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धरती से लगभग आधा है मंगल ग्रह लेकिन इसका पहाड़ एवरेस्ट से दोगुना ऊंचा? ऐसा क्यों?

मंगल का माउंट ओलम्पस मोन्स करीब 25 किलोमीटर ऊंचा है. तुलना के लिए देखें तो हमारा माउंट एवरेस्ट करीब 8.8 किलोमीटर ऊंंचा है. यानी दोगुने से भी ज्यादा. मामला तब फंसता है जब ये देखा जाए कि मंगल तो आकार में धरती से छोटा है, करीब आधा. फिर मंगल के पहाड़ ने कौन सी 'बूटी' पी कि वो इतना लंबा हो गया.

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मंगल ग्रह के पहाड़ और माउंट एवरेस्ट की तस्वीर
1 मार्च 2024 (Updated: 1 मार्च 2024, 19:19 IST)
Updated: 1 मार्च 2024 19:19 IST
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अमेरिकी एस्ट्रोफिजिसिस्ट (Astrophysicist) या कहें अंतरिक्ष मामलों के जानकार नील डिग्रास टायसन (Neil Degrasse Tyson) एक मजेदार बात बताते हैं. वो कहते हैं कि देखने में हमें हमारी धरती ऊबड़-खाबड़ लग सकती है. पहाड़ (Mountains) बहुत ऊंचे और सागर (seas) के गर्त बहुत गहरे लग सकते हैं. लेकिन अगर धरती के आकार की तुलना में देखें तो ये ऊंचाई कुछ भी नहीं है. वो कहते हैं कि कल्पना कीजिए कोई धरती से बड़ा एलियन (Aliens) आए. और धरती को अपने हाथ में लेकर देखे तो. धरती उसे उतनी ही चिकनी (smooth) लगेगी जैसे कोई गेंद हो. जानते हैं ये क्या माजरा है?

AI आर्टिफिशल इंटेलिजेंस से बनाई गई सांकेतिक तस्वीर
धरती ‘गोल’ है मालूम है, लेकिन ये गोल ही क्यों है? 

वैसे तो धरती एकदम गोल भी नहीं है. कहें तो असल में अंडाकार है. ये सब तो आप जानते ही हैं. मामला इसका है ही नहीं. सवाल है कि धरती के गोल होने के पीछे भी कोई विज्ञान है क्या? क्योंकि स्पेस में दूसरी कई चीजें तो एक दम गोल नहीं हैं. नीचे अजीब से नाम वाले स्पेस कॉमेट की तस्वीर लगी है. जुपिटर के पास के इस कॉमेट का नाम लेने की कोशिश अपने रिस्क पर करें. काम फोटो देखकर भी चल जाएगा. इसका नाम है 67पी/चुर्युमोव-गेरासिमेनको (67P/Churyumov–Gerasimenko)

2014 में एक स्पेस क्राफ्ट से खींची गई तस्वीर में कॉमेट का ऊबड़-खाबड़ आकार देखा जा सकता है.ESA's Rosetta Spacecraft

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क्यों दूसरे स्पेस आब्जेक्ट्स गोल नहीं हैं?

वैसे तो इसकी कई वजह हो सकती हैं. लेकिन एक फैक्टर जो सबसे इंट्रेस्टिंग है. जो पहाड़ों की ऊंचाई भी डिसाइड करता है. वो है गुरुत्वाकर्षण (gravity). इसको रेत के उदाहरण से समझते हैं. आपने कभी रेत से टीला बनाने की कोशिश की है? एक ऊंचाई के बाद रेत का टीला अपने ही वजन से धंसने लगता है.

ये वजन निर्भर करता है गुरुत्वाकर्षण पर. गुरुत्वाकर्षण ज्यादा तो वजन ज्यादा, कम तो वजन कम. ये भी बता दें, अलग-अलग ग्रहों और स्पेस आब्जेक्ट्स पर गुरुत्वाकर्षण भी अलग हो सकता है. मतलब अलग-अलग ग्रहों पर चीजों का वजन अलग हो सकता है. इसलिए वजन कम करना मुश्किल पड़ रहा हो तो. जिम ट्रेनर की बजाय ग्रह बदलने से भी काम चल सकता है. 

अब वापस आते हैं रेत के टीले पर, ऐसा ही ग्रहों के साथ भी होता है. लेकिन बस बहुत बड़े पैमाने पर. दरअसल जैसे हमारे लिए रेत है, वैसे ही ग्रहों के लिए पहाड़ हैं. इस मामले को मंगल के सबसे ऊंचे ज्वालामुखीय पहाड़ के उदाहरण से समझते हैं. 

मंगल का माउंट ओलम्पस मोन्स करीब 25 किलोमीटर ऊंचा है. तुलना के लिए देखें तो हमारा माउंट एवरेस्ट करीब 8.8 किलोमीटर ऊंंचा है. लेकिन ओलम्पस एक ज्वालामुखीय पहाड़ है. यानी पहले ये एक ज्वालामुखी था. ओलम्पस हमारी धरती के पहाड़ों से तो ऊंचा तो है ही. ये पूरे सौर्य मंडल के सबसे ऊंचे पहाड़ों में से है. 

एक्सपर्ट्स इसकी कई वजह बताते हैं. जिसमें हैं कि मार्स में ज्वालामुखी ज्यादा सक्रिय रहे होंगे, टेक्टानिक एक्टिविटी या सतह के नीचे की हलचल कम रही होगी. जिससे पहाड़ धीरे-धीरे ज्यादा ऊंचे हो पाए, वगैरह-वगैरह. लेकिन जो वजह धरती के मंगल से आकार में दोगुना बड़ी होने के बावजूद, ज्यादा बड़े पहाड़ नहीं होने देती. वो है धरती का गुरुत्वाकर्षण. मंगल में गुरुत्वाकर्षण धरती से कम है. एक सवाल ये कि ऐसा क्यों?

गुरुत्वाकर्षण में ये भेदभाव देखकर तो मंगल ग्रह भी बोल उठता होगा-

अलग अलग ग्रहों में अलग गुरुत्वाकर्षण बल क्यों? 

दरअसल गुरुत्वाकर्षण को आसान भाषा में समझें तो ये दो बातों पर निर्भर करता है. एक तो ‘मास’ दूसरा ‘दूरी.’ ग्रह का मास जितना ज्यादा होगा गुरुत्वाकर्षण उतना ज्यादा होगा. धरती का मास मंगल से ज्यादा है, तो गुरुत्वाकर्षण भी ज्यादा है. यानी मंगल पर रेत का टीला बनाएंगे तो वो धरती पर बनाए रेत के टीले से थोड़ा ऊंचा होगा. ऐसा ही मामला पहाड़ों के साथ भी है. ज्यादा बड़े पहाड़ अपने ही वजन से धंसते जाते हैं. 

ऐसे ही सेम मामला, पहले बताए कठिन नाम वाले कॉमेट के साथ भी है. जाहिर है उसका गुरुत्वाकर्षण धरती के गुरुत्वाकर्षण से कम होगा और वो अपने गुरुत्वाकर्षण बल की वजह से गोल नहीं हो पाया होगा. मतलब सब गोलमाल हो ये जरूरी भी नहीं.

वीडियो: NASA के आर्टेमिस-1 की इतनी चर्चा क्यों? इस मिशन का मंगल गृह से क्या लेना-देना?

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