# मैनेजमेंट (प्रबंधन)प्रबंधन की परिभाषा वगैरह में पड़ने से अच्छा आपको ये बताते हैं कि इसके टोटल छः चरणहोते हैं. और यदि आप इन छः चरणों को ध्यान में रखकर कोई भी काम करते हैं, तो वोमैनेजमेंट की श्रेणी में आएगा (जैसे कि – होटल मैनेजमेंट, एंगर मैनेजमेंट, रिस्कमैनेजमेंट, होम मैनेजमेंट, टाइम मैनेजमेंट आदि). लोगों को कहते भी सुना होगा आपने –अपने काम को मैनेज करना सीखो. उसका अर्थ ये ही है कि अपने काम को इन छः चरणों मेंकरना सीखो – 1) फोरकास्टिंग (पूर्वानुमान) 2) प्लानिंग (योजना) 3) ऑर्गनाइजिंग(व्यवस्था करना) 4) कमांडिंग (नियोग) 5) को-ऑर्डनेटिंग (समन्यव) 6) कंट्रोलिंग(नियंत्रित करना)--------------------------------------------------------------------------------# रिस्क मैनेजमेंट (जोख़िम प्रबंधन)अब मैनेजमेंट का अस्तित्व ही इसलिए है कि इस एक शब्द को किसी भी कार्य से जोड़ दियाजाए तो उस कार्य में नुकसान कम और संसाधनों का उपयोग महत्तम हो जाता है. ऐसा हीरिस्क मैनेजमेंट में भी है. रिस्क मैनेजमेंट के अंतर्गत, किसी रिस्क को कैसे टालाजाए, इससे अधिक इस बात पर ज़ोर दिया जाता है कि किसी अपरिहार्य दुर्घटना में नुकसानकैसे कम से कम हो. तभी तो रिस्क मैनेजमेंट को ध्यान में रखकर बनाई गई बिल्डिंगभूकंप-अवरोधी होती है, आग से बचने के लिए छत पर पानी वाले फव्वारे लगे होते हैं.यदि आप किसी कार्य में होने वाले नुकसान का या उसमें निहित रिस्क का पहले से हीअनुमान लगा कर (मैनेजमेंट का प्रथम स्टेप) उसकी प्रॉपर प्लानिंग (मैनेजमेंट काद्वितीय स्टेप) करके अपने संसाधनों को उसी तरह से व्यवस्थित करते हैं (मैनेजमेंट कातीसरा स्टेप) कि - अव्वल तो दुर्घटनाएं घटे ही न और यदि घटे भी तो दुर्घटना होने कीस्थिति में कम से कम नुकसान हो - तो फिर आप ‘रिस्क मैनेजमेंट’ को बहुत हद तक फॉलोकरते हैं. और यदि भगवान न करे दुर्घटना हो ही गई और थोड़ा बहुत नुकसान भी हो ही गयातो - ‘पिछली बार दुर्घटना क्यूं हुई’, ‘पिछली बार जो नुकसान हुआ उसे कैसे कम कियाजाए’ - आदि का भी संज्ञान लेते हैं तो आप मैनेजमेंट के अंतिम स्टेप - कंट्रोलिंग कोभी फ़ॉलो करते हैं. इससे यह होगा कि हर बार आपका रिस्क मैनेजमेंट सिस्टम और अधिक -और अधिक मज़बूत होता चला जाएगा. और यूं हर बार दुर्घटना में और कम - और कम नुकसानहोगा. आपने देखा ही होगा कि ‘एंटी-वायरस’ के हर साल नए-नए, ज़्यादा कारगर वर्ज़न आतेरहते हैं. यदि ‘रिस्क मैनेजमेंट’ में 'कंट्रोलिंग' न होती तो वही पुराना वर्ज़न चलतारहता.--------------------------------------------------------------------------------# इंश्योरेंस (बीमा)रिस्क या दुर्घटनाएं ‘आर्थिक’ भी हो सकती हैं. बल्कि हर दुर्घटना का एक आर्थिक पक्षहोता ही होता है. इसलिए ही तो इंश्योरेंस जो है, वो आता है रिस्क मैनेजमेंट केअंदर. इंश्योरेंस किसी भी तरह का हो, वो होता भविष्योन्मुखी ही है. मतलब उस नुकसानकी भरपाई के लिए, जो अभी हुई ही नहीं. और इसमें मैनेजमेंट के छः स्टेप्स भी होतेहैं. आगे बढ़ने से पहले एक सत्य घटना जानते हैं: दूसरी और तीसरी सदी में यात्राएं,ख़ास तौर पर समुद्री और नदी की यात्राएं, बहुत जोखिम भरी होतीं थी. लेकिन व्यापारकरने के लिए और अपने माल को बेचने के लिए ये यात्राएं अपरिहार्य भी थीं. चीनीयात्री/व्यापारी अपने सामान को अलग-अलग जहाजों में बांट लेते थे, ताकि किसी एक जहाजके डूब जाने या लुट जाने पर हर एक का थोड़ा-थोड़ा नुकसान हो, न कि एक ही कोबहुत-सारा. वहीं दूसरी ओर, बेबीलोन में एक ऐसी प्रणाली विकसित हुई जिसमें यदि एकव्यापारी अपनी यात्रा और शिपमेंट के लिए ऋण लेता था तो उसे यह सुविधा भी प्राप्त थीकि वह थोड़ी अतिरिक्त राशि का भुगतान करे और यदि सामान चोरी हो जाए या डूब जाए तोफिर ऋण न लौटाए. ऋणदाता को भी इसलिए कोई नुकसान नहीं होता था क्यूंकि यदि दसव्यापारियों ने अतिरिक्त राशि का भुगतान करे और एक जहाज डूब भी जाए, तो भी बाकी नौलोगों की अतिरिक्त राशि से हिसाब बराबर हो जाता था. इन दोनों कहानियों से हमें येशिक्षा मिलती है कि ‘इंश्योरेंस’ नामक 'रिस्क मैनेजमेंट' एक ऐसा ‘पूल’ सिस्टम हैजिसमें भविष्य में होने वाले आर्थिक नुकसान को कम नहीं किया जाता बल्कि बराबर-बराबरसभी लोगों में बांट दिया जाता है.--------------------------------------------------------------------------------# गेम थ्योरीकैसिनो में एक कहावत प्रसिद्ध है कि – हाउस नेवर लूज़ – यानी जो जुए को आर्गेनाइजकरवाता है वो कभी नहीं हारता, या उसका कभी नुकसान नहीं होता. क्यूंकि जीते कोई भी,पर हर दांव लगाने वाले के पैसे में से ‘हाउस’ पहले ही अपना 'कट' निकाल लेता है.कैसिनो में गेम थ्योरी इसी काम आती है कि कैसे दांव निर्धारित किए जाएं कि – हाउसनेवर लूज़. सारे गुणा भाग, सारे समीकरण इसी के लिए. एक उदाहरण देखिए – दो रूपये काएक लॉटरी का टिकट है जिसमें शून्य से लेकर नौ तक नंबर लिखे हैं. जिस किसी की भीलॉटरी खुलेगी उसको अट्ठारह रुपए मिलेंगे. अब हर दस टिकट बिकने पर ‘हाउस’ को मिलतेहैं बीस रुपए और जीतने वाले अट्ठारह रुपए और जिसकी लॉटरी न खुली उसको होता है दोरुपए का नुकसान. वैसे तो गेम थ्योरी का कांसेप्ट बहुत विशाल है और इसका उपयोगमनोविज्ञान, लॉजिक, कंप्यूटर-साइंस से लेकर लॉस वेगास के कैसिनो तक में किया जाताहै लेकिन हमारा उद्देश्य गेम थ्योरी नहीं, इंश्योरेंस को समझना है. कैसिनो या जुएकी तरह का ही कुछ होता है इंश्योरेंस में भी. चूंकि जुए से उलट इंश्योरेंस एकनोबल-कॉज़ है इसलिए इसमें हाउस को कुछ नहीं मिलता (या आदर्श रूप से कुछ नहीं मिलनाचाहिए, और IRDA की रूलिंग भी यही कहती है. IRDA के बारे में आगे बताते हैं.) तो ऊपरवाले उदाहरण में जुए के बदले इंश्योरेंस को फिट किया जा सकता है. बस दो अंतर हैं -# 1 - हाउस को कुछ नहीं मिलेगा, और # 2 - नुकसान जिसका हुआ उसे उतना ही पैसा मिलेगाजितने का उसे नुकसान हुआ है, न कि बीस रुपया. याद रखिए कि इंश्योरेंस एक नो-लॉस,नो-प्रॉफिट कांसेप्ट है. ये मज़े की बात है न इंश्योरेंस पूरी तरह एक ‘आर्थिक’अवधारणा होते हुए भी - नो-लॉस, नो-प्रॉफिट कांसेप्ट है. तो इस तरह से हमें ये समझमें आता है कि यदि आपने पांच लाख का हेल्थ इंश्योरेंस करवाया है तो ऐसा नहीं है किआपका खर्चा तो हुआ बीस हज़ार पर आपको मिल गए पांच लाख. नहीं! आप कितने ही बड़े अमाउंटका इंश्योरेंस करवा लें, आपको मिलेंगे उतने ही जितना आपका खर्च हुआ है - इंश्योरेंसएक नो-लॉस, नो-प्रॉफिट कांसेप्ट है. साथ ही यदि आपके पांच लाख से अधिक खर्च होता हैतो भी आपको केवल पांच लाख ही मिलेंगे. यानी आपको ‘महत्तम’ पांच लाख रुपए मिलेंगे.--------------------------------------------------------------------------------# कवर और प्रीमियमगेम थ्योरी का उपयोग इंश्योरेंस में इसलिए ही किया जाता है ताकि इंश्योरेंस काप्रीमियम निर्धारित किया जा सके. प्रीमियम बोले तो वो छोटी सी राशि जो आपको एक बड़ीराशि का इंश्योरेंस दिलाएगी. और दुर्घटना हो जाने की स्थिति में जो महत्तम राशिमिलेगी वो है 'कवर' या 'इंश्योरेंस कवर'. और इसे निर्धारित करने के लिए बहुत सेफेक्टर ध्यान में रखने पड़ते हैं. कुछ फेक्टर्स नीचे बता रहे हैं – # 1) पूल कितनाबड़ा है – जितना बड़ा 'पूल' होगा (यानी जितने लोग इंश्योरेंस करवाएंगे)प्रीमियम-अमाउंट उतना ही कम होता जाएगा. जैसे यदि पूल में केवल एक ही आदमी हो तोइसका मतलब तो यही हुआ कि उसको अपने नुकसान की भरपाई खुद ही करनी पड़ेगी. किंतु जैसेजैसे लोग बढ़ते जाएंगे प्रीमियम अमाउंट घटता जाएगा. # 2) दुर्घटना की प्रायिकता क्याहै – मतलब कि आम तौर पर कितने प्रतिशत लोग उस दुर्घटना के शिकार होते हैं जिसपरइंश्योरेंस आधारित है. जैसे - यदि दस में से एक आदमी कैंसर का और दो हार्ट अटैक केशिकार होते हैं, और यदि दोनों के ही इलाज के खर्च बराबर हो तो, हार्ट अटैक वालेहेल्थ इंश्योरेंस की तुलना में कैंसर वाले हेल्थ इंश्योरेंस का प्रीमियम कम होगा.(इसलिए ही तो जिसकी जितनी उम्र उसका उतना ज़्यादा प्रीमियम, क्यूंकि बढ़ती उम्र केसाथ बीमार पड़ने की प्रायिकता बढ़ जाती है.) # 3) रिस्क कवर कितना बड़ा है – अब आपनेलिया रिस्क कवर दस लाख का और दूसरे ने पांच लाख का, तो ऐसा नहीं है कि आप दोनों कोबराबर रुपए देने पड़ेंगे. क्यूंकि दरअसल आप यदि दुर्घटना के शिकार हुए तो आपको‘महत्तम’ दो लोगों के बराबर पैसा मिलेगा. (लेकिन फिर भी ऐसा नहीं है कि दस लाख वालेको पांच लाख वाले से दुगने रुपए देने पड़ेंगे, क्यूंकि अंततः हेल्थ इंश्योरेंस मेंआपको उतने ही रुपए मिलते हैं जितने आपने खर्च हुए, चाहे कितने का भी इंश्योरेंस कवरलिया हो. हेल्थ इंश्योरेंस ही नहीं ऐसा कमोबेश हर तरह के इंश्योरेंस में होता है,एक को छोड़कर. कौन सा और क्यूं ये भी नीचे बताया जाएगा.) ऐसे ही कई कारक हैं जिन्हेंध्यान में रखकर न केवल प्रीमियम तय होता है बल्कि पूरी की पूरी पॉलिसीज़ का एक ढांचाबनता है.--------------------------------------------------------------------------------# IRDAIपॉलिसी बनाने वालों को आम बोलचाल की भाषा में कहते हैं – इंश्योरेंस कंपनीज़. जैसेबजाज-एलायंज़, ICICI-लोम्बार्ड, टाटा-AIG, भारती-AXA, LIC आदि. अब एक पॉलिसी बनानेमें बनाने वाला गड़बड़ी कर सकता है, जैसे कि प्रीमियम ज़्यादा ले सकता है, क्लेम केवक्त पैसे कम या नहीं दे सकता है, और सबसे बुरा - आपके प्रीमियम के पैसे लेकर भागसकता है. तो इन सब, और बाकी कई तरह के, फ्रॉड से आपको बचाने के लिए भारत सरकार नेगठित की है – IRDAI. यानी इंश्योरेंस रेग्युलेटरी डेवलपमेंट अथॉरिटी यानी भारतीयबीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण. जैसे बैंको के लिए RBI और शेयर मार्किट के लिएSEBI वैसे ही इंश्योरेंस के लिए IRDAI. IRDAI एक स्वायत्त, वैधानिक एजेंसी है जोभारत में बीमा उद्योगों को कंट्रोल करती है और बढ़ावा भी देती है.--------------------------------------------------------------------------------# जनरल और लाइफ इंश्योरेंस के बीच अंतरऊपर की परिभाषाओं में जितने तरह के रिस्क कवर आ सकते हैं वो सारे दरअसल जनरलइंश्योरेंस ही हैं – कार इंश्योरेंस, हेल्थ इंश्योरेंस. लाइफ-इंश्योरेंस तो ऊपर कीपरिभाषा से दरअसल ‘इंश्योरेंस’ में आता ही नहीं. क्यूंकि - लाईफ-इंश्योरेंस की सबसेआसान परिभाषा यही है कि किसी की मृत्यु पर नॉमिनी को एक निश्चित राशि मिलती है. अबये तो इंश्योरेंस की परिभाषा से बिल्कुल उल्टा हुआ. क्यूंकि बेशक किसी की मृत्यु सेआर्थिक नुकसान होगा, लेकिन ये कैसे पता लगे कि कितना नुकसान होगा/हुआ. इसी बात कोअप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार करते हुए लाइफ इंश्योरेंस और बाकी सब इंश्योरेंस मेंसबसे बड़ा अंतर यह रखा जाता है कि – हर तरह के जर्नल इंश्योरेंस में जहां आपको जितनाआर्थिक नुकसान हुआ और जितने का इंश्योरेंस कवर है उसमें से जो भी अमाउंट कम है उतनाभुगतान किया जाता है, लेकिन लाइफ इंश्योरेंस में आपको कितना आर्थिक नुकसान हुआ येतो कैलकुलेट किया ही नहीं जा सकता इसलिए आपने जितने का कवर लिया उतना अमाउंट आपकेनॉमिनी को दिया जाता है. और आप कितने भी अमाउंट का कवर ले सकते हैं, अपनी सामर्थ्यके अनुसार.-------------------------------------------------------------------------------- # टर्म और रेगुलर प्रीमियम इंश्योरेंस में अंतर# टर्म इंश्योरेंस – यदि आपने भविष्य में होने वाली किसी दुर्घटना के आर्थिक नुकसानसे बचने के लिए इंश्योरेंस कंपनी को पैसा जमा किया और ‘निश्चित अवधि’ तक वहदुर्घटना नहीं घटी या आपको कोई आर्थिक नुकसान नहीं हुआ तो आपका सारा पैसा लेप्स. इसनिश्चित अवधि को ही ‘पॉलिसी का टर्म’ और इस तरह के इंश्योरेंस को ही ‘टर्म पॉलिसी’कहते हैं. एक उदाहरण से ये समझना आसान होगा – आपने एक पांच हज़ार रुपए प्रीमियम काएक वर्ष का ‘टर्म हेल्थ-इंश्योरेंस’ लिया. यानि इस पॉलिसी का टर्म हुआ एक वर्ष.माना इसका प्रीमियम कवर है पांच लाख. अब यदि - 1) एक वर्ष के भीतर आपकी तबियत खराबहोती है और आपके बीस हज़ार रुपए खर्च होते हैं – तो इंश्योरेंस कंपनी आपको बीस हज़ाररुपए देगी. 2) एक वर्ष के भीतर आपकी तबियत खराब होती है और आपके छः लाख खर्च होतेहैं – तो इंश्योरेंस कंपनी आपको पांच लाख रुपए देगी. (छः क्यूं नहीं इसके लिए ऊपरगेम-थ्योरी वाला भाग फिर देखें.) 3) आपकी एक वर्ष में तबियत खराब नहीं होती है, याहोती भी है तो आप क्लेम नहीं करते (बीमा आग्रह की विषय वस्तु है) - तो आपके पांचहज़ार रुपए लेप्स और अगले साल पांच लाख का कवर लेने के लिए आपको फिर से पांच हज़ाररुपए प्रीमियम देना पड़ेगा. 4) आपकी एक साल में दो बार तबियत खराब होती है - पहलीबार बीस हज़ार खर्च होता है और दूसरी बार छः लाख, तो पहली बार तो आपको मिलेंगे पूरेबीस हज़ार लेकिन दूसरी बार केवल चार लाख अस्सी हज़ार. क्यूंकि आपका एक साल का 'टर्मकवर' पांच लाख है इसलिए पूरे साल में आपको महत्तम पांच लाख रुपए ही मिल सकते हैं.यही तो इंश्योरेंस की परिभाषा है - कि कुछ लोग थोड़े थोड़े पैसे जमा करें, उन कुछलोगों में से जिसका नुकसान हो उसे उस पूल में से पैसे दिए जाएं और बाकियों के पैसेलेप्स. न ज़्यादा गणित लगाना न ज़्यादा दिमाग. इसलिए ही टर्म इंश्योरेंस ही परिभाषाके हिसाब से असली इश्योरेंस है और उधर 'रेगुलर प्रीमियम इंश्योरेंस' परिभाषा से‘इंश्योरेंस’ के अंतर्गत आता ही नहीं. कैसे? आइये समझें: # रेगुलर प्रीमियमइंश्योरेंस – इसमें आप हर माह या हर साल या हर छः माह में एक निश्चित राशि देते हैंऔर ऐसा 'रेगुलरली' करते हैं. इस राशि को प्रीमियम कहते हैं. ऐसा आप एक अपेक्षाकृतलंबे समय तक – माना बीस वर्ष तक करते हैं. अब यदि बीस वर्ष तक आपने क्लेम नहीं कियातो आपको आपके सारे पैसे वापस मिल जाते हैं और साथ ही थोड़ा बढ़ कर. कुछ चीज़ें गौरकरें – # पहली ये कि 'रेगुलर प्रीमियम इंश्योरेंस' का कोई ऑफिसियल नाम नहीं है.चूंकि हम इसे ही असली इंश्योरेंस समझते आ रहे हैं इसलिए इसे सिर्फ ‘इंश्योरेंस’ भीकह देते हैं. मगर आप समझ ही गए होंगे कि ये तो सेविंग और इंश्योरेंस का मिला जुलारूप है. # दूसरी ये कि ‘रेगुलर प्रीमियम इंश्योरेंस’ ज़्यादातर ‘लाइफ इंश्योरेंस’ हीहोते हैं. क्यूंकि इंसान दो बार नहीं मर सकता. लेकिन बीमार कई बार पड़ सकता है. बीसया तीस वर्ष में एक बार तो पड़ेगा ही. तो यदि ‘कार इंश्योरेंस’ और ‘हेल्थइंश्योरेंस’ भी ‘रेगुलर प्रीमियम इंश्योरेंस’ हों अजीब सी स्थिती उत्पन्न हो जाएगी.--------------------------------------------------------------------------------# सेविंग और इन्वेस्टमेंट:आप हर महीने कुछ रुपया इकट्ठा करते हैं – ये सेविंग का उदाहरण है. आप अपना रुपयाबढ़ाते हैं या बढ़ाने की इच्छा से कहीं पैसा खर्च करते हैं – ये इन्वेस्टमेंट काउदाहरण है. सेविंग उधार लेकर नहीं होती, न होनी चाहिए, लेकिन इन्वेस्टमेंट उधार यालोन लेकर भी किया जा सकता है. क्यूंकि अंततः आपको पता है (या उम्मीद है) कि जहांइन्वेस्ट किया है वहां से इतना माल वापस आ जाएगा कि न केवल उधार और उसका ब्याज़ वापसहोगा बल्कि कुछ पैसा अपने लिए भी बच जाएगा. अब यदि आप हर हर महीने कुछ रुपया इकट्ठाकरते हैं और उस रुपए को बढ़ाना भी चाहते हैं – सेविंग प्लस इन्वेस्टमेंट. कोई भीसेविंग प्योर सेविंग नहीं होती और कोई भी इन्वेस्टमेंट प्योर इन्वेस्टमेंट नहींहोता. मगर ‘सेविंग प्लस इन्वेस्टमेंट’ में सेविंग वाला पार्ट जितना ज़्यादा होगारिस्क उतना कम लेकिन रिटर्न भी उतना ही कम होगा और इन्वेस्टमेंट वाला पार्ट जितनाअधिक होगा रिस्क उतना ज़्यादा मगर रिटर्न भी उतना ही अधिक होगा.--------------------------------------------------------------------------------# इंश्योरेंस, सेविंग्स और इन्वेस्टमेंट का घालमेल महंगा है:अब तक के आर्टिकल से आपको पता चल गया होगा कि टर्म और रेगुलर इंश्योरेंस में, टर्मइंश्योरेंस रियल या तुलनात्मक रूप से ज्यादा रियल इंश्योरेंस है और लाइफ और जनरलइंश्योरेंस में जनरल इंश्योरेंस ज्यादा रियल इंश्योरेंस है. लेकिन हम ने तो हद्द हीकर रखी है हममें से ज्यादा लोगों के पास जो इंश्योरेंस से वोरेगुलर-प्रीमियम-लाइफ-इश्योरेंस है. यानी दो नकली इंश्योरेंस का घालमेल. अब कहनेवाले कहेंगे नाम से क्या फर्क पड़ता है. हमें इंश्योरेंस और इन्वेस्टमेंट एक साथ मिलरहा है. बिलकुल सहमत, जिस तरह कमल में कमलत्व नहीं वैसे ही इंश्योरेंस मेंइंश्योरेंसत्व न हो तो क्या फर्क पड़ता है. लेकिन केवल गलत परिभाषा भर होती तो इतनाबड़ा लेख ये सब समझाने के लिए लिखा ही नहीं जाता. लेकिन हमें निजी रूप से प्रभावितकरने वाली दिक्कतें दो हैं – पहली तो ये कि जब हम इन्वेस्टमेंट या सेविंग्स के नामपर कोई रेगुलर-प्रीमियम-लाइफ-इश्योरेंस लेते हैं तो जानकारों के सामने बेवकूफ साबितहोते हैं और दूसरी और सबसे महत्वपूर्ण दिक्कत ये कि यदि आप इंश्योरेंस औरइन्वेस्टमेंट और सेविंग्स तीनों को अलग अलग रखते हैं तो आप तुलनात्मक रूप से अपनेपैसों को अधिक बेहतर तरीके से व्यवस्थित करते हैं और जहां एक तरफ कम पैसों में अधिकरिटर्न पाते हैं वहीं दूसरी तरफ एक बड़ी राशि का इंश्योरेंस पाते हैं. याद रखिए कि‘इंश्योरेंस’ में पैसे ‘इन्वेस्ट’ करना ऐसा ही है जैसे 'ईएनटी विशेषज्ञ 'से दांतोंका इलाज करवाना. ऑफ कोर्स वो भी किया जा सकता है, क्यूंकि अंततः वो डॉक्टर ही हैऔर ह्यूमन एनाटोमी के विषय में थोड़ा बहुत तो जानता ही होगा. लेकिन फिर भी यदि आपको'दंत-चिकित्सक' और 'ईएनटी-विशेषज्ञ 'में एक चुनने का विकल्प मिले तो आप क्याचुनेंगे? ठीक वैसे ही, 'इंश्योरेंस' में 'इन्वेस्टमेंट' कर आप बेशक ‘आर्थिकविशेषज्ञों’ को ही अपनी राशि सौंप रहे हैं लेकिन सबसेट अलग हैं. और जहां इंश्योरेंसनो-लॉस, नो प्रॉफिट कांसेप्ट है वहीं इन्वेस्टमेंट का एकमात्र उद्देश्य ही प्रॉफिटहै.--------------------------------------------------------------------------------क्या करें # 1: एक उदाहरण से आसानी से समझ आएगा. माना आपके पास पांच हज़ार रुपए हरमाह बच जाते हैं और आप इसे इन्वेस्ट करना चाह रहे हैं, अगले बीस सालों तक. लेकिनआपको तो साथ ही साथ पच्चीस लाख का लाइफ-इंश्योरेंस भी चाहिए ताकि अगले बीस सालों तकआपको कुछ हो जाने की स्थिति में आपके नॉमिनी को पच्चीस लाख मिलें. तो सबसे पहले तोतीन हजार प्रति-वर्ष से कम रुपए में बीस वर्ष का टर्म लाइफ इंश्योरेंस ले लें. बेशकआपको हर साल तीन हजार रुपए देने पड़ेंगे जो कि क्लेम न करने की स्थिति मेंवर्ष-दर-वर्ष लेप्स होते जाएंगे. लेकिन इन बीस सालों में आपको यदि कुछ हो जाता है,ईश्वर न करे, तो आपके नॉमिनी को पच्चीस लाख रुपए मिल जाएंगे. और एक बार आप तीन हज़ाररुपए वार्षिक देकर लाइफ इंश्योरेंस वाले टेंशन से मुक्त हुए तो आपके पास सालाना बचजाएगें सालाना सत्तावन हज़ार रुपए. अब इन सत्तावन हज़ार रुपए को वहां लगाएं जहां परप्योर इन्वेस्टमेंट होता हो और इंश्योरेंस का नाम-ओ-निशान न हो. गुणा भाग करके देखलें, कहीं ज़्यादा फायदा हो रहा होगा. क्या न करें # 1: हर महीने पूरे के पूरे पांचहज़ार रूपये इंश्योरेंस में इन्वेस्ट न करें. बल्कि एक रुपया भी ‘इंश्योरेंस' में'इन्वेस्ट’ न करें. इंश्योरेंस अलग से लें और इन्वेस्टमेंट अलग करें.--------------------------------------------------------------------------------# अब ये यूलिप क्या बला है?इसका फुल-फॉर्म होता है – यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस प्लान. यदि आपने ‘क्या करें # 1’को फ़ॉलो किया है या करने की सोच रहे हैं तो आपको इसकी चिंता करने की या जानने कीबिलकुल ज़रूरत नहीं. लेकिन यदि आप इंश्योरेंस और इन्वेस्टमेंट दोनों एक ही पॉलिसी केमाध्यम से लेना/करना चाहते हैं या यूलिप के विषय में ऐसे ही ज्ञानवर्धक-जानकारीचाहते हैं तो आगे पढ़िए. जो लोग इंश्योरेंस में अपना पैसा इन्वेस्ट करते हैं या यूंकहें कि ‘रेगुलर-प्रीमियम-लाइफ-इंश्योरेंस’ लेते हैं उनके पास दो विकल्प होते हैं.एक तो पारंपरिक इन्श्योरेंस प्लान लिया जाए, जिसमें आपको इंश्योरेंस तो मिलता ही हैसाथ ही साथ एक निश्चित अवधि के बाद अपना पैसा थोड़ा बहुत बढ़ के वापस मिलता है. औरदूसरा यूलिप – जिसमें इंश्योरेंस तो आपको ठीक पारंपरिक इन्श्योरेंस की तरह ही मिलताहै लेकिन साथ ही इन्श्योरेंस कंपनी, आपका और आप जैसे अन्य यूलिप ग्राहकों का पैसाइकट्ठा करके कई जगहों में एक साथ इन्वेस्ट करती है – जैसे शेयर मार्किट में, सरकारीपरियोजनाओं में, किसान विकास पत्र और कमोडिटी मार्किट में. ‘यूनिट लिंक इंश्योरेंसप्लान’ में ‘यूनिट लिंक’ का मतलब है कि आपके पैसे को एक ‘यूनिट’ यानी इकाई के साथलिंक कर दिया जाता है. जैसे-जैसे वह यूनिट बढ़ती है उसी अनुपात में आपके पैसे, जो उसयूनिट से लिंक हैं, वो भी बढ़ते हैं. जब इंश्योरेंस कंपनी कोई पॉलिसी मार्किट मेंलाती है तो उस पॉलिसी की यूनिट ‘दस’ होती है. और यदि वो कभी बीस हो जाती है तो इसकामतलब कि आपके पैसे दुगने हो गए हैं. ये यूनिट के बढ़ने का अर्थ यही है कि आपके पैसेइंश्योरेंस कंपनी ने जहां इन्वेस्ट किए थे वहां पर कंपनी और इसलिए आपको लाभ हो रहाहै. ऐसी पॉलिसी लेते वक्त देखें कि खरीदते वक्त यूनिट प्राइस क्या चल रहा है और नज़रबनाए रक्खें कि उसमें क्या उतार चढ़ाव आ रहे हैं. पारंपरिक इंश्योरेंस में रिस्क कमया शून्य होता है क्यूंकि आपको जितना वादा किया जाता है उतना पैसा वापस मिलता है,जबकि यूनिट लिंक इंश्योरेंस प्लान में रिस्क अधिक होता है क्यूंकि आपको प्रोमिसकिया ही नहीं जाता कि कितना पैसा वापस मिलेगा, लेकिन हमने ऊपर जाना है कि जितनाज़्यादा रिस्क उतना अधिक रिटर्न. अब थोड़ी सोचिए – इंश्योरेंस की मूल प्रकृति थी थोड़ीपैसे ज़ेब से देकर भविष्य में होने वाले रिस्क से अपने को सुरक्षित करना, लेकिनयूलिप ने इंशोयरेंस के ठीक उल्ट काम किया – थोड़ी ज़्यादा रिस्क लेकर थोड़ी पैसे जेबमें डालना.--------------------------------------------------------------------------------क्या करें # 2 – यूलिप लेने के बदले वही तीन हज़ार सालाना वाला इंश्योरेंस लें –टर्मलाइफ इंश्योरेंस, और बाकी के पैसे शेयर मार्केट में सीधे लगाएं, एसआईपी लें.क्या न करें # 2 – इंश्योरेंस का अर्थ होता है थोड़ा सा पैसे देकर भविष्य में आनेवाली आर्थिक मुसीबतों से अपने को निश्चिन्त करना, ऐसा न भी करें तो भी इसका उल्टातो बिलकुल भी न करें. और करें भी तो उसे कम-से-कम इंश्योरेंस तो न ही कहें.--------------------------------------------------------------------------------# पोर्टफोलियो और एसआईपीचूंकि हमने ऊपर कहा है कि यूलिप लेने के बजाय शेयर मार्किट में लगाएं इसलिए हमारीज़िम्मेदारी बन जाती है कि आपको तीन चार चीज़ें अंत में और बता दें – # पहला, यदि आपशेयर मार्किट में पैसा लगा रहे हैं तो जुए के उद्देश्य से नहीं इन्वेस्टमेंट केउद्देश्य से लगाएं – यानी पैसे एक दो दिन के लिए नहीं लांग-टर्म के लिए लगाएं. #दूसरा, पोर्टफोलियो डाइवर्स रखें. हिंदी में कहें तो एक ही शेयर में पैसे न लगाएं.कुछ पैसे एक शेयर में और कुछ दूसरे और कुछ तीसरे. साथ ही एक शेयर यदिइन्फ्रास्ट्रक्चर का हो तो दूसरा केमिकल्स का तीसरा एफएमसीजी का. # तीसरा, एसआईपीयानी सिस्टमेटिक इन्वेस्टमेंट प्लान को अपनाएं. यानी एक बार में ही पैसे को लगादेना और एक बार में ही पैसे को निकाल लेना इन्वेस्टमेंट या सेविंग नहीं, जुए कीश्रेणी में आता है. जबकि आप अगर हर महीने थोड़ा थोड़ा इन्वेस्ट करते हैं और अपनेपोर्टफोलियो को भी अच्छे से मैनेज कर पाते हैं तो आपका रिस्क कम और रिटर्न अधिकहोगा.--------------------------------------------------------------------------------दी लल्लनटॉप के तहखाने में और भी हीरे पड़े हुए हैं:सूर्यवंशम की बेक़दरी के चलते फेल होगा स्टार्टअप इंडियाथंडरबोल्ट: सबसे जांबाज मिलिट्री ऑपरेशन, जिसमें बेंजामिन नेतन्याहू के भाई शहीदहुए थेराख से निकल आया था इज़रायल, खून से लिखी अपनी कहानीमुख्तार अंसारी बनाम ब्रजेश सिंह: यूपी का सबसे बड़ा गैंगवारकमाल की है उन करणी माता की कहानी, जिनके नाम पर करणी सेना गुंडई कर रही हैउस रात की पूरी कहानी, जब शास्त्री की मौत हुई--------------------------------------------------------------------------------VIDEO देखें:2017 में अलविदा कहने वाले वो 5 लोग, जिनके बिना दुनिया थोड़ी खाली-खाली लगती है: