अंकिता जैन. जशपुर छतीसगढ़ की रहने वाली हैं. पढ़ाई की इंजीनियरिंग की. विप्रोइंफोटेक में छह महीने काम किया. सीडैक, पुणे में बतौर रिसर्च एसोसिएट एक साल रहीं.साल 2012 में भोपाल के एक इंजीनियरिंग इंस्टिट्यूट में असिस्टेंट प्रोफेसर रहीं.मगर दिलचस्पी रही क्रिएटिव राइटिंग में. जबर लिखती हैं. इंजीनियरिंग वाली नौकरीछोड़ी. 2015 में एक नॉवेल लिखा. ‘द लास्ट कर्मा.’ रेडियो, एफएम के लिए भी लिखती हैं.शादी हुई और अब वो प्रेग्नेंट हैं. ‘द लल्लनटॉप’ के साथ वो शेयर कर रही हैंप्रेग्नेंसी का दौर. वो बता रही हैं, क्या होता है जब एक लड़की मां बनती है. पढ़िएदूसरी क़िस्त.--------------------------------------------------------------------------------“रोम और वेनिस की गलियों में अपनी पहली सालगिरह पर कुछ यादें बनाकर मैं और मेरे पतिइंडिया वापस लौट रहे थे. दिल्ली से आगरा रिश्तेदारों के यहां मिलते हुए हमझारसुगुड़ा के लिए अपनी घर वापसी की ट्रेन में बैठते, उससे पहले ही मुझे स्टेशन परउल्टी हो गई. क्योंकि मैं उस महीने की अपनी पीरियड की डेट मिस कर चुकी थी, इसलिएमेरी ताई-सास को लगा कि ये उल्टी खुश-खबरी की निशानी है. हालांकि मैं उतना श्योरनहीं थी, क्योंकि मुझे सफर में पहले भी उल्टियां होती रही हैं, हां लेकिन पीरियड्समिस होना एक साइन था. फोन पर बात करने पर जब मेरी ताई-सास ने मुझे कहा कि देख लेनाखुशखबरी ही होगी तो मेरा दिमाग उस डायरेक्शन में चलने लगा, जिस डायरेक्शन में जानेसे मैं उसे साल भर से रोक रही थी... क्या मैं मां बनने के लिए तैयार हूं ?”आज से दो-तीन साल पहले अगर कोई मुझसे शादी या उसके बाद होने वाले बच्चों की बातकरता था तो मैं खीज पड़ती थी, शायद ऐसा करने वाली मैं अकेली नहीं हूं. हमारे ज़मानेकी इंडिपेंडेंट लड़कियां 25-26 की उम्र में भी शादी और बच्चों के लिए मानसिक रूप सेतैयार नहीं होती. अपनी माओं, दादियों की ज़िन्दगी में हमेशा सिर्फ पति और बच्चेदेखकर हम इतने उकता चुके होते हैं कि हमें लगने लगता है कि शादी और बच्चों के अलावाभी एक दुनिया है, एक ज़िन्दगी है, जो हमें पुकार रही है. और बिना मतलब लड़के रिजेक्टकरके, घर वालों से लड़-झगड़ के हम शादी को टालते रहते हैं. मैं भी कई सालों तक यहीकरती रही. लेकिन फिर धीरे-धीरे मेरी फेसबुक वाल, मेरी सहेलियों की शादियों कीतस्वीरों और फिर उनके प्री-प्रेगनेंसी फोटो शूट, नन्हे-मुन्ने बच्चों की तस्वीरोंसे भरने लगा. जिसने मुझे कुछ हद तक अकेलेपन और ज़िन्दगी में एक साथी की कमी होने काअहसास कराना शुरू कर दिया. सच कहूं तो कारण बहुत सिली है, लेकिन वाकई ऐसा होता था.फिर एक वक़्त आया, जब मुझे लगा कि मैं अपनी जिद से, अपनी ज़िन्दगी में वो सब कुछ करचुकी हूं जो मैं करना चाहती थी, बोर्डिंग में पढ़ाई, पुणे, दिल्ली की लाइफ एन्जॉय,विप्रो और सीडेक जैसी कंपनियों में काम, एक बेहतरीन कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर,एक मैगज़ीन की ऑनर, और एक किताब की राइटर. इसके अलावा दोस्तों के साथ जी भर करतफरी... अब शायद टाइम आ चुका था जब मुझे भी अपने अंदर मातृत्व को महसूस करने का मनहोने लगा था. कई सारे कारणों से मैं बिन ब्याही मां नहीं बनना चाहती थी, और ना हीकिसी हिपोक्रेट से शादी करना चाहती थी, इसलिए सेटल होने के लिए कोई मन मुरादी लड़काचाहती थी. और किस्मत से समर्थ के रूप में मिल भी गया. लेकिन मज़े की बात यह है किशादी होते ही मेरी बच्चा पैदा करने की इच्छा अचानक गायब हो गई, तब एक नयी इच्छापैदा हुई, शादी एन्जॉय करने की... लगा कि अगर अभी बच्चा पैदा कर लिया तो समर्थ औरमैं कभी अपना वक़्त नहीं जी पाएंगे... इसलिए शादी के बाद जब भी कोई मुझे बच्चे केलिए कहता मैं मन ही मन उसे कोसती. फिर शादी के साल-भर बाद अचानक से एक उल्टी नेमेरे मन में हजारों सवाल खड़े कर दिए. मेरे मन से भी ज्यादा मेरे लिए ये जानना ज़रूरीथा कि समर्थ अभी पिता बनने के लिए तैयार हैं या नहीं... क्योंकि मुझे लगता था कि“बच्चा पैदा होने के बाद मां तो बनना पड़ता है, लेकिन पिता शायद बनना नहीं पड़ता,पिता बना जाता है” उस उल्टी के बाद जब कुछ और दिन मेरे पीरियड्स नहीं आए तो हमनेडरते हुए होम प्रेगनेंसी टेस्ट किया जो पॉजिटिव था. हम दोनों ख़ुश भी थे और डरे हुएभी, क्यूंकि हम पूरी तरह तैयार नहीं थे. “क्या वाकई मैं मां बनने के लिए तैयारहूं?” “क्या ये सही टाइम है?” “इतना काम तो कर लिया. चलो अब एक बच्चा पैदा कर लेतेहैं. अगर अभी नहीं किया तो देर होने पर मेडिकल इशू ना आयें” और ना जाने कितने सवालमुझे घेरे हुए थे. अपने आस-पास के कुछ केसेस भी बार-बार सामने आने लगे थे जिनमेकपल्स ने पहले प्लानिंग नहीं की थी और बाद में वो मां-बाप नहीं बन पाए... कारण कुछभी रहे हों लेकिन बहुत उल-जलूल सवाल मेरे साथ खेल रहे थे. मैं बच्चे को एक काम कीतरह नहीं करना चाहती थी, और न ही ज़िन्दगी में आई एक सामजिक ज़िम्मेदारी की तरह...मैं चाहती थी कि बच्चे को तब अपनी ज़िन्दगी में लाऊं जब मैं पूरी तरह उसके लिए अपनेअन्दर ललक महसूस करूं. तैयार हूं. इन सवालों को मैं सोच भले रही थी, लेकिन इनकेजवाब कैसे भी आते, मैं कंसीव कर चुकी थी, और कुदरत की इस नेमत को खोना नहीं चाहतीथी. मन से या बिना मन से मैं उसे स्वीकार करने के लिए ख़ुद को तैयार कर रही थी. औरदो-तीन दिन में ही घर-वालों के खिले चेहरों ने मुझे तैयार होने में मदद की. पर येज़िन्दगी है मेरी जान यहां सब कुछ आपके मुताबिक़ नहीं होता. मेरी पहली प्रेगनेंसी“केमिकल प्रेगनेंसी” निकली. सामान्य भाषा में इसे मिस्केरिज ही कहा जाता है, लेकिनइसकी असल टर्म “केमिकल प्रेगनेंसी” है, जिसमें स्पर्म एग को fertilize तो करता हैलेकिन एग यूट्रस में इम्प्लांट नहीं हो पाता. इसके होने के जो मुख्य कारण सामने आतेहैं, उनमे से एक है आपके शरीर में कुछ nutrition की कमी, जो उस अंडे को उतनीnutrition नहीं दे पाते कि वो आगे का सफ़र तय कर सके. कई महिलाओं को जिनके पीरियड्सअक्सर समय पर नहीं होते या सामान्य पीरियड्स वालों को भी कई बार यह पता चलने सेपहले ही पीरियड्स आ जाते हैं कि उन्होंने किसी अंडे को fertilize भी किया था, या वोमां बनने वाली थीं. जब हम पहली बार डॉक्टर के पास गए, तब मेरे पीरियड्स मिस हुएपांच हफ्ते हो चुके थे, लेकिन अल्ट्रासाउंड में डॉक्टर को कोई भी Yolk Sac याgestational sac नहीं दिखा, जो अर्ली प्रेगनेंसी का साइन होता है. हां पर मेरायूरिन टेस्ट पॉजिटिव था, इसलिए एक उम्मीद के साथ डॉक्टर ने मुझे कुछ दवाइयां औरइंजेक्शन देकर विदा किया और कुछ हफ्ते बाद आने को कहा. हॉस्पिटल में यूरिन टेस्टपॉजिटिव आने के बाद अचानक मैं ख़ुश हो गई थी, सारे नेगेटिव ख़याल जा चुके थे, और मैंपूरे दिलो-जान से बच्चे को चाहने लगी थी. सब ठीक था, कि डॉक्टर के यहां से आने केतीन दिन बाद शाम के वक़्त मुझे कुछ ब्लड ड्रॉप्स हुए. मैं बहुत ज्यादा घबरा गयी थी,और तुरंत अपनी सासू-मां को सूचित किया. एक पल को उनके चहरे के एक्सप्रेशन देखकर लगाजैसे मैंने उनकी सारी खुशियां छीन ली हों. वो भी बहुत घबरा गईं, पर ब्लीडिंग बहुतमाइनर थी इसलिए उन्होंने मुझे परेशान न होने की हिदायत के साथ शान्ति से सोने औरअगले दिन डॉक्टर से बात करने की सलाह दी. मैं मन-ही-मन ख़ुद को कोसने लगी थी किमैंने क्यों सोचा कि काश मैं कुछ और दिन बाद प्रेग्नेंट होती, शायद इसलिए ऐसा होरहा है. लेकिन तब एक बहुत बड़े सपोर्ट के रूप में मेरे पति मेरे साथ आये. इन्टरनेटपर कई सारे आर्टिकल्स पढ़ने के बाद उन्होंने मेरा हाथ थामकर मुझे समझाया कि डरने कीकोई ज़रुरत नहीं है, जब egg fertilize होकर यूट्रस में इम्प्लांट होता है तो किसीकिसी को माइनर ब्लीडिंग होती है.“जब कोई पत्नी किसी भी वजह से कमज़ोर पढ़ती है, और एक ऐसे दौर से गुज़र रही होती है,जिसकी तकलीफ सिर्फ औरतों के लिए बनी हो, तब अगर उसका पति औरतों वाली वो सारी बातेंपढ़कर समझकर उसके साथ हो. उसे समझाए, और उसके अन्दर चल रही नकारात्मकता को ख़त्म करनेमें सहायक बने तो शायद वो दुनिया का सबसे अच्छा मर्द और सबसे अच्छा पति है. फिरचाहे वो सामान्य दिनों में अपनी गीली टॉवल बिस्तर पर रखता हो. अपने गंदे मोज़े यहांवहां पटकता हो. अपने अंडर-गारमेंट्स ना धोता हो. या स्पोर्ट्स क्लब से आने के बादअपनी पसीने से भरी टीशर्ट आपको सताने के लिए बच्चों की तरह आपके ऊपर फेंक देताहो... इस सबके बावजूद भी वो दुनिया का सबसे अच्छा पति है, क्योंकि वो तब आपके साथहै जब आपको उसकी सबसे ज्यादा ज़रूरत है.”समर्थ ने भी मेरा पूरा साथ दिया. पहले दो-तीन दिन जब मामूली ब्लड स्पॉट हुए तो हमेंयही लगा कि implantation ब्लीडिंग है, लेकिन जब डॉक्टर को दिखाया और उसने नार्मल औरवेजिनल दोनों तरह के अल्ट्रासाउंड किये तो उसे मेरी यूट्रस में implantation का कोईनमो-निशान नहीं मिला, और रिपोर्ट आते ही उसने कहा, “मुझे नहीं लगता ये प्रेगनेंसीआगे जायेगी”. वो बच्चा जिसके होने पर मैं कुछ दिन पहले घबरा रही थी, कुछ और वक़्तमांग रही थी, जब वो जाने को हुआ तो मैं रो दी. घर का माहौल अचानक से उस सूखे पौधेकी तरह हो गया जो एक रात पहले हरा-भरा था, और अगली ही सुबह सूख चुका था.उस दिनडॉक्टर की उस बात ने हमें थोड़ी हिम्मत बंधाई थी. हमने उसी दिन hCG टेस्ट कराया,जिसकी रिपोर्ट आने से पहले ही, मेरे पीरियड्स पूरी तरह आ चुके थे. पूरी तरह साफ़ होचुका था कि मैं मां बनने का एक मौका गंवा चुकी हूं. पंद्रह दिन में ही हम उस ख़ुशीसे इतना ज्यादा जुड़ चुके थे कि, जब पीरियड्स में हुई ब्लीडिंग के वक़्त खून केबड़े-बड़े थक्के निकले तो लगा जैसे मेरा बच्चा टुकड़ों में निकल रहा हो. हमारे उदासचेहरे देखकर डॉक्टर ने हमसे कहा कि, “वैसे तो ऐसे केसेस में मैं पीरियड्स होने कीदवाई देती हूं, ताकि आगे दिक्कत ना हो.. लेकिन आप दोनों को देखकर कहूंगी कि आप लोगएक-दो दिन और देख लें, और 72 घंटे के डिफरेंस से अपना hCG टेस्ट करा लें, अगर 72घंटे में आपका hCG लेवल दुगना हो गया तो मतलब आपकी प्रेगनेंसी आगे बढ़ेगी, वरनानहीं. उससे पूरी तरह साफ़ हो जाएगा.. और परेशान होने की ज़रुरत नहीं है... अभी आपकेपास बहुत समय है...आज नहीं तो कल.. ख़ुश हो जाइए कि आप बिना किसी परेशानी की कंसीवतो कर सकती हैं” चूंकि, egg fertilize हो चुका था, इसलिए यूट्रस की वाल ने खून जमाकर-करके आने वाले बच्चे के लिए ख़ुद को तैयार करना शुरू कर दिया था, और जब वो बच्चानहीं आया तो यूट्रस की वाल से खून की परत टूटकर ब्लीडिंग बनकर बाहर निकलने लगी. मैंउस ब्लीडिंग से सदमे में थी. न सिर्फ मानसिक रूप से टूट चुकी थी, बल्कि शारीरिक रूपसे भी. उस चंद दिनों में चले इमोशनल रोलर-कोस्टर से अगर मैं बिना किसी पीड़ा के बाहरनिकल पाई तो इसका सबसे बड़ा कारण मेरे पति हैं. जब पेट में खलबत्ता कुछ कूट रहा हो,और आप हर तीन घंटे में खून से सने पेड्स बदल रहे हों, तब अगर दवा की तरह कुछ काम करसकता है तो वो वाकई आपके साथी का साथ है. इसके अलावा सब सिर्फ कहने की बाते हैं.मैंने कुछ ही दिनों में अपनी केमिकल प्रेगनेंसी से मिले शारीरिक और मानसिक ट्रामासे फतह पा ली थी. और फिर कुछ महीनों बाद ऊपर वाले ने मुझे दोबारा मां बनने का मौकादिया. अब तक सब ठीक चल रहा है. क्या चल रहा है? एक मिस-कैरिज के बाद दोबारा मांबनने के लिए क्या-क्या प्रीकोशन लेने पड़े? क्या-क्या तैयारियां करनी पड़ीं? इस सबकेबारे में अगले आर्टिकल में बताउंगी. अभी सिर्फ एक छोटी सी टिप के साथ अपनी बात ख़त्मकरती हूं कि, अगर आपके साथ कभी ऐसा होता है या केमिकल प्रेगनेंसी की तकलीफ होती है,तो D&C कराने की जल्दी ना करें. आप अपनी यूट्रस को जितना औजारों से दूर रखेंगी उतनाशारीरिक रूप से स्वस्थ रहेगीं, हमारी दादी नानी के बताये नुस्खे, या देशी तरीके जोऐसे केसेस यूट्रस को साफ़ करने के लिए कारगर हैं उन पर अमल करना दकियानूसी नहींबल्कि अपने शरीर को प्राकृतिक रूप से मजबूत करने का एक तरीका है और उससे भी ज़रूरीबात कि किसी भी निर्णय पर पहुंचनें से पहले संबंधित आर्टिकल्स, बुक्स, या उपलब्धजानकारी अच्छी तरह पढ़ें, इन्टरनेट पर बहुत कुछ उपलब्ध है हमारे लिए... जो डॉक्टर नेकह दिया सिर्फ उसी पर आंख बंद करके भरोसा करना ज़रूरी नहीं है..अपनी अक्ल लगाएं औरअपने शरीर को बचाएं.-------------------------------------------------------------------------------- पहली क़िस्त ये रही पढ़ लेनाएक प्रेग्नेंट लड़की की डायरी: पार्ट-1