लोक सभा में अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा में गूंजा मणिपुर मुद्दा, सरकार की ओर से क्या जवाब आए?
ऐसा कहा जा रहा कि जिस दिन पीएम मोदी लोक सभा में आएंगे, उसी दिन राहुल गांधी भाषण देंगे.

- जब भारत के लिए पदक लाने वाली महिला पहलवान सड़क पर धरना दे रही थीं, प्रधानमंत्री मौन रहे.
- किसान आंदोलन में 750 किसानों की जान चली गईं, प्रधानमंत्री मौन रहे.
- जब 2020 में दिल्ली में दंगे हुए, प्रधानमंत्री मौन रहे.
- हिंडनबर्ग रिपोर्ट के बाद जब गौतम आडानी की कंपनी पर सवाल उठे, प्रधानमंत्री मौन रहे.
- जब चीन पर विपक्ष ने सवाल उठाए, प्रधानमंत्री मौन रहे.
- जब कश्मीर के पूर्व-राज्यपाल ने सीधे तौर पर केंद्र की सुरक्षा चूक पर आरोप लगाए, प्रधानमंत्री मौन रहे.
- जब कोविड की दूसरी लहर में लोग मर रहे थे, प्रधानमंत्री मौन रहे.
- जब मणिपुर में महिलाओं पर यातना हो रही था, प्रधानमंत्री मौन रहे.
लोकसभा में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उपनेता गौरव गोगोई ने इन दलीलों के साथ अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा शुरू की. गौरव गोगोई ने की, राहुल गांधी ने नहीं. जबकि तय तो था कि विपक्ष की तरफ़ से राहुल ही बहस को खोलेंगे. लेकिन आख़िरी पांच मिनट में चिट्ठी गई और सीक्वेंस बदल दिया गया. जो सवाल गोगोई ने उठाए, मोटा-माटी विपक्ष ने पूरे मॉनसून सत्र के दौरान इन्हीं बयानों के साथ हंगामा काटा.
'प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सदन से मणिपुर के हालात पर बोलें!' इसी एक वाक्य को कभी अस, तो कभी जस - कभी इसने, कभी उसने बोला. संसद के अंदर से भी, बाहर भी. और, विपक्ष ने साफ़ तौर पर कहा भी है कि अविश्वास प्रस्ताव लाने का एक्कै मक़सद भी यही था.. कि प्रधानमंत्री बोलें.
गौरव गोगोई के वक्तव्य की झलक हमने आपको दी. बाक़ी, और सदस्य क्या बोले? राहुल की स्पीच ऐन मोमेंट पर क्यों कैंसिल हुई? सत्ता पक्ष की तरफ़ से क्या जवाब आया? और प्रधानमंत्री बोलेंगे कब?
4 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक मानहानि मामले में राहुल गांधी की सज़ा पर रोक लगा दी और दो दिन बाद, 7 अगस्त को लोकसभा सचिवालय ने राहुल गांधी की सांसदी बहाल कर दी. राहुल ने भी ट्विटर बायो अपडेट कर लिया: Disqualified MP से Member of Parliament.26 जुलाई को कांग्रेस और BRS ने अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था. चर्चा होगी ये तय हो चुका था. राहुल की सांसदी वापस आने के बाद से ही क़यास लगने लगे थे कि इस सत्र में राहुल बोलेंगे. फिर सूत्रों के हवाले से ख़बरें भी छपने लगीं कि बस बोलेंगे नहीं, अविश्वास प्रस्ताव की बहस की शुरुआत वही करेंगे. यानी पहला वक्तव्य राहुल गांधी का ही होगा. राजनीति बूझने वाले कहने लगे कि कांग्रेस ने राहुल गांधी पर चले मुक़दमे को बहुत सटीक तरीक़े से मैनेज किया. नैरेटिव राहुल के पक्ष में ला दिया. फिर राजनीति ज़्यादा बूझने वालों ने ये भी कहा कि अगर राहुल और मोदी की सीधी टक्कर होती है, तो गेंद कांग्रेस के पक्ष में नहीं आ पाएगी. ये तो ख़ैर ऑप्टिक्स की राजनीति है. लेकिन ज़रूरी है कि हम पहले सदन का क़ायदा समझें. तय कैसे होता है कौन पहले बोलेगा? कितना बोलेगा? कब बोलेगा?
अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के लिए लोकसभा में तीन दिन निर्धारित किए गए हैं. 8, 9 और 10 को प्रस्ताव पर बहस होगी और आखिरी दिन प्रधानमंत्री मोदी विपक्ष के आरोपों और सवालों के जवाब देंगे.
सदन में बोलने के लिए किस पार्टी को कितना समय दिया जाएगा, ये उस पार्टी के सांसदों की संख्या से तय होता है. और ये तय करती है, बिज़नेस एडवाइज़री कमेटी (BAC). इस कमेटी में कुल 26 सदस्य होते हैं - 15 लोकसभा के और 11 सदस्य राज्यसभा के. लोकसभा में इस कमेटी के अध्यक्ष लोकसभा स्पीकर होते हैं और राज्यसभा में इस कमेटी की अध्यक्षता राज्य सभा के पदेन अध्यक्ष (उपराष्ट्रपति) करते हैं. कुल मिलाकर सदन के कामकाज तय करने और बहस के लिए समय आवंटित करने का ज़िम्मा BAC के हिस्से है. किस पार्टी के कितने सदस्य हैं, उसी अनुपात में उन्हें समय दिया जाता है. सदन में पार्टियों के भी तीन लेवल्स हैं:-
> बड़े दल: वो पार्टियां या समूह, जिसके सदस्यों की संख्या 15 या उससे ज़्यादा होती है.
> दूसरा, मझले दल: 5 से 14 सदस्यों की संख्या वाले दल.
> और, छोटे दल - 2 से 4 सदस्यों वाली पार्टियां.
> इसके अलावा निर्दलीय सदस्यों और मनोनित सदस्यों को अलग से समय दिया जाता है.
इस आधार पर अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के लिए भाजपा को 6 घंटे, 41 मिनट दिए गए हैं. वहीं कांग्रेस को 1 घंटा 15 मिनट मिले हैं. युवजन श्रमिका रायथू कांग्रेस पार्टी (YSRCP), उद्धव गुट की शिवसेना, जनता दल युनाइटड, बसपा, भारत राष्ट्र समिति (BRS) और लोकजन शक्ति पार्टी (LJP) को कुल 2 घंटे दिए गए हैं. इसके अलावा अन्य दलों और निर्दलीय सांसदों के लिए 1 घंटा, 10 मिनट निर्धारित किया गया है.
अब संख्या बल पर पार्टियों को तो एक सेट समय मिल गया. पर सदन में पार्टी की तरफ़ से कौन-कितने-कब बोलेगा, ये पार्टी ही तय करती है. सारी पार्टियां अपने सदस्यों की सूचि सदन के स्पीकर को भेजती हैं. पार्टियां सूचि में वक्ताओं के नाम जिस क्रम में देती हैं, स्पीकर उसी क्रम में सदस्यों को बोलने के लिए बुलाते हैं. लेकिन इसमें पेच यही है कि पार्टी अपनी इच्छानुसार सदस्यों के बोलने का क्रम बदल सकती हैं. आज ही की मिसाल ले लीजिए. कांग्रस ने अविश्वास प्रस्ताव पर बोलने के लिए 9 सदस्यों की सूचि दी थी. राहुल गांधी का नाम पहले नंबर में था, पर अख़िरी समय में क्रम बदल दिया गया और गौरव गोगोई कांग्रेस की तरफ़ से पहले नंबर पर बोलने आए.
छिछली छीटाकशी से इतर भी राजनीतिक विमर्श अभी हमारे देश में बचा है. इसकी बानगी आज संसद में देखने को मिली. पहले विपक्ष से गोगोई और उसके बाद सत्ता पक्ष की तरफ से बोलने के लिए सबसे पहले खड़े हुए निशिकांत दुबे. दुबे ने पहले राहुल गांधी को निशाने पर लिया उसके बाद विपक्षी गठबंधन INDIA को. वैसे दुबे पहले इंडिया बोलने से बचते नज़र आए. उन्होंने I...N...D...I...A कहकर संबोधित किया. फिर चुटकी लेते हुए ये भी कहा कि विपक्ष के बहुत से सासंद तो इसका फुलफॉर्म भी नहीं बता पाएंगे. इसके बाद निशिकांत ने विपक्ष के गठबंधन की क्षेत्रीय पार्टियों और कांग्रेस की पुरानी खींचतान का इतिहास सुनाया.
बीजेपी सांसद ने शुरू किया डीएमके से. कांग्रेस के बाद के विपक्षी मोर्च में सबसे ज्यादा सांसद डीएमके के हैं. उन्होंने कहा कि 1976 में कांग्रेस ने करुणानिधि की सरकार को भ्रष्टाचार के आरोप में बर्खास्त कर दिया. और 1980 में डीएमके एक बार फिर से कांग्रेस के साथ हो गई. दुबे ने राजीव गांधी की हत्या के बाद बने जैन कमीशन का जिक्र किया और डीएमके पर निशाना साधा. दुबे का कहना था कि जैन कमीशन की रिपोर्ट में साफ शब्दों में कहा गया था कि लिट्टे जिसने राजीव गांधी की हत्या की थी उसे डीएमके का समर्थन मिलता था. लेकिन फिर भी डीएमके और कांग्रेस साथ हैं.
इसके बाद निशिकांत ने एक-एक करके विपक्षी गठबंधन के क्षेत्रीय दलों की लिस्ट गिनाई और कहा बीजेपी ने नहीं कांग्रेस ने इन दलों के साथ ठीक बर्ताव नहीं किया.
दरअसल, निशिकांत दुबे विपक्ष के गठबंधन की उन गांठों को गिनवा रहे थे जिन पर पर्दा डालकर सभी दल साथ आए हैं. सारे मतभेदों और मनभेदों के किनारे रखकर नरेंद्र मोदी की बीजेपी के सामने एक सामुहिक राजनीतिक प्रयास की कोशिश हो रही है. एक बात और. निशिकांत उन आरोपों को भी काउंटर करने की कोशिश कर रहे थे, जिनमें विपक्ष वाले बीजेपी को वॉशिंग मशीन कह देते हैं. शरद पवार की पार्टी तोड़कर अजित पवार गुट महाराष्ट्र में बीजेपी के साथ आ गया. टीएमसी के सौगत राय ने जब अपनी बारी में बोलने के लिए खड़े हुए तो उन्होंने बीजेपी पर यही आरोप लगाया.
यही नहीं. जम्मू-कश्मीर में महबूबा मुफ्ती के साथ बीजेपी ने सरकार बनाई. हालांकि गठबंधन टूटा और अनुच्छेद 370 हटने के बाद महबूबा को केंद्रीय शासन ने नज़रबंद कर दिया. तब भी बीजेपी पर ऐसी ही आरोप लगे थे. इस दौरान निशिकांत ने सोनिया गांधी पर भी निशाना साधा. पहले नेशनल हेराल्ड के केस को लेकर उसके बाद उनकी राजनीति पर.
उनके बाद डीएमके के आर बालू ने अविश्वास प्रस्ताव के समर्थन में भाषण दिया. कायदे के मुताबिक जब भी कोई पक्ष या विपक्ष का सांसद संसद में बोलने के लिए खड़ा होता है वो पहले ही ये बता देता है कि वो प्रस्ताव के समर्थन में है या विरोध में. बालू ने पहले तो तमिलनाडु की बात की. मोदी सरकार और प्रधानमंत्री पर तमिलनाडु की अनदेखी करने का आरोप लगाया. उसके बाद वो मणिपुर पर लौटे. उन्होंने सदन के पटल पर मणिपुर के रहवासियों के लिए चिंता जाहिर की. मणिपुर में हुई हत्याओं, रेप और विस्थापन के आंकड़े देकर सरकार पर निशाना साधा.
अपनी बात खत्म करते हुए डीएमके सांसद ने सदन में तमिलनाडु के गवर्नर आरएन रवि का भी जिक्र किया. दरअसल, जनवरी के महीने में तमिलनाडु की विधानसभा से एक वीडियो सामने आया था. जिसमें राष्ट्रगान शुरू होते ही आरएन रवि सदन छोड़कर चले गए थे. बालू ने इस वाकये का जिक्र करते हुए कहा कि ये राष्ट्रगान का अपमान था.
बालू के बाद ममता बनर्जी की पार्टी से सौगत राय ने अविश्वास प्रस्ताव की चर्चा में हिस्सा लिया. उन्होंने मणिपुर की हिंसा पर सरकार को घेरा. सौगत ने प्रधानमंत्री पर सीधा हमला बोलते हुए कहा कि जब मणिपुर में हिंसा हो रही थी तब पीएम मोदी विदेश दौरों पर थे. अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडन के घर पर डिनर कर रहे थे. लेकिन उन्होंने मणिपुर पर एक भी बयान नहीं दिया.
सौगत ने इस दौरान हरियाणा के नूह की हिंसा का भी जिक्र किया. उन्होंने आरोप लगाया कि नूह में सरकार दंगा रोकने में विफल रही. और मुसलमानों के घर तोड़े जा रहे हैं. लेकिन हिंसा की बात पर एक सवाल तो उन पर भी उठता है. बंगाल में जून के हुए पंचायत चुनावों के दौरान जो हिंसा हुई उसका जिम्मेदार किसे ठहराया जाना चाहिए. नूह की हिंसा को बंगाल की हिंसा से काउंटर नहीं किया जा सकता. लेकिन अगर नूह में खट्टर सरकार की विफलता दिखती है. तो बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार. वहां होने वाली हिंसा की जिम्मेदारी भी तो उन्हीं की पार्टी की है.
महाराष्ट्र के सांसदों ने भी लोकसभा में अपनी बात रखी. चर्चा के दौरान एकनाथ शिंदे की शिवसेना से श्रीकांत शिंदे ने सरकार के समर्थन में भाषण दिया. श्रीकांत, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के बेटे हैं. उन्होंने मोदी सरकार के कार्यकाल की उपलब्धियों की पूरी फेहरिस्त गिनवा डाली. वो अंग्रेजी वर्णमाला में A से Z तक UPA सरकार के घोटाले गिनवाने लगे और दूसरी तरफ मोदी सरकार की स्कीम्स गिनवाई. क्योंकि चर्चा ही मणिपुर से जुड़ी थी इसलिए इस उन्होंने मणिपुर की हिंसा पर भी दुख जताया.
लेकिन चर्चा के दौरान एक और बात पर गौर करना चाहिए. इस देश के राजनेता कैसे अपनी बातों में घुमाकर असल मुद्दे से भटकाते हैं ये आज संसद में देखने को मिला. शिंदे लोकसभा में महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार पर निशाना साध रहे थे. और तभी उन्होंने हनुमान चालिसा का जिक्र कर दिया. तपाक से विपक्ष के एक सांसद ने तंज-नुमा लहजे में कह दिया कि हनुमान चालिसा सुनाकर दिखाओ. और श्रीकांत शिंदे हनुमान चालिसा सुनाने लगे. ये सब हो रहा था देश की संसद में.
जिस संसदीय क्षेत्र की नुमाइंदगी श्रीकांत शिंदे करते हैं क्या वाकई वहां की जनता ने उन्हें इसलिए चुना होगा क्योंकि उनको हनुमान चालिसा याद है. या विपक्ष के जिस सांसद ने शिंदे से हनुमान चालिसा सुनाने को कहा था क्या उनकी कॉन्स्टीट्यूएंसी वालों ने सांसद महोदय को सदन के पटल पर यही सवाल पूछने के लिए भेजा था कि हनुमान चालीसा सुनाकर सुनाए.
बहरहाल, महाराष्ट्र से ही शरद पवार वाली NCP से सुप्रिया सुले ने सरकार का एक-एक करके कई हमले बोले. सबसे पहले उन्होंने महंगाई को लेकर सरकार को घेरा. सुप्रिया ने कहा कि सिर्फ टमाटर ही नहीं, प्याज़, आटा, दाल, चावल, नमक, दूध तक महंगा हो गया है. उन्होंने दावा किया कि इन सभी खाने पीने वाली चीज़ों को मिलाकर जो थाली, UPA सरकार में 500 रुपये में भर जाती थी आज वहीं थाली हजार रुपये में भी नहीं भरती. लेकिन इसके बाद उनके भाषण में पार्टी टूटने का दर्द भी झलका. उन्होंने मोदी सरकार के दौरान के विपक्षी पार्टियों की सरकारों को गिराने की पूरी लिस्ट गिनवाई.
वंदे भारत ट्रेन, मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी परियोजना मानी जाती है. लेकिन सुप्रिया सुले ने वंदे भारत को लेकर सरकार को घेरने की कोशिश की. उन्होंने कहा कि उनके संसदीय क्षेत्र में ना तो वंदे भारत रुकती है और जो एक्सप्रेस ट्रेनें UPA सरकार में रुकती थीं, उन्हें स्टॉपेज भी बदल दिए गए हैं.
इसके बाद स्पीकर ने सपा सांसद डिंपल यादव को बोलने के लिए बुलाया. डिंपल ने भाषण शुरू में ही भाजपा के नैरेटिव को काउंटर किया. जब से मणिपुर से वो भयानक वीडियो आया है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत कई भाजपा मंत्रियों और सांसदों-विधायकों ने कहा कि राजस्थान, बंगाल और छत्तीसगढ़ की महिलाओं पर हो रही हिंसा की बात होनी चाहिए. बिल्कुल होनी चाहिए, मगर ये ख़ालिस वाटबाउट्री है. मतलब अगर आपसे कोई सवाल पूछा जाए, तो आप जवाब देने के बजाए एक वैसी ही और स्थिति पर पलटकर सवाल पूछ लें. हालांकि, डिंपल ने सवाल के बदले सवाल पर सवाल नहीं उठाए. बल्कि और सवाल जोड़ दिए. कहा कि राजस्थान की तो चर्चा होनी ही चाहिए, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश में भी महिलाओं की स्थिति पर बात होनी चाहिए. बताया कि योगी आदित्यनाथ की सरकार में हर तीन घंटे पर महिलाओं के साथ उत्पीड़न के केस रिपोर्ट होते हैं.
पूर्व क़ानून मंत्री और मौजूदा भू-विज्ञान मंत्री किरण रिजीजू ने भी सरकार का पक्ष रखा. कहा कि विपक्ष अपने अविस्वास प्रस्ताव पर पछताएगा.
विपक्ष की मांग थी कि मणिपुर पर संसद में चर्चा हो. विस्तृत चर्चा हो. प्रधानमंत्री सदन में आकर जवाब दें. अविश्वास प्रस्ताव लाया ही इसलिए गया था. क्योंकि इस बात में कोई शक नहीं है कि विपक्ष का अविश्वास प्रस्ताव वोटिंग में कहीं भी टिकेगा नहीं. लेकिन सवाल ये कि मणिपुर पर कितनी चर्चा हुई. अगर आप आज की संसद की कार्यवाही गौर से देखेंगे तो पाएंगे कि मणिपुर पर चर्चा खानापूर्ति के तौर पर ही हुई. विपक्ष ने सरकार को कोसा तो खूब लेकिन कमोबेश सभी सांसदों ने एक-एक पैरा ही मणिपुर को डेडिकेट किया. और तीन महीने से मणिपुर में हो रहे रेप, हत्या और विस्थापन के दर्द का जिक्र किया. सरकार के पक्ष में बोलने वाले कुछ सांसदों ने उतनी भी जहमत नहीं उठाई कि मणिपुर पर सरकार का पक्ष भी कायदे से रखें. हांलाकि सरकार के कामों का गुणगान खूब हुआ. चर्चा के अभी दो दिन और बचे हैं.
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