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महज नौ महीने नहीं हैं ये, पूरी एक ज़िन्दगी है... जीकर देखेंगे?

एक प्रेग्नेंट लड़की की डायरी: पार्ट-3

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लल्लनटॉप
19 नवंबर 2016 (अपडेटेड: 18 नवंबर 2016, 04:34 AM IST)
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अंकिता जैन. जशपुर छतीसगढ़ की रहने वाली हैं. पढ़ाई की इंजीनियरिंग की. विप्रो इंफोटेक में छह महीने काम किया. सीडैक, पुणे में बतौर रिसर्च एसोसिएट एक साल रहीं. साल 2012 में भोपाल के एक इंजीनियरिंग इंस्टिट्यूट में असिस्टेंट प्रोफेसर रहीं. मगर दिलचस्पी रही क्रिएटिव राइटिंग में. जबर लिखती हैं. इंजीनियरिंग वाली नौकरी छोड़ी. 2015 में एक नॉवेल लिखा. ‘द लास्ट कर्मा.’ रेडियो, एफएम के लिए भी लिखती हैं. शादी हुई और अब वो प्रेग्नेंट हैं. ‘द लल्लनटॉप’ के साथ वो शेयर कर रही हैं प्रेग्नेंसी का दौर. वो बता रही हैं, क्या होता है जब एक लड़की मां बनती है. पढ़िए तीसरी क़िस्त.


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दूध का जला मठा भी फूंक-फूंककर पीता है. ये कहावत तो कई दफ़ा सुनी होगी आपने. मैंने भी सुनी थी, लेकिन ये किसी दिन मेरी ज़िन्दगी में मेरी प्रेग्नेंसी पर भी लागू होगा ये मुझे नहीं पता था. मेरी पहली प्रेग्नेंसी तीन हफ्तों में ही ख़त्म होने की वजह से मैं बहुत डर गई थी. अगली बार कंसीव कब करना होगा. कंसीव करने से पहले और कंसीव होने के बाद क्या-क्या प्रीकोशन लेने होंगे. अगर दोबारा पहले जैसा हो गया तो... अगर मैं कभी कंसीव कर ही नहीं पाई तो? न जाने कितने सवालों से मैं घिरी हुई थी. क्योंकि मेरी प्रेग्नेंसी “फेटलपोल” यानी बच्चा बनने से पहले ही ख़त्म हो गई थी, इसलिए मैंने अंग्रेजी डॉक्टर की सलाह के ऊपर एक आयुर्वेदिक डॉक्टर की और घर की बड़ी-बुजुर्ग महिलाओं की सलाह को अहमियत दी. और अपनी यूट्रस को साफ़ करने के लिए D&C की जगह घरेलू उपचार किये. मैं अपनी सबसे अहम चीज़ को औजारों और केमिकलों से दूर रखना चाहती थी, ताकि मुझे भविष्य में कोई दिक्कत ना हो. इसलिए जैसे ही मुझे प्रेग्नेंसी ख़त्म होने की सूचना देने वाली हेवी ब्लीडिंग शुरू हुई, मेरी मां और मेरी सास दोनों ने अपना घरेलू इलाज शुरू कर दिया, ताकि यूट्रस में जमा खून ना रह पाए जो आगे कंसीव होने वाले बच्चे को नुकसान पहुंचा सकता था.
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इन तीन घरेलू इलाजों के साथ मेरी यूट्रस, प्रेग्नेंसी ख़त्म होने के बाद की पहली ब्लीडिंग में ही पूरी तरह साफ़ हो चुकी थी. और मेरी यूट्रस ने अपनी खून से बनी दीवारों को जो उसने मेरे आने वाले बच्चे के लिए एक महीने में बनाई थीं, को तोड़कर, बड़े-बड़े जमा खून के थक्के निकालकर, ब्लीडिंग भी चार दिन में पूरी तरह ख़त्म कर दी थी, जो प्राकृतिक रूप से सब कुछ ठीक होने का एक अच्छा साइन था. अब मुझे एक महीना इंतज़ार करना था. और ये देखना था कि क्या हमेशा की तरह अगले महीने भी मेरा पीरियड समय पर आकर नार्मल ब्लीडिंग के साथ निकल जाएगा या आगे कोई परेशानी होगी. उसी पर डिपेंड करने वाला था कि मैं दोबारा कंसीव कब कर सकती हूं.
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अर्ली मिस-केरिज में सामान्यतः डॉक्टर दो से तीन महीने नार्मल पीरियड होने के बाद कंसीव करने की सलाह देते हैं. मेरे केस में फेटल-पोल या योक-सेक भी नहीं बन पाया था, सिर्फ एग फर्टिलाइज़ होकर रह गया था. इसलिए मुझे अपने पीरियड्स को सिर्फ एक महीने वाच करना था. हालांकि मेरे जैसे केसेस में भी डॉक्टर दो से तीन महीने रुकने की सलाह देते हैं. यह पूरी तरह आपके शरीर, और उसे चलाने वाली चीज़ों, जैसे कि आपके हीमोग्लोबिन, आपकी यूट्रस का स्टेटस, आपका ब्लड-प्रेशर, आपकी शुगर, आपका hCG लेवल आदि-आदि के सामान्य होने पर डिपेंड करता है. साथ ही इस पर भी कि मिस-केरिज के बाद आपके पीरियड्स कैसे हो रहे हैं. क्या वो नार्मल हैं. या अगले कुछ पीरियड्स में भी आपको सामान्य से ज्यादा तरल की जगह जमा हुआ खून यानी खून के थक्के निकल रहे हैं.
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साथ ही मैंने अपने कुछ डॉक्टर दोस्तों और उन सहेलियों से बात की जो मां बन चुकी थीं. और तब सारी जानकारी इकठ्ठा करने के बाद मैंने ये डिसाइड किया. कि यदि मेरा अगला पीरियड्स समय पर और हमेशा की तरह सामान्य रहेगा तो मैं आगे और महीनों का इंतज़ार किये बिना उसके बाद ही अपना अगला बच्चा प्लान करूंगी. इस निर्णय के पीछे एक कारण ये भी था कि इकठ्ठा हुई जानकारी के मुताबिक़ मेरे जैसे केसेस में दोबारा कंसीव होने वाला बच्चा, न सिर्फ आसानी से कंसीव होता है, बल्कि वह पूरी एक हेल्दी प्रेग्नेंसी रहती है. इस एक बात ने मेरे मन को परेशान करने वाले हर नकारात्मक ख़याल को दरकिनार करके मुझे अपने आगे आने वाले बच्चे के लिए सकारात्मकता से भर दिया था. मेरी मुश्किल घड़ी में मेरा साथ न सिर्फ मेरे पति ने बल्कि मेरी सास और ससुर ने भी पूरा दिया. मेरी मानसिक स्थिति को समझते हुए वो कई तरह से मुझे अपनी बातों से बहलाने और समझाने की कोशिश करते थे, ताकि मैं नकारात्मकता से बाहर निकलकर उदासी से दूर हो जाऊं, और जो घट चुका है उसे भुलाकर आगे के, अच्छे के बारे में सोचूं.
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हां हमारे शरीर वैसे नहीं हैं, क्योंकि अब हमें न उतना शुद्ध खाना मिलता है, हम 17 साल की उम्र में होस्टल चले जाते हैं. जहां की पतली दाल और अधपकी रोटियां खाकर हम पढ़ाई करते हैं. हमारी शादियां तेरह, सत्रह, या बीस में नहीं होती हैं. और सबसे बड़ी बात हम उन तकलीफों से क्यों गुजरें जिनसे आप गुज़र चुकी हैं. क्या आप अपने शरीर से खुश हैं. पंद्रह-पंद्रह बच्चे पैदा करके? क्या आप अपनी ज़िन्दगी सिर्फ उन बच्चों को पालने में लगाकर खुश हैं? क्या आप इस बात से खुश हैं कि जब आपके पहले बच्चे का बच्चा होने वाला था तब आप भी अपने बारहवें या तेरहवें बच्चे की मां बनने वाली थीं? या क्या आप इस बात से ख़ुश हैं आपने अपने शरीर में अपने लिए कुछ भी नहीं बचने दिया? खैर, इन सवालों का कोई अंत नहीं, लेकिन मैं सिर्फ एक ही जवाब देना चाहती हूं कि हम एक या दो में ही ख़ुश हैं, क्योंकि देश की इकॉनमी के बारे में भी तो हमें सोचना है भाई... !!
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ये डगर बहुत है कठिन मगर, ना उदास हो मेरे हमसफ़र. तो चलिए, अभी के लिए इतना ही, अगली क़िस्त में बताती हूं, कि आगे क्या हुआ... अब मैं कैसी हूं, दोबारा कंसीव करने के बाद मुझे किन-किन परेशानियों से जूझना पड़ा, क्या मां बनने का सुख यूं ही मिल जाता है हम लड़कियों को?

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