नहीं दो ब्लैक होल (black hole) होते हैं जो एक दूसरे के आस पास ही घूम रहे होते हैं. और वक़्त ऐसा आता है जब ये इतने करीब आते हैं कि इनके आस पास की वेव्स आपस में मिलती हैं. कुछ समय बाद ये दोनों ब्लैक होल आपस में मिल जाते हैं और एक बड़ी वेव (लहर) पैदा होती है और दो के बजाय एक बड़ा ब्लैक होल बन जाता है.
https://www.youtube.com/watch?v=9W6Sr6Mtsbk&feature=youtu.be
ऐसे ही दो ब्लैक होल 1 करोड़ 30 साल पहले आपस में मिले जिससे ऐसी तरंगें/वेव्स पैदा हुईं जो लाइट की स्पीड से दौड़ती थीं और आज भी स्पेस में दौड़ रही हैं. साइंटिस्ट जमात का कहना है कि ब्लैक होल के आपस में मिलने से ठीक पहले इतनी एनर्जी/ऊर्जा पैदा हुई थी कि अंतरिक्ष में सभी तारों, ग्रहों वगैरह वगैरह को आपस में मिला दें तो भी उसका मुकाबला न कर पाए. इस बात को आइंस्टीन ने सौ साल पहले ही कह चुके थे लेकिन कोई मानता नहीं था. अब प्रूव हो गया. आइंस्टीन फिर सही साबित हुए.
खैर, ये प्रूव हुआ कैसे? ये प्रूव किया LIGO ने. LIGO यानी Laser Inferometer Gravitational Wave Observatory. अब ये बताते हैं कि आखिर इस एक्सपेरिमेंट में हुआ क्या.
आइंस्टीन की एक थ्योरी ये भी थी कि स्पेस हर वक़्त एक डायमेंशन में फैल रहा होता है और एक डायमेंशन में सिकुड़ रहा होता है. LIGO की नींव इसी थ्योरी पर रखी गई.
इस क्रम में 2.5 मील लम्बी L शेप में लगी दो गोल नलियों में लेज़र किरणें फेंकी जाती हैं.

L शेप में लेज़र किरणें
जब ग्रेविटेशनल वेव्स एक डायमेंशन में स्पेस को फैला रही होती हैं और एक में सिकोड़ रही होती हैं, तब लेज़र किरणों के दोनों नलियों के आखिर तक पहुंचने के वक़्त में एक बहुत ही छोटा सा अंतर आता है. इससे ये पता चलता है कि जिस थ्योरी के बेस पे ये Observatory बनाई गई है, वो सच है. इसलिए ये भी प्रूव हुआ कि आइंस्टीन ने जो कहा, सच था. इसलिए ग्रेविटेशनल वेव्स असल में हमारे स्पेस में मौजूद हैं.

